Neeru Dhanda ने Asian Games में महिला ट्रैप स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतकर रचा इतिहास

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भारतीय निशानेबाज नीरू ढांडा ने एशियाई खेलों में महिला ट्रैप स्पर्धा में रिकॉर्ड प्रदर्शन के साथ व्यक्तिगत शॉटगन स्वर्ण पदक अपने नाम किया है। वह यह ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करने वाली पहली भारतीय महिला बन गई हैं। हरियाणा के जींद की रहने वाली नीरू ने गंभीर बीमारी और कठिन मौसम से उबरते हुए यह जीत दर्ज की।

(अजय मसंद) नागोया, 29 सितंबर उधार की बंदूक, भोपाल का एक तालाब और रिश्ते के भाई का लगातार प्रोत्साहन - ऐसे ही नीरू ढांडा का सफर शुरू हुआ था। सात साल बाद 26 वर्षीय नीरू ने एशियाई खेलों के दौरान भारतीय निशानेबाजी में नया इतिहास रच दिया। नीरू मंगलवार को यहां महिला ट्रैप स्पर्धा में रिकॉर्ड प्रदर्शन के साथ स्वर्ण पदक जीतकर एशियाई खेलों में व्यक्तिगत शॉटगन स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला बन गईं।

रिश्ते के भाई लक्ष्य श्योराण के पिता की भारतीय निर्मित बंदूक से कामचलाऊ निशानों पर निशाना साधने से लेकर एशियाई मंच पर दबदबा कायम करने तक नीरू का सफर बेहद असाधारण रहा है। हरियाणा के जींद जिले के एक किसान की बेटी नीरू के पास 2019 में भोपाल जाने के समय निशानेबाजी का महज छह महीने का अनुभव था। मध्य प्रदेश राज्य निशानेबाजी अकादमी की ओर से उपलब्ध कराई गई मुफ्त बंदूक और कारतूस ने उन्हें इस खेल को आगे बढ़ाने का अवसर दिया जो अन्यथा उनके लिए पहुंच से बाहर हो सकता था।

इस सफर की शुरुआत लक्ष्य से मिली प्रेरणा से हुई जिन्होंने 2018 के जकार्ता एशियाई खेलों में रजत पदक जीता था। अपने भाई की उपलब्धि से प्रेरित होकर नीरू ने निशानेबाजी में हाथ आजमाने का फैसला किया। नीरू ने ऐतिहासिक जीत के बाद कहा, ‘‘उससे पहले मुझे निशानेबाजी के बारे में कुछ भी पता नहीं था।

मेरे रिश्ते के भाई लक्ष्य ने जकार्ता में रजत पदक जीता था। मैं उस पदक से प्रेरित हुई।’’ भाई के पिता की बंदूक लेकर उन्होंने भोपाल के एक तालाब के पास अभ्यास किया। वहां टिन के डिब्बे को अस्थायी निशाना बनाकर उन्होंने खुद ही प्रयास और गलतियों के जरिए निशाना साधना सीखा।

उन्होंने कहा, ‘‘मैं निशाना काफी दूर रखती थी और उस पर निशाना लगाने की कोशिश करती थी।’’ लक्ष्य के माता-पिता ही उन्हें मध्य प्रदेश राज्य निशानेबाजी अकादमी लेकर आए जहां मुफ्त बंदूक, कारतूस और संस्थागत सहयोग ने उनके शुरुआती प्रयास को अंतरराष्ट्रीय करियर में बदलने में अहम भूमिका निभाई। नीरू के लिए यह सहयोग बेहद महत्वपूर्ण था। उनके पिता किसान और मां गृहिणी है।

परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं होने के कारण निशानेबाजी जैसे महंगे खेल का खर्च उठाना आसान नहीं था। अब यह सहयोग एक ऐतिहासिक उपलब्धि में बदल चुका है। इस साल इटली के लोनाटो में विश्व कप पदक जीतने के बाद नीरू का एशियाई खेलों का स्वर्ण भारत के लिए महिला शॉटगन में व्यक्तिगत खिताब के लंबे इंतजार को समाप्त करता है।

हालांकि यह स्वर्ण पदक नीरू ने बेहद मुश्किल परिस्थितियों के बीच जीता। प्रतियोगिता से केवल 10 दिन पहले गंभीर रूप से बीमार पड़ने के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। वह पूरे प्रशिक्षण शिविर में हिस्सा नहीं ले सकीं और पांच दिन तक कुछ नहीं खाया।

तैयारी प्रभावित होने के बावजूद उनके कोच मनशेर सिंह ने उनका ध्यान लक्ष्य पर बनाए रखने में मदद की। उन्होंने कहा, ‘‘मेरी हालत बहुत खराब थी। मैंने पूरे शिविर में अभ्यास नहीं किया।

पांच दिन तक कुछ नहीं खाया। सिर्फ पानी पीती थी। मैं रोज अपने कोच से बात करती थी।’’ नीरू ने कहा, ‘‘यहां आने के बाद भी मैं उनसे रोज बात करती थी।

उन्होंने मेरे से कहा कि अगर मैं चार-पांच दिन अभ्यास नहीं कर पाई तो भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा।’’ उन्होंने कहा, ‘‘जब आपके दिल में पूरा समर्पण हो तो बाधाएं मायने नहीं रखतीं। मुझे अपने परिवार, देश, भारतीय सेना और मध्य प्रदेश राज्य निशानेबाजी अकादमी के लिए जीतना था। मेरे पीछे इतने सारे लोग हैं।

जब वे मेरे लिए इतनी मेहनत कर रहे हैं तो जीतना छोटी बात है।’’ बीमारी ने जहां उनकी तैयारियों को प्रभावित किया तो वहीं नागोया में लगातार बारिश और गिरते तापमान ने उनकी तकनीक और मानसिक मजबूती की परीक्षा ली। बारिश से उनकी पकड़ प्रभावित हुई और बंदूक संभालने का परिचित अहसास बदल गया जिससे उन्हें अपना ध्यान भटकने से बचाना पड़ा। नीरू के प्रशिक्षण ने उन्हें ऐसी परिस्थितियों के लिए पहले से तैयार किया था।

उनके कोच जानबूझकर अभ्यास के दौरान ध्यान भटकाने वाली परिस्थितियां पैदा करते हैं। वह कभी उनकी जैकेट खींचते हैं तो कभी निशाना साधने की तैयारी के दौरान सामने कुर्सी रख देते हैं। उन्होंने कहा, ‘‘हम अभ्यास में ऐसी परिस्थितियां बनाते हैं जहां हमें ध्यान भटकाने वाली चीजों से लड़ना होता है।

हम तेज संगीत और अन्य व्यवधानों के बीच भी अभ्यास करते हैं।’’ नीरू के लिए यह स्वर्ण पदक व्यक्तिगत उपलब्धि से कहीं अधिक है। उन्हें उम्मीद है कि इससे भारतीय शॉटगन निशानेबाजों की अगली पीढ़ी को प्रेरणा मिलेगी। सेना की निशानेबाज नीरू ने अपना पदक देश की सीमाओं की रक्षा कर रहे सैनिकों को समर्पित किया और कहा कि सेना का प्रतिनिधित्व करने के प्रति उनकी प्रतिबद्धता हमेशा बनी रहेगी।

उन्होंने कहा, ‘‘पदोन्नति के अवसर होते हैं लेकिन पदोन्नति मिले या ना मिले, हमें सेना के लिए खेलना है। सैनिक सीमाओं पर तैनात हैं। वे देश के लिए लड़ते हैं और अपने प्राणों की आहुति देते हैं।

यह पदक उन्हें समर्पित है।’’ उन्होंने यह स्वर्ण 1978 के एशियाई खेलों के चैंपियन राजा रणजीत सिंह को भी समर्पित किया जिनका इस साल निधन हो गया।

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