जानिए संजय गांधी की मौत के बाद मेनका गांधी को गांधी परिवार से बेदखल करने के पीछे किसका हाथ रहा ?

जानिए संजय गांधी की मौत के बाद मेनका गांधी को गांधी परिवार से बेदखल करने के पीछे किसका हाथ रहा ?

इंदिरा को संजय गांधी के जिंदा रहते ही उनकी पत्नी मेनका पसंद नहीं थीं, क्योंकि संजय का झुकाव अपनी ससुराल की तरफ ज्यादा रहता था। इस बात से इंदिरा को बुरा लगता था कि अपने गांधी परिवार की बजाय ससुराल का माहौल ज्यादा रास आता है।

गांधी परिवार के दो चिराग राजीव गांधी और संजय गांधी तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा की आंखों की दो पुतलियां हुआ करती थे, जिसमें राजीव का राजनीति से ताल्लुक नहीं होता था जबकि संजय ने आपातकाल जैसे समय में इंदिरा की राजनीति को चमकाने का काम लगातार किया था यही कारण था कि संजय गांधी को इंदिरा का राजनीतिक उत्तराधिकारी होने की बात की जाती थी। लेकिन परिस्थितियों के बदलाव ने इंदिरा को अपने बड़े बेटे राजीव को राजनीति में लाने मजबूर किया। 

एक समय हुआ करता था, जब संजय से राजनीतिक चर्चा करते समय इंदिरा राजीव को कमरे से बाहर जाने के लिए कह दिया करतीं थी। 70 के दशक में लोकप्रिय युवा नेता की छवि संजय गांधी की हुआ करती थी। लेकिन राजनीतिक समीकरण तो तब बदल गये जब दिल्ली स्थित फ्लाइंग क्लब के इंस्ट्रक्टर सुभाष सक्सेना के संग संजय गांधी ने दो सीटर प्लेन में सवार होकर उड़ान भरी लेकिन दिल्ली के दक्षिणी पर्वत श्रेणियों में ये विमान क्रैश कर गया। 23 जून 1980 संजय और सुभाष सक्सेना की इस विमान दुर्घटना में मौत हो गयी।

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गांधी परिवार के बेहद करीबी रहे लेखक खुशवंत सिंह ने संजय गांधी की मौत के बाद मचे  परिवारिक हलाकान और निजी कलह के बारे में अपनी किताब में जिक्र भी किया है। गांधी परिवार पर लिखी गयी किताब 'सच, प्यार और थोड़ी सी शरारत' में जो बातें लेखक खुशवंत ने बताईं उससे पता चलता है कि मेनका ने कैसे गांधी परिवार से पाला बदला। कलकत्ता में साप्ताहिक पत्रिका छपती थी, जिसका नाम 'रविवार' था इस पत्रिका में साल 1985 में वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर ने अपने लेख के माध्यम से बताया था कि संजय गांधी की मौत हो जाने से कैसे इंदिरा गांधी का राजनीतिक वारिस बदल गया।

संजय गांधी की मौत के बाद मेनका (गांधी) और इंदिरा गांधी की तकरार

इंदिरा ने अपना राजनीतिक वारिस खोया लेकिन बड़े बेटे राजीव को कुछ बड़े नेताओं के जरिए राजनीति में लाने के लिए मना लिया वहीं मेनका अपने पति संजय की राजनीतिक संज्ञा को आकार देने की मंशा बना ली खैर इंदिरा ने मेनका को कहा कि तुम मेरी सचिव के रूप में काम करो और राजनीतिक रणनीतियों में मेरा हाथ बटाओ। 

लेकिन राजीव गांधी की पत्नी सोनिया ने इंदिरा को चेतावनी देते हुए कहा कि मेनका को सचिव बनाया तो मैं अपने पूरे परिवार के संग इटली चली जाऊंगी। इंदिरा के करीब संजय के बराबर ही सोनिया भी थीं, सोनिया के इस अड़ंगे से इंदिरा ने अपने राजनीतिक गुरू धीरेन्द्र ब्रह्मचारी के द्वारा मेनका को कहलवा दिया कि आपको सचिव नहीं बनाया जाएगा। 

इंदिरा को संजय गांधी के जिंदा रहते ही उनकी पत्नी मेनका पसंद नहीं थीं, क्योंकि संजय का झुकाव अपनी ससुराल की तरफ ज्यादा रहता था। इस बात से इंदिरा को बुरा लगता था कि अपने गांधी परिवार की बजाय ससुराल का माहौल ज्यादा रास आता है। हांलाकि इंदिरा ने इसका जिक्र संजय से कभी नहीं किया। जब संजय की मौत हो गयी तब से ही इंदिरा को मेनका और भी बुरी लगने लगीं। खाने की मेज पर मेनका को अब इतनी तवज्जो नहीं मिलती थी जिससे मेनका को बुरा भी लगता था। इंदिरा और मेनका में बातों बातों में तकरार बढ़ती चली गयी।

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आए दिन होने वाले मनमुटावों से मेनका ने अपनी मां के यहां चले जाने का निर्णय कर ही लिया था। संजय के विचारों को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से संजय के वफादार रहे अकबर अहमद के साथ मिलकर संजय विचार मंच की शुरूआत करने का फैसला मेनका गांधी ने किया वो भी बेहद ही चतुराई के साथ जब इंदिरा गांधी अपनी बड़ी बहू सोनिया को साथ लेकर लंदन में होने वाले भारत उत्सव में सम्मिलित होने गयी हुईं थी। संजय विचार मंच के उद्घाटन समारोह के आयोजन में पढ़े गये भाषण को राजीव गांधी ने तार के जरिए इंदिरा को भेज दिया और खुद को मेनका की नजर से दूर रखते रहे। राजीव भी राजनीति में नये थे और राजनैतिक स्थितियों में अपने आप को फिट बैठाने की जुगत में व्यस्त थे।

राजीव गांधी के द्वारा भेजे गए तार में मेनका के द्वारा दिया गया भाषण था जिसे इंदिरा ने पढ़ने के बाद अपनी छोटी बहू मेनका को सबक सिखाने का फैसला लंदन में ही कर लिया। 28 मार्च 1982 को लंदन से लौटने के तुरंत बाद ही इंदिरा गांधी ने अपने राजनैतिक गुरु धीरेंद्र ब्रह्मचारी और अपने करीबी राजनीतिक सलाहकार आरके धवन के सामने मेनका को जमकर खरी-खोटी सुनाई। मेनका को तुरन्त घर से निकल जाने की बात कहकर गेट में गाड़ी खड़ी करवा दी और मेनका से कहा 'तुम अभी इसी वक्त अपनी मां के घर जा सकती हो'। इंदिरा ने मेनका पर उनके दुश्मनों को उनकी अनुपस्थिति में घर में लाने का आरोप भी लगाया।

मेनका ने इंदिरा गांधी के द्वारा किए गए इस बर्ताव को नहीं समझा और अड़ी रहीं कि वह अपने मां के घर नहीं जाना चाहतीं‌। इस वक्त इंदिरा ने मेनका और उनकी मां अमतेश्वर आनंद के बारे में भी काफी अपशब्द कहे। 1, सफदरजंग रोड पर स्थित प्रधानमंत्री के बंगले से मेनका का डेरा उठ चुका था।

जब राजीव और मेनका गांधी चुनाव में आमने-सामने उतर आए

1980 में जनता पार्टी की सरकार गिर गई और मध्य अवधि में चुनाव हुए इंदिरा गांधी ने कांग्रेस पार्टी की अगुवाई करते हुए सप्ताह में एक बार फिर वापसी की इंदिरा के छोटे बेटे संजय गांधी ने अमेठी से पहली बार संसद का रुख किया लेकिन कुछ ही महीनों बाद संजय गांधी की विमान दुर्घटना में असमय मौत हो गई और इंदिरा गांधी के सामने एक घोर संकट आन खड़ा हुआ।

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मजबूरन इंदिरा गांधी को अपने पेशे से पायलट बेटे राजीव गांधी को कुछ बड़े नेताओं की जुगाड़ से राजनीति में आने का मान-मनौव्वल करना पड़ा। राजीव गांधी ने भी मजबूरी को समझते हुए राजनीति में आना उचित समझा। उधर संजय गांधी की मौत के बाद मेनका गांधी ने अमेठी से पति के राजनीतिक कारवां को आगे बढ़ाने की मंशा बना ली थी लेकिन इंदिरा ने अपने बड़े बेटे राजीव को अमेठी से चुनाव मैदान में उतार दिया। 

मेनका गांधी ने इंदिरा के इस फैसले का मन ही मन विरोध भी किया उधर राजीव ने लोकदल के युवा नेता शरद यादव को भारी मतों से हराकर अमेठी से यह उप-चुनाव जीत लिया। मेनका ने संजय विचार मंच नाम से अपना राजनीतिक दल बना लिया था। 31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी की मौत के बाद राजीव गांधी को तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के द्वारा प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई गई।

एक बार फिर लोकसभा चुनावों का ऐलान हुआ और इस बार भी राजीव गांधी ने अमेठी से लोकसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया उधर मेनका गांधी ने भी संजय विचार मंच नामक अपने दल से अमेठी से ही पर्चा दाखिल कर दिया। अब दो पार्टियों के आमने-सामने होने के बजाय एक ही परिवार के दो सदस्य अमेठी से आमने-सामने आ चुके थे। संजय गांधी की मौत के बाद विरासत में राजीव को अमेठी लोकसभा सीट मिल तो गई थी लेकिन संजय के चाहने वाले अमेठी में लाखों की तादाद में मौजूद थे।

लोकसभा चुनाव के प्रचार में एक तरफ राजीव गांधी ने चुनाव जीतने के लिए इंदिरा गांधी की मौत के बाद बचे हुए कार्यों को पूरा करने की भावना लोगों के सामने जताते हुए चुनाव मैदान में उतर चुके थे, वहीं अमेठी से मेनका गांधी ने चुनावी बिगुल बजाकर संजय गांधी के प्रति सहानुभूति और उनकी बेवा पत्नी होने की भावना लेकर लोगों के बीच यह जताने निकल चुकी थीं कि अमेठी के लोगों को संजय गांधी के नाम को नहीं भूलना चाहिए। 

स्वयं प्रधानमंत्री के द्वारा अमेठी से चुनाव लड़े जाने के कारण लोगों में भी यह भावना पैदा हो चुकी थी कि अब अमेठी का भाग खुल चुका है और विकास के रास्ते भी उज्जवल हो चुके हैं। राजीव गांधी के साथ उनकी पत्नी सोनिया गांधी भी चुनाव प्रचार के लिए जाया करती थीं तब सोनिया गांधी को हिंदी कम समझ में आती थी और कम ही बोल पाती थीं लेकिन प्रचार के दौरान लोगों से घुलने मिलने का प्रयास सोनिया गांधी के द्वारा किया जाता था। 

आखिरकार राजीव गांधी ने अपनी भावना लोगों तक पहुंचाने में सफलता प्राप्त की और तीन लाख से ज्यादा मतों के अंतर से अमेठी का लोकसभा चुनाव जीत लिया। मेनका को मिली करारी हार के बाद गांधी परिवार के दो भागों में हमेशा के लिए बंट गये।

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मेनका गांधी ने इस चुनाव में मिली हार के बाद अमेठी लोकसभा सीट का रुख दोबारा कभी नहीं किया। बाद में मेनका गांधी ने भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया। उत्तर प्रदेश की पीलीभीत सीट से ही मेनका गांधी ने लोकसभा चुनाव लड़ा। मेनका और संजय गांधी के बेटे वरुण गांधी ने भी लोकसभा चुनाव में अमेठी का रुख न करते हुए पीलीभीत और सहारनपुर से ही लोकसभा का चुनाव लड़ा है।

- शुभम यादव