यहां हैं सबसे छोटी और सबसे बड़ी मस्जिद, दुनियाभर से लोग आते हैं देखने

यहां हैं सबसे छोटी और सबसे बड़ी मस्जिद, दुनियाभर से लोग आते हैं देखने

सबसे छोटी मस्जिद का इतिहास अपने आप में सबसे बड़ा हैं। कहा जाता है कि यह मस्जिद तीन सौ साल पुरानी हैं। भोपाल के पुराने शहर इलाके में बड़े तालाब के किनारे पर फतह गढ़किले की दीवारों पर चौकसी के लिए बने गुंबद पर बनी इस सबसे छोटी मस्जिद में पहरेदार नमाज अदा किया करते थे।

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल एक मात्र ऐसा शहर हैं, जहां सबसे छोटी और सबसे बड़ी मस्जिद हैं। सबसे छोटी और सबसे बड़ी मस्जिद होने से इन्हें देखने की रोचकता भी बढ़ जाती है, यही वजह हैं कि यहां मस्जिद देखने के लिए दुनियाभर से सैलानी भी आते हैं। 

इन दोनों मस्जिदों का इतिहास भी एक रोचक कहानी कहता है। भोपाल में एशिया की सबसे छोटी मस्जिद को ढाई सीढ़ी वाली मस्जिद कहते हैं। इस मस्जिद को गांधी मेडिकल कॉलेज के पास बने फतेहगढ़ किले के बुर्ज पर बनाया गया था। जब यह मस्जिद अपने मूल स्वरुप में थी उस समय यहां केवल तीन हीं लोग नमाज पढ़ सकते थे। यूं तो दिल्ली की जामा मस्जिद को भारत की सबसे बड़ी मस्जिद के रुप में जाना जाता है, मगर रिसर्च में भोपाल की बेगम सुल्तान शाहजहां की बनाई ताजुल मसाजिद भारत की सबसे बड़ी मस्जिद में शामिल है। यहीं नहीं यह मस्जिद एशिया की सबसे बड़ी मस्जिद भी कही जाती है। यह दोनों मस्जिद भी धार्मिक महत्व तो रखती ही है, पर्यटन की दृष्टि से भी इन दोनों का बड़ा महत्व है। भारत दर्शन आने वाले विदेशी सैलानी इन दोनों मस्जिदों को देखने जरुर जाते हैं। दुनियाभर में इनकी ख्याती हैं।

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छोटी मस्जिद का बड़ा इतिहास

सबसे छोटी मस्जिद का इतिहास अपने आप में सबसे बड़ा हैं। कहा जाता है कि यह मस्जिद तीन सौ साल पुरानी हैं। भोपाल के पुराने शहर इलाके में बड़े तालाब के किनारे पर फतह गढ़किले की दीवारों पर चौकसी के लिए बने गुंबद पर बनी इस सबसे छोटी मस्जिद में पहरेदार नमाज अदा किया करते थे। फतेहगढ़ किले में पहले पहरा देने वाले सिपाही नमाज अदा किया करते थे। जब अफगानिस्तान के तराह शहर से नूर मोहम्मद खान और उनके साहबजादे दोस्त मोहम्मद खान भारत आए थे। उसके बाद दोस्त मोहम्मद खान ने इस जगह पर फतेहगढ़ किले का निर्माण कराया था। इस किले की नींव का पत्थर काजीमोहम्मद मोअज्जम साहब ने रखा था। किले की पश्चिमी दिशा में स्थित बुर्ज को मस्जिद का रुप दिया गया था। निर्माण के समय यहां ढाई सीढ़ियां बनाई गई थी। यहां कमरों की संख्या भी ढाई है। आने के रास्ते पर भी सीढ़ियों की संख्या ढाई है। 

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दुनियाभर में विख्यात है बड़ी मस्जिद

भोपाल की बड़ी मस्जिद दुनियाभर में जानी जाती है। न केवल धार्मिक महत्व बल्कि पर्यटन के रुप में भी कई लोग यहां आते हैं। यह सवाल हर किसी के मन में उठता है कि कैसे बनी सबसे बड़ी मस्जिद। जी हां दोस्तों भोपाल में शासन करने वाली बेगम सुल्तान शाहजहां को इमारतों का काफी शौक हुआ करता था। इसी कारण इन्हें सेकंड एंपरर शाहजहां भी कहते थे। जब वे अपने रहने के लिए ताजमहल बनावा रही थीं, उसी वक्त उन्हें बड़ी मस्जिद बनाने की भी सूझी और कर दिखाया। बहादुर शाह ज़फर की हुकुमत में बेगम सुल्तान शाहजहां ने इसका काम शुरू करवाया था। लेकिन बीच में बेगम सुल्तान शाहजहां की मृत्यु के बाद उनकी बेटी को उनका काम संभालना पड़ा। सुल्तान जहां बेगम ने इसका निर्माण कार्य जारी रखा। पैसों की कमी के कारण बाद में इसका निर्माण कुछ समय के लिए रूक गया। मस्जिद में दो 18 मंज़िला ऊंची मिनारे हैं जो संगमरमर के गुंबज़ों से सजी है। इसके अलावा मस्जिद में तीन बड़े गुंबज़ भी है। जिनसे मस्जिद में चार चांद की खूबसूरती नजर आती है। मस्जिद में एक बड़ा सा दालान, संगमरमर का फर्श और स्तम्भ हैं। मोतिया तालाब और ताज-उल-मस्जिद को मिलाकर मस्जिद का कुल क्षेत्रफल 14 लाख 52 हजार स्क्वेयर फीट है जो मक्का-मदीना के बाद सबसे ज्यादा बड़ी जगह है। इस वजह से इसे विश्व की तीसरी सबसे बड़ी मस्जिद कहा जाता है।

- कमल सिंघी