नेपाल में उठ रही हिंदी की मांग

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मधेसी समुदाय का अपने सीमावर्ती भारतीय इलाकों के लोगों से रोटी और बेटी का रिश्ता है। वे लोग पहाड़ी मूल के लोगों की बजाय सीमावर्ती भारतीय इलाकों के लोगों की तरह दिखते, रहते, खाते-पीते और बोलते हैं। इनमें अवधी, भोजपुरी, थारू, बज्जिका, अंगिका, मैथिली, सतार, मगही, राजवंशी और मैथिलीभाषी शामिल हैं।

नेपाल की जनकपुर उपमहानगर पालिका ने अपने अधीन प्राथमिक विद्यालय में मैथिली भाषा की पढ़ाई का फैसला लिया है। जनकपुर से महज तीस किलोमीटर दूर भारतीय सीमा में पहले से ही मैथिली की पढ़ाई हो रही है। भारत में मैथिली भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल भाषा है। चूंकि जनकपुर के आसपास मैथिलीभाषियों की अच्छी-खासी संख्या है। लिहाजा जनकपुर उपमहानगर पालिका के इस निर्णय का मैथिलभाषी समुदाय में स्वागत होना लाजमी है। लेकिन नेपाल का ही एक वर्ग इस फैसले के विरोध में उतर आया है। दिलचस्प यह है कि उसे मैथिली से कोई बुनियादी विरोध नहीं है, बल्कि वह चाहता है कि मधेस इलाकों में हिंदी की विधिवत पढ़ाईहोनी चाहिए। हिंदी समर्थक इस वर्ग का तर्क है कि इस कदम से नेपाल में बोली जाने वाली भारतीय मूल की भाषाओं के बीच एकता का संदेश जाएगा और यह एकता मधेस समुदाय की राजनीतिक ताकत को बढ़ावा देगी। लेकिन मधेस समाज के लोग अपनी-अपनी भाषाओं की अगर पढ़ाई पर जोर देने लगेंगे तो इससे मधेस समाज में बिखराव आएगा और उनकी एकता में दरार बढ़ेगी। इसका सीधा फायदा संख्या के लिहाज से मधेस समुदाय की तुलना में छोटा खस आर्य मूल के नेपाली समुदाय का नेपाल की राजनीति में वर्चस्व बना रह सकता है। 

नेपाल में भाषा को लेकर उठे इन सवालों पर विचार से पहले मधेस समुदाय के बारे में मोटे तौर पर कुछ बातें समझनाआवश्यक है। नेपाल में पहाड़ी मूल के अलावा तराई में जो लोग रहते हैं, उन्हें मधेस या मधेसी कहा जाता है। मधेस समुदाय की व्यापकता उत्तर प्रदेश की सीमा से लेकर बिहार होते हुए पश्चिम बंगाल की सीमा तक नेपाली हिस्से में है। नेपाल की कुल जनसंख्या तीन करोड़ है। आंकड़ों के मुताबिक, करीब 53 प्रतिशत यानी लगभग एक करोड़ साठ लाख लोग मधेसी है। नेपाल में बड़ी जनसंख्या होने के बावजूद यहां की शासन व्यवस्था में पहाड़ी मूल के लोगों का ही वर्चस्व रहा है, जिनकी जनसंख्या करीब एक करोड़ चालीस लाख है।

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मधेसी समुदाय का अपने सीमावर्ती भारतीय इलाकों के लोगों से रोटी और बेटी का रिश्ता है। वे लोग पहाड़ी मूल के लोगों की बजाय सीमावर्ती भारतीय इलाकों के लोगों की तरह दिखते, रहते, खाते-पीते और बोलते हैं। इनमें अवधी, भोजपुरी, थारू, बज्जिका, अंगिका, मैथिली, सतार, मगही, राजवंशी और मैथिलीभाषी शामिल हैं। नेपाल की राष्ट्रीय मुक्ति पार्टी के नेता रह चुके रमन पांडेय इन दिनों हिंदी के लिए स्वतंत्र रूप से अभियान चला रहे हैं। उनका तर्क है कि मैथिली की पढ़ाई से उन्हें एतराज नहीं है। लेकिन इससे मधेस समुदाय की आपसी एकता में दरार पड़ेगी। उनका कहना है कि नेपाल का पहाड़ी शासक समुदाय चाहता है कि मधेस समाज की एकता बाधित हो। यह उसके हित में है, क्योंकि मधेस जनसंख्या अगर बंटी होगी तो पहाड़ी मूल के लोगचुनावों में जीतते रहेंगे और कम संख्या के बावजूद वे देश पर शासन करते रहेंगे। 

नेपाल में 133 भाषाएं बोली जाती हैं। लेकिन यहां मोटे तौर पर नेपाली और अंग्रेजी माध्यम से ही पढ़ाई होती है। नेपाल में हिंदी की पढ़ाई की मांग करने वाले वर्ग का तर्क है कि अगर हिंदी को शासकीय मान्यता मिलती है और उसकी पढ़ाई होती है तो वह नेपाल की सभी 133 भाषाओं के आपसी संपर्क का सबसे बड़ा जरिया होगी। यह मांग कुछ वैसे ही है, जैसे भारत में आपसी संपर्क भाषा के लिए हिंदी को अपनाने का विचार केशवचंद्र सेन, गुजराती कवि नर्मदा शंकर उपाध्याय, लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी और बिनोबा भावे सदृश हस्तियों ने दिया था। विनोबा और पुरूषोत्तम दास टंडन ने तो देवनागरी लिपि को दूसरी भाषाओं द्वारा अपनाए जाने और उसके विस्तार की जोरदार पैरवी की थी। रमन पांडेय जैसे लोग भी नेपाल में हिंदी को कुछ उसी तरह आगे लाने की मांग कर रहे हैं। उनका तर्क है कि अगर हिंदी को मान्यता मिली तो नेपाल की स्थानीय भाषाओं के बीच मजबूत कड़ी बनकर उभरेगी। वैसे भी मधेस समुदाय जब दूसरे भाषा-भाषी से बात करता है तो वह हिंदी का ही सहारा लेता है। इससे नेपाली एकता की भावना को तो मजबूती मिलेगी ही, भारतीय सीमा पार रिश्तों को निभाने में नेपाली लोगों मदद मिलेगी। हिंदी समर्थकों का यह भी तर्क है कि मधेस समुदाय की आपसी एकता को भी हिंदी के ही जरिए  मजबूती मिल सकेगी। मधेस आबादी नेपाल के बाइस जिलों में फैली हुई है। रमन पांडेय जैसे लोगों का तर्क है कि बाइस जिलों के लोगों को एक माला में जोड़ने में हिंदी ही कामयाब हो सकती है। रमन पांडेय का कहना है कि नेपाली भाषा बेहद छोटे समुदाय खस आर्य की भाषा है। जिनकी संख्या एक करोड़ भी नहीं है। लेकिन वह पूरे देश की एक मात्र भाषा बनी हुई है। 

इसमें दो राय नहीं कि नेपाल के तराई यानी मधेस और भारत से सटे इलाकों में हिंदी का प्रभाव गहरा और व्यापक है। नेपाल और भारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत साझा है। नेपालमें भी हिंदी का व्यापक स्तर पर प्रयोग होता है। इतना ही  नहीं, मधेस समुदाय के आपसी संपर्क का भी जरिया हिंदी ही है। हिंदी पहाड़ी यानी खस समुदाय के लिए भी मधेस समुदाय से जुड़ने का जरिया है। अगर हिंदी को मान्यता मिलती है तो संपर्क भाषा हिंदी को नई ताकत मिलेगी। हिंदी नेपाली समुदायों को तो आपस में जोड़ेगी ही, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक साझा विरासत की बुनियाद पर नेपाल और भारत के रिश्तों को भी नई गति मिलेगी। 

ऐसा नहीं कि नेपाल में हिंदी के विरोधी नहीं है। लिपुलेख और कालापानी विवाद के वक्त तो तत्कालीन नेपाली प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने नेपाल में हिंदी पर पाबंदी लगाने तक की बात कर डाली थी। यह बात और है कि इसका विरोध उनकी पार्टी में ही हुआ था। हिंदी के मशहूर पत्रकार बनारसीदास चतुर्वेदी ने हिंदी में जनपदीय आंदोलन चलाया था। नेपाल के हिंदी समर्थकों को इसे भी ध्यान में रखना होगा। बनारसी दास चतुर्वेदी जनपदीय भाषाओं को बढ़ावा देने के जरिए भाषायी लोकतंत्र की वकालत कर रहे थे। उन्हें पता था कि जनपदीय भाषाओं के आपसी संपर्क और संवाद के लिए हिंदी ही सहयोगी होगी। इसलिए वे जनपदीय भाषाओं के विस्तार के जरिए हिंदी को बढ़ावा दे रहे थे। नेपाल के हिंदी समर्थकों को भी आपसी भाषाओं के बीच कुछ उसी तरह सौहार्द को बढ़ावा देते हुए हिंदी के विकास की बात करनी होगी। इसी बहाने नेपाल में वे हिंदी को प्रतिष्ठापित करने में सफल हो सकेंगे।

- उमेश चतुर्वेदी

लेखक मीडिया समीक्षक हैं

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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