नवसंवत्सर पर शुरू किये गये कार्य में सफलता अवश्य मिलती है

  •  देवेंद्रराज सुथार
  •  मार्च 17, 2018   15:44
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नवसंवत्सर पर शुरू किये गये कार्य में सफलता अवश्य मिलती है
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हमारी भारतीय संस्कृति के अनुसार प्रत्येक चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि को ‘नवसंवत्सर’ अर्थात् नववर्ष का शुभारंभ माना जाता है। इस दिन का धार्मिक, सांस्कृतिक व ऐतिहासिक महत्व है।

हमारी भारतीय संस्कृति के अनुसार प्रत्येक चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि को ‘नवसंवत्सर’ अर्थात् नववर्ष का शुभारंभ माना जाता है। इस दिन का धार्मिक, सांस्कृतिक व ऐतिहासिक महत्व है। पौराणिक कथाओं के अनुसार इस दिन ब्रह्माजी ने सृष्टि का निर्माण किया था और मानव सभ्यता की शुरुआत हुई थी। महान गणितज्ञ भास्कराचार्य द्वारा इसी दिन से सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन, मास और वर्ष की गणना कर पंचांग की रचना की गई थी। सम्राट विक्रमादित्य ने इसी दिन अपना राज्य स्थापित किया था। पांच हजार एक सौ बारह वर्ष पूर्व युधिष्ठिर का राज्याभिषेक भी इसी दिन हुआ था, चौदह वर्ष के वनवास और लंका विजय के बाद भगवान राम ने राज्याभिषेक के लिए इसी दिन को चुना था व स्वामी दयानन्द सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना भी इसी पावन दिवस पर की थी। संत झूलेलाल का अवतरण दिवस व शक्ति और भक्ति के नौ दिन अर्थात् नवरात्रा का यह स्थापना दिवस भी है। इस दिन से लेकर नौ दिन तक मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है।

भारत के विभिन्न भागों में इस पर्व को भिन्न-भिन्न नामों से मनाया जाता है। महाराष्ट्र में इस दिन को ‘गुड़ी पड़वा’ के रूप में मनाते हैं। ‘गुड़ी’ का अर्थ होता है- ‘विजय पताका’। आज भी घर के आंगन में गुड़ी खड़ी करने की प्रथा महाराष्ट्र में प्रचलित है। दक्षिण भारत में चंद्रमा के उज्ज्वल चरण का जो पहला दिन होता है उसे ‘पाद्य’ कहते हैं। गोवा और केरल में कोंकणी समुदाय इसे ‘संवत्सर पड़वो’ नाम से मनाते हैं। कर्नाटक में यह पर्व ‘युगाड़ी’ नाम से जाना जाता है। आन्ध्र प्रदेश और तेलंगाना में इसे ‘उगाड़ी’ नाम से मनाते हैं। कश्मीरी हिन्दू इस दिन को ‘नवरेह’ के तौर पर मनाते हैं। मणिपुर में यह दिन ‘सजिबु नोंगमा पानबा’ या ‘मेइतेई चेइराओबा’ कहलाता है। 

दरअसल इस समय वसंत ऋतु का आगमन हो चुका होता है और उल्लास, उमंग, खुशी और पुष्पों की सुगंध से संपूर्ण वातावरण चत्मकृत हो उठता है। प्रकृति अपने यौवन पर इठला रही होती है। लताएं और मंजरियाँ धरती के श्रृंगार के प्रमुख प्रसाधन बनते हैं। खेतों में हलचल, हंसिए की आवाज फसल कटाई के संकेत दे रही होती है। किसान को अपनी मेहनत का फल मिलने लगता है। इस समय नक्षत्र सूर्य स्थिति में होते हैं। इसलिए कहा जाता है कि इस दिन शुरु किये गये कामों में सफलता निश्चित तौर पर मिलती है। 

-देवेंद्रराज सुथार

(जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय जोधपुर में अध्ययनरत)







जानिये छठ पूजा की तिथि और विधि, ऐसे करें भगवान सूर्य को प्रसन्न

  •  शुभा दुबे
  •  नवंबर 10, 2018   15:14
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जानिये छठ पूजा की तिथि और विधि, ऐसे करें भगवान सूर्य को प्रसन्न
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छठ पूर्वांचल में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस पर्व की धूम अब अब बिहार और उत्तर प्रदेश से निकल कर देशभर में फैल रही है और देशभर में विभिन्न जगहों पर रहने वाले पूर्वांचली लोग छठ पर्व को बड़े धूमधाम से मनाते हैं।

भगवान सूर्य की उपासना का पर्व छठ पूर्वांचल में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस पर्व की धूम अब अब बिहार और उत्तर प्रदेश से निकल कर देशभर में फैल रही है और देशभर में विभिन्न जगहों पर रहने वाले पूर्वांचली लोग छठ पर्व को बड़े धूमधाम से मनाते हैं। यह पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को पूरे भक्तिभाव के साथ मनाया जाता है। माना जाता है कि इस पर्व की शुरुआत द्वापर काल में हुई थी। यह पर्व इस मायने में अनोखा है कि इसकी शुरुआत डूबते हुए सूर्य की आराधना से होती है। बिहार के औरंगाबाद जिले में स्थापित प्राचीन सूर्य मंदिर में छठ पर्व के दौरान वृदह सूर्य मेले का आयोजन किया जाता है।

पर्व से जुड़ी महत्वपूर्ण तिथियाँ

इस बार नहाय-खाय 11 नवंबर को, खरना 12 नवंबर को, सांझ का अर्घ्य 13 नवंबर को और सुबह का अर्घ्य 14 नवंबर को होगा। इस वर्ष छठ पूजा के दिन सूर्योदय सुबह 6 बजकर 41 मिनट पर होगा और सूर्यास्त 17 बजकर 28 मिनट पर होगा। इस बार छठ पर्व रविवार से शुरू हो रहा है और रविवार भगवान सूर्य का दिन माना जाता है इसलिए इसे शुभ संयोग माना जा रहा है। छठ पूजा के दिन उगते और अस्त होते सूर्य को अर्घ्य देने से समस्त पापों का नाश होता है।

पर्व से जुड़ी कुछ बड़ी बातें

छठ पर्व की शुरुआत कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को नहाय खाय से शुरू हो जाती है जब छठव्रती स्नान एवं पूजा पाठ के बाद शुद्ध अरवा चावल, चने की दाल और कद्दू की सब्जी ग्रहण करते हैं। पंचमी को दिन भर 'खरना का व्रत' रखकर व्रती शाम को गुड़ से बनी खीर, रोटी और फल का सेवन करते हैं। इसके बाद शुरू होता है 36 घंटे का 'निर्जला व्रत'। महापर्व के तीसरे दिन शाम को व्रती डूबते सूर्य की आराधना करते हैं और अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देते हैं। पूजा के चौथे दिन व्रतधारी उदयीमान सूर्य को दूसरा अर्घ्य समर्पित करते हैं। इसके पश्चात 36 घंटे का व्रत समाप्त होता है और व्रती अन्न जल ग्रहण करते हैं। इस अर्घ्य में फल, नारियल के अतिरिक्त ठेकुआ का काफी महत्व होता है। नहाय खाय की तैयारी के दौरान महिलाओं के एक ओर जहां गेहूं धोने और सुखाने में व्यस्त देखा जा सकता है वहीं महिलाओं के एक हुजूम को बाजारों में चूड़ी, लहठी, अलता और अन्य सुहाग की वस्तुएं खरीदते देखा जा सकता है।


छठ व्रत के हैं कठिन नियम

इस व्रत को करने के कुछ कठिन नियम भी हैं जिनमें निर्जल उपवास के अलावा व्रती को सुखद शैय्या का भी त्याग करना होता है। पर्व के लिए बनाए गए कमरे में व्रती फर्श पर एक कंबल या चादर के सहारे ही रात बिताता है। इस व्रत को करने वाले लोग ऐसे कपड़े पहनते हैं, जिनमें किसी प्रकार की सिलाई नहीं की होती है। महिलाएं साड़ी और पुरुष धोती पहनकर छठ व्रत करते हैं। इस व्रत को करने के बारे में एक मान्यता यह भी है कि इसको शुरू करने के बाद छठ पर्व को सालोंसाल तब तक करना होता है, जब तक कि अगली पीढ़ी की किसी विवाहित महिला को इसके लिए तैयार न कर लिया जाए।

छठ पर्व से जुड़ी कथा

राजा प्रियवद को कोई संतान नहीं थी, तब महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराकर उनकी पत्नी मालिनी को यज्ञाहुति के लिए बनाई गई खीर दी। इसके प्रभाव से उन्हें पुत्र हुआ परंतु वह मृत पैदा हुआ। प्रियवद पुत्र को लेकर श्मशान गए और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे। उसी वक्त भगवान की मानस कन्या देवसेना प्रकट हुईं और कहा कि सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती हूं। राजन तुम मेरा पूजन करो तथा और लोगों को भी प्रेरित करो। राजा ने पुत्र इच्छा से देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी।

कार्तिक मास में दीपावली के छह दिन बाद पड़ने वाला यह पर्व मुख्य रूप से बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के साथ ही नेपाल के कुछ इलाकों में धूमधाम से मनाया जाता है लेकिन अब इस पर्व का विस्तार देश के अन्य हिस्सों में भी तेजी से हो रहा है और बिहार तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश से जुड़े लोग देश के जिस भी कोने में मौजूद हैं, वहां इस पर्व को बड़ी धूमधाम से मनाते हैं। दिल्ली में यमुना नदी और इंडिया गेट तथा मुंबई में चौपाटी पर उमड़ने वाली छठ व्रतियों की भीड़ इस बात को साबित करती है कि बड़े महानगरों में भी अब इस पर्व को लेकर जागरूकता बढ़ी है।

-शुभा दुबे







जानिए कैसे मनाया जाता है भाईदूज, पढ़िए पूजा विधि और कथा के तरीके

  •  वरूण क्वात्रा
  •  नवंबर 6, 2018   15:10
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जानिए कैसे मनाया जाता है भाईदूज, पढ़िए पूजा विधि और कथा के तरीके
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रक्षाबंधन की तरह की भाईदूज का पर्व भी हर भाई−बहन के जीवन में खास महत्व रखता है। उनके अटूट व अथाह प्रेम को प्रदर्शित करने वाला यह उत्सव कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है। तो चलिए आज हम आपको भाईदूज मनाने का तरीका व इसकी प्रचलित कथा के बारे में बता रहे हैं−

कथा

भाईदूज को मनाने के पीछे की मान्यता का बखान पुराणों में किया गया है। माना जाता है कि भगवान सूर्य नारायण की पत्नी छाया ने यमराज व यमुना को जन्म दिया था। यमुना यमराज से हमेशा ही निवेदन करती रहती थी कि वे अपने इष्ट मित्रों के साथ आकर उनके घर पर भोजन करें। एक दिन यमुना ने यमराज को अपने घर आने के लिए वचनबद्ध कर लिया। जिसके पश्चात यमराज वचनबद्धता के चलते अपनी बहन के घर गए। साथ ही बहन के घर आते समय यमराज ने नरक निवास करने वाले जीवों को मुक्त कर दिया। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को जब यमराज यमुना के घर पहुंचे तो यमुना की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। यमुना ने स्नान कर पूजन करके व्यंजन परोसकर भोजन कराया। यमराज यमुना द्वारा किए गए आतिथ्य से बेहद प्रसन्न हुए और बहन से वर मांगने को कहा। जिसके बाद यमुना ने कहा कि आप हर साल इसी दिन मेरे घर आया करो। साथ ही मेरी तरह जो बहन इस दिन अपने भाई का आदर सत्कार करके उसका टीका करे, उसे तुम्हारा भय न रहे। यमराज ने तथास्तु कहकर यमुना को प्रसन्न किया। तभी से इस दिन से भाईदूज पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। माना जाता है कि इस पर्व को मनाने वालों को कभी भी यम का भय नहीं रहता।


यूं मनाएं भाईदूज

भाईदूज मनाने के लिए सर्वप्रथम बहनें भाईयों को तेल मलकर गंगा यमुना के जल में स्नान करवाती हैं। अगर ऐसा कर पाना संभव न हो तो सामान्य जल का प्रयोग भी किया जा सकता है। इसके बाद बहने भाईयों को नए वस्त्र धारण करवाकर शुभ मुहूर्त में तिलक रवाती हैं। इसके लिए सबसे पहले भाई को एक चौकी पर बिठाएं और उसके हाथों मे एक श्रीफल दें ताकि उसकी उम्र लंबी हो। इसके बाद उसके बाद भाई के माथे पर हल्दी व चावल की मदद से तिलक करें। साथ ही दूब खास की पत्तियों के साथ भाई की आरती उतारी जाती है और उसके हाथों पर कलावा बांधें और उसे मिठाई खिलाएं। वहीं भाई अपनी बहनों को उपहारस्वरूप कुछ न कुछ अवश्य भेंट करें। इसके अतिरिक्त बहनें इस खास दिन यमराज के नाम से दीपकर जलाकर उसे घर की दहलीज के बाहर रखें। माना जाता है कि ऐसा करने से यम की कुदृष्टि कभी भी भाई के उपर नहीं पड़ती।

वरूण क्वात्रा







गोवर्धन पूजा पर इस तरह करें भगवान श्रीकृष्ण को खुश, हमेशा सुखी रहेंगे

  •  शुभा दुबे
  •  नवंबर 6, 2018   13:43
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गोवर्धन पूजा पर इस तरह करें भगवान श्रीकृष्ण को खुश, हमेशा सुखी रहेंगे
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गोवर्धन पूजा पर्व को अन्नकूट पर्व के नाम से भी जाना जाता है। दीपावली के अगले दिन मनाये जाने वाले इस त्योहार की विशेष छटा ब्रज में देखने को मिलती है। गोवर्धन पूजा में गोधन यानी गायों की पूजा की जाती है।

गोवर्धन पूजा पर्व को अन्नकूट पर्व के नाम से भी जाना जाता है। दीपावली के अगले दिन मनाये जाने वाले इस त्योहार की विशेष छटा ब्रज में देखने को मिलती है। गोवर्धन पूजा में गोधन यानी गायों की पूजा की जाती है। देवी लक्ष्मी जिस प्रकार सुख समृद्धि प्रदान करती हैं उसी प्रकार गौ माता भी अपने दूध से स्वास्थ्य रूपी धन प्रदान करती हैं। मान्यता है कि जब भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को मूसलधार वर्षा से बचने के लिए सात दिन तक गोवर्धन पर्वत को अपनी सबसे छोटी उंगली पर उठाकर रखा था तो गोप-गोपिकाएं उसकी छाया में सुखपूर्वक रहे। सातवें दिन भगवान ने गोवर्धन पर्वत को नीचे रखा और हर वर्ष गोवर्धन पूजा करके अन्नकूट उत्सव मनाने की आज्ञा दी। तभी से यह पर्व अन्नकूट के नाम से मनाया जाने लगा।

गोवर्धन पूजा का समय

इस वर्ष गोवर्धन पूजा प्रातःकाल में 6 बजकर 42 मिनट से लेकर 08 बजकर 51 मिनट तक की जा सकती है और सायंकाल में पूजा का मुहूर्त 15 बजकर 18 मिनट से लेकर 17 बजकर 27 मिनट तक है। मान्यता है कि गौ के पूजन से भगवान श्रीकृष्ण अत्यंत प्रसन्न होते हैं और भक्तों पर विशेष कृपा बरसाते हैं।

भगवान को लगते हैं तरह-तरह के व्यंजनों के भोग

कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को मनाये जाने वाले इस पर्व के दिन बलि पूजा, मार्गपाली आदि उत्सवों को भी मनाने की परम्परा है। इस दिन भगवान को तरह−तरह के व्यंजनों के भोग लगाये जाते हैं और उनके प्रसाद का लंगर लगाया जाता है। इस दिन गाय−बैल आदि पशुओं को स्नान करा कर फूलमाला, धूप, चंदन आदि से उनका पूजन किया जाता है। गायों को मिठाई खिलाकर उनकी आरती उतारी जाती है तथा प्रदक्षिणा की जाती है। गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाकर जल, मौली, रोली चावल लगाकर पूजा करते हैं तथा परिक्रमा करते हैं। मान्यता है कि इस दिन गाय की पूजा करने से सभी पाप उतर जाते हैं और मोक्ष प्राप्त होता है।

पर्व से जुड़ी कथा

एक बार भगवान श्रीकृष्ण गोप−गोपियों के साथ गायें चराते हुए गोवर्धन पर्वत की तराई में पहुंचे। वहां उन्होंने देखा कि हजारों गोपियां गोवर्धन पर्वत के पास छप्पन प्रकार के भोजन रखकर बड़े उत्साह से नाच गाकर उत्सव मना रही हैं। श्रीकृष्ण के पूछने पर गोपियों ने बताया कि मेघों के स्वामी इन्द्र को प्रसन्न रखने के लिए प्रतिवर्ष यह उत्सव होता है। श्रीकृष्ण बोले− यदि देवता प्रत्यक्ष आकर भोग लगाएं, तब तो इस उत्सव की कुछ कीमत है। गोपियां बोलीं− तुम्हें इन्द्र की निन्दा नहीं करनी चाहिए। इन्द्र की कृपा से ही वर्षा होती है।

श्रीकृष्ण बोले− वर्षा तो गोवर्धन पर्वत के कारण होती है, हमें इन्द्र की जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए। सभी गोप−ग्वाल अपने−अपने घरों से पकवान ला−लाकर श्रीकृष्ण की बताई विधि से गोवर्धन की पूजा करने लगे। इन्द्र को जब पता चला कि इस वर्ष मेरी पूजा न होकर गोवर्धन की पूजा की जा रही है तो वह कुपित हुए और मेघों को आज्ञा दी कि गोकुल में जाकर इतना पानी बरसायें कि वहां पर प्रलय का दृश्य उत्पन्न हो जाये।

मेघ इन्द्र की आज्ञा से मूसलाधार वर्षा करने लगे। श्रीकृष्ण ने सब गोप−गोपियों को आदेश दिया कि सब अपने−अपने गायों बछड़ों को लेकर गोवर्धन पर्वत की तराई में पहुंच जाएं। गोवर्धन ही मेघों की रक्षा करेंगे। सब गोप−गोपियां अपने−अपने गाय−बछड़ों, बैलों को लेकर गोवर्धन पर्वत की तराई में पहुंच गये। श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठ उंगली पर धारण कर छाता सा तान दिया। सब ब्रजवासी सात दिन तक गोवर्धन पर्वत की शरण में रहे। सुदर्शन चक्र के प्रभाव से ब्रजवासियों पर जल की एक बूंद भी नहीं गिरी।

ब्रह्माजी ने इन्द्र को बताया कि पृथ्वी पर श्रीकृष्ण ने जन्म ले लिया है। उनसे तुम्हारा बैर लेना उचित नहीं है। श्रीकृष्ण अवतार की बात जानकर इन्द्रदेव लज्जित हुए तथा भगवान श्रीकृष्ण से क्षमा−याचना करने लगे। श्रीकृष्ण ने सातवें दिन गोवर्धन पर्वत को नीचे रखकर ब्रजवासियों से कहा कि अब तुम प्रतिवर्ष गोवर्धन पूजा कर अन्नकूट का पर्व मनाया करो। तभी यह यह गोवर्धन पर्व के रूप में प्रचलित हो गया।

-शुभा दुबे