आज के दौर में अब झाँसी नहीं झाँसियों की जरूरत है

  •  डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त
  •  जून 18, 2020   11:07
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आज के दौर में अब झाँसी नहीं झाँसियों की जरूरत है

आज वंदनीय नारी जब भी उदास होती है, तब-तब उसका कारण बड़ा ही विकारी होता है। हम भूल जाते हैं कि वह समाज में पूजनीय है, सम्माननीय है। फिर क्यों उसे हम कम आंकने पर मजबूर कर देते हैं? आज तो झांसी लक्ष्मीबाई की पुण्यतिथि है। वही लक्ष्मीबाई जिसने अबला से सबला बनना सिखाया।

मरना तो सभी को है लेकिन मरना कोई नहीं चाहता। भोजन सभी को चाहिए लेकिन खेती करना कोई नहीं चाहता। पानी सभी को चाहिए लेकिन पानी बचाना कोई नहीं चाहता। छाया सभी को चाहिए, किन्तु पेड़ लगाना और उसे जिन्दा रखना कोई नहीं चाहता। इसी तरह बहू सभी को चाहिए, पर बेटी बचाना कोई नहीं चाहता। यह पीड़ा ऐसी वैसी नहीं है- कुछ कोख मे मारी जाती हैं / कुछ मरण जन्म पे पाती हैं / कुछ अधिकारों से वंचित कर / जीवन भर तड़पायी जाती हैं। 

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आज वंदनीय नारी जब भी उदास होती है, तब-तब उसका कारण बड़ा ही विकारी होता है। हम भूल जाते हैं कि वह समाज में पूजनीय है, सम्माननीय है। फिर क्यों उसे हम कम आंकने पर मजबूर कर देते हैं? आज तो झांसी लक्ष्मीबाई की पुण्यतिथि है। वही लक्ष्मीबाई जिसने अबला से सबला बनना सिखाया। वही लक्ष्मीबाई जिसने दबी-दबाई आवाजों को बुलंद करना सिखाया। वही लक्ष्मीबाई जिसने अन्याय का विरोध करना सिखाया।  यह वही देश है जहाँ राम से पहले सीता, कृष्ण से पहले राधा और स्वतंत्रता के समर इतिहास में गांधी से पहले झांसी लक्ष्मीबाई का नाम लिया जाता है। वैसे भारत धीरे-धीरे पुरुष प्रधान समाज के टैग से बाहर निकलकर सम समाज के टैग की ओर बड़ी तेजी से बढ़ रहा है। यह वही देश है जहाँ अनेक महान वीरांगनाओं यथा- रानी लक्ष्मी बाई, रज़िया सुल्ताना, रानी रुद्रमा देवी, रानी चेनम्मा देवी ने यह सिद्ध कर दिखाया कि किस तरह न झुकने वाले रूढ़ी समाज को झुकाया जाता है। उसकी जगह दिखायी जाती है। सशक्त नारी समाज से सशक्त समाज बनता है। किसी भी देश की प्रगति तब तक नहीं हो सकती जब तक वहाँ की महिलाएँ पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर न चलें। सच तो यह कि बेटियाँ हर किसी के भाग्य में नहीं होती हैं, भगवान को जो घर पसंद आता है, वह उसे वहाँ भेज देता है। वह हमारा कल थी, आज है और कल रहेगी। यदि एक पुरष शिक्षित होता है तो वह अपने तक सीमित रह जाता है। यदि नारी शिक्षित होती है तो वह पूरे समाज को शिक्षित करने की क्षमता, संयमता तथा सहनशीलता रखती है। उसका विकास ही देश का विकास है। हमने देश की परिकल्पना भारत माँ के रूप में इसलिए की है क्योंकि नारी का स्थान सर्वोपरि है- तू ही दुर्गा / तू ही काली / तू ही लक्ष्मी / तू ही सरस्वती / तू है माया / तू महामाया / तुझ में यह सृष्टी  समाया / नर देव दानव और गन्धर्व / सब को चाहिए तेरा वर / तू है महान, कृपावान और तू ही है भगवान।

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समाज रूपी बैलगाड़ी के दो पहिए कहलाने वाले पुरुष व महिला में अंतर नहीं होना चाहिए। दोनों की समानता समाज की प्रगति के परिचायक हैं। कुछ चंद नामों जैसे- इंदिरा गाँधी, प्रतिभा पाटिल, सुस्मिता सेन, सुनीता विलियम्स, रीता फारिया, पी.वी. सिंधु, कादम्बिनि गांगुली, कमलजीत सिंधु, डायना इदुल, मीरा साहिब फातिमा बीबी, लीला सेठ, किरण बेदी, मदर टेरेसा, देविका रानी, मायावती, सुचेता कृपलानी, हरिता कौर देओल, मीरा कुमार, बछेंद्री पाल आदि के ले लेने मात्र से झांसी लक्ष्मीबाई का देखा हुआ सपना पूरा नहीं होगा। इस देश में झाँसी नहीं झाँसियों की जरूरत है। समाज में बदलाव की आवश्यकता है। हमारे आदि-ग्रंथों में भी कहा गया है- यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते रमंते तत्र देवता। अर्थात जहाँ नारियों की पूजा की जाती है वहां देवता निवास करते हैं। यह सब सुनने में अच्छा लगता है। इसे कथनी से करनी में बदलने की आवश्यकता है। माँ, बहन, भाभी, बुआ, चाची, फुआ, दादी, नानी सभी रूपों में प्रेम बरसाने वाली महिलाओं को हमें समझने का प्रयास करना चाहिए। जिस तरह महिलाओं ने पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर उनका हाथ बंटाया है ठीक उसी तरह पुरुष भी घर परिवार की छोटी-छोटी जिम्मेदारियों में महिलाओं का हाथ बंटाएँ। वे उन्हें आराम करने का अवसर दें, क्योंकि वे भी मनुष्य हैं, यंत्र नहीं। लक्षमीबाई की पुण्यतिथि की सार्थकता मात्र श्रद्धा सुमन चढ़ाने से नहीं मस्तिष्क में बैठी संकीर्ण विचारधारा को बदलने से होगी। लिंगभेद की पीड़ा मिटाने से होगी। हमारे देश की वर्तमान झाँसी संस्कारों को बोने वाली टीचर भी है, हमारा देखभाल करने वाली डॉक्टर भी, सपनों की उड़ान भरती पायलट भी और तथ्यों को पता लगाती शोधार्थी भी। यदि वह ये सब नहीं भी होती, तब भी वह सब कुछ है, आज से नहीं सदियों से वह सब कुछ है इस सृष्ट‍ि की। क्योंकि वह किसी पद पर न भी हो, तो सृजनकर्ता के पद पर सदैव आसीन रहेगी, जब तक यह सृष्ट‍ि है। 

- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त

सरकारी पाठ्यपुस्तक लेखक, 

तेलंगाना सरकार







अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस: भारतीय नारी कब तक रहेगी बेचारी?

  •  ललित गर्ग
  •  मार्च 6, 2021   16:18
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अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस: भारतीय नारी कब तक रहेगी बेचारी?

महिलाओं के प्रति एक अलग तरह का नजरिया इन सालों में बनने लगा है, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नारी के संपूर्ण विकास की संकल्पना को प्रस्तुत करते हुए अनेक योजनाएं लागू की है, जिनमें अब नारी सशक्तीकरण और सुरक्षा के अलावा और भी कई आयाम जोडे़ गए हैं।

नारी का नारी के लिये सकारात्मक दृष्टिकोण न होने का ही परिणाम है कि पुरुष उसका पीढ़ी-दर-पीढ़ी शोषण करता आ रहा हैं। इसी कारण नारी में हीनता एवं पराधीनता के संस्कार संक्रान्त होते रहे हैं। जिन नारियों में नारी समाज की दयनीय दशा के प्रति थोड़ी भी सहानुभूति नहीं है, उन नारियों का मन स्त्री का नहीं, पुरुष का मन है, ऐसा प्रतीत होता है। अन्यथा अपने पांवों पर अपने हाथों से कुल्हाड़ी कैसे चलाई जा सकती है? अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाते हुए नारी के मन में एक नयी, उन्नायक एवं परिष्कृत सोच पनपे, वे नारियों के बारे में सोचें, अपने परिवार, समाज एवं राष्ट्र की नारी की पीड़ा को अपनी पीड़ा समझें और उसके समाधान एवं प्रतिकार के लिये कोई ठोस कदम उठायें तो नारी शोषण, उपेक्षा, उत्पीड़न एवं अन्याय का युग समाप्त हो सकता है। इसी उद्देश्य से नारी के प्रति सम्मान एवं प्रशंसा प्रकट करते हुए 8 मार्च का दिन महिला दिवस के रूप में उनके लिये निश्चित किया गया है, यह दिवस उनकी सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक उपलब्धियों के उपलक्ष्य में, उत्सव के रूप में मनाया जाता है।

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अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस से पहले और बाद में हफ्ते भर तक विचार विमर्श और गोष्ठियां होंगी जिनमें महिलाओं से जुड़े मामलों जैसे महिलाओं की स्थिति, कन्या भू्रण हत्या की बढ़ती घटनाएं, लड़कियों की तुलना में लड़कों की बढ़ती संख्या, तलाक के बढ़ते मामले, गांवों में महिला की अशिक्षा, कुपोषण एवं शोषण, महिलाओं की सुरक्षा, महिलाओं के साथ होने वाली बलात्कार की घटनाएं, अश्लील हरकतें और विशेष रूप से उनके खिलाफ होने वाले अपराध को एक बार फिर चर्चा में लाकर सार्थक वातावरण का निर्माण किया जायेगा। लेकिन इन सबके बावजूद एक टीस से मन में उठती है कि आखिर नारी कब तक भोग की वस्तु बनी रहेगी? उसका जीवन कब तक खतरों से घिरा रहेगा? बलात्कार, छेड़खानी, भ्रूण हत्या और दहेज की धधकती आग में वह कब तक भस्म होती रहेगी? कब तक उसके अस्तित्व एवं अस्मिता को नौचा जाता रहेगा? विडम्बनापूर्ण तो यह है कि महिला दिवस जैसे आयोजन भी नारी को उचित सम्मान एवं गौरव दिलाने की बजाय उनका दुरुपयोग करने के माध्यम बनते जा रहे हैं।

महिलाओं के प्रति एक अलग तरह का नजरिया इन सालों में बनने लगा है, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नारी के संपूर्ण विकास की संकल्पना को प्रस्तुत करते हुए अनेक योजनाएं लागू की है, जिनमें अब नारी सशक्तीकरण और सुरक्षा के अलावा और भी कई आयाम जोडे़ गए हैं। सबसे अच्छी बात इस बार यह है कि समाज की तरक्की में महिलाओं की भूमिका को आत्मसात किया जाने लगा है। आज भी आधी से अधिक महिला समाज को पुरुषवादी सोच के तहत बहुत से हकों से वंचित किया जा रहा है। वक्त बीतने के साथ सरकार को भी यह बात महसूस होने लगी है। शायद इसीलिए सरकारी योजनाओं में महिलाओं की भूमिका को अलग से चिह्नित किया जाने लगा है।

एक कहावत है कि औरत जन्मती नहीं, बना दी जाती है और कई कट्ट्टर मान्यता वाले औरत को मर्द की खेती समझते हैं। कानून का संरक्षण नहीं मिलने से औरत संघर्ष के अंतिम छोर पर लड़ाई हारती रही है। इसीलिये आज की औरत को हाशिया नहीं, पूरा पृष्ठ चाहिए। पूरे पृष्ठ, जितने पुरुषों को प्राप्त हैं। पर विडम्बना है कि उसके हिस्से के पृष्ठों को धार्मिकता के नाम पर ‘धर्मग्रंथ’ एवं सामाजिकता के नाम पर ‘खाप पंचायते’ घेरे बैठे हैं। पुरुष-समाज को उन आदतों, वृत्तियों, महत्वाकांक्षाओं, वासनाओं एवं कट्टरताओं को अलविदा कहना ही होगा जिनका हाथ पकड़कर वे उस ढ़लान में उतर गये जहां रफ्तार तेज है और विवेक अनियंत्रण हैं जिसका परिणाम है नारी पर हो रहे नित-नये अपराध और अत्याचार। पुरुष-समाज के प्रदूषित एवं विकृत हो चुके तौर-तरीके ही नहीं बदलने हैं बल्कि उन कारणों की जड़ों को भी उखाड़ फेंकना है जिनके कारण से बार-बार नारी को जहर के घूंट पीने एवं बेचारगी को जीने को विवश होना पड़ता है। पुरुषवर्ग नारी को देह रूप में स्वीकार करता है, लेकिन नारी को उनके सामने मस्तिष्क बनकर अपनी क्षमताओं का परिचय देना होगा, उसे अबला नहीं, सबला बनना होगा, बोझ नहीं शक्ति बनना होगा।

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‘यत्र पूज्यंते नार्यस्तु तत्र रमन्ते देवता’- जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं। किंतु आज हम देखते हैं कि नारी का हर जगह अपमान होता चला जा रहा है। उसे ‘भोग की वस्तु’ समझकर आदमी ‘अपने तरीके’ से ‘इस्तेमाल’ कर रहा है, यह बेहद चिंताजनक बात है। आज अनेक शक्लों में नारी के वजूद को धुंधलाने की घटनाएं शक्ल बदल-बदल कर काले अध्याय रच रही है। देश में गैंग रेप की वारदातों में कमी भले ही आयी हो, लेकिन उन घटनाओं का रह-रह कर सामने आना त्रासद एवं दुःखद है। आवश्यकता लोगों को इस सोच तक ले जाने की है कि जो होता आया है वह भी गलत है। महिलाओं के खिलाफ ऐसे अपराधों को रोकने के लिए कानूनों की कठोरता से अनुपालना एवं सरकारों में इच्छाशक्ति जरूरी है। कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न के विरोध में लाए गए कानूनों से नारी उत्पीड़न में कितनी कमी आयी है, इसके कोई प्रभावी परिणाम देखने में नहीं आये हैं, लेकिन सामाजिक सोच में एक स्वतः परिवर्तन का वातावरण बन रहा है, यहां शुभ संकेत है। महिलाओं के पक्ष में जाने वाले इन शुभ संकेतों के बावजूद कई भयावह सामाजिक सच्चाइयां बदलने का नाम नहीं ले रही हैं।

देश के कई राज्यों में लिंगानुपात खतरे के निशान के करीब है। देश की राजधानी में महिलाओं के हक के लिए चाहे जितने भी नारे लगाए जाएं, लेकिन खुद दिल्ली शहर से भी बुरी खबरें आनी कम नहीं हुई हैं। तमाम राज्य सरकारों को अपनी कागजी योजनाओं से खुश होने के बजाय अपनी कमियों पर ध्यान देना होगा। योजना अपने आप में कोई गलत नहीं होती, कमी उसके क्रियान्वयन में होती है। कुछ राज्यों में बेटी की शादी पर सरकार की तरफ से एक निश्चित रकम देने की स्कीम है। इससे बेटियों की शादी का बोझ भले ही कम हो, लेकिन इससे बेटियों में हीनता की भावना भी पनपती है। ऐसी योजनाओं से शिक्षा पर अभिभावकों का ध्यान कम जाएगा। जरूरत नारी का आत्म-सम्मान एवं आत्मविश्वास कायम करने की है, उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की है। नारी सोच बदलने की है। उन पर जो सामाजिक दबाव बनाया जाता है उससे निकलने के लिए उनको प्रोत्साहन देना होगा। ससुराल से निकाल दिए जाने की धमकी, पति द्वारा छोड़ दिए जाने का डर, कामकाजी महिलाओं के साथ कार्यस्थलों पर भेदभाव, दोहरा नजरियां, छोटी-छोटी गलतियों पर सेवामुक्त करने की धमकी, बड़े अधिकारियों द्वारा सैक्सअल दबाब बनाने, यहां तक कि जान से मार देने की धमकी के जरिये उन पर ऐसा दबाव बनाया जाता है। इन स्थितियों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है नारी को खुद हिम्मत जुटानी होगी, साहस का परिचय देना होगा लेकिन साथ ही समाज को भी अपने पूर्वाग्रह छोड़ने के लिए तैयार करना होगा। इन मुद्दों पर सरकारी और गैरसरकारी, विभिन्न स्तरों पर सकारात्मक नजरिया अपनाया जाये तो इससे न केवल महिलाओं का, बल्कि पूरे देश का संतुलित विकास सुनिश्चित किया जा सकेगा।

रामायण रचयिता आदि कवि महर्षि वाल्मीकि की यह पंक्ति-‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ जन-जन के मुख से उच्चारित है। प्रारंभ से ही यहाँ ‘नारीशक्ति’ की पूजा होती आई है फिर क्यों नारी अत्याचार बढ़ रहे हैं? क्यों महिला दिवस मनाते हुए नारी अस्तित्व एवं अस्मिता को सुरक्षा देने की बात की जाती है?  क्यों उसे दिन-प्रतिदिन उपेक्षा एवं तिरस्कार का सामना करना पड़ता है। इसके साथ-साथ भारतीय समाज में आई सामाजिक कुरीतियाँ जैसे सती प्रथा, बाल विवाह, पर्दा प्रथा, बहू पति विवाह और हमारी परंपरागत रूढ़िवादिता ने भी भारतीय नारी को दीन-हीन कमजोर बनाने में अहम भूमिका अदा की। बदलते परिवेश में आधुनिक महिलाओं के लिए यह आवश्यक है कि मैथिलीशरण गुप्त के इस वाक्य-“आँचल में है दूध” को सदा याद रखें। उसकी लाज को बचाएँ रखें। बल्कि एक ऐसा सेतु बने जो टूटते हुए को जोड़ सके, रुकते हुए को मोड़ सके और गिरते हुए को उठा सके। 

- ललित गर्ग







पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने के बावजूद नारी अभी भी प्रताड़ित है

  •  सुखी भारती
  •  मार्च 6, 2021   16:16
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पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने के बावजूद नारी अभी भी प्रताड़ित है

महादेवी वर्मा ने नारी की परिभाषा देते हुए कहा− 'नारी सिर्फ हाड़−मांस से बने पुतले का नाम नहीं अपितु आदिकाल से लेकर आज तक उसने विकास पथ पर पुरुष का साथ दिया। नर के शापों को खुद पर झेल कर वरदानों से उसके जीवन में अथाह शक्ति का संचार किया।'

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस हर वर्ष 8 मार्च को पूरे विश्व में बड़े हर्षोल्लास से मनाया जाता है। कहीं इसे महिलाओं के सम्मान में समर्पित एक पर्व के रूप में मनाया जाता है तो कहीं पर स्त्री−पुरुष की समानता−स्थापना दिवस के रूप में मनाया जाता है। कहीं पर महिला सशक्तिकरण में की जा रही कोशिशों के रूप में इस दिन की खास अहमीयत है। परंतु 1909 से लेकर 2020 तक विश्व भर में 111 अंतर राष्ट्रीय महिला दिवस मनाए जाने के बावजूद भी नारी को उसके योग्य सम्मान नहीं मिल पाया। वैज्ञानिक युग में पुरुषों के समकक्ष अपनी भागीदारी सिद्ध करने वाली नारी अभी भी प्रताड़ित है। एक तरफ कल्पना चावला, ऐलिन कोलिन्ज़, वैलेन्टाईना तेरोशकोवा, सुनीता विलीयमज़ ने अंतरिक्ष में अपनी पहचान बनाई तो वहीं सानिया मिर्ज़ा, सायना नेहवाल एवं पी.वी. सिंधु इत्यादि महिलाओं ने खेल जगत को अपनी प्रतिभा व कौशल से विस्मित करके रख दिया। चंदा कोचर, इंद्रा नूई जैसी प्रतिभाशाली औरतें ने पुरुषों के वर्चस्व वाले Finance and entrepreneurship के क्षेत्र में अपनी योग्यता का लोहा मनवाया। वहीं किरण मजमूदार शा जैसी नारियों का biotechnology, industrial enzymes निर्माण के सबसे मुश्किल माने जाने वाले क्षेत्र में उन्नति के नए शिखरों को छूकर नए आयाम स्थापित किए। वहीं दूसरी ओर नारी के साथ होती निरंतर हिंसा, अपराध, शोषण समाज के माथे के काले स्याह कलंक हैं जो नारी की उलझी हुई विरोधी स्थिति को उजागर करते हैं। अगर हम विश्व सेहत संगठन के आंकड़ों पर दृष्टिपात करेंगे तो पता चलेगा−

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1. विश्व में हर 3 में से 1 औरत (36 प्रतिशत) घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं। इनमें से लगभग 38 प्रतिशत औरतों की पति या निजी संबंध रखते हुए कुछ और पुरुषों द्वारा हत्या कर दी जाती है। 

2. अंतरराष्ट्रीय एसिड सर्वाइवर ट्रस्ट के अनुसार विश्व स्तर पर प्रत्येक वर्ष महिलाओं पर तेज़ाबी हमले के 1500 सौ से भी ज्यादा मामले दर्ज होते हैं। 

3. अंतरराष्ट्रीय मजदूर संगठन के अनुसार वर्ष 2012 में विश्व भर में 16 करोड़ औरतों को जर्बदस्ती मजदूरी करने को विवश किया गया एवं इसी दौरान ज्यादातर औरतें छेड़छाड़ की शिकार हुईं। 

4. विश्व में 79 प्रतिशत महिलाओं को गलत तरीके द्वारा बेचा और खरीदा जा रहा है। इन औरतों को जर्बदस्ती देह व्यापार में धकेल दिया जाता है। 

5. संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार प्रत्येक वर्ष विश्व में 2,55,000 महिलाओं के साथ बलात्कार के मामले दर्ज होते हैं। अमेरिका में प्रत्येक 5 में से 1 औरत का शील भंग किया जाता है। दक्षिणी अमेरिका में प्रत्येक 17 सैकिंड में 1 महिला का शील भंग किया जाता है। चीन के आंकड़े भी कुछ कम दहलाने वाले नहीं हैं क्योंकि चीन में 57 प्रतिशत से भी ज्यादा पुरुषों ने अपने जीवन में एक बार एवं 9 प्रतिशत पुरुषों ने 4 या फिर 4 से भी ज्यादा स्त्रियों का शील भंग किया। भारत देश भी कहाँ पीछे रहा यहाँ पर भी ऐसी वीभत्स घटनाएं प्रत्येक घंटे में नारियों के शील का हनन करती हैं। 

सबसे हैरानी की बात तो यह है कि ऊपर वर्णित सभी हिंसात्मक व अपराधों की शिकार सिर्फ अनपढ़ या ग्रामीण औरत नहीं अपितु पढ़ी−लिखी व आत्मनिर्भर नारी भी हैं। इस स्थिति में शिक्षा एवं रोज़गार महिला सशक्तिकरण का आधार स्तम्भ कहना कहाँ तक मान्य है? हमें गहराई से चिंतन करना पड़ेगा कि आज भी नारी हिंसा एवं शोषण का शिकार क्यों हो रही है? तो इसका एक ही मुख्य कारण उभर कर सामने आया कि इसकी जड़ें लिंग आधारित घटिया सोच एवं पक्षपात में ही निहित हैं। जिसकी शिकार गृहिणी एवं कामकाजी, आत्मनिर्भर महिलाएँ भी होती हैं। ऐसी सोच रखने वाले लोग इस बात को भूल जाते हैं कि जिस औरत के अंदर एक भ्रूण को विकसित करने की महान शक्ति है उस माँ में स्वयं कितनी शक्ति होगी? हमारे ऋषियों ने नारी की इस शक्ति को बहुत पहले ही जान लिया था। इसलिए उन्होंने अर्थववेद में वर्णित किया− माता भूमिः पुत्रो अहं पृथियाः भूमि मेरी माता है एवं हम इस धरती के पुत्र हैं। इन पंक्तियों में स्पष्ट तौर पर नारी की महिमा की घोषणा हो गई थी। 

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नेपोलीयन बोनापार्ट ने नारी की महानता बताते हुए कहा था− आप मुझे एक योग्य माता दे दें। मैं आपको एक योग्य राष्ट्र दे दूँगा। हम शहीद भगत सिंह जी की माता विद्यावती जी को कैसे भूल सकते हैं? कहा जाता है कि जब उनका पुत्र फांसी पर चढ़ा था तो उनकी माता जी की आँखों में अश्रु देखकर उनकी माता जी को पत्रकारों ने प्रश्न पूछा था कि आप तो एक शहीद की माता हैं फिर आप की आंखें नम क्यों हो रही हैं? आपको तो गर्व होना चाहिए कि आपका बेटा इतनी कम आयु में देश के हित लिए शहीद हुआ है। पत्रकारों की बात सुनकर माता विद्यावती जी ने जवाब दिया कि मैं अपने पुत्र की शहीदी पर नहीं रो रही हूँ अपितु अपनी कोख पर रो रही हूँ कि काश मेरी कोख से एक और भगत सिंह पैदा हुआ होता। तो मैं उसे भी भारत माता की गुलामी की बेड़ियां तोड़ने के लिए समर्पित कर देती। माता विद्यावती जी के मुख से निकले ये शब्द हमारे लिए सुनहरे शब्द बन गए जिनसे मानव समाज अनादि काल तक मार्गदर्शन प्राप्त करता रहेगा। महर्षि पाणिनी भी कहते हैं− 'जो पुरुष स्त्री से शिक्षा प्राप्त करेगा वह उत्तम बुद्धि वाला श्रेष्ठ पुरुष बन जाएगा।' महाकवि जय शंकर नारी से संबंधित बहुत ही सुंदर पंक्तियों का उच्चारण करते हुए कहते हैं− 'नारी तुम केवल श्रद्धा हो को याद कर अपने कर्त्तव्य को निभा नवयुग का स्वर्णिम इतिहास बन जाओ।' इसी प्रकार राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त नारी को नर से ज्यादा श्रेष्ठ मानते हुए कहते हैं− 'एक नहीं दो−दो मात्राएं नर से बढ़कर नारी।' महादेवी वर्मा ने नारी की परिभाषा देते हुए कहा− 'नारी सिर्फ हाड़−मांस से बने पुतले का नाम नहीं अपितु आदिकाल से लेकर आज तक उसने विकास पथ पर पुरुष का साथ दिया। नर के शापों को खुद पर झेल कर वरदानों से उसके जीवन में अथाह शक्ति का संचार किया।' 

विनोबा भावे जी ने नारी की इस अदभुत् शक्ति को वैज्ञानिक ढंग से प्रमाणित करते हुए कहा है− 'कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि स्त्री एवं पुरुष समान उम्र के हों, एक समान काम करते हों तो पुरुष का आहार 2000 कैलोरी का होगा एवं स्त्री को सिर्फ 1600 कैलोरी ही काफी हैं। यही नहीं स्त्रियाँ पुरुषों से ज्यादा लंबा जीवन व्यतीत करती हैं। भाव स्त्री के शरीर में पुरुष से ज्यादा जीवनी शक्ति निवास करती है। इसलिए महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले कम आराम की जरूरत होती है।' 

शायद तभी हमारे महापुरुषों ने स्त्री को 'महिला' की उपाधि दी। महिला भाव जो महान शक्ति की स्वामिनी है। नारी की इसी महानता को बयां करते हुए पाश्चात्य कवि William Goding ने भी कहा है− जो नारी यह दिखावा करती है कि वह पुरुष से श्रेष्ठ है तो वह मूर्ख है क्योंकि नारी इससे कहीं ज्यादा महान एवं शक्तिशाली है। असलियत तो यह कि पुरुष जो भी नारी को प्रदान करता है नारी उसे भी महान बना देती है− If you give her a sperm she will give you a baby. If you give her a house, she will give you a home. If you give her groceries, she will give you a meal. If you give her a smile, she will give you her heart. She multiplies and enlarges what is given to her. आदि शंकराचार्य जी नारी की महिमा में कहते हैं− कुपुत्रो जायेता क्वाचिदापि न भवति अर्थात् संतान कुपुत्र पैदा हो सकती है लेकिन माता कभी कुमाता नहीं हो सकती। वेदों का भी कथन है− 

वस्यां इन्द्रासि मे पितुः।

माता च मे छदयथः समा वासो।।

अर्थात् हे इन्द्र आप मेरे पिता से बढ़कर हैं। हे ईश्वर! आप और मेरी माता यह दो ही ऐसे हैं जो मेरे समस्त पापों एवं अपराधों को ढंक लेते हो। इसलिए कहा गया− त्वमेव माता च पिता त्वमेव। त्वमेव बन्धु च सखा त्वमेव। यहाँ पर भी ईश्वर के लिए सबसे पहले माता संबोधन ही आया है। 

तभी तो भगवान शंकर जी महर्षि गार्ग्य को समझाते हैं− यदगृहे रमते नारी, देवताः कोटिशो वत्स न त्यजन्ति गृहं हि तत्। अर्थात् जिस स्थान पर सदगुणों से भरपूर स्त्री सम्मान सहित निवास करती है। करोड़ों देवी देवता भी उस स्थान को त्यागकर नहीं जाते। 

इसलिए आज आवश्यकता है सदियों पहले संत अरस्तु द्वारा स्थापित किए गए सूत्र को समझने की− Equals should be treated equally भाव जो समान रूप से कार्यरत हैं उन्हें समान रूप में ही देखना चाहिए। लेकिन आज इतनी उन्नति के बावजूद भी हमारे समाज में स्त्री−पुरुषों के अधिकारों में गहरी खाई नज़र आती है। जिसे पाटना इस समय की महती आवश्यकता है।

-सुखी भारती







विश्व वन्यजीव दिवस: खतरे में है सैंकड़ों जीव प्रजातियों का अस्तित्व

  •  योगेश कुमार गोयल
  •  मार्च 3, 2021   16:05
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विश्व वन्यजीव दिवस: खतरे में है सैंकड़ों जीव प्रजातियों का अस्तित्व

देश में हर साल बड़ी संख्या में बाघ मर रहे हैं, हाथी कई बार ट्रेनों से टकराकर मौत के मुंह में समा रहे हैं, इनमें से कईयों को वन्य तस्कर मार डालते हैं। कभी गांवों या शहरों में बाघ घुस आता है तो कभी तेंदुआ और घंटों-घंटों या कई-कई दिनों तक दहशत का माहौल बन जाता है।

जैव विविधता की समृद्धि ही धरती को रहने तथा जीवनयापन के योग्य बनाती है किन्तु विड़म्बना है कि निरन्तर बढ़ता प्रदूषण रूपी राक्षस वातावरण पर इतना खतरनाक प्रभाव डाल रहा है कि जीव-जंतुओं और वनस्पतियों की अनेक प्रजातियां धीरे-धीरे लुप्त हो रही हैं। इसीलिए संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 20 दिसम्बर 2013 को अपने 68वें सत्र में 3 मार्च के दिन को विश्व वन्यजीव दिवस के रूप में अपनाए जाने की घोषणा की। अगर भारत में कुछ जीव-जंतुओं की प्रजातियों पर मंडराते खतरों की बात करें तो जैव विविधता पर दिसम्बर 2018 में संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (सीबीडी) में पेश की गई छठी राष्ट्रीय रिपोर्ट से पता चला था कि अंतर्राष्ट्रीय ‘रेड लिस्ट’ की गंभीर रूप से लुप्तप्रायः और संकटग्रस्त श्रेणियों में भारतीय जीव प्रजातियों की सूची वर्षों से बढ़ रही है। इस सूची में शामिल प्रजातियों की संख्या में वृद्धि जैव विविधता तथा वन्य आवासों पर गंभीर तनाव का संकेत है। भारत में इस समय नौ सौ से भी अधिक दुर्लभ प्रजातियां खतरे में बताई जा रही हैं। यही नहीं, विश्व धरोहर को गंवाने वाले देशों की सूची में दुनियाभर में भारत का चीन के बाद सातवां स्थान है।

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हिन्दी अकादमी दिल्ली के सहयोग से प्रकाशित चर्चित पुस्तक ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ के मुताबिक भारत का समुद्री पारिस्थितिकीय तंत्र करीब 20444 जीव प्रजातियों के समुदाय की मेजबानी करता है, जिनमें से 1180 प्रजातियों को संकटग्रस्त तथा तत्काल संरक्षण के लिए सूचीबद्ध किया गया है। अगर देश में प्रमुख रूप से लुप्त होती कुछेक जीव-जंतुओं की प्रजातियों की बात करें तो कश्मीर में पाए जाने वाले हांगलू की संख्या सिर्फ दो सौ के आसपास रह गई है, जिनमें से करीब 110 दाचीगाम नेशनल पार्क में हैं। इसी प्रकार आमतौर पर दलदली क्षेत्रों में पाई जाने वाली बारहसिंगा हिरण की प्रजाति अब मध्य भारत के कुछ वनों तक ही सीमित रह गई है। वर्ष 1987 के बाद से मालाबार गंधबिलाव नहीं देखा गया है। हालांकि माना जाता है कि इनकी संख्या पश्चिमी घाट में फिलहाल दो सौ के करीब बची है। दक्षिण अंडमान के माउंट हैरियट में पाया जाने वाला दुनिया का सबसे छोटा स्तनपायी सफेद दांत वाला छछूंदर लुप्त होने के कगार पर है। एशियाई शेर भी गुजरात के गिर वनों तक ही सीमित हैं।

देश में हर साल बड़ी संख्या में बाघ मर रहे हैं, हाथी कई बार ट्रेनों से टकराकर मौत के मुंह में समा रहे हैं, इनमें से कईयों को वन्य तस्कर मार डालते हैं। कभी गांवों या शहरों में बाघ घुस आता है तो कभी तेंदुआ और घंटों-घंटों या कई-कई दिनों तक दहशत का माहौल बन जाता है। यह सब वन क्षेत्रों के घटने और विकास परियोजनाओं के चलते वन्य जीवों के आश्रय स्थलों में बढ़ती मानवीय घुसपैठ का ही परिणाम है कि वन्य जीवों तथा मनुष्यों का टकराव लगातार बढ़ रहा है और वन्य प्राणी अभयारण्यों की सीमा पार कर बाघ, तेंदुए इत्यादि वन्य जीव अब अक्सर बेघर होकर भोजन की तलाश में शहरों का रूख करने लगे हैं, जो कभी खेतों में लहलहाती फसलों को तहस-नहस कर देते हैं तो कभी इंसानों पर जानलेवा हमले कर देते हैं। ‘इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर’ (आईयूसीएन) के मुताबिक भारत में पौधों की करीब 45 हजार प्रजातियां पाई जाती हैं और इनमें से भी 1336 प्रजातियों पर लुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। इसी प्रकार फूलों की पाई जाने वाली 15 हजार प्रजातियों में से डेढ़ हजार प्रजातियां लुप्त होने के कगार पर हैं।

‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ पुस्तक के अनुसार प्रदूषण तथा स्मॉग भरे वातावरण में कीड़े-मकौड़े सुस्त पड़ जाते हैं। प्रदूषण का जहर अब मधुमक्खियों तथा सिल्क वर्म जैसे जीवों के शरीर में भी पहुंच रहा है। रंग-बिरंगी तितलियों को भी इससे काफी नुकसान हो रहा है। यही नहीं, अत्यधिक प्रदूषित स्थानों पर तो पेड़-पौधों पर भी इसका इतना बुरा प्रभाव पड़ रहा है कि हवा में सल्फर डाईऑक्साइड, नाइट्रोजन तथा ओजोन की अधिक मात्रा के चलते पेड़-पौधों की पत्तियां भी जल्दी टूट जाती हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि अगर इस ओर जल्द ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले समय में स्थितियां इतनी खतरनाक हो जाएंगी कि धरती से पेड़-पौधों तथा जीव-जंतुओं की कई प्रजातियां विलुप्त हो जाएंगी। पृथ्वी पर पेड़ों की संख्या घटने से अनेक जानवरों और पक्षियों से उनके आशियाने छिन रहे हैं, जिससे उनका जीवन संकट में पड़ रहा है।

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वन्य जीवों को विलुप्त होने से बचाने के लिए भारत में पहला कानून ‘वाइल्ड एलीकेंट प्रोटेक्शन एक्ट’ ब्रिटिश शासनकाल में 1872 में बनाया गया था। 1927 में ब्रिटिश शासनकाल में ही ‘भारतीय वन अधिनियम’ बनाकर वन्य जीवों का शिकार तथा वनों की अवैध कटाई को अपराध की श्रेणी में रखते हुए दंड का प्रावधान किया गया। 1956 में एक बार फिर ‘भारतीय वन अधिनियम’ पारित किया गया और वन्य जीवों के बिगड़ते हालातों में सुधार के लिए 1983 में ‘राष्ट्रीय वन्य जीव योजना’ की शुरूआत की गई, जिसके तहत कई नेशनल पार्क और वन्य प्राणी अभयारण्य बनाए गए। हालांकि नेशनल पार्क बनाने का सिलसिला ब्रिटिश काल में ही शुरू हो गया था, जब सबसे पहला नेशनल पार्क 1905 में असम में बनाया गया था और उसके बाद दूसरा नेशनल पार्क ‘जिम कार्बेट पार्क’ 1936 में बंगाल टाइगर के संरक्षण के लिए उत्तराखण्ड में बनाया गया था लेकिन आज नेशनल पार्कों की संख्या बढ़कर 103 हो गई है और देश में कुल 530 वन्य जीव अभयारण्य भी हैं, जिनमें 13 राज्यों में 18 बाघ अभयारण्य भी स्थापित किए गए हैं।

आजादी के बाद से देश में वन्य जीवों के संरक्षण के लिए कई परियोजनाएं चलाई जा रही हैं, जिनमें ‘कस्तूरी मृग परियोजना 1970’, ‘प्रोजेक्ट हुंगल 1970’, ‘गिर सिंह परियोजना 1972’, ‘बाघ परियोजना 1973’, ‘कछुआ संरक्षण परियोजना 1975’, ‘गैंडा परियोजना 1987’, ‘हाथी परियोजना 1992’, ‘गिद्ध संरक्षण परियोजना 2006’, ‘हिम तेंदुआ परियोजना 2009’ इत्यादि शामिल हैं। इस तरह की कई परियोजनाएं शुरू किए जाने के बावजूद शेर, बाघ, हाथी, गैंडे इत्यादि अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। भारत फिलहाल जैव विविधता पर करीब दो अरब डॉलर खर्च कर रहा है और इसे वन्य जीवों के संरक्षण के लिए चलाई जा रही परियोजनाओं की सफलता ही माना जाना चाहिए कि जहां 2006 में देश में व्यस्क बाघों की संख्या 1411 थी, वह 2010 में बढ़कर 1706, 2014 में 2226 और 2018 में 2967 हो गई। हालांकि बाघों की बढ़ी संख्या का यह आंकड़ा अभी संतोषजनक नहीं है क्योंकि इसी देश में कभी बाघों की संख्या करीब 40 हजार हुआ करती थी। सरकारी योजनाओं की सफलता ही असर है कि आईयूसीन द्वारा शेर जैसी पूंछ वाले बंदरों की संख्या बढ़ने के कारण इन्हें 25 लुप्तप्रायः जानवरों की सूची से हटा दिया गया है। जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के अनुसार 2011 में भारत में जानवरों की 193 नई प्रजातियां भी पाई गई।

माना कि धरती पर मानव की बढ़ती जरूरतों और सुविधाओं की पूर्ति के लिए विकास आवश्यक है लेकिन यह हमें ही तय करना होगा कि विकास के इस दौर में पर्यावरण तथा जीव-जंतुओं के लिए खतरा उत्पन्न न हो। अगर विकास के नाम पर वनों की बड़े पैमाने पर कटाई के साथ-साथ जीव-जंतुओं तथा पक्षियों से उनके आवास छीने जाते रहे और ये प्रजातियां धीरे-धीरे धरती से एक-एक कर लुप्त होती गई तो भविष्य में उससे उत्पन्न होने वाली भयावह समस्याओं और खतरों का सामना हमें ही करना होगा। बढ़ती आबादी तथा जंगलों के तेजी से होते शहरीकरण ने मनुष्य को इस कदर स्वार्थी बना दिया है कि वह प्रकृति प्रदत्त उन साधनों के स्रोतों को भूल चुका है, जिनके बिना उसका जीवन ही असंभव है। आज अगर खेतों में कीटों को मारकर खाने वाले चिडि़या, मोर, तीतर, बटेर, कौआ, बाज, गिद्ध जैसे किसानों के हितैषी माने जाने वाले पक्षी भी तेजी से लुप्त होने के कगार हैं तो हमें आसानी से समझ लेना चाहिए कि हम भयावह खतरे की ओर आगे बढ़ रहे हैं और हमें अब समय रहते सचेत हो जाना चाहिए। हमें अब भली-भांति समझ लेना होगा कि पृथ्वी पर जैव विविधता को बनाए रखने के लिए सबसे जरूरी और सबसे महत्वपूर्ण यही है कि हम धरती की पर्यावरण संबंधित स्थिति के तालमेल को बनाए रखें।

- योगेश कुमार गोयल

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और पर्यावरण मामलों के जानकार हैं। गत वर्ष इन्होंने पर्यावरण पर चर्चित पुस्तक ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ लिखी है।)







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