अक्षय तृतीया को सर्वाधिक शुभ दिन क्यों माना जाता है ? क्या है पूजन विधि और व्रत कथा ?

अक्षय तृतीया को सर्वाधिक शुभ दिन क्यों माना जाता है ? क्या है पूजन विधि और व्रत कथा ?

हिंदू पौराणिक ग्रंथों में कहा गया है कि अक्षय तृतीया के दिन मनुष्य अपने या स्वजनों द्वारा किए गए जाने-अनजाने अपराधों के लिए सच्चे मन से ईश्वर से क्षमा प्रार्थना करे तो भगवान अपराधों को क्षमा कर देते हैं और उसे सद्गुण प्रदान करते हैं।

अक्षय तृतीया या आखा तीज वैशाख मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को कहा जाता है। इस वर्ष यह पर्व 14 मई को पड़ रहा है लेकिन पिछले साल की तरह इस बार भी लॉकडाउन के कारण लोगों को घरों पर ही यह पर्व मनाना पड़ेगा। पौराणिक ग्रंथों में इस पर्व की महत्ता बताते हुए कहा गया है कि इस दिन जो भी शुभ कार्य किये जाते हैं, उनका अक्षय फल मिलता है। वैसे तो सभी बारह महीनों की शुक्ल पक्षीय तृतीया शुभ होती है, किंतु वैशाख माह की तिथि स्वयंसिद्ध मुहूर्तों में मानी गई है। कहा जाता है कि इस दिन बिना कोई पंचांग देखे कोई भी शुभ व मांगलिक कार्य जैसे विवाह, गृह-प्रवेश, वस्त्र-आभूषणों की खरीददारी या घर, भूखंड, वाहन आदि की खरीददारी आदि कार्य किए जा सकते हैं।

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दो साल से बदल गया है अक्षय तृतीया पर्व का सामाजिक स्वरूप

इस दिन आभूषणों की दुकानों पर लोगों की भीड़ उसी तरह लगती है जैसे धनतेरस के दिन होती है। यही नहीं बहुत-से लोग तो इस दिन नया वाहन खरीदते हैं या नये मकान का सौदा आदि करते हैं ताकि उनके घर में धन-धान्य बना रहे। माना जाता है कि इस दिन ख़रीदा गया सोना कभी समाप्त नहीं होता, क्योंकि भगवान विष्णु एवं माता लक्ष्मी स्वयं उसकी रक्षा करते हैं। हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार यह दिन सौभाग्य और सफलता का सूचक है। यही नहीं साल में सबसे ज्यादा जिन दिनों में शादियां होती हैं उनमें से एक अक्षय तृतीया भी है। लेकिन इस साल हालात अलग नजर आ रहे हैं। बाजार बंद हैं, ऑनलाइन ज्यादा लोग ज्वैलरी खरीदते नहीं, खरीद भी लें तो यह चिंता है कि वह मिलेगा कैसे क्योंकि इस समय सिर्फ आवश्यक वस्तुओं की ही डिलीवरी की कई जगह अनुमति है। इसी सब को देखते हुए गोल्ड बांड्स की तरफ लोग आकर्षित हो रहे हैं। लेकिन ऐसे लोगों की संख्या भी सीमित ही है क्योंकि अधिकांश लोग तो इसी चिंता में हैं कि किसी तरह इस महामारी के समय में जीवन बचे। दूसरी ओर शादियां भी जो धूमधाम से हुआ करती थीं वह अब कहीं मात्र 20 लोगों की तो कहीं 50 लोगों की उपस्थिति में हो रही हैं। गंगा घाटों पर लगने वाले स्नान मेले भी नहीं आयोजित किये जा रहे हैं।

पर्व की महत्ता

अक्षय तृतीया के दिन पितरों को किया गया तर्पण या किसी भी प्रकार का दान, अक्षय फल प्रदान करने वाला है। इस दिन गंगा स्नान करने से तथा भगवत पूजन से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। मान्यता है कि यदि इस दिन मनुष्य अपने या स्वजनों द्वारा किए गए जाने-अनजाने अपराधों के लिए सच्चे मन से ईश्वर से क्षमा प्रार्थना करे तो भगवान अपराधों को क्षमा कर देते हैं और उसे सद्गुण प्रदान करते हैं।

अक्षय तृतीया पूजन विधि

अक्षय तृतीया के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर गंगा स्नान करने के बाद शांत मन से भगवान श्रीविष्णु की विधि विधान से पूजा करनी चाहिए। इस दौरान नैवेद्य में जौ या गेहूँ का सत्तू, ककड़ी और चने की दाल अर्पित की जाती है। इसके बाद फल, फूल, बरतन तथा वस्त्र आदि ब्राह्मणों को दान के रूप में दिये जाते हैं। इस दिन ब्राह्मण को भोजन करवाना कल्याणकारी समझा जाता है। इस दिन लक्ष्मी नारायण की पूजा सफेद कमल अथवा सफेद गुलाब या पीले गुलाब से करना चाहिये।

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अक्षय तृतीया पर्व से जुड़ी मान्यताएं

अक्षय तृतीया पर्व वसंत ऋतु के अंत और ग्रीष्म ऋतु का प्रारंभ का दिन भी है इसलिए इस दिन जल से भरे घड़े, कुल्हड़, पंखे, खडाऊं, छाता, चावल, नमक, घी, खरबूजा, ककड़ी, चीनी, साग, इमली, सत्तू आदि गरमी में लाभकारी वस्तुओं का दान पुण्यकारी माना गया है। इस तिथि का कितना महत्व है यह इस बात से भी पता चलता है कि सतयुग और त्रेता युग का प्रारंभ इसी तिथि से हुआ है। भगवान परशुराम जी का अवतरण भी इसी तिथि को हुआ था। तीर्थ स्थल बद्रीनारायण के कपाट भी इसी तिथि से ही खुलते हैं। वृंदावन स्थित श्री बांके बिहारी जी मन्दिर में भी केवल इसी दिन श्री विग्रह के चरण दर्शन होते हैं, अन्यथा वे पूरे वर्ष वस्त्रों से ढंके रहते हैं। इसी दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था और द्वापर युग का समापन भी इसी दिन हुआ था।

अक्षय तृतीया पर्व कथा

अक्षय तृतीया का महत्व युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा था। तब श्रीकृष्ण बोले, 'राजन! यह तिथि परम पुण्यमयी है। इस दिन दोपहर से पूर्व स्नान, जप, तप, होम तथा दान आदि करने वाला महाभाग अक्षय पुण्यफल का भागी होता है। इसी दिन से सतयुग का प्रारम्भ होता है। इस पर्व से जुड़ी एक प्रचलित कथा इस प्रकार है−

प्राचीन काल में सदाचारी तथा देव ब्राह्मणों में श्रद्धा रखने वाला धर्मदास नामक एक वैश्य था। उसका परिवार बहुत बड़ा था। इसलिए वह सदैव व्याकुल रहता था। उसने किसी से व्रत के माहात्म्य को सुना। कालान्तर में जब यह पर्व आया तो उसने गंगा स्नान किया। विधिपूर्वक देवी देवताओं की पूजा की। गोले के लड्डू, पंखा, जल से भरे घड़े, जौ, गेहूं, नमक, सत्तू, दही, चावल, गुड़, सोना तथा वस्त्र आदि दिव्य वस्तुएं ब्राह्मणों को दान कीं। स्त्री के बार−बार मना करने, कुटुम्बजनों से चिंतित रहने तथा बुढ़ापे के कारण अनेक रोगों से पीडि़त होने पर भी वह अपने धर्म कर्म और दान पुण्य से विमुख न हुआ। यही वैश्य दूसरे जन्म में कुशावती का राजा बना। अक्षय तृतीया के दान के प्रभाव से ही वह बहुत धनी तथा प्रतापी बना। वैभव संपन्न होने पर भी उसकी बुद्धि कभी धर्म से विचलित नहीं हुई। जैसा कि भगवान श्रीविष्णु ने कहा था, मथुरा जाकर राजा ने बड़ी ही श्रद्धा के साथ वैसा ही किया और इस व्रत के प्रभाव से वह शीघ्र ही अपने पैरों को प्राप्त कर सका।

-शुभा दुबे





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