ईरान के जेन-जेड प्रदर्शनकारियों से अमेरिकी सहानुभूति के वैश्विक मायने

अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार बताते हैं कि पहले तो अमेरिका ने इन्हें यानी चीन-भारत को पटाकर और भारत-चीन को परस्पर उलझाकर अपने चिर शत्रु देश रूस को और अधिक कमजोर की कोशिशें की, लेकिन जब वो अपने नापाक इरादों में सफल नहीं हुआ तो इनके पड़ोस में 'भारत विरोध' को हवा दिलवानी शुरू कर दी।
ईरान के जेन-जेड प्रदर्शनकारियों से अमेरिकी सहानुभूति के वैश्विक मायने बड़े ही खतरनाक हैं। लिहाजा यदि समय रहते ही एशियाई देश नहीं चेते तो वे सब धीरे-धीरे अमेरिकी साम्राज्यवादी रणनीतियों के सहज शिकार बन सकते हैं। पहले बंगलादेश, फिर नेपाल और अब ईरान में हुए जेन-जेड प्रदर्शन वाकई अमेरिकी डीप स्टेट की उन छिपी हुई मंशाओं को उजागर करते हैं, जिसका उद्देश्य चीन और रूस के सदाबहार मित्र भारत को कमजोर करना है क्योंकि ये दोनों अमेरिका की वैश्विक दादागिरी की राह के सबसे बड़े रोड़े हैं।
अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार बताते हैं कि पहले तो अमेरिका ने इन्हें यानी चीन-भारत को पटाकर और भारत-चीन को परस्पर उलझाकर अपने चिर शत्रु देश रूस को और अधिक कमजोर की कोशिशें की, लेकिन जब वो अपने नापाक इरादों में सफल नहीं हुआ तो इनके पड़ोस में 'भारत विरोध' को हवा दिलवानी शुरू कर दी। इसलिए बंगलादेश व नेपाल न सही, लेकिन ईरान में भारत, चीन और रूस को अविलंब हस्तक्षेप करना चाहिए और कथित लोकतंत्र के नाम पर अमेरिकी थानेदारी का कड़ा अंतर्राष्ट्रीय प्रतिरोध करना चाहिए, अन्यथा अगला नम्बर अब उन्हीं का आएगा।
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देखा जाए तो ईरान में रोजगार और बढ़ती महंगाई को लेकर बीते पांच दिनों से जारी जेन-जेड के विरोध प्रदर्शनों ने अब हिंसक रूप अख्तियार कर लिया है। लिहाजा, ईरानी सुरक्षा बलों ने उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की, जिसमें अबतक सात प्रदर्शनकारियों के मारे जाने और कइयों के घायल होने की पुष्टि हुई है। वहीं, इससे व्याकुल अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने माइक्रो ब्लॉगिंग साइट 'एक्स' पर लिखा है कि, "अगर ईरान शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को मारता है तो हम बचाने को तैयार हैं।"
वैश्विक कूटनीतिज्ञों का मानना है कि अमेरिकी नेतृत्व द्वारा दिया गया उक्त बयान ईरान में लोकतंत्र की हिफाजत के बहाने वहां लगी आग में घी डालने जैसा है, जो निंदनीय भी है। इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंफ भी अब डीप स्टेट के समक्ष घुटने टेक चुके हैं और इसकी तथाकथित कारगुजारियों को बढ़ावा देने लगे हैं, जो वाकई दिलचस्प है।
हालांकि, इस अमेरिकी दुस्साहस पर पलटवार करते हुए ईरान ने दो टूक शब्दों में कहा कि, "ईरान की सुरक्षा रेड लाइन है।" ईरान के सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव अली लारीजानी ने कहा कि- "अमेरिका और इस्राइल प्रदर्शन भड़का रहे हैं। अमेरिकी दखल से अशांति फैल जाएगी, उन्हें अपने सैनिकों की फिक्र करनी चाहिए।" कहने का तातपर्य यह हुआ कि यदि अमेरिका ईरान पर हमला करेगा तो ईरान उसके खाड़ी देशों और अरब देशों में स्थित सैन्य अड्डों को निशाना बनाएगा। पिछले वर्ष वह ईरान-इजरायल युद्ध के दौरान ऐसा कर भी चुका है, जिसके बाद घबराहट में अमेरिका ने उस युद्ध को मध्यस्थता करके बंद करवाया था।
स्वाभाविक सवाल है कि ईरानी प्रदर्शनकारियों के जिस तरह के उग्र विडियो सामने आए हैं, जहां प्रदर्शनकारी ईरान की सरकारी इमारतों पर पत्थरबाजी करते देखे गए, उसके दृष्टिगत ईरानी सुरक्षा बलों ने सख्त कार्रवाई करके अपने राष्ट्रीय धर्म का पालन किया है। अन्यथा बंगलादेश व नेपाल की तरह वो सुरक्षाकर्मी भी घुटने टेक सकते थे। हालांकि उन्होंने यह सख्ती दो तीन दिन प्रदर्शनकारियों को झेलने के बाद दिखाई है।
इसलिए डॉनल्ड ट्रंप का यह कहना कि, "ईरान का रिवाज मारना है!", न्यायसंगत प्रतीत नहीं होता है। उनकी यह टिप्पणी कि, "अमेरिका प्रदर्शनकारियों की मदद को आगे बढ़ने के लिए तैयार है", प्रथमदृष्टया ईरान के आंतरिक मामलों में खुला हस्तक्षेप है। इससे जाहिर है कि अब वो भी उस डीप स्टेट के हाथों खेलने को अभिशप्त हैं, जिसका विरोध उन्होंने खुद ही अपने प्रथम कार्यकाल के दौरान किया था। लिहाजा स्वाभाविक सवाल है कि क्या अब्राहम परिवार में एका स्थापित करने की चाह रखने वाले डॉनल्ड ट्रंप अब ईरान को इस्लामिक देश नहीं मानते हैं और उसे पुनः पारसी देश बनाने की चाल चल रहे हैं, यक्ष प्रश्न है।
ऐसा इसलिए कि अमेरिकी डीप स्टेट एक षड्यंत्र सिद्धांत है जो संघीय एजेंसियों जैसे सीआईए, एफबीआई और एनएसए के गुप्त नेटवर्क को संदर्भित करता है। यह कथित रूप से चुनी हुई सरकार के समानांतर सत्ता संचालित करता है। जहां तक डीप स्टेट की परिभाषा का सवाल है तो आपको पता होना चाहिए कि यह शब्द 1990 के दशक में तुर्की से उत्पन्न हुआ और अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल में लोकप्रिय हुआ। क्योंकि तब ट्रंप ने इसे रूस की जांच और अन्य विपत्तियों के लिए जिम्मेदार ठहराया। सच कहूं तो यह नेटवर्क वित्तीय, औद्योगिक हितों के साथ मिलकर निर्वाचित नेताओं को प्रभावित करता है।
ऐसे में स्वाभाविक सवाल है कि आखिर अमेरिकी राष्ट्रपति इसे क्यों संरक्षण देते हैं? तो इसका माकूल जवाब यह आम व खास धारणा है कि कुछ प्रशासनों (जैसे- जो बाइडन प्रशासन के द्वारा) को डीप स्टेट का संरक्षण प्राप्त होता है क्योंकि यह विदेश नीति और खुफिया कार्यों में स्थिरता प्रदान करता है। हालांकि, राष्ट्रपति ट्रंप जैसे नेता इसे अपना दुश्मन मानते आये हैं और इसका विरोध करते रहे हैं। यही वजह है कि वर्तमान राष्ट्रपति ट्रंप (2025 में पुनः शपथग्रहण के बाद) कहीं इसे कमजोर करने का प्रयास कर रहे हैं तो कहीं शह देते नजर आ रहे हैं। इससे वह अपने ही उद्देश्य में विफल साबित हुए।
आपने देखा होगा कि भारत में विगत तीन पारियों से केंद्रीय सत्ता पर काबिज भाजपा ने भी डीप स्टेट पर मोदी सरकार को अस्थिर करने का आरोप लगाया था, जबकि डीप स्टेट मुख्यतः षड्यंत्र सिद्धांत है। कई अमेरिकी सर्वे में वहां के आधे लोग इसके अस्तित्व में विश्वास करते हैं। कहना न होगा कि डीप स्टेट की अवधारणा मूल रूप से एक षड्यंत्र सिद्धांत है जो गुप्त शक्तियों के एक नेटवर्क को संदर्भित करता है। इसका आधुनिक इतिहास तुर्की से जुड़ा है, जहां 1990 के दशक में "डेरिन देवलेट" (गहरा राज्य) शब्द का इस्तेमाल सेना, खुफिया एजेंसियों और अपराधी तत्वों के गठजोड़ के लिए हुआ।
जहां तक इसके उद्भव की बात है तो इसका प्रारंभिक चरण तुर्की में 1990 के दशक के एक सड़क हादसे से लोकप्रिय हुआ, जिसमें एक राजनेता, पुलिस अधिकारी और माफिया डॉन की मौत हुई। इससे कथित गुप्त गठबंधन यानी डीप स्टेट की चर्चा शुरू हुई। फिर अमेरिका में ओबामा प्रशासन के दौरान इसका जिक्र बढ़ा, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप ने 2017 से इसे मुख्यधारा में लाकर सीआईए और एफबीआई जैसी एजेंसियों को निशाना बनाया।
जहां तक अमेरिकी संदर्भ में इसके विकास की बात है तो ट्रंप के पहले कार्यकाल में डीप स्टेट को रूस की जांच और अन्य घटनाओं से जोड़ा गया। 2017-18 के सर्वे में लगभग आधे अमेरिकियों ने इसके अस्तित्व में विश्वास जताया। कुछ सिद्धांतकार इसे रोथ्सचाइल्ड, रॉकफेलर जैसे वित्तीय समूहों से जोड़ते हैं, जो 18वीं सदी से बैंकिंग के माध्यम से प्रभाव डालते रहे।
जहां तक डीप स्टेट के वैश्विक प्रसार की बात है तो यह तुर्की से निकलकर यह मिस्र, पाकिस्तान और भारत जैसे देशों में फैला। भारत में भाजपा ने 2024 में इसे मोदी सरकार के खिलाफ साजिश से जोड़ा। हालांकि, कतिपय विद्वान इसे अतिशयोक्तिपूर्ण सिद्धांत मानते हैं क्योंकि वो खुद किसी न किसी रूप में डीप स्टेट से लाभान्वित हैं। वास्तव में डीप स्टेट एक षड्यंत्र सिद्धांत है जो सरकारी, सैन्य, खुफिया एजेंसियों और कॉर्पोरेट अभिजात वर्ग के गुप्त नेटवर्क को संदर्भित करता है। यह नेटवर्क लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार के बाहर काम करता है और नीतियों को प्रभावित करने का दावा किया जाता है।
मसलन, डीप स्टेट शब्द तुर्की के "डेरिन देवलेट" से लिया गया है, जो गैर-निर्वाचित तत्वों के समूह को दर्शाता है। अमेरिकी संदर्भ में, यह CIA, FBI, NSA जैसी एजेंसियों को लक्षित करता है जो कथित रूप से राष्ट्रपति के फैसलों को बाधित करती हैं। यह समूह अपने विशेष हितों, जैसे सुरक्षा या आर्थिक एजेंडे, को आगे बढ़ाने के लिए गुप्त रूप से सक्रिय रहता है। वहां का पेंटागन, हथियार निर्माता कंपनियां, नौकरशाही और वित्तीय अभिजात यानी बड़े कॉर्पोरेट्स, बैंकिंग समूह जैसे रॉकफेलर या रोथ्सचाइल्ड भी इससे जुड़े हुए हैं।
इतना ही नहीं, गूगल, फेसबुक जैसे टेक दिग्गज और ओपन सोसाइटी फाउंडेशन जैसे एनजीओ भी इसके पार्ट समझे जाते हैं। नौकरशाह और पूर्व अधिकारी, सेवानिवृत्त न्यायाधीश, खुफिया अधिकारी जो वैचारिक प्रतिबद्धताओं से प्रेरित रहते हैं, इसके अंग बन हैं। वहीं वहां के
वित्तीय परिवार जैसे रोथ्सचाइल्ड, रॉकफेलर जैसे समूह, जो बैंकिंग और परोपकार के माध्यम से प्रभाव डालते हैं। वहां की सिविल सोसायटी यानी मीडिया, प्रोफेसर, कलाकार और एनजीओ कार्यकर्ता जो मानवाधिकार या पर्यावरण के नाम पर सक्रिय रहते हैं।
इसके संचालन का तरीका भी गजब है। ये समूह लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को बायपास कर शासन परिवर्तन या अस्थिरता पैदा करते हैं। भारत में इन्हें अर्बन नक्सल या राष्ट्रविरोधी इकोसिस्टम से जोड़ा जाता है। यह लोकतांत्रिक नियंत्रण से बाहर रहता है और निर्वाचित नेताओं को कमजोर करने का आरोप लगाया जाता है। हालांकि, कई विशेषज्ञ इसे अतिशयोक्तिपूर्ण सिद्धांत मानते हैं।
बताया जाता है कि अमेरिका के आर्थिक और कॉर्पोरेट हित डीप स्टेट के सिद्धांत में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं, जहां इन्हें गुप्त नेटवर्क का अभिन्न हिस्सा माना जाता है। ये हित सरकारी नीतियों को प्रभावित कर लाभ कमाते हैं। वहां से कॉर्पोरेट जुड़ाव रखने वाले यानी कॉर्पोरेट दिग्गज जैसे गूगल, फेसबुक और हथियार कंपनियां डेटा गोपनीयता, कराधान तथा बाजार विनियमन पर प्रभाव डालती हैं। ये शक्तिशाली इकाइयां खुफिया एजेंसियों के साथ साझेदारी कर आर्थिक नीतियों को आकार देती हैं। ओपन सोसाइटी फाउंडेशन जैसे संगठन शासन परिवर्तन को बढ़ावा देते हैं।
इसका आर्थिक प्रभाव निर्णायक होता है। वहां के वित्तीय परिवार जैसे रोथ्सचाइल्ड और रॉकफेलर बैंकिंग प्रणाली पर नियंत्रण के माध्यम से प्रमुख घटनाओं जैसे एशियाई वित्तीय संकट को प्रभावित करते हैं। ये समूह मुक्त बाजार, व्यापार वार्ता और शॉक थेरेपी जैसी नीतियों को प्रोत्साहित कर विकासशील देशों में बाजार पहुंच सुनिश्चित करते हैं। हिंडनबर्ग रिसर्च जैसे उदाहरण स्टॉक बाजार अस्थिरता पैदा करते हैं। ये परस्पर लाभ के लिए काम करते हैं। ये हित सैन्य-औद्योगिक परिसर के साथ मिलकर युद्ध अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देते हैं, जहां कॉर्पोरेट फंडिंग राजनीतिक प्रभाव खरीदती है। भारत जैसे देशों में एनजीओ वित्तपोषण कोयला परियोजनाओं का विरोध करता है, जो जीडीपी वृद्धि को 2-3% नुकसान पहुंचाता है।
इसलिए इनके कारनामों से शेष दुनिया के लोगों को सावधान रहने की जरूरत है, क्योंकि गरीब व विकासशील देशों के धनलोलुप नेता व चतुरसुजान अब इनके अंग बन चुके हैं। भारत, चीन व रूस में भी इनकी अच्छी खासी तादात होने की अटकलें हैं।
- कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
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