RBI के उपायों से देश में आया 32 Billion Dollar का निवेश, Indian Economy की वित्तीय स्थिति होगी और मजबूत

आरबीआई के रणनीतिक कदमों ने देश की बाहरी वित्तीय स्थिति को मजबूत किया है, जिसमें नई विदेशी मुद्रा का बड़ा योगदान देखा जा रहा है। मजबूत विदेशी पोर्टफोलियो निवेश भारतीय ऋण बाजार के प्रति वैश्विक निवेशकों के बढ़ते विश्वास और अर्थव्यवस्था की सकारात्मक दिशा को दर्शाता है। इसमें आर्थिक विकास, मौद्रिक स्थिरता और विदेशी मुद्रा प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए हाल के दिनों में एक सकारात्मक संकेत सामने आया है। भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से जून में विदेशी मुद्रा आकर्षित करने के लिए उठाए गए कदमों का असर अब दिखाई देने लगा है। मौजूद जानकारी के अनुसार इन उपायों के बाद अब तक देश में करीब 32 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा का प्रवाह हुआ है। रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा है कि इससे भारत के भुगतान संतुलन और बाहरी वित्तीय स्थिति को मजबूती मिलने की उम्मीद है।
बता दें कि किसी भी देश के लिए पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार और मजबूत बाहरी वित्तीय स्थिति बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। इससे आयात भुगतान, विदेशी व्यापार और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं का सामना करने में मदद मिलती है। हाल के समय में रुपये पर दबाव और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक चुनौतियों के बीच यह विदेशी मुद्रा प्रवाह भारत के लिए राहत देने वाला माना जा रहा है।
मौजूद जानकारी के अनुसार लगभग 32 अरब डॉलर में सबसे बड़ा योगदान विदेशी मुद्रा गैर-निवासी जमा योजना का रहा है। इस योजना के तहत विदेशों में रहने वाले भारतीय और अन्य पात्र निवेशक भारतीय बैंकों में विदेशी मुद्रा में जमा कर सकते हैं। इससे बैंकों के पास विदेशी मुद्रा उपलब्ध होती है और जमाकर्ताओं को तत्काल रुपये के उतार-चढ़ाव का जोखिम भी नहीं उठाना पड़ता है।
संजय मल्होत्रा ने स्पष्ट किया कि रिजर्व बैंक को ऐसा कोई संकेत नहीं मिला है कि बड़ी संख्या में पहले से मौजूद जमा राशि को दोबारा उसी योजना में जमा कराया गया हो। इसका अर्थ यह है कि देश में आने वाली राशि का बड़ा हिस्सा नई विदेशी मुद्रा के रूप में आया है, जिससे भारत की बाहरी वित्तीय स्थिति को वास्तविक मजबूती मिलने की संभावना है।
गौरतलब है कि विदेशी निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए किए गए कर संबंधी बदलावों का भी सकारात्मक असर देखने को मिला है। मौजूद जानकारी के अनुसार इन बदलावों के बाद विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारत की ऋण प्रतिभूतियों में लगभग सात अरब डॉलर का निवेश किया है। इससे न केवल विदेशी मुद्रा का प्रवाह बढ़ा है बल्कि देश के ऋण बाजार में विदेशी निवेशकों की भागीदारी भी मजबूत हुई है।
हालांकि रिजर्व बैंक के गवर्नर ने यह भी कहा कि विदेशी मुद्रा का पूरा प्रभाव अभी बैंकिंग व्यवस्था में रुपये की उपलब्धता के रूप में नहीं दिखा है। उनके अनुसार सरकार के नकद भंडार में वृद्धि इसकी एक प्रमुख वजह रही है। उन्होंने बताया कि बैंकिंग व्यवस्था में रुपये की उपलब्धता केवल विदेशी मुद्रा के प्रवाह से तय नहीं होती, बल्कि सरकार के नकद प्रबंधन और रिजर्व बैंक की नीतियों का भी उस पर सीधा असर पड़ता है।
रुपये की स्थिति को लेकर संजय मल्होत्रा ने कहा कि रिजर्व बैंक की नीति में कोई बदलाव नहीं हुआ है। केंद्रीय बैंक केवल अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करता है। उन्होंने दोहराया कि रिजर्व बैंक रुपये के लिए कोई निश्चित स्तर तय नहीं करता, बल्कि उसका उद्देश्य बाजार में संतुलित और व्यवस्थित स्थिति बनाए रखना है। उन्होंने यह भी कहा कि मौजूदा स्तर पर रुपये को कम मूल्य वाला नहीं माना जा सकता है।
मौद्रिक नीति पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि वर्तमान रेपो दर 5.25 प्रतिशत मौजूदा आर्थिक वृद्धि और महंगाई की स्थिति के अनुरूप है। उनके अनुसार फिलहाल व्यापक स्तर पर महंगाई का दबाव सीमित है, लेकिन खाद्य पदार्थों और ईंधन की कीमतों में संभावित बढ़ोतरी भविष्य में चिंता का कारण बन सकती है। यदि ईंधन महंगा होता है तो परिवहन और उत्पादन लागत बढ़ेगी, जबकि खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि का असर आम लोगों के खर्च और महंगाई की उम्मीदों पर पड़ सकता है।
रिजर्व बैंक का मानना है कि विदेशी मुद्रा का मजबूत प्रवाह, संतुलित मौद्रिक नीति और वित्तीय बाजारों पर लगातार नजर रखने की रणनीति से भारत की अर्थव्यवस्था को आने वाले समय में मजबूती मिलेगी। साथ ही केंद्रीय बैंक रुपये की चाल, विदेशी निवेश, महंगाई और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।
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