• Gyan Ganga: भगवान की कृपा से अर्जुन का मोह व संशय नष्ट हो गये और वह आज्ञा का पालन करने लगे

आरएन तिवारी Jul 23, 2021 15:43

यदि गीता ज्ञान का प्रचार-प्रसार और अध्ययन करने में भी असमर्थ है तो उस मनुष्य को श्रद्धायुक्त और दोषदृष्टि से रहित होकर इस गीताशास्त्र का श्रवण करना चाहिए ऐसा करने से, वह भी पापों से मुक्त होकर उत्तम कर्म करने वालों के श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त होगा।

प्रभासाक्षी के सहृदय गीता प्रेमियों ! 

भगवान जिन्हें ऊँचाई पर पहुंचाना चाहते हैं उन्हें सबसे अधिक तकलीफ देते हैं ताकि तकलीफ से लड़ते-लड़ते वह मंजिल तक पहुँच जाए। आइए ! अब गीता के आगे के प्रसंग में चलते हैं---

पिछले अंक में भगवान ने अर्जुन से कहा था, सभी कर्मों को मुझमें अर्पण करके तथा समान बुद्धि के साथ योग का आश्रय लेकर मेरे परायण हो जाओ और अपना चित्त मुझमें लगा दो। अब आगे भगवान कहते हैं, सब कुछ छोड़कर मेरी शरण में आ जाओ।

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श्री भगवान उवाच 

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।

अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥

गीता उपदेश का संपूर्ण सार इसी श्लोक में निहित है। भगवान कहते हैं, हे अर्जुन! सभी धर्मों को अर्थात संपूर्ण कर्तव्य कर्मों को मुझ पर छोड़कर तू केवल एक मुझ सर्वशक्तिमान, सर्वाधार परमेश्वर की ही शरण में आ जा। मैं तुझे संपूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर। कभी-कभी धर्म और अधर्म का निर्णय भगवान पर छोड़ देना चाहिए। 

अर्जुन का कर्ण के साथ युद्ध चल रहा था। इसी बीच कर्ण के रथ का चक्का जमीन में धँस गया, कर्ण रथ से नीचे उतरकर चक्के को निकालने का प्रयास करने लगा और अर्जुन से कहा- जब तक मैं यह चक्का निकाल न लूँ तब तक तुम ठहर जाओ। तुम सहस्त्रार्जुन के समान शस्त्र और शास्त्र के ज्ञाता हो और धर्म को जानने वाले हो इसलिए इस वक्त मुझ पर प्रहार करना उचित नहीं है। कर्ण की बात सुनकर अर्जुन ने बाण नहीं चलाया। तब भगवान ने कर्ण से कहा— तुम्हारे जैसे आततायी को किसी तरह से मार देना धर्म ही है पाप नहीं।

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अभी-अभी तुम छह महारथियों ने मिलकर अकेले अभिमन्यु को चारो तरफ से घेरकर मार डाला, उस समय तुम्हारा धर्म कहाँ था? इसलिए अब धर्म की दुहाई देने से कोई लाभ नहीं है। जो स्वयं धर्म का पालन नहीं करता, उसे धर्म का उपदेश देने का कोई हक नहीं बनता। ऐसा कहकर भगवान ने अर्जुन को बाण चलाने की आज्ञा दी तो अर्जुन बाण चलाना आरंभ कर दिया। इस प्रकार यदि अर्जुन अपनी बुद्धि से धर्म का निर्णय करते तो भूल कर बैठते। इसलिए उन्होने धर्म का निर्णय भगवान पर छोड़ दिया और भगवान ने परिस्थिति को देखते हुए धर्म का उचित निर्णय भी किया।  

अब भगवान गीता का माहात्म्य समझते हुए कहते हैं--

इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ।

चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥

हे अर्जुन! यह रहस्यमय गीता का उपदेश ब्रह्म गीत है। इस गीता उपदेश की चर्चा उन लोगों के सामने नहीं करनी चाहिए, जिनमें भक्ति-भाव न हो, वेद शास्त्र और भगवान, गुरुजनों में श्रद्धा, प्रेम न हो और जो सुनने की इच्छा नहीं रखता हो तथा जो मुझमें दोषदृष्टि रखता हो, उससे तो कभी भी नहीं करनी चाहिए॥

य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति ।

भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ॥

इस श्लोक में भगवान गीता का प्रभाव बताते हुए कहते हैं-- जो व्यक्ति इस गीता ज्ञान का प्रचार-प्रसार करेगा वह मेरा सबसे प्रिय भक्त होगा और अंत समय में  वह मुझको ही प्राप्त होगा- इसमें कोई संदेह नहीं है। 

अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः ।

ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ॥

जो व्यक्ति गीता ज्ञान का प्रचार-प्रसार करने में भी असमर्थ है, उसको चाहिए कि वह इस धर्ममय हम दोनों के संवाद रूप गीताशास्त्र का अध्ययन करे। उसके द्वारा भी मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊँगा- ऐसा मेरा मत है। 

श्रद्धावाननसूयश्च श्रृणुयादपि यो नरः ।

सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्‌ ॥

यदि गीता ज्ञान का प्रचार-प्रसार और अध्ययन करने में भी असमर्थ है तो उस मनुष्य को श्रद्धायुक्त और दोषदृष्टि से रहित होकर इस गीताशास्त्र का श्रवण करना चाहिए ऐसा करने से, वह भी पापों से मुक्त होकर उत्तम कर्म करने वालों के श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त होगा। जहाँ कहीं भी गीता का पाठ या गीता उपदेश की चर्चा होती है वहाँ भगवान श्रीकृष्ण उपस्थित हो जाते हैं। 

गीता पढ़ने, सुनने का माहात्म्य बताकर अब अर्जुन की क्या स्थिति है, क्या दशा है, आदि सब कुछ जानते हुए भी भगवान भगवत गीता के श्रवण के माहात्म्य को सबके सामने प्रकट करने के मकसद से अर्जुन से प्रश्न करते हैं।   

कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा ।

कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय ॥

हे पार्थ ! सम्बोधन देकर भगवान अपनेपन से, बहुत प्यार से पूछ रहे हैं, क्या इस (गीताशास्त्र) को तूने एकाग्रचित्त से श्रवण किया? और हे धनञ्जय! क्या तेरा अज्ञानजनित मोह नष्ट हो गया? भगवान कृष्ण को अर्जुन से बहुत स्नेह था वे जानना चाहते थे कि उसने श्रद्धापूर्वक और ध्यानपूर्वक गीता सुनी कि नहीं। भगवान यहाँ दूसरा प्रश्न भी करते हैं कि तुम्हारा अज्ञानता से उत्पन्न हुआ मोह नष्ट हुआ कि नहीं? अगर मोह नष्ट हो गया तो तुमने मेरा उपदेश सुन लिया और अगर मोह नष्ट नहीं हुआ तो तुमने मेरा यह रहस्यमय उपदेश एकाग्रता से सुना ही नही, क्योंकि यह एकदम पक्का नियम है जो अपनी दृष्टि को शुद्ध कर श्रद्धा के साथ श्रीमदभगवत गीता के उपदेश को सुनता है उसका मोह निश्चित रूप से नष्ट हो जाता है। धनंजय सम्बोधन देकर भगवान कहते हैं तुम सांसरिक धन को लेकर (राजाओं के धन को जीतने वाले को धनंजय कहते हैं) धनंजय बने हो। अब इस वास्तविक गीता के तत्वरूप धन को प्राप्त करके अपने मोह का नाश कर लो और सच्चे अर्थों में धनंजय बन जाओ।

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अब आगे के श्लोक में अर्जुन भगवान के प्रश्नों के उत्तर देते हैं---

अर्जुन उवाच

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वप्रसादान्मयाच्युत ।

स्थितोऽस्मि गतसंदेहः करिष्ये वचनं तव ॥

अर्जुन बोले- हे अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया और मैंने स्मृति प्राप्त कर ली है, अब मैं संशयरहित होकर स्थिर हूँ, अतः आपकी आज्ञा का पालन करूँगा। मैं युद्ध करूँ या नहीं करूँ ? अब यह संदेह नहीं रहा। मेरे लिए अब कुछ करना बाकी नहीं रहा, केवल आपकी आज्ञा का पालन करना बाकी है। अब मैं सम्पूर्ण रूप से आपका हो गया हूँ। अर्जुन ने यहाँ भगवान के लिए अच्युत सम्बोधन का प्रयोग किया है। इसका तात्पर्य यह है कि जीव तो च्युत हो जाता है अर्थात पतन की तरफ चला जाता है, परंतु भगवान कभी भी च्युत नहीं होते। वे सदा सर्वदा एकरस रहते हैं। उनमें कभी भी कोई दोष नहीं होता, वे सदा निर्दोष हैं। 

सब में कोई ना कोई दोष रहा

एक विधाता बस निर्दोष रहा

सब में कोई ना कोई दोष रहा

एक विधाता बस निर्दोष रहा

वेद शास्त्र का महापंडित ज्ञानी

रावण था पर था अभिमानी

शिव का भक्त भी सिया चुरा कर

कर बैठा ऐसी नादानी

राम से हरदम रोष रहा

सब में कोई ना कोई दोष रहा

एक विधाता बस निर्दोष रहा

श्री वर्चस्व आयुस्व आरोग्य कल्याणमस्तु --------

जय श्रीकृष्ण----------

-आरएन तिवारी