न संघर्ष थमेगा न होगा हसीना का प्रत्यर्पण

Sheikh Hasina
ANI

हसीना की वापसी पर भारत कहता रहा है कि शेख़ हसीना को बांग्लादेश लौटना है या नहीं, इसका फैसला उन्हें ही करना है। हिंदुस्तान टाइम्स लीडरशिप समिट 2025 में विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर कह चुके हैं कि हसीना ‘खास परिस्थितियों’ में भारत आई थीं और वह स्थिति उनके भविष्य को तय करने में बड़ा रोल निभाएगी।

बांग्लादेश में तारिक रहमान की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी यानी बीएनपी की भारी जीत के बाद लंदन की जगह दिल्ली ने ले ली है। जब शेख हसीना ढाका से सरकार चलाती थीं, तब तारिक लंदन से उस पर निगाह रखते थे। अब रहमान सरकार चलायेंगे और हसीना दिल्ली से उस पर निगाह रखेंगी. उसका मतलब यह नहीं है कि रहमान हसीना के प्रत्यर्पण की माँग नहीं करेंगे। हसीना के प्रत्यर्पण की माँग कार्यवाहक सरकार के मुखिया मो. यूनुस भी करते रहे हैं और तारिक भी करते रहेंगे। बांग्लादेश में विद्रोह के बाद शेख हसीना को मौत की सजा सुनाई जा चुकी है। इस बहाने उनके प्रत्यर्पण की माँग तारिक समेत कई अन्य नेता भी करते रहे हैं। लेकिन अब तारिक का सुर नरम हो सकता है। इसकी वजह यह है कि वे यूनुस की तुलना में कहीं ज्यादा वैध लोकतांत्रिक सरकार के मुखिया बनने जा रहे हैं। लोकतांत्रिक सत्ता उतनी कट्टर और कठोर नहीं हो सकती, जैसी वीणा वैध मतदान के बाद आईं सरकारें होतीं हैं। वैसे भी भारत शेख हसीना को बांग्लादेश नहीं भेजने जा रहा है। 

बीएनपी का रूख भारत समर्थक तो नहीं ही रहा है, लेकिन बीएनपी प्रमुख ख़ालिदा जिया के निधन के बाद भारत ने जिस तरह का रुख़ अपनाया, उससे तारिक के मन की गाँठ खुली है। ख़ालिदा के शोक के वक़्त जिस तरह भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कदम उठाया और ढाका जाकर तारिक से दुख व्यक्त किया, उसे बांग्लादेश के साथ भारत की भावी रणनीति और संभावनाशील संबंधों की बानगी माना जा सकता है। भारत को अंदेशा था कि चुनावों में बीएनपी को समर्थन मिल सकता है। इसलिए उसने सही समय पर सही कदम उठाने में कोई हिचक नहीं दिखाई। वैसे भी बांग्लादेश की सबसे प्रभावी पार्टी रही अवामी लीग ने चुनावों का बहिष्कार करने की घोषणा कर रखी थी। फिर यूनुस सरकार और कट्टरपंथी जमात ए इस्लाम के नेताओं ने अवामी लीग की राह में जमकर कांटे बोए। ऐसे में बीएनपी की जीत की उम्मीद बेमानी भी नहीं थी।

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खालिदा जिया के निधन के बाद हुई एस जयशंकर की ढाका यात्रा से ही भारत की ओर से तारिक रहमान से संपर्क साधना शुरू हो गया था। इसका असर तारिक के चुनाव प्रचार में भी दिखाई दिया। उन्होंने अपने चुनाव प्रचार के दौरान भूलकर भी भारत के खिलाफ कोई बयान नहीं दिया, जिससे भविष्य में दोनों देशों के बीच बेहतर रिश्तों की उम्मीद जगी है।

हसीना की वापसी पर भारत कहता रहा है कि शेख़ हसीना को बांग्लादेश लौटना है या नहीं, इसका फैसला उन्हें ही करना है। हिंदुस्तान टाइम्स लीडरशिप समिट 2025 में विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर कह चुके हैं कि हसीना ‘खास परिस्थितियों’ में भारत आई थीं और वह स्थिति उनके भविष्य को तय करने में बड़ा रोल निभाएगी। कुछ ऐसे ही शब्दों का प्रयोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कर चुके हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर उन्होंने तारिक रहमान को जीत की बधाई दी है। चुनाव आयोग के आधिकारिक नतीजों से पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीएनपी की जीत को जनता का भरोसा बताने में देर नहीं लगाई। उन्होंने कहा कि भारत लोकतांत्रिक और समावेशी बांग्लादेश के साथ काम करने को तैयार है।

चुनाव जीतने के बावजूद बांग्लादेश के भावी प्रधानमंत्री तारिक की चुनौतियां कम नहीं होने जा रहीं हैं। इसकी वजह है, बांग्लादेश के बीते चुनाव में बेहद कम मतदान। जिसमें सिर्फ 48 प्रतिशत वोटिंग हुई है, यानि 52 प्रतिशत लोगो  ने मतदान ही नहीं किया। ध्यान देने की बात है कि शेख हसीना को बांग्लादेश के 35 से  प्रतिशत लोगों का समर्थन मिलता रहा है। कम मतदान का मतलब है कि हसीना के समर्थकों ने बड़े पैमाने पर चुनाव का बहिष्कार किया। इसके साथ ही केवल 48 प्रतिशत मतदान का मतलब है कि तारिक रहमान की अगुआई वाले गठबंधन को देश के ज्यादतर लोगों का समर्थन नहीं मिला। गौर करने की बात है कि बीएनपी की अगुआई वाले गठबंधन में पार्टी जमात-ए-इस्लामी, छात्रों की पार्टी एनसीए और जातीय पार्टी शामिल हैं। इसका अर्थ यह है कि बीते चुनाव में बीएनपी को 25 से प्रतिशत मत ही मिले और इतने कम वोट से ही वह सत्ता संभालने जा रही है। इसका संदेश साफ़ है कि हसीना का "वोट बैंक" खत्म नहीं हुआ है, बल्कि वह फिलहाल चुप है। इससे अवामी लीग के लिए भविष्य में वापसी की उम्मीद तो बनती ही है, बीएनपी के लिए चेतावनी भी है।

आधे से भी कम मतदान के बाद मिली जीत भी वैध नहीं मानी जा सकती। अवामी लीग के ख़िलाफ़ बगावत के बीज उनके आख़िरी चुनाव के दौरान तत्कालीन विपक्षी दलों के चुनाव बहिष्कार से ही पड़ गए थे। कुछ वैसा ही हाल बीएनपी के साथ भी हो सकता है। आधे से भी कम आबादी की वोटिंग आगे जाकर जीतने वाली सरकार की वैधता पर सवाल का कारण बन सकती है। शेख हसीना भी जानती हैं कि हिंसक प्रदर्शन के बाद हुए चुनाव के बाद आई नई सरकार को करीब तीस प्रतिशत लोगों का ही समर्थन हासिल है। कम मतदान और मौजूदा सरकार का कम आधार आगे चलकर शेख हसीना के लिए संघर्ष का नया बहाना बन सकता है। वे इसे अपने लिए नैतिक जीत बता सकतीं हैं और इस आधार पर अवामी लीग के लिए फिर से सहयोग की व्यापक माँग कर सकती हैं। वैसे भी वे पहले यूनुस सरकार के ख़िलाफ़ लोगों से उठ खड़े होने की अपील कर चुकी हैं। साफ़ है कि बांग्लादेश का न तो संघर्ष ख़त्म होने जा रहा है और न शेख हसीना का प्रत्यर्पण. इस हालात में भारत को संतुलन बनाए रखते हुए आगे बढ़ना होगा।

-उमेश चतुर्वेदी

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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