मध्य पूर्व तनाव के बीच Crude Oil उछला, Brent Crude 110 डॉलर के पार पहुंचा

Crude Oil
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Ankit Jaiswal । Oct 21 2026 6:37PM

मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और लाल सागर व ओमान की खाड़ी में जहाजों पर हमलों के चलते कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है। इस दौरान ब्रेंट क्रूड 110.10 डॉलर और अमेरिकी डब्ल्यूटीआई 99 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। सऊदी अरब के तेल ठिकानों पर हमलों और अमेरिका में डीजल संकट से तेल बाजार में चिंता बढ़ गई है।

तेल की कीमतों में एक बार फिर तेजी देखने को मिल रही है। मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव, लाल सागर में जहाजों पर हमलों और सऊदी अरब के तेल ठिकानों को निशाना बनाए जाने की खबरों ने दुनिया भर में तेल की सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ा दी है। इसी वजह से बुधवार को कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज की गई। बाजार में कारोबार करने वाले लोग इस बात पर नजर बनाए हुए हैं कि आने वाले दिनों में तेल की सप्लाई कितनी प्रभावित होती है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड का भाव 1.34 डॉलर यानी 1.23 फीसदी बढ़कर 110.10 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। वहीं, अमेरिका के वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) कच्चे तेल की कीमत 1.18 डॉलर यानी 1.21 फीसदी बढ़कर 99 डॉलर प्रति बैरल हो गई। बता दें कि तेल की कीमतों में यह तेजी पिछले कारोबारी सत्र में आई गिरावट के बाद देखने को मिली है। इससे पहले ईरान के राष्ट्रपति ने तेहरान में पाकिस्तान के सेना प्रमुख के साथ बैठक के दौरान मध्यस्थता की कोशिशों पर चर्चा की थी, जिसके बाद कीमतों में कुछ नरमी आई थी।

तेल की सप्लाई को लेकर चिंता उस समय और बढ़ गई, जब ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स नौसेना के मुताबिक, होर्मुज स्ट्रेट के दक्षिण में समुद्र में एक विशाल तेल टैंकर समुद्री बारूदी सुरंग से टकराने के बाद आग की चपेट में आ गया। ईरानी मीडिया ने दावा किया कि जहाज ईरान के नियमों का उल्लंघन कर रहा था। हालांकि, इस घटना को लेकर सामने आई जानकारी के बीच समुद्री रास्तों पर सुरक्षा का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आ गया है।

जहाजों पर हमलों की बढ़ती घटनाएं भी तेल बाजार को प्रभावित कर रही हैं। जहाजों की आवाजाही पर नजर रखने वाली कंपनी केप्लर ने सोमवार को जारी एक रिपोर्ट में बताया कि 2 सप्ताह के दौरान कम से कम 18 जहाजों पर हमले दर्ज किए गए। गौरतलब है कि ये हमले अब केवल होर्मुज स्ट्रेट तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ओमान की खाड़ी तक फैल गए हैं। यह इलाका इसलिए अहम है, क्योंकि यहां तेल लाने और ले जाने वाले जहाजों की आवाजाही होती है।

एलएसईजी के विश्लेषकों के मुताबिक, ईरान की ओर से ओमान की खाड़ी तक जहाजों को निशाना बनाए जाने से अरब की खाड़ी के बाहर तेल लोड करने की प्रक्रिया और समुद्र में एक जहाज से दूसरे जहाज में तेल पहुंचाने का काम भी प्रभावित हो सकता है। इससे मध्य पूर्व से तेल की सप्लाई बनाए रखना और मुश्किल हो सकता है।

इसी बीच, यमन में भी संघर्ष तेज हो गया है। हूती विद्रोहियों ने सोमवार को सऊदी अरब की सरकारी तेल कंपनी सऊदी अरामको के यानबू स्थित ठिकाने, शायबा तेल क्षेत्र और रियाद व आभा के हवाई अड्डों पर हमलों की जिम्मेदारी ली। वहीं, यमन की सरकारी सेना पर हूतियों के हमले में मरने वालों की संख्या बढ़कर 73 हो गई है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, इलाके में लड़ाई तेज होने से हालात और गंभीर हो गए हैं।

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने मंगलवार को प्रसारित एक टीवी इंटरव्यू में कहा कि तेहरान को सऊदी अरब या यमन के हूतियों की ओर से शांति वार्ता में मदद करने के उसके प्रस्ताव पर कोई जवाब नहीं मिला है।

दूसरी ओर, मंगलवार को ब्रेंट क्रूड का भाव 76 सेंट यानी 0.69 फीसदी गिरकर 108.79 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ था। कारोबार के दौरान इसकी कीमत 111.99 डॉलर तक पहुंच गई थी, जो 5 महीने का उच्च स्तर था। वहीं, अमेरिका के डब्ल्यूटीआई तेल के नवंबर अनुबंध की कीमत 1.87 डॉलर यानी 1.8 फीसदी गिरकर 101.79 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुई थी। यह अनुबंध मंगलवार को समाप्त हो गया था।

अमेरिका में भी ईंधन की उपलब्धता बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। अमेरिकी ऊर्जा विभाग के 2 अधिकारियों के मुताबिक, डीजल की कमी और बढ़ती कीमतों को देखते हुए दुनिया भर की तेल रिफाइनरियों के साथ मिलकर उत्पादन बढ़ाने पर काम किया जा रहा है। रॉयटर्स के 8 विश्लेषकों के सर्वेक्षण के अनुसार, 16 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह में अमेरिका के कच्चे तेल का भंडार औसतन 800,000 बैरल घटने का अनुमान है। पेट्रोलियम से बने अन्य ईंधनों के भंडार में भी गिरावट की आशंका जताई गई है।

मौजूद जानकारी के अनुसार, मध्य पूर्व में तनाव, समुद्री रास्तों पर खतरे और तेल ठिकानों पर हमलों के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है। यदि तेल की सप्लाई लंबे समय तक प्रभावित होती है, तो इसका असर ईंधन की कीमतों, परिवहन खर्च और भारत जैसे तेल आयात करने वाले देशों की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।

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