2019 के नरेंद्र मोदी की हालत 2004 के अटल बिहारी वाजपेयी की तरह?

By रेनू तिवारी | Publish Date: May 22 2019 2:59PM
2019 के नरेंद्र मोदी की हालत 2004 के अटल बिहारी वाजपेयी की तरह?
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एक नजरिये से देखा जाये तो इस समय नरेंद्र मोदी के हालात हूबहू 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी की तरह ही है। 2019 का ये लोकसभा चुनाव कई हद तक 2004 के लोकसभा चुनाव से मिलता-जुलता है।

लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजे 23 मई को आने वाले हैं। इससे तीन दिन पहले एग्ज़िट पोल के नतीजे आये, एग्ज़िट पोल के नतीजे आने के बाद जहां एनडीए में खुशी की लहर दौड़ गई वहीं कांग्रेस और महागठबंधन में मातम सा फैल गया। एग्ज़िट पोल के नतीजे कितने सही हैं ये तो 23 मई को जब वोटों की गिनती शुरू होगी तब ही पता चलेगा। ये तो बस सर्वे के आधार पर दिये गये आंकड़े है। पासा पुरी तरह पलट भी सकता है और नहीं भी पलट सकता। एग्ज़िट पोल के नतीजों को अनदेखा कर कांग्रेस ने सत्ता में वापसी के लिए रणनीति बनानी शुरू कर दी है। वहीं अपना मनोबल बनाने के लिए एनडीए ने अपने सभी 36 घटकों के नेताओं लिए डिनर पार्टी का आयोजन किया।

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एक नजरिये से देखा जाये तो इस समय नरेंद्र मोदी के हालात हूबहू 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी की तरह ही है। 2019 का ये लोकसभा चुनाव कई हद तक 2004 के लोकसभा चुनाव से मिलता-जुलता है। तब वाजपेयी सरकार 5 साल सत्ता का सुख लेने के बाद खुली आंखों से सपने देख रही थी सत्ता में वापस आने के। माहौल भी कुछ ऐसा ही था कि वाजपेयी सरकार एक बार फिर बनने जा रही है, लेकिन जब मतदाओं के वोट का पिटारा खुला तो बदलाव हो गया और सत्ता का सुख यूपीए की झोली में आ गया और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार का चमक-दमक भरा 'इंडिया शाइनिंग' अभियान और बहुप्रचारित 'फ़ील गुड फैक्टर' धराशायी हो गया था।

गलतफहमी का शिकार हुआ एनडीए



जनादेश आया था कि एनडीए को सत्ता से बेदखल किया जाए लेकिन, जनादेश में स्पष्ट बहुमत कांग्रेस को भी नहीं मिला था। 2004 में पहली बार कांग्रेस की गठबंधन सरकार बनी, साथ ही कांग्रेस का गठबंधन बना यूपीए। 2004 ने यूपीए उस हालात में बना जब कांग्रेस की बागडोर एक ऐसी महिला के हाथ में थी जिसे ठीक से हिंदी बोलनी भी नहीं आती थी। लेकिन सोनिया गांधी ने अपने आप को साबित किया, और कांग्रेस को गठबंधन बनाने के हाल में लेकर आई।

टीवी पर बैठे कई राजनीतिक विचारकों का मानना है कि 2004 और 2019 के आम चुनाव में कई समानताएं हैं।

चुनाव प्रचार में पानी के तरह पैसा बहाया

साल 2004 में जब लोकसभा चुनाव हो रहे थे तो इंडिया शाइनिंग और फील गुड फैक्टर का नारा पूरे देश हवा की तरह तैर रहा था। बीजेपी लगातार अपने शासन के दौरान हुए काम का बखान कर रही थी। अपने कार्य को लोगों को बताने के लिए बीजेपी ने पानी की तरह पैसा बहाया। इस तरह के चुवान प्राचार के दौरान सबको यहीं लग रहास था कि इस बार फिर एक बार एनडीए ही सत्ता में वापस आ रही है। फिर चुनाव हुए और चौकाने वाले परिणाम आए। एनडीए को जबरदस्त झटका लगा। जनता ने एनडीए को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया। बीजेपी के सारे सपने धराशाही हो गये। 

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ठीक उसी तरह 2019 में भी भाजपा ने खूब पैसा उड़ाया है विज्ञापनों में। जमीन से लेकर आसमान तक, मोदी हैं तो मुमकिन हैं, फिर एक बार मोदी सरकार, 300 के पार मोदी सरकार जैसे पोस्टर बैनर दिखाई दे रहे हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक 2019 के लोकसभा चुनाव में सबसे ज्यादा एडवरडाइमेंट करने वाली पार्टी भाजपा हैं। वहीं  अटल बिहारी वाजपेयी के 'इंडिया शाइनिंग' की जगह 'एयर स्ट्राइक' ने ले ली है। इस बार राष्ट्रवादियों ने राम को किनारा कर देश भक्ति पर वोट मांगे है। अब देखना होगा कि भारत की जनता का जनादेश 23 मई को फिर से इतिहास दौहराएगा या नया इतिहास बनाएगा।

सोनिया और राहुल की नागरिकता

अटल बिहारी वाजपेयी ने 20014 के चुनाव में अपनी सरकार के विकास के कार्य को पेश किया। जनता को दिखाने की कोशिश की की एनडीए के शासन में विकास के लिए कार्य किया गया है। लेकिन विकास के कार्यों को गिनाने में शायद बीजेपी चूक गई और सोनिया गांधी की मनागरिकता को मुद्दा बना लिया। चुनावी रैलियों में जौर- शौर से  सोनिया गांधी के विदेशी मूल की होने का मुद्दा उठाया गया। इस बार 2019 की रैलियों में भी भाजपा ने नेहरू-गांधी परिवार को निशाना बनाया। इस बार भी सुब्रह्मण्यम स्वामी  ज़रिए राहुल गांधी की नागरिकता को चुनाव में खूब भुना गया।

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