काव्य रूप में पढ़ें श्रीरामचरितमानस: भाग-41

श्रीराम चरित मानस में उल्लेखित सुंदरकांड से संबंधित कथाओं का बड़ा ही सुंदर वर्णन लेखक ने अपने छंदों के माध्यम से किया है। इस श्रृंखला में आपको हर सप्ताह भक्ति रस से सराबोर छंद पढ़ने को मिलेंगे। उम्मीद है यह काव्यात्मक अंदाज पाठकों को पसंद आएगा।
तूने मेरी शक्ति का, नहीं सुना यशगान
मारे राक्षस वीर सब, और पुत्र बलवान।
और पुत्र बलवान, प्राण का मोह न तुझको
मगर न छोड़ूंगा अब, क्या समझा है मुझको।
कह ‘प्रशांत’ बजरंगी अट्टहास कर बोले
भरी सभा में धक-धकाए सबके दिल डोले।।31।।
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इस सारे ब्रह्मांड के, जो हैं मायाकार
ब्रह्मा विष्णु-महेश का, चलता कारोबार।
चलता कारोबार, सृजन पालन-संहारा
उनके बल ब्रह्मांड शेष ने सिर पर धारा।
कह ‘प्रशांत’ तुम जैसों को वे शिक्षा देते
देवों की रक्षाहित रूप अनेकों लेते।।32।।
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शिवजी का भारी धनुष, दिया जिन्होंने तोड़
राजाओं के गर्व को, पल में दिया निचोड़।
पल में दिया निचोड़, उन्होंने ही थे मारे
खर दूषण त्रिशिरा-बाली, इस विध उद्धारे।
कह ‘प्रशांत’ मैं दूत उन्हीं का हूं हनुमाना
जिनकी पत्नी को तुम लाए चोर समाना।।33।।
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मैं तुमको हूं जानता, हे रावण बलवान
सहसबाहु अरु बालि का, भी है मुझको ध्यान।
भी है मुझको ध्यान, युद्ध तुमने था ठाना
लेकिन क्या परिणाम हुआ, दुनिया ने जाना।
कह ‘प्रशांत’ सुन व्यंग्य-वचन रावण खिसियाया
पवनपुत्र ने खरा-खरा कुछ और सुनाया।।34।।
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भूख लगी मुझको बहुत, फल खाये भरपूर
तोड़े थोड़े वृक्ष भी, मेरा नहीं कसूर।
मेरा नहीं कसूर, देह वानर की पाई
तोड़फोड़-उत्पात मुझे लगता सुखदाई।
कह ‘प्रशांत’ जो कोई मुझे मारने आया
खुद बचने को मैंने उनको मार गिराया।।35।।
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अपने बंधने का नहीं, मुझे जरा अफसोस
ये तो प्रभु का काम है, इसका है संतोष।
इसका है संतोष, एक विनती है मेरी
गहो राम की शरण, तभी है सद्गति तेरी।
कह ‘प्रशांत’ लेकिन जो रामविमुख हो जाता
ब्रह्मा विष्णु-महेश, न कोई उसका त्राता।।36।।
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इसीलिए तुम राम से, ठानो जरा न बैर
वरना इस ब्रह्मांड में, तेरी कहीं न खैर।
तेरी कहीं न खैर, राज लंका पर कीजे
लेकिन उससे पहले छोड़ जानकी दीजे।
कह ‘प्रशांत’ यदि राघवेन्द्र का भजन करोगे
तुम भी ऋषि पुलस्त्य के यश के भागी होगे।।37।।
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लेकिन रावण की समझ, आयी जरा न बात
बोला मुझको दे रहा, शिक्षा वानर जात।
शिक्षा वानर जात, मारकर इसको डालो
इस मूरख के प्राण, इसी क्षण यहीं निकालो।
कह ‘प्रशांत’ यह सुनकर राक्षस दौड़े आये
तभी विभीषण भ्राता आकर शीश नवाए।।38।।
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कहा दूत को मारना, नहीं नीति की बात
इसको कोई दूसरा, दंड दीजिए तात।
दंड दीजिए तात, कहा रावण ने हंसकर
अंग-भंग कर लौटाओ यह पापी बंदर।
कह ‘प्रशांत’ बंदर को पूंछ होत अति प्यारी
आग लगा दो इसमें, देखे लंका सारी।।39।।
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सारे राक्षस हर्ष से, लगे मचाने शोर
बजरंगी चुपचाप थे, हुआ मगन मन मोर।
हुआ मगन मन मोर, शारदा हुईं सहाई
बैठ शीश रावण के कैसी बात सुझाई।
कह ‘प्रशांत’ घी तेल-वस्त्र जितने भी आये
सभी लग गये, हनुमत इतनी पूंछ बढ़ाये।।40।।
- विजय कुमार
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