समन्दर से लेकर रेगिस्तान तक... खतरनाक हालात का सामना कर रहे हैं भारतीय श्रमिक और नाविक

भारत सरकार ने यूक्रेन के राजदूत डॉ. ओलेक्सांद्र पोलिशचुक को तलब कर ओडेसा के निकट व्यापारी जहाज MV OMORFI पर हुए हमले पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। इस हमले में एक भारतीय नाविक की मौत हो गई, जबकि जहाज पर सवार चार भारतीयों में दो सुरक्षित बताए गए हैं।
यूक्रेन-रूस युद्ध और पश्चिम एशिया में गहराते भू-राजनीतिक तनाव ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि वैश्विक संघर्षों की सबसे बड़ी कीमत अक्सर वे लोग चुकाते हैं, जिनका युद्ध से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं होता। भारतीय नाविक, प्रवासी श्रमिक और कामगार आज इसी त्रासदी के सबसे बड़े शिकार बनकर उभरे हैं। यूक्रेन के ओडेसा बंदरगाह के निकट एक के बाद एक वाणिज्यिक जहाजों पर हुए हमलों, खाड़ी देशों में बढ़ती औद्योगिक दुर्घटनाओं और असुरक्षित कार्य परिस्थितियों ने भारतीय श्रमिकों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
ताजा घटनाक्रम में भारत सरकार ने यूक्रेन के राजदूत डॉ. ओलेक्सांद्र पोलिशचुक को तलब कर ओडेसा के निकट व्यापारी जहाज MV OMORFI पर हुए हमले पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। इस हमले में एक भारतीय नाविक की मौत हो गई, जबकि जहाज पर सवार चार भारतीयों में दो सुरक्षित बताए गए हैं और दो अन्य के बारे में जानकारी का इंतजार है। विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाना न केवल समुद्री सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए खतरा है, बल्कि निर्दोष नागरिक नाविकों के जीवन के साथ खिलवाड़ भी है।
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यह कोई अकेली घटना नहीं है। इससे पहले MV Golden Leo पर हुए हमले में चार भारतीय नाविकों सहित कई लोगों की जान चली गई थी। जुलाई में ही लगातार दो हमलों के बाद यूक्रेन युद्ध में जान गंवाने वाले भारतीय नाविकों की संख्या बढ़कर पांच हो गई है। भारत सरकार ने इसके बाद भारतीय नाविकों के लिए विशेष एडवाइजरी जारी करते हुए संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में नौकरी स्वीकार करने से पहले सुरक्षा जोखिमों का गंभीर आकलन करने की सलाह दी है। जहाज के मार्ग, सुरक्षा इंतजाम, बीमा, आपातकालीन निकासी और मुआवजा व्यवस्था की पूरी जानकारी लेने पर भी जोर दिया गया है।
दरअसल, ब्लैक सी ही नहीं बल्कि पश्चिम एशिया के समुद्री मार्ग भी अब सुरक्षित नहीं रह गए हैं। होरमुज जलडमरूमध्य, अरब सागर, ओमान की खाड़ी और लाल सागर में बढ़ते सैन्य तनाव के कारण हजारों भारतीय नाविक लगातार जोखिम के बीच काम कर रहे हैं। हाल के संकट के दौरान 13 भारतीय ध्वज वाले जहाजों पर लगभग 550 भारतीय नाविक लंबे समय तक फंसे रहे, जबकि पूरे क्षेत्र में 18 हजार से अधिक भारतीय समुद्री कर्मियों पर अनिश्चितता का साया मंडराता रहा। हम आपको बता दें कि भारत दुनिया के तीन सबसे बड़े समुद्री मानव संसाधन प्रदाताओं में शामिल है। वर्ष 2024 में 3.07 लाख से अधिक भारतीय नाविक वैश्विक व्यापारी जहाजों पर सेवाएं दे रहे थे। ऐसे में समुद्री सुरक्षा का संकट सीधे लाखों भारतीय परिवारों की आजीविका से जुड़ा हुआ है।
केवल समुद्र ही नहीं, खाड़ी देशों में काम कर रहे भारतीय श्रमिकों की स्थिति भी बेहद चिंताजनक है। कतर में पिछले महीने हुए भीषण औद्योगिक विस्फोट में 12 भारतीयों की मौत ने प्रवासी मजदूरों की सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी। विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार 2023 से 2025 के बीच कार्यस्थल दुर्घटनाओं में 800 से अधिक भारतीयों की जान गई, जिनमें लगभग 55 प्रतिशत मौतें अरब देशों में हुईं। अकेले सऊदी अरब में 182 और संयुक्त अरब अमीरात में 128 भारतीय श्रमिकों की कार्यस्थल पर मौत दर्ज की गई।
विशेषज्ञों के अनुसार इन मौतों के पीछे कई कारण हैं, जैसे सुरक्षा उपकरणों का अभाव, औद्योगिक स्थलों पर तकनीकी खामियां, सुरक्षा मानकों का कमजोर पालन, पर्याप्त प्रशिक्षण की कमी और अत्यधिक गर्म मौसम में कठिन श्रम। निर्माण, वेयरहाउस, ऑटोमोबाइल, रिटेल और रासायनिक उद्योगों में काम करने वाले भारतीय मजदूर अक्सर बिना पर्याप्त सुरक्षा उपकरणों के जोखिम भरे वातावरण में काम करने को मजबूर होते हैं। कई बार श्रमिक स्वयं भी सुरक्षा नियमों के प्रति पर्याप्त जागरूक नहीं होते, क्योंकि विदेश भेजे जाने से पहले उन्हें आवश्यक प्रशिक्षण नहीं मिल पाता।
स्थिति केवल कार्यस्थल तक सीमित नहीं है। प्रवासी संगठनों का कहना है कि तंग आवास, खराब भोजन, 12-12 घंटे की ड्यूटी, कई-कई महीनों तक वेतन नहीं मिलना और वेतन में मनमानी कटौती जैसी समस्याएं भारतीय श्रमिकों के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल रही हैं। विदेश मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि विदेशों में भारतीयों की आत्महत्या के अधिकांश मामले भी खाड़ी देशों से सामने आए हैं। कई मामलों में कंपनियां कार्यस्थल पर हुई मौतों को "प्राकृतिक मृत्यु" बताकर अपनी जिम्मेदारी से बच निकलती हैं और पीड़ित परिवारों को उचित मुआवजा भी नहीं मिल पाता।
देखा जाये तो खाड़ी क्षेत्र भारतीय प्रवासी श्रमिकों के लिए केवल रोजगार का केंद्र नहीं, बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था का भी महत्वपूर्ण आधार है। नौ मिलियन से अधिक भारतीय इस क्षेत्र में रहते और काम करते हैं। केरल, तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और पंजाब जैसे राज्यों की लाखों परिवारों की आय खाड़ी देशों से आने वाले धन पर निर्भर है। यही कारण है कि क्षेत्रीय अस्थिरता का प्रभाव केवल विदेशों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि भारत के सामाजिक और आर्थिक ढांचे पर भी पड़ता है।
देखा जाये तो युद्ध और क्षेत्रीय तनाव का एक और गंभीर पहलू श्रमिक अधिकारों का कमजोर होना है। मानवाधिकार संगठनों ने चेतावनी दी है कि कई खाड़ी देशों में निगरानी बढ़ने, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर नियंत्रण और श्रमिक संगठनों की सीमित भूमिका के कारण प्रवासी मजदूर अपनी समस्याएं खुलकर नहीं रख पा रहे हैं। वीजा व्यवस्था, नियोक्ता पर निर्भरता और सीमित कानूनी सुरक्षा के कारण वे शोषण के खिलाफ आवाज उठाने से भी डरते हैं।
हालांकि भारत सरकार ने पिछले वर्षों में संकट प्रबंधन की दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। विदेश मंत्रालय और भारतीय दूतावास लगातार सुरक्षा सलाह जारी कर रहे हैं, हेल्पलाइन सक्रिय हैं और जरूरत पड़ने पर निकासी अभियानों की तैयारी भी की जा रही है। कुवैत, यमन, लीबिया, अफगानिस्तान, सूडान और यूक्रेन जैसे देशों से सफल निकासी अभियानों के अनुभव ने भारत की क्षमता को मजबूत किया है। इसके बावजूद बदलते वैश्विक हालात यह संकेत देते हैं कि केवल आपातकालीन प्रतिक्रिया पर्याप्त नहीं होगी।
अब आवश्यकता इस बात की है कि विदेश भेजे जाने से पहले भारतीय श्रमिकों और नाविकों को अनिवार्य सुरक्षा प्रशिक्षण दिया जाए, जोखिम वाले क्षेत्रों के लिए विशेष बीमा और मुआवजा व्यवस्था सुनिश्चित हो, भर्ती एजेंसियों की जवाबदेही तय की जाए और द्विपक्षीय समझौतों के माध्यम से मेजबान देशों में श्रमिक सुरक्षा मानकों का सख्ती से पालन कराया जाए। साथ ही, भारत को समुद्री सुरक्षा, प्रवासी संरक्षण और श्रमिक अधिकारों को अपनी विदेश नीति का और अधिक महत्वपूर्ण हिस्सा बनाना होगा।
बहरहाल, भले भारतीय श्रमिक और नाविक वैश्विक अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, लेकिन विडंबना यह है कि वही सबसे अधिक असुरक्षित भी हैं। युद्ध की गोलियां हों, समुद्री मिसाइलें, औद्योगिक विस्फोट या श्रम शोषण, हर मोर्चे पर भारतीय कामगारों की जान दांव पर लगी है। ऐसे में केवल संवेदना और कूटनीतिक विरोध पर्याप्त नहीं होंगे। जरूरत एक ऐसी व्यापक नीति की है, जो दुनिया के किसी भी कोने में काम कर रहे भारतीय श्रमिक और नाविक को यह भरोसा दिला सके कि उसकी सुरक्षा, गरिमा और जीवन भारत की सर्वोच्च प्राथमिकता है।
-नीरज कुमार दुबे
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