पंजाब में कांग्रेस को आपसी खींचतान में उलझा देख भाजपा ने मोदी को आगे कर पलट दी बाजी

PM Modi
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प्रधानमंत्री के पंजाब दौरे का दूसरा बड़ा आयाम रविदासिया समाज तक पहुंच बनाना है। प्रधानमंत्री इससे पहले भी गुरु रविदास जयंती पर डेरा सचखंड बल्लां पहुंच चुके हैं। जालंधर और पूरा दोआबा क्षेत्र रविदासिया समुदाय का प्रभावशाली राजनीतिक केंद्र माना जाता है।

पंजाब में विधानसभा चुनावों से पहले का राजनीतिक परिदृश्य बड़ा हैरान कर देने वाला है। एक ओर सत्तारुढ़ आम आदमी पार्टी अपनी नाकामियों और तमाम तरह के आरोपों का सामना कर रही है, वहीं खुद को सत्ता की प्रबल दावेदार मान रही कांग्रेस में एकाएक जबरदस्त आपसी खींचतान मच गयी है। साथ ही पंजाब में कई बार राज कर चुका शिरोमणि अकाली दल अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है तो वहीं राज्य में पहली बार अपने दम पर सभी विधानसभा सीटों पर लड़ने का ऐलान कर चुकी भाजपा ने मौका देख कर अपनी चुनावी रणनीति को नई धार दे दी है।

हम आपको बता दें कि भाजपा 2027 के विधानसभा चुनाव को लक्ष्य बनाकर विकास, धार्मिक-सामाजिक समीकरणों और नए राजनीतिक संदेश के सहारे अपनी जमीन मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है। इसी कड़ी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 17 जुलाई को जालंधर दौरे पर आ रहे हैं। उनका दौरा केवल विकास परियोजनाओं के उद्घाटन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे 2027 की चुनावी बिसात का स्पष्ट राजनीतिक संदेश छिपा है।

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भाजपा के लिए प्रधानमंत्री मोदी का पंजाब दौरा ऐसे समय हो रहा है, जब राज्य की राजनीति सतलुज फिल्म विवाद से गर्माई हुई है। इस पूरे विवाद में भाजपा सबसे अधिक राजनीतिक दबाव में दिखाई दी। पार्टी लगातार यह कहती रही कि फिल्म को ओटीटी मंच से हटाने में उसकी कोई भूमिका नहीं है, लेकिन विपक्ष ने पूरे विवाद का राजनीतिक ठीकरा भाजपा पर ही फोड़ दिया। भाजपा के भीतर भी मतभेद खुलकर सामने आए। केंद्रीय राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू ने फिल्म को पंजाब की त्रासदी का "एकतरफा चित्रण" बताते हुए इसकी आलोचना की और कहा कि इसमें आतंकवाद की पृष्ठभूमि तथा पुलिसकर्मियों के बलिदान की अनदेखी की गई है। दूसरी ओर वरिष्ठ भाजपा नेता इकबाल सिंह लालपुरा ने सार्वजनिक रूप से बिट्टू को "अपनी सीमाओं में रहने" की सलाह दी। पंजाब भाजपा अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों ने भी माहौल शांत करने की अपील करते हुए कहा कि पंजाब ने बहुत खून-खराबा देखा है, इसलिए पुराने जख्मों को कुरेदने की बजाय शांति और जिम्मेदार संवाद की जरूरत है। पार्टी के भीतर यह स्वीकार किया जा रहा है कि फिल्म कांग्रेस शासनकाल की घटनाओं पर आधारित होने के बावजूद राजनीतिक जवाब भाजपा को देना पड़ रहा है।

ऐसे माहौल में प्रधानमंत्री मोदी का विकास एजेंडा भाजपा के लिए राजनीतिक नैरेटिव बदलने का प्रयास माना जा रहा है। जालंधर कैंट रेलवे स्टेशन के पुनर्विकास का उद्घाटन, मोहाली, श्री मुक्तसर साहिब और श्री आनंदपुर साहिब समेत कई रेलवे स्टेशनों का वर्चुअल लोकार्पण केवल आधारभूत ढांचे का विस्तार नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश भी है कि भाजपा पंजाब में विकास की राजनीति को केंद्र में रखना चाहती है। साथ ही यह भी तय माना जा रहा है कि भाजपा पंजाब में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे पर ही चुनाव लड़ेगी।

इस दौरे का दूसरा बड़ा आयाम रविदासिया समाज तक पहुंच बनाना है। प्रधानमंत्री इससे पहले भी गुरु रविदास जयंती पर डेरा सचखंड बल्लां पहुंच चुके हैं। जालंधर और पूरा दोआबा क्षेत्र रविदासिया समुदाय का प्रभावशाली राजनीतिक केंद्र माना जाता है, जहां अनुसूचित जाति मतदाता चुनावी परिणाम तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आनंदपुर साहिब और मोहाली जैसे धार्मिक एवं शहरी क्षेत्रों को भी इस दौरे में शामिल करना भाजपा की व्यापक सामाजिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। श्री मुक्तसर साहिब का चयन भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह शिरोमणि अकाली दल अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल का गृह जिला है। हम आपको बता दें कि भाजपा पहले ही 2027 का चुनाव अपने दम पर लड़ने का ऐलान कर चुकी है, हालांकि उसने गठबंधन के विकल्प पूरी तरह बंद भी नहीं किए हैं। ऐसे में विकास और सामाजिक आउटरीच के जरिए पार्टी अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान मजबूत करने की कोशिश कर रही है।

दूसरी ओर कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि उसका अपना संगठन बन गया है। लंबे समय से चली आ रही गुटबाजी के बावजूद पार्टी हाईकमान ने अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग को प्रदेश अध्यक्ष बनाए रखने का फैसला किया है। पार्टी का आकलन है कि विधानसभा चुनाव से पहले नेतृत्व परिवर्तन संगठन को कमजोर कर सकता है। कांग्रेस सूत्रों का दावा है कि राज्य के 29 में से 25 जिला अध्यक्ष, सात में से चार सांसद और 18 में से 10 विधायक वड़िंग के साथ हैं। पंजाब प्रभारी भूपेश बघेल ने भी स्पष्ट संकेत दिया कि फिलहाल यथास्थिति ही बनी रहेगी और मीडिया में चल रही अटकलों पर भरोसा नहीं किया जाना चाहिए।

हालांकि यह फैसला कांग्रेस के भीतर नई खींचतान का कारण बन गया है। पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी को चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनाकर शक्ति संतुलन बनाने की कोशिश की गई, लेकिन चन्नी समर्थक इसे पर्याप्त नहीं मानते। उनका तर्क है कि चुनाव अभियान का नेतृत्व करने और पंजाब में पार्टी का प्रमुख चेहरा बनने के बाद चन्नी को अधिक अधिकार मिलने चाहिए थे। वरिष्ठ नेता सुखजिंदर सिंह रंधावा समेत कई नेता भी वड़िंग के नेतृत्व पर सवाल उठा रहे हैं। कांग्रेस नेतृत्व का कहना है कि लोकतांत्रिक दल में मतभेद स्वाभाविक हैं और समय आने पर असंतुष्ट नेताओं को साथ लेकर चलने का प्रयास किया जाएगा, लेकिन फिलहाल संगठन में स्थिरता सबसे बड़ी प्राथमिकता है।

बहरहाल, स्पष्ट है कि पंजाब की राजनीति अब केवल विकास बनाम विपक्ष की लड़ाई नहीं रह गई है। भाजपा अतीत की बहसों से निकलकर विकास, रेलवे परियोजनाओं और रविदासिया समाज के जरिए नया राजनीतिक विमर्श गढ़ना चाहती है, जबकि कांग्रेस अपने ही संगठनात्मक संकट से जूझते हुए एकजुटता बचाने में लगी है। इस बीच, सतलुज विवाद ने पंजाब के पुराने जख्मों को फिर से राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है, लेकिन असली मुकाबला इस बात का होगा कि 2027 तक कौन-सी पार्टी जनता के सामने सबसे विश्वसनीय राजनीतिक कथा स्थापित कर पाती है। फिलहाल भाजपा विकास और सामाजिक समीकरणों के सहारे नई जमीन तलाश रही है, जबकि कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी परीक्षा अपने घर की कलह पर नियंत्रण पाने की है। पंजाब की चुनावी बिसात बिछ चुकी है और आने वाले महीनों में यही दोनों ध्रुव राज्य की राजनीति की दिशा तय करेंगे क्योंकि आम आदमी पार्टी के प्रति बढ़ती नाराजगी को देखते हुए सत्ता से उसकी विदाई तय मानी जा रही है।

-नीरज कुमार दुबे

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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