History Revisited: क्या नेताजी सुभाष चंद्र ही थे गुमनामी बाबा

History Revisited: क्या नेताजी सुभाष चंद्र ही थे गुमनामी बाबा

इंदिरा सरकार के दौरान जस्टिस मुखर्जी की अध्यक्षता में तीसरी बार जांच आयोग गठित किया गया। आयोग ने रिपोर्ट पेश करते हुए दावा किया कि विमान हादसे में नेताजी की मौत नहीं हुई है और इस मामले में आगे और जांच की जरूरत है।

समकालीन उत्तर प्रदेश के तत्कालीन गवर्नर को नवंबर 1945 में पत्र लिखा जिसमें कहा गया था कि आंदोलनकारियों की बढ़ती तादाद साफ दिखाती है कि बोस लोगों की नजर में गांधी की जगह लेते नजर आ रहे हैं। इन सबके बीच नेताजी कहां थे? जवाब मिला द्वितीय विश्व युद्ध के अंत में ताइवान में है क्या हवाई दुर्घटना में चल बसे थे? लेकिन बोस का मृत शरीर कभी नहीं मिला, इससे उन अफवाहों को बल मिला कि वे उस हवाई दुर्घटना में बच गए थे। सन 1956 और फिर 1970 में नेहरू और क्रमशः इंदिरा गांधी सरकार के ऊपर दबाव बना कि वह इस मुद्दे की जांच कराएं। शाहनवाज खान और जाने माने जज रहे जीडी खोसला दोनों ही ने हवाई दुर्घटना की बात को सही ठहराया। लेकिन भूलने वाले ना भूले ना विश्वास कर पाए। उनका कहना था कि जांच निष्पक्ष नहीं थी। 1960 के दशक में एक नई कहानी ने जन्म लिया इस बार बोस को भारत के एक सुदूर कोने में एक संन्यासी के वेश में देखे जाने का दावा किया गया। आज से लगभग 15-20 वर्ष पहले एक बार फिर से इस मुद्दे पर नई थ्योरी सामने आई जब एक कोर्ट के निर्णय की वजह से नेताजी की गुत्थी को दोबारा खोला गया। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश रह चुके मुखर्जी की जांच ने पासा पलट दिया था। अपनी रिपोर्ट में उन्होंने सरकार को उनकी जांच में पूरा सहयोग न करने के लिए जबरदस्त फटकार लगाई। उन्होंने यह भी लिखा कि ताइवान में बोस की मृत्यु की कहानी अंग्रेजों की आंखों में धूल झोंकने की एक जापानी चाल थी, ताकि वह बोस के रूस जाने की बात छिपा सके। सन 2005 में सरकार को जब यह रिपोर्ट मिली और वह तिलमिला उठी।

सन 1995 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान आईएनए से जुड़े कुछ वृद्ध जापानी सैनिक ने भारत सरकार से अपील की कि वह नेता जी की अस्थियों को भारत लेकर आए। माना यह जाता था कि ताइवान की हवाई दुर्घटना के बाद नेताजी का अंतिम संस्कार वहीं कर दिया गया था और तत्पश्चात उनके अस्थियों को जापान लाकर टोक्यो के एक बौद्ध मंदिर जिसका नाम रेनकोजी मंदिर था में रख दिया गया। 

प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव, गृह मंत्री एसबी चव्हाण, विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी ने इस अपील को लेकर विचार विमर्श किया। इंटेलिजेंस ब्यूरो की टिप्पणी तर्कसंगत थी- "अगर अस्थियां भारत में लाई गयी तो बहुत संभव है कि पश्चिम बंगाल के लोग इसे नेताजी की मृत्यु की आधिकारिक कहानी को उन पर थोपने का एक तरीका समझें, यह गलत हो सकता है।" 

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प्रणब मुखर्जी सन 1995 में नेताजी के निधन के रहस्य को सुलझाने के लिए निकल पड़े। करीब दस साल बाद जस्टिस मुखर्जी की रिपोर्ट के अनुसार प्रणब मुखर्जी उन गवाहों में से थे जिन्होंने ताईवान में नेताजी के निधन की पुष्टि की थी। 

जांच और नतीजे 

नेताजी की रहस्यमई मौत की जांच को लेकर अब तक तीन आयोग का गठन किया जा चुका है लेकिन इनके निष्कर्ष विवादास्पद ही बने रहे हैं। जांच आयोग की भूल भुलैया में नेताजी किसी जासूसी कथा के चरित्र बनाकर रखती है गए हैं। 

शाहनवाज आयोग 1956 

आयोग के सदस्यों ने जापान जाकर घटना की जांच की है आयोग ने रिपोर्ट में बताया कि जापान के रेनकोजी मोनेस्ट्री में नेताजी की अस्थियां रखी हुई है। अता उनकी मृत्यु हवाई दुर्घटना के कारण ताइवान में ही हुई थी। 

जस्टिस जीडी खोसला आयोग 1970 

खोसला आयोग ने भी कुछ इन्हीं निष्कर्षों के साथ रिपोर्ट पेश की। 

जस्टिस मुखर्जी आयोग 1999 

इंदिरा सरकार के दौरान जस्टिस मुखर्जी की अध्यक्षता में तीसरी बार जांच आयोग गठित किया गया। आयोग ने रिपोर्ट पेश करते हुए दावा किया कि विमान हादसे में नेताजी की मौत नहीं हुई है और इस मामले में आगे और जांच की जरूरत है। आयोग ने 2005 को अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी लेकिन 2006 में सरकार ने रिपोर्ट को मानने से इनकार कर दिया। 

एक दावा यह भी 

जम्मू कश्मीर के राजौरी शहर में 25 किलोमीटर दूर दलहनी गांव के लोगों का भी दावा है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस 70 के दशक में उनके गांव आए थे और यही कुटिया बनाकर रहते थे। गांव में उनकी समाधि होने की बात भी की जाती है। इस गांव के मंदिर में नेताजी से जुड़े कई तथ्य हैं लेकिन इसकी पुष्टि सिर्फ इस इलाके के लोग ही करते हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार 1970 के दशक में एक महात्मा इस गांव में आया और कुटिया बनाकर रहने लगा। धीरे-धीरे वहां लोगों का आना-जाना शुरू हो गया और 1973 में यहां पहुंचने वालों की संख्या हजारों में हो गई 15 लोगों ने महात्मा जी कहते थे और मानते थे कि महात्मा जी नेताजी सुभाष चंद्र बोस थे। इस मंदिर में हर साल नेता जी की जन्म तिथि व पुण्यतिथि मनाई जाती है। महात्मा जी के करीबियों के अनुसार उनको डरता कि कांग्रेस सरकार उनको पकड़ कर अंग्रेजों के हवाले कर देगी। दावा किया गया कि उनके पास बंगाल से लोग मिलने आते थे और वह बंगाली में बातचीत भी करते थे। यहां तक कहा गया कि अगर किसी को कोई शक है तो वह समाधि से महात्मा जी की अस्थियां निकाल कर उनका डीएनए टेस्ट करवा सकता है सच्चाई सामने आ जाएगी। 

नेताजी सुभाष चंद्र बोस ही थे गुमनामी बाबा! 

बात 1985 की है माह सितंबर की 16 तारीख उत्तर प्रदेश में अयोध्या से सटे फैजाबाद के सिविल लाइंस स्थित राम भवन के बाहर अचानक लोगों का हुजूम उमड़ने लगा था। राम भवन के अंदर भी उस दिन गतिविधियां अन्य दिनों की अपेक्षा ज्यादा बढ़ी हुई थी। घर के अंदर मौजूद कुछ लोग आपस में कोलकाता वालों को सूचना दे दिए जाने की बातें कर रहे थे। बाहर जमा लोग उस शख्स की एक झलक को बेताब हुए जा रहे थे जो अब इस दुनिया में ही नहीं रहा था। उसकी मौत की खबर सुनकर ही लोग वहां भागे भागे पहुंचे थे। भगवन और गुमनामी बाबा नामक उस शख्स के बारे में लोग यह फुसफुसाहट सुनते रहे थे कि वह शायद नेताजी सुभाष चंद्र बोस है जो वहां गुमनामी में रह रहे हैं। यह भी कहा जाता रहा था कि उनकी शक्ल बिल्कुल नेताजी सुभाष चंद्र बोस से मिलती है। जिनकी कथित तौर पर 1945 में ताइवान में एक विमान हादसे में मौत हो चुकी थी। जाहिर है कि इस बात के कौतुहल में ही कि क्या क्या वाकई गुमनामी बाबा ही नेताजी हैं, आखिर वे दिखते कैसे हैं। लोग उनकी एक झलक पाने को व्यग्र हुए जा रहे थे। वैसे भी राम भवन के पिछवाड़े में बने दो कमरे के मकान में लगभग 2 वर्षों से रह रहे भगवन उर्फ गुमनामी बाबा लोगों के लिए एक अबूझ पहेली बने हुए थे। ना तो वह किसी अपरिचित से मिलते थे ना बात करते थे। उन्होंने अपने आप कौन दो कमरों के उस मकान में ही कैद कर रखा था। जहां कुछ खास लोगों को ही उनसे मिलने बात करने की इजाजत थी। शायद यही वजह थी कि अपना नाम भगवन बताने वाले साधु बाबा का नाम लोगों ने गुमनामी बाबा रख दिया था। गुमनामी बाबा की मौत के 2 दिनों के बाद बड़े गोपनीय तरीके से वही सरयू किनारे गुप्ता घाट पर उनके करीबियों ने उनका अंतिम संस्कार कर दिया। शायद यह सोच कर कि जो रहस्य है उस पर पर्दा ही पड़ा रहे तो बेहतर। रहस्य पर से तो अभी भी पूरी तरह से पर्दा नहीं उठ पाया, लेकिन गुमनामी बाबा की मौत के बाद उनके कमरे से बरामद सामानों ने जरूर उस पहेली को उलझा दिया जो नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मौत से जुड़ी रही है। हैरत की बात है कि गुमनामी बाबा के 24 संदूक में रखे जो 2760 सामान दुनिया की नजरों में आए उसने कहीं न कहीं इस बात को और भी बल दिया कि गुमनामी बाबा कोई और नहीं बल्कि सुभाष चंद्र बोस ही थे जो रूस से भागने के बाद यहां गुमनामी में अपनी जिंदगी बसर कर रहे थे। 

गुमनामी बाबा का सामान 

सुभाष चंद्र बोस के माता पिता और परिवार की निजी तस्वीरें। 

कोलकाता में हर वर्ष 23 जनवरी को मनाए जाने वाले नेता जी के जन्मोत्सव की तस्वीरें। 

लीला राय की मृत्यु पर शोक सभा की तस्वीरें। 

नेताजी की तरह के दर्जनों गोल चश्में। 

555 सिगरेट और विदेशी शराब का बड़ा जखीरा। 

रोलेक्स की जेब घड़ी। 

आजाद हिंद फौज के यूनिफॉर्म। 

1974 में कोलकाता के दैनिक आनंद बाजार पत्रिका में 24 किस्तों में छपी खबर ताइहोकू विमान दुर्घटना एक बनी हुई कहानी की कटिंग

जर्मनी जापानी और अंग्रेजी साहित्य की ढेरों किताबें 

सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु की जांच पर बने शाहनवाज और खोसला आयोग की रिपोर्ट 

हाथ से बने हुए नक्शे जिनमें उस जगह को इंगित किया गया जहां कहा जाता है कि नेताजी का विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ था 

आजाद हिंद फौज की गुप्तचर शाखा के प्रमुख पवित्र मोहन राय के लिखे गए बधाई संदेश

जब गुमनामी बाबा के निधन के बाद उनकी नेताजी होने की बातें फैलने लगे तो नेता जी की भतीजी ललिता बोस भी कोलकाता से फैजाबाद आई थी और वह भी इन सामानों को देख कर फफक कर रो पड़ी थी यह कहते हुए कि यह सब कुछ मेरे चाचा का ही है। उन्होंने इस सामानों को सहेजने की मांग को लेकर अदालत में याचिका भी दाखिल की थी जिस पर हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने फैजाबाद के तत्कालीन डीएम को निर्देश दिया था कि राम भवन में रहने वाले संत के सामानों को सूचीबद्ध राजकीय संरक्षण में लें। सरयू नदी के तट पर गुमनामी बाबा की समाधि है जिस पर जन्म की तारीख लिखी है 23 जनवरी संयोग है कि यही तारीख नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जन्म तिथि है जबकि मृत्यु की तारीख के सामने तीन सवालिया निशान लगे। समाधि पर अंकित इंसान निसानों की तरह गुमनामी बाबा भी सवालों के घेरे में हैं। 

बोस की हत्या में नेहरू का हाथ? 

एक धारणा यह भी है कि नेताजी की मौत विमान हादसे में नहीं बल्कि जवाहरलाल नेहरू के इशारे पर रूस में स्टालिन ने उनकी हत्या कराई थी। भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने इससे जुड़ा दावा किया। 

मौत क्यों आज भी रहस्य? 

नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जीवित होने की बात को इससे भी बल मिला कि ब्रिटिश और अमेरिकी खुफिया विभाग लगातार उनकी तलाश करते रहे। 

नेहरू की मृत्यु के बाद भी एक तस्वीर वायरल हुई थी इसमें साधु के वेश में एक आदमी उनके दर्शन कर रहा है उन्होंने उस आदमी के गोलाकार चश्मे की वजह से यह कहा गया था कि वह कोई और नहीं बल्कि सुभाष चंद्र बोस ही थे।

आजाद हिंद फौज में नेताजी के ड्राइवर रहे उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिला निवासी निजामुद्दीन ने दावा किया था कि सुभाष चंद्र बोस की 1945 में विमान हादसे में मौत नहीं हुई थी उनका कहना था कि विमान हादसे के तीन चार महीने बाद उन्होंने खुद नेता जी को वर्मा और थाईलैंड के बॉर्डर पर सीतापुर नदी के किनारे कार से छोड़ा था। 

जब गांधी जी की मृत्यु हुई तो अनेक लोगों ने यह दावा किया था कि शव यात्रा में नेताजी को देखा था।

नेताजी की तथाकथित मृत्यु के 7 दिन बाद एक अमेरिकी पत्रकार अल्फ्रेड में नहीं आ दावा किया था कि नेताजी जिंदा है और 4 दिन पहले उनको साइगोन नामक जगह में देखा गया। 

ताइवान में कथित विमान हादसे के वक्त नेताजी के साथ रहे कर्नल हबीबुर रहमान ने आजाद हिंद सरकार के सूचना मंत्री एस ए नय्यर, रूसी व अमेरिकी जासूसों और शाहनवाज समिति के सामने विरोधाभासी बयान दिए थे। 

नेताजी के जीवित होने को महात्मा गांधी ने भी हवा दी थी उन्होंने एक भाषण में कहा था कि कोई मुझे अस्थियां दिखा दे तब भी मैं इस बात को नहीं मानूंगा कि सुभाष जीवित नहीं बचे। ताइवान सरकार ने अपना रिकॉर्ड देखकर खुलासा किया था कि 18 अगस्त 1945 को ताइवान में कोई विमान हादसा हुआ ही नहीं था। 

उनकी मृत्यु के कुछ दिनों बाद ही उनको रूस में होने के दावे किए जाने लगे थे और मेरा पिछले दिनों सुब्रमण्यम स्वामी ने भी दावा किया था कि नेताजी को रूस में स्टालिन ने मरवा दिया था।

विष्णु सहाय आयोग की रिपोर्ट 

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए 31 जनवरी 2013 को आयोग गठित करने के आदेश दिए। 28 जून 2016 को सेवानिवृत्त जज विष्णु सहाय की अध्यक्षता में आयोग का गठन किया गया। आयोग ने अपनी रिपोर्ट 19 सितंबर 2017 को दी। न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) विष्णु सहाय आयोग की रिपोर्ट उत्तर प्रदेश विधानसभा में पेश की गई जिसमें कहा गया कि गुमनामी बाबा नेताजी के अनुयायी थे और उनकी आवाज नेताजी की तरह थी। कुल 130 पन्नों की रिपोर्ट में 11 बिंदु बताए गए जिनमें गुमनामी बाबा के नेताजी होने के संकेत नहीं मिलते हैं। 

आज बरसों बीत चुके हैं। नेताजी के अपने राज्य बंगाल में भी शायद ही उनका राजनैतिक साथ देने वाला कोई बाकी हो। पर उनकी मृत्यु की रहस्य गाथा आज भी हमें उकसाती है। जाहिर सी बात है, अफवाहों और निराधार चिंतन से कुछ ज्यादा है इस मसले में तभी तो हम लोग इसे आज तक भूले नहीं।

- अभिनय आकाश