Gyan Ganga: गीता में कहा गया है- जिसने इंद्रियों को वश में कर लिया उसने जग जीत लिया

  •  आरएन तिवारी
  •  जनवरी 1, 2021   18:00
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Gyan Ganga: गीता में कहा गया है- जिसने इंद्रियों को वश में कर लिया उसने जग जीत लिया

भगवान कहते हैं कि स्थिर बुद्धि उसी व्यक्ति की हो सकती है, जिसने अपनी इंद्रियों को वश में कर लिया हो। इस श्लोक में कछुए का बड़ा सुंदर दृष्टांत दिया गया है। कछुआ जब चलता है तब उसके छ: अंग दिखते हैं- चार पैर, एक पूंछ और एक मस्तक।

आइए! गीता प्रसंग में चलें- पिछले अंक में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को क्षत्रिय धर्म की व्याख्या करते हुए युद्ध करने का उपदेश दिया था। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि श्रीमद्भगवत गीता मनुष्य को अपने धर्म का अनुसरण करते हुए कर्म करने की प्रेरणा देती है, इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए भगवान कहते हैं-

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कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।

मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥

हे अर्जुन ! तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में ही है, फल की प्राप्ति में नहीं। भगवान का इशारा हम मनुष्यों की तरफ है। मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र है लेकिन फल प्राप्ति में परतंत्र है। फल देना या न देना ये तो भगवान के हाथ में है। यदि मनुष्य फल की इच्छा से कर्म करेगा तो वह उसी में बंध जाएगा। आज क्या हो रहा है। लोग कर्म करने से पहले ही फल का हिसाब लगाने लगते हैं, क्या मिलेगा? कितना मिलेगा? कब मिलेगा? इस क्या, कितना और कब के चक्कर में ही कर्म भटक जाता है। हाँ ! इस संदर्भ में एक बात और याद रखनी चाहिए कि भगवान हमें वह नहीं देता जो हमें अच्छा लगता है, बल्कि वह देता है जो हमारे लिए अच्छा होता है। हमारे लिए अच्छा क्या है? यह भगवान से अधिक बेहतर और कौन जानता है? समाज में यह भी देखा जाता है कि इच्छा पूरी न होने पर लोग भगवान को बुरा-भला भी कहने लगते हैं। एक बार एक आदमी टूटे हुए पुल पर चल रहा था, अचानक पुल हिलने लगा। आदमी ने भगवान को पुकारा भगवान मुसकुराते हुए पुल के उस पार दिखाई दिए। वह आदमी ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाकर भगवान को अपने पास बुला रहा था, जब भगवान उसके पास नहीं आए तब वह उन्हें बुरा-भला कहने लगा।

जैसे-तैसे पुल के पार पहुंचा तो देखा, भगवान टूटे पुल के खंभे को ज़ोर से पकड़े हैं। समझदार व्यक्ति यही मानकर चलता है कि भगवान जो भी करते हैं अच्छा ही करते हैं। ओस की बूँद-सा है जिंदगी का सफर, कभी फूल में तो कभी धूल में।

आइए ! गीता ज्ञान गंगा में अवगाहन करें-

श्रीभगवानुवाच

प्रजहाति यदा कामान्‌ सर्वान्पार्थ मनोगतान्‌ ।

आत्मयेवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, हे अर्जुन! जब व्यक्ति अपने मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं को भलीभाँति त्याग देता है और स्वयं में ही संतुष्ट रहता है, तब वह स्थितप्रज्ञ अर्थात् स्थिर बुद्धि वाला कहा जाता है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को अपना परम सखा तो मानते ही थे, अब अर्जुन को परम भक्त की श्रेणी में लाते हुए कहते हैं— व्यक्ति को बिना किसी झिझक के सभी विषय-वासनाओं का त्याग कर अपना मन भगवान के भावनामृत में लगाना चाहिए क्योंकि वहीं से उसको दिव्य चेतना प्राप्त होती है, जिसके फलस्वरूप वह अपने आपको भगवान का सेवक मानते हुए सहज रूप में सदा प्रसन्न रहने लगता है।

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यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गनीव सर्वशः ।

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥

भगवान कहते हैं कि स्थिर बुद्धि उसी व्यक्ति की हो सकती है, जिसने अपनी इंद्रियों को वश में कर लिया हो। इस श्लोक में कछुए का बड़ा सुंदर दृष्टांत दिया गया है। कछुआ जब चलता है तब उसके छ: अंग दिखते हैं- चार पैर, एक पूंछ और एक मस्तक। परंतु जब वह अपने अंगों को छिपा लेता है, तब केवल उसकी पीठ ही दिखाई देती है। ऐसे ही स्थिर बुद्धि वाला व्यक्ति पाँच इन्द्रियां और एक मन इन छहों को अपने-अपने विषय-वासनाओं से हटा लेता है। इंद्रियों की तुलना जहरीले साँपों से की गई है जो स्वतन्त्रता पूर्वक कर्म करना चाहती हैं। सच्चे भक्त को एक सपेरे की तरह अपनी इंद्रियों को वश में करने के लिए सदा सजग रहना चाहिए।  

गीता के इस पुण्य संदेश को ध्यान में रखना चाहिए। 

विकल्प मिलेंगे बहुत, मार्ग भटकाने के लिए।  

संकल्प एक ही काफी है भगवान तक जाने के लिए॥ 

   

श्री वर्चस्व आयुस्व आरोग्य कल्याणमस्तु...

जय श्रीकृष्ण...

- आरएन तिवारी







Gyan Ganga: इसलिए बालि का वध करने का प्रण पूर्ण करना चाहते थे प्रभु श्रीराम

  •  सुखी भारती
  •  फरवरी 25, 2021   17:21
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Gyan Ganga: इसलिए बालि का वध करने का प्रण पूर्ण करना चाहते थे प्रभु श्रीराम

बालि को भले ही अपनी उपलब्ध बहिुत श्रेष्ठ लगे कि उसके सामने आने वाले का बल आधा हो जाये लेकिन भगवान श्रीराम जी को यह कतई स्वीकार नहीं था। क्योंकि प्रभु का यह मत ही नहीं है कि आपके सामने भले ही सामने वाले का बल आधा रह जाए।

विगत अंक में हम श्रीराम जी द्वारा बालि वध के प्रति अपनी प्रतिज्ञा पर मंथन कर रहे थे। प्रसंग निःसंदेह मार्मिक व अर्थपूर्ण है। कोई श्रीराम जी से पूछ ले कि कैकेई ने आपके प्रति निष्ठुरता तभी दिखाई जब उसकी आसक्ति का केन्द्र बिंदु श्री भरत जी थे। श्री भरत ही न होते तो कैकेई भला आपका बनवास क्यों मांगती? तो एक सांसारिक विश्लेषण तो यह भी कहता है कि भरत जी भी श्रीराम जी को वन भेजने हेतु जिम्मेवार हैं। भले ही उनकी व्यक्तिगत कोई भूमिका व भावना नहीं है। लेकिन उनका अस्तित्व होना ही उनकी अप्रत्यक्ष भूमिका से इनकार नहीं कर रहा। तो ऐसे में क्या श्रीराम जी भरत जी के प्रति वैर भाव पालते हैं? नहीं न! अपितु अथाह प्रेम व स्नेह की रसधरा निरंतर उनके हृदय से बहती रहती है। प्रश्न उठता है कि स्वयं के भाई के प्रति जैसी आपकी प्रीति है ठीक वैसी ही मनोभावना भले सुग्रीव की अपने भाई के प्रति नहीं। लेकिन शत्रुता वाली भी तो बिलकुल नहीं। सुग्रीव जब अपने भाई को दण्डित नहीं करना चाहता तो आपको भला क्या पड़ी है कि बालि वध का अपना प्रण पूर्ण करना ही है।

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तो इसके पीछे एक अन्य कारण यह भी है कि बालि को यह वरदान था कि उसके समक्ष जब भी कोई शत्रु उपस्थित होता था तो शत्रु का बल आधा रह जाता था। और वह बल बालि में प्रवेश कर जाता था। बालि को भले ही अपनी यह उपलब्ध बहिुत श्रेष्ठ लगे लेकिन श्रीराम जी को यह कतई स्वीकार नहीं था। क्योंकि प्रभु का यह मत ही नहीं है कि आपके सामने भले ही सामने वाले का बल आधा रह जाए। आप किसी का बल आधा कर देते हैं तो यह आपकी उपलब्धि नहीं अपितु कमी है। आपके बल की श्रेष्ठता इसी में है कि आप जिसके समक्ष खड़े हो तो आपको देख उसका बल दोगुना हो जाए, वह आसमां छूने लगे। आपको देख भय से कोई आधा रह जाए तो यह आपकी जीत नहीं अपितु हार है। आपको देख कोई सक्षम से अक्षम की स्थिति में आ जाए तो कोई आपके देखने से भी कतराएगा। आपका दर्शन ही अगर भयक्रांत करने वाला है तो आप तो अशुभ हुए। और अशुभ होने को अगर बालि अपनी विशेषता मानता है तो इसका अर्थ बालि मन से बीमार है। मानसिक रोगी है। बल की श्रेष्ठता तो तब है जब आपका बल किसी अति निर्बल व अक्षम व्यक्ति में भी इतना बल भर दे कि वह काल से भी लड़ने को तत्पर हो जाए। और बालि को यह भ्रम कब से हो गया कि मेरा बल मेरे पुरुषार्थ के कारण है।

सज्जनों वास्तविक्ता यद्यपि यह है कि हमारा जितना भी बल व पराक्रम होता है वह सब ईश्वरीय बल के प्रभाव से ही होता है। हमारे बल के पीछे ईश्वरीय बल का ही प्रतिबिंब छुपा होता है। श्री हनुमान जी भी जब अशोक वाटिका उजाड़ देते हैं तो अनेकों राक्षसों का वध कर देते हैं और जब उन्हें ब्रह्मपाश में बांधकर रावण के समक्ष लाया जाता है तो रावण भी श्री हनुमंत जी से कुछ ऐसा ही प्रश्न करता है−

कह लंकेस कवन तैं कीसा।

केहि कें बल छालेहि बन खीसा।।

रावण कहता है कि हे कपि! तूने मेरा बहुत नुकसान किया है। मेरी पूरी वाटिका तूने तहस−नहस करके रख दी। मैं जानना चाहता हूँ कि किसका बल पाकर तूने यह दुस्साहस किया। तो श्री हनुमान जी रावण को यही प्रति उत्तर देते हैं कि−

जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि। 

तास दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि।।

अर्थात् हे रावण! जिनके बल से तुमने समस्त चराचर जगत के जीत लिया है और जिनकी प्रिय पत्नी को तुम हर लाए हो। मैं उन्हीं श्रीराम जी का दूत हूँ। सज्जनों देखा आपने। रावण के पास भी कोई अपना बल नहीं था। अपितु यह बल प्रभु का ही दिया हुआ था। लेकिन रावण ने उस बल का प्रयोग परमार्थ की बजाय स्वार्थ सिद्धि में किया। जिसका घातक परिणाम स्वयं के साथ−साथ समाज ने भी भोगा।

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बालि को लगा कि मैं तो देवताओं के राजा इन्द्र का पुत्र हूँ। राजा का पुत्र आखिर राजा नहीं होगा, तो और क्या होगा। और राजा का बल कोई न स्वीकार करे, भला ऐसे दर्शन ही भूल गया। प्रभु की दृष्टि में ऐसे बल के होने से अच्छा है कि वह मिट ही जाना चाहिए। बालि को मारने की ऐसी दृढ़ प्रतिज्ञा के पीछे एक सुंदर आध्यात्मिक मर्म भी हो। 

हम जानते हैं कि बालि सुग्रीव के पीछे चौबीस घंटे लगा रहा। और सुग्रीव भी बालि से इतना भयभीत है कि उससे बचने के लिए बस भागे ही जा रहा है। सुग्रीव जानता है कि बालि उसे दुनिया के किसी भी कोने में जाकर मार सकता है। लेकिन केवल ऋर्षयमूक पर्वत ही ऐसा स्थान है जहाँ बालि का जाना निषेध है। और उसका बल कार्य नहीं करता। क्योंकि वही स्थान ऋषि की तपोस्थली थी। मार्मिक अर्थ यह है कि बालि वास्तव में 'कर्म' है और सुग्रीव 'जीव।' जीव भला कितना भी दौड़ ले, भाग ले, कर्म उसका पीछा करता वहाँ पहुँच ही जाता है। कर्म से बचा नहीं जा सकता। लेकिन जीव अगर संत के स्थान की शरण लेता है अर्थात् वह स्थान जहाँ सत्संग होता है तो वहाँ बालि अर्थात् कर्म हमें छू भी नहीं पाता। हम उसके प्रभाव से बचे रहते हैं। लेकिन इतने पर भी कर्म टला नहीं है। जब कभी अवसर मिलेगा तो बालि रूपी कर्म अवश्य ही सुग्रीव रूपी जीव को अपना ग्रास बनाने में संकोच नहीं करेगा, बालि को समाप्त करने में जैसे सुग्रीव असमर्थ है ऐसे में सुग्रीव रूपी जीव अगर प्रभु को समर्पित हो जाए तो प्रभु स्वयं प्रण कर लेते हैं कि हे जीव! तू अपने कर्म के प्रति भले कोई भी भाव रखे। भले सकारात्मक या नकारात्मक मैं उसे समाप्त करके रहूंगा। तभी तू मुक्त होगा, और कर्म बंधन से मुक्त होना ही वास्तव में तेरे आनंद का सूत्र है। 

श्रीराम जी बालि वध हेतु आगे क्या लीला करने वाले हैं। जानेंगे अगले अंक में...क्रमशः...जय श्रीराम

- सुखी भारती







Gyan Ganga: श्रीराम से बालि को नहीं मारने का अनुरोध क्यों करने लगे थे सुग्रीव?

  •  सुखी भारती
  •  फरवरी 23, 2021   16:25
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Gyan Ganga: श्रीराम से बालि को नहीं मारने का अनुरोध क्यों करने लगे थे सुग्रीव?

सज्जनों श्रीराम जी के समग्र जीवन में देखेंगे तो पाएँगे कि क्रोध तो उन्हें किसी पर आता ही नहीं। वे तो अपने परम शत्रु पर भी दया लुटाने को तत्पर हो उठते हैं। लेकिन सुग्रीव जब कहते हैं कि प्रभु मुझे बालि के प्रति अब रोष व शत्रुता नहीं है तो आप उन्हें मत मारें।

श्री रामजी ने सुग्रीव की बात सुनी तो हँस पड़े क्योंकि श्रीराम जी जानते थे कि सुग्रीव का वैराग्य क्षणिक व परिस्थितिजन्य है। परिस्थिति बदलेगी तो सुग्रीव की बैरागी अवस्था भी परिवर्तित हो जाएगी। लेकिन सुग्रीव को प्रभु श्रीराम जी सदा यूं ही बिन पेंदे के लोटे की तरह थोड़ी रखना चाहते थे। जिसमें जिधर चाहो लोटा उधर ही लुढ़क जाता है। उसे स्थिर होना है तो उसका पेंदा अर्थात् आधार होना अति आवश्यक है। वास्तव में विश्वास ही वह आधार है जिस पर एक साधक सदा टिका रह सकता है। इसलिए भगवान ने भी थोड़ी सख्ती दिखा दी कहा कि सुग्रीव देखो तुम्हें अब बदलना होगा। मैं भले ही अब तक वैसा ही करता रहा जैसा तुम कहते व चाहते रहे। लेकिन अब मैं अपने दिए वचन से नहीं मुडूँगा। मेरा कहा अटल होता है मैंने जब यह प्रण ले ही लिया कि मैं बालि को मारूंगा ही मारूंगा और तुम्हें राज्य सिंघासन पर भी अवश्य बिठाऊँगा तो समझ लो कि दोनों प्रसंग घटित होकर ही रहेंगे। इसलिए अब तुम्हें अपने मन की अवस्था मेरे वचनों के अनुसार ही निर्मित करनी पड़ेगी। श्रीराम जी ने सुग्रीव को मानों बड़े तरीके से कह दिया−

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जो कछु कहेहु सत्य सब सोई।

सखा बचन मम मृषा न होई।।

श्रीराम कहते हैं कि हे सुग्रीव निःसंदेह तुम्हारी बातें सत्य की चाशनी में डूबी हैं। लेकिन क्या करूं मैंने जब वचन दे ही दिया है तो इसका अर्थ कि बालि का मरना तो निश्चित ही है। 

श्रीराम जी तो दया के सागर हैं, करूणा निधान हैं, उन्हें किसी के प्रति कोई शत्रुता कहाँ। अगर शत्रुता का भाव उन्हें कण मात्र भी छुआ होता तो श्रीराम मंथरा को तो अवश्य ही दंडित करते। दंड देने की बात तो छोड़िए पूरी रामायण खंड में एक भी ऐसा लघु से लघु प्रसंग भी प्रतीत नहीं होता जिसमें प्रभु श्रीराम मंथरा के लिए कोई कटु शब्द बोलते हों। क्योंकि देखा जाए तो मंथरा ही तो प्रभु श्रीराम जी के बनवास के लिए पृष्ठ भूमि तैयार करती है। कैकेई को भड़काती है और श्रीराम तो अपनी माता कैकेई को भी कभी अपशब्द नहीं कहते। अपने पिता राजा दशरथ पर तो फिर भी असंतोष का कारण बनता था क्योंकि माना कि माता कैकेई तो सौतेली थी उन्हें कोई व्यक्तिगत पीड़ा कैसे होती। परंतु राजा दशरथ तो उनके सौतेले पिता न थे। सायंकाल तो वे घोषणा करते हैं कि सुबह श्रीराम को अयोध्या को सिंघासन पर बिराजमान करेंगे। और सुबह हुई तो निर्णय पलट देते हैं। मात्र निर्णय ही पलटते तो कोई बात न थी, लेकिन यहाँ तो वे सीधा भाग्य ही पलट देते हैं। श्रीराम जी को 14 वर्ष का बनवास दे डाला। पिता वाला कोई स्नेह, प्रेम व दुलार की कोई परंपरा की कोई लाज ही न रखी। कितना अन्याय, अत्याचार व शोषित व्यवहार होने पर भी श्रीराम जी के उनके प्रति व्यवहार, सत्कार व प्यार में कोई त्रुटि नहीं आती अपितु श्रीराम जी कहते हैं कि अरे! किसने कहा कि मुझे मेरे पिता ने अयोध्या का राजपाठ न देकर अन्याय किया। अयोध्या का राजपाठ तो एक सीमित क्षेत्र तक ही था। लेकिन पिता दशरथ ने मुझे इससे कहीं अधिक विशाल व विराट राज्य की वागडोर दी है। और वो राज्य है 'वनों का राज्य।' वे कहते हैं कि−

पिता दीन्ह मोहि कानन राजू। 

जहं सब भांति मोर बड़ काजू।।

पिता दशरथ ने वनों का राज्य देकर मुझ पर कृपा ही की है। क्योंकि वहीं पर वास्तव में मेरे समस्त कार्य सिद्ध होने हैं। 

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सज्जनों श्रीराम जी के समग्र जीवन में देखेंगे तो पाएँगे कि क्रोध तो उन्हें किसी पर आता ही नहीं। वे तो अपने परम शत्रु पर भी दया लुटाने को तत्पर हो उठते हैं। लेकिन सुग्रीव जब कहते हैं कि प्रभु मुझे बालि के प्रति अब रोष व शत्रुता नहीं है तो आप उन्हें मत मारें। और अब तो मुझे राजपाठ व धन परिवार की भी चाहना नहीं। क्योंकि सर्वस्व त्याग कर मैं तो आपकी सेवा करने चला हूँ। तो फिर यह झगड़ा झंझट क्यों। तो यह सुन श्रीराम जी को अवश्य ही बालि को मारने की योजना स्थगित कर देनी चाहिए थी। क्योंकि पीड़ित ही अगर आरोपी को दण्डित नहीं करना चाहता तो श्रीराम जी क्यों बलपूर्वक बालि को दंड देना चाहते हैं? इसके पीछे बहुत से सूक्ष्म, अनिवार्य व न्याय संगत कारण हैं। प्रथम कारण बालि का अहंकार था। वानरों की इतिहास गाथा वास्तव में कुछ और ही संदेश समेटे हुए है। वानर जाति का उदय यूं ही अस्तित्व में नहीं आया था। हुआ यूं था कि जब पृथ्वी रावण के पापों व अत्याचारों से त्रास्त थी, तो देवगणों ने ब्रह्मा जी को जाकर प्रार्थना की आप प्रभु को मृत्यु लोक पर अवतरित होने के लिए मनाइए। प्रभु दुष्टों के संहार व धर्म की स्थापना हेतु इस धरा धाम पर अवतार धारण करने हेतु सहमति प्रदान कर देते हैं। देव गणों को लगा कि अब अपना काम तो हो गया। प्रभु अवतार लेंगे और राक्षसों का वध करेंगे। अब हमारा क्या काम! हम जाकर विषय भोग भोगते हैं। देवगण जैसे ही वापिस पलटने लगे तो ब्रह्मा जी ने सबको रोक लिया कि प्रभु से केवल स्वार्थ का रिश्ता रखना कदापि यथोचित नहीं है। आप सबको भी प्रभु की सेवा में धरा पर देह धारण करनी होगी। प्रभु नारायण से नर बनने का साहस रखते हैं तो आप लोगों को कम से कम देवता से वानर रूप धरण करना ही चाहिए−

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बानर तनु धरि धरि महि हरि पद सेवहु जाइ। 

सभी देवता वानर रूप धारण कर प्रभु के वन आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थे। बाकी सभी वानर तो ठीक निर्वाह कर रहे थे लेकिन बालि को अपने बल का इतना अहंकार हो गया कि वह स्वयं को ईश्वर से भी अधिक बलशाली मान चुका था। वानर देह तो इसलिए धारण की थी कि प्रभु की सेवा करनी है एवं रावण वध में उनका सहयोग करना है। लेकिन कृत्य देखिए कि वह रावण से ही मित्रता किए बैठा है। क्योंकि एक प्रसंग में जब बालि रावण को पराजित कर अपने कांख में दबाकर समस्त विश्व का भ्रमण करता है तो रावण क्षमा याचना करता हुआ बालि की अनेकों स्तुतियां कर उसे रिझाकर अपने पक्ष में कर लेता है। बालि भी आत्म प्रशंसा के वशीभूत होकर उसे अभय दान दे देता है। यद्यपि होना तो यह चाहिए था कि ऐसे दुष्ट को दंडित करे लेकिन बालि को तो धुन थी कि उसके बल व सामर्थ्य का पूरी दुनिया लोहा माने। प्रभु का यश फैले या न फैले इससे उसे कोई सरोकार नहीं था। परंतु अपना यश व कीर्ति सर्वत्र फैलनी चाहिए इसकी उसे बहुत चिंता थी। बल व सामर्थ्य की ही बात की जाए तो हनुमान जी के सामने उसकी क्या बिसात थी। लेकिन श्री हनुमान जी ने भी कभी अपने बल का प्रदर्शन व अहंकार नहीं किया। अपितु इसी प्रतीक्षा में लगे रहे कि हमें प्रभु की सेवा में अपना सर्वस्व लगाना है। बालि एक नहीं अपितु दो−दो गलतियां एक साथ करता है। रावण से तो मित्रता की लेकिन साथ में अपने ही भाई सुग्रीव के साथ शत्रुता पूर्ण व्यवहार करने लगा। प्रभु भला अपने सेवकों व भक्तों के प्रति किसी का शत्रु भाव कैसे स्वीकार कर सकते हैं।

लिहाज़ा प्रभु ने अपना निर्णय यथावत रखा कि मैं बालि को जरूर मारूंगा। मारूंगा भी उसी बाण से जिससे मैंने ताड़ के वृक्षों को काटा था। मानों कह रहे हों कि बालि भी ताड़ के वृक्षों की तरह सीधा अकड़ा खड़ा है। किसी को छाया भी नहीं देता। तो क्यों न व्यर्थ के इस बोझ से पृथ्वी के भार को कम किया जाए। बालि को मारने का दूसरा कारण था वह कारण भी उसके बल के साथ ही जुड़ा था। क्या था वह कारण? हम अगले अंक में विस्तार पूर्वक जानेंगे...क्रमशः...जय श्रीराम

-सुखी भारती







Gyan Ganga: अर्जुन ने चंचल मन को स्थिर करने का उपाय पूछा तो भगवान ने क्या कहा ?

  •  आरएन तिवारी
  •  फरवरी 19, 2021   13:33
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Gyan Ganga: अर्जुन ने चंचल मन को स्थिर करने का उपाय पूछा तो भगवान ने क्या कहा ?

अर्जुन कहते हैं- हे कृष्ण! यह मन बड़ा ही चंचल, हठी तथा बलवान है, मुझे इस मन को वश में करना, वायु को वश में करने के समान अत्यन्त कठिन लगता है। आप ही कृपा करके इस मन को खींचकर अपने में लगा लें, तो यह लग सकता है।

गीता प्रेमियो ! हवाएँ अगर मौसम का रुख बदल सकती हैं तो दुआएँ भी मुसीबत के पल बदल सकती हैं। कुछ लोग किस्मत की तरह होते हैं जो दुआ से मिलते हैं और कुछ लोग दुआ की तरह होते हैं जो किस्मत बदल देते हैं।

अर्जुन को भगवान श्री कृष्ण किस्मत से ही प्राप्त हुए थे, जिन्होंने सबको छोड़कर केवल अर्जुन को चुना और उनको प्रत्यक्ष रूप से गीता सुनाई।  

आइए ! गीता प्रसंग में चलते हैं-

पिछले अंक में हमने पढ़ा- भगवान त्रिभुवन के स्वामी हैं तथा हमारे परम हितैषी और सखा हैं। श्रद्धा और विश्वास के साथ अगर हम दृढ़तापूर्वक हरि चिंतन करें, तो भगवान का साक्षात्कार निश्चित है। अब आगे भगवान मनुष्य को अपना उद्धार करने की प्रेरणा देते हैं।

श्री भगवान उवाच    

उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्‌।

आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥ 

मनुष्य को चाहिये कि वह अपने मन के द्वारा ही जन्म-मृत्यु के बन्धन से अपना उद्धार करने का प्रयत्न करे और अपने को निम्न-योनि में न गिरने दे, क्योंकि यह मन ही हमारा मित्र है, और मन ही हमारा शत्रु भी है। आइए ! इस पर थोड़ा विचार करें— ‘मैं’ शरीर नहीं हूँ, क्योंकि शरीर बदलता रहता है और ‘मैं’ वही रहता हूँ। यह शरीर मेरा नहीं है, क्योंकि शरीर पर मेरा वश नहीं चलता। मैं इस शरीर को जैसा रखना चाहूँ वह वैसा नहीं रह सकता, जितने दिन तक रखना चाहूँ उतने दिन तक नहीं रख सकता, जितना सुंदर और सबल बनाना चाहूँ नहीं बना सकता। कौन चाहता है, कि मेरा शरीर बूढ़ा हो किन्तु बूढ़ा होना पड़ता है। इस शरीर पर मेरा कोई अधिकार नहीं। यदि यह मेरे लिए होता तो हमेशा मेरे पास रहता। इस प्रकार शरीर मैं नहीं, मेरा नहीं और मेरे लिए नहीं। यदि मनुष्य इस सच्चाई पर अमल करे, तो उसका अपने आप उद्धार हो जाएगा।

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जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः।

शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः॥ 

जिसने अपने मन को वश में कर लिया है, उसको परम-शान्ति स्वरूप परमात्मा पूर्ण-रूप से प्राप्त हो जाता है, उस मनुष्य के लिये सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख और मान-अपमान एक समान होते है। अर्थात् जिसका शरीर में मैं-पन और मेरा-पन नहीं है वह अनुकूलता और प्रतिकूलता में भी निर्विकार रहता है, क्योंकि वह मानता है कि सुख-दुःख और मान-अपमान तो आते जाते हैं, पर परमात्मतत्व ज्यों का त्यों रहता है। 

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।

तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥ 

भगवान कहते हैं, हे अर्जुन ! जो मनुष्य सभी प्राणियों में मुझ परमात्मा को ही देखता है और सभी प्राणियों को मुझ परमात्मा में ही देखता है, उसके लिए मैं कभी अदृश्य नहीं होता हूँ और वह मेरे लिए कभी अदृश्य नहीं होता है। श्रीमदभागवत कथा का एक बहुत ही रोचक प्रसंग स्मरण में आता है—

ब्रह्माजी जब गाय-बछड़ों और ग्वाल-बालों को चुराकर ले गए, तब भगवान श्रीकृष्ण स्वयं ही गाय-बछड़े और ग्वाल-बाल बन गए। केवल ग्वाल-बाल ही नहीं बल्कि उनके बेंत, सींग, बांसुरी और वस्त्र-आभूषण भी बन गए। यह लीला एक वर्ष तक चलती रही, पर किसी को इसका पता नहीं चला। जब बलराम जी ने ध्यान लगाकर देखा तो उनको गाय-बछड़ों और ग्वाल-बालों के रूप में भगवान श्रीकृष्ण ही दिखाई दिए। ऐसे ही भगवान का सिद्ध भक्त सब जगह भगवान को ही देखता है। उसके लिए यह जगत सर्वं विष्णुमयं जगत है। कर्मयोगी परमात्मा को नजदीक देखता है, ज्ञानयोगी परमात्मा को अपने में देखता है और भक्तियोगी परमात्मा को सर्वत्र ही देखता है।   

सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।

सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥

भगवान कहते हैं, हे अर्जुन ! योग में स्थित जो मनुष्य सभी प्राणियों के हृदय में मुझको देखता है और भक्ति-भाव में स्थित होकर मेरा ही स्मरण करता है, वह योगी सभी प्रकार से सदैव मुझमें ही स्थित रहता है। अर्थात् भगवान और भक्त दिखने में तो दो हैं, पर वास्तव में एक ही हैं। भक्त में भगवान हैं और भगवान में भक्त है। भगवान में अत्यंत प्रीति होने के कारण भक्तियोग का साधक भगवान को प्राप्त हो जाता है। 

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।

सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥ 

हे अर्जुन! योग में स्थित जो मनुष्य अपने ही समान सभी प्राणियों को देखता है, सभी प्राणियों के सुख और दुःख को अपना ही सुख और दुख समझता है, उसी को परम पूर्ण-योगी समझना चाहिये। वह भक्त सभी प्राणियों की आत्मा में भगवान के ही दर्शन करता है, वह सभी शरीरों को अपना शरीर ही मानता है, इसलिए वह दूसरे के दुख से दुखी और दूसरे के सुख से सुखी होता है। गोस्वामी तुलसीदास जी रामचरितमानस के उत्तर कांड में संत के लक्षण बताते हुए कहते हैं- संत सांसरिक विषय-वासनाओं में लिप्त नहीं होते, शील और सद्गुणों की खान होते हैं। उन्हें दूसरे का दुख देखकर दुख और सुख देखकर सुख होता है। विषय अलंपट सील गुनाकर। पर दुख दुख सुख सुख देखे पर॥ 

अब अर्जुन भगवान से इस चंचल मन को स्थिर करने का उपाय पूछते हैं-

                 

अर्जुन उवाच


चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्‌ ।

तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्‌ ॥ 

अर्जुन कहते हैं- हे कृष्ण! यह मन बड़ा ही चंचल, हठी तथा बलवान है, मुझे इस मन को वश में करना, वायु को वश में करने के समान अत्यन्त कठिन लगता है। आप ही कृपा करके इस मन को खींचकर अपने में लगा लें, तो यह लग सकता है।

श्रीभगवानुवाच

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्‌।

अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥ 

श्री भगवान ने कहा- हे महाबाहु कुन्तीपुत्र! इसमे कोई संशय नही है कि चंचल मन को वश में करना अत्यन्त कठिन है, किन्तु इसे सभी सांसारिक कामनाओं को त्याग (वैराग्य) और निरन्तर अभ्यास द्वारा वश में किया जा सकता है।

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अर्जुन की माता कुंती बहुत बुद्धिमती तथा सांसरिक भोगों से विरक्त रहने वाली थी। श्रीमद भागवत महापुराण में कुंती ने भगवान श्रीकृष्ण से विपत्ति का वरदान मांगा था। 

विपद: सन्तु न: शश्वत तत्र तत्र जगत्गुरो। 

भवतो दर्शनं यत् स्यात् अपुन: भवदर्शनम्।।

ऐसा वरदान मांगने वाला इतिहास में बहुत कम मिलता है। यहाँ भगवान अर्जुन को कुंती माता की याद दिलाते हैं कि जैसे तुम्हारी माता कुंती बड़ी विरक्त है, ऐसे ही तुम भी संसार से विरक्त होकर अपने मन को संसार से हटाकर परमात्मा में लगाओ। 

अर्जुन उवाच

अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः।

अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति॥ 

अर्जुन ने पुन: पूछा- हे कृष्ण! प्रारम्भ में श्रद्धा-पूर्वक योग में स्थिर रहने वाला किन्तु बाद में चंचल मन होने के कारण योग से विचलित होने वाला असफ़ल-योगी परम-सिद्धि को न प्राप्त करके किस गति को प्राप्त करता है?

श्रीभगवानुवाच

प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः।

शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते॥ 

भगवान कहते हैं— हे अर्जुन! योग में असफ़ल हुआ मनुष्य स्वर्ग के भोगों को भोगता है। पुण्य क्षीण होने और भोगों से अरुचि हो जाने पर वह फिर लौटकर मृत्युलोक में सम्पन्न सदाचारी मनुष्यों के परिवार में जन्म लेता है। भगवान उसकी अधूरी साधना पूरी करने का मौका देने के लिए शुद्ध श्रीमानों के घर में जन्म देते हैं।  

श्री वर्चस्व आयुस्व आरोग्य कल्याणमस्तु...

जय श्री कृष्ण...

-आरएन तिवारी







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