मजहब और जाति, आज की राजनीति के सबसे मजबूत हथियार बन गए हैं

मजहब और जाति, आज की राजनीति के सबसे मजबूत हथियार बन गए हैं

हिंदू धर्म ही एकमात्र ऐसा है, जो यह मानता है कि ‘एकं सदविप्रा बहुधा वदन्ति’ याने सत्य तो एक ही है लेकिन विद्वान उसे कई रूप में जानते हैं। इसीलिए भारत के हिंदू, जैन, बौद्ध या सिख लोगों ने धर्म-परिवर्तन के लिए कभी तीर, तलवार, तोप और तिजोरी का सहारा नहीं लिया।

जहां ‘लव’ है, वहां ‘जिहाद’ कैसा ? जिहाद तो दो तरह का होता है। जिहादे-अकबर और जिहादे-अशगर ! पहला, बड़ा जिहाद, जो अपने काम, क्रोध, मद, लोभ मोह के खिलाफ इंसान खुद लड़ता है और दूसरा छोटा जिहाद, जो लोग हमलावरों के खिलाफ लड़ते हैं। जहां प्रेम है, वहां जिहाद का क्या काम ? प्रेम के पैदा होते ही सारे जिहादों का याने युद्ध का अंत हो जाता है। लेकिन फिर भी भारत में यह शब्द चल पड़ा है- लव जिहाद याने प्रेमयुद्ध ।

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इस लव जिहाद के खिलाफ भाजपा की लगभग सभी प्रांतीय सरकारों ने जिहाद छेड़ देने की घोषणा कर दी है। वे ऐसा कानून बनाने की कोशिश कर रही हैं, जिसके तहत उन सब लोगों को कम से कम पांच साल की सजा और जुर्माना भुगतना पड़ेगा, जो किसी हिंदू लड़की को मुसलमान बनाने के लिए उससे शादी का नाटक रचाते हैं। ऐसी शादियां बलात्कार, लालच, भय और बहकावे के जरिए होती हैं। यह भी कहा जा रहा है कि इन शादियों का आयोजन विदेशी पैसे के बल पर योजनाबद्ध षड्यंत्र के तहत होता है।

यदि सचमुच ऐसा हो रहा है तो यह अनैतिक तो है ही, यह राष्ट्रविरोधी काम भी है। इसके विरुद्ध जितनी सख्ती की जाए, उतनी कम है लेकिन इधर कानपुर से आई एक ताजा सरकारी जांच रपट के मुताबिक ऐसा एक भी मामला सामने नहीं आया है, जहां धर्म-परिवर्तन के लिए विदेशी पैसा इस्तेमाल हुआ है या कोई योजनाबद्ध षड्यंत्र किया गया है। सरकार के विशेष जांच दल (एसआईटी) ने ऐसे 14 मामलों की जांच-पड़ताल के बाद यह निष्कर्ष निकाला है। 11 मामलों में उसे शादी के पहले बलात्कार के मामले जरूर मिले हैं।

लव जिहाद के ये मामले किनके बीच हो रहे हैं ? ये प्रायः मुसलमान लड़कों और हिंदू लड़कियों के बीच हो रहे हैं। लेकिन ‘लव जिहाद’ शब्द चला है, केरल से। पिछले 10-11 वर्षों में केरल और कर्नाटक के पादरी शिकायत करते रहे कि लगभग 4000 ईसाई लड़कियों को जबरन मुसलमान बनाया गया है। उन्हें डरा-धमकाकर, लालच देकर या झूठ बोलकर उनका धर्म-परिवर्तन करा दिया गया है। जो काम अंग्रेज के ज़माने में विदेशी पादरी लोग मूंछों पर ताव देकर करते थे, वही आरोप उन्होंने इस्लामी मुल्ला-मौलवियों पर लगा दिया।

इस आरोप की जांच-पड़ताल सरकारी एजेंसियों ने जमकर की लेकिन उन्हें हर मामले में ऐसे प्रमाण नहीं मिले कि उन अन्तर्धार्मिक शादियों में लालच, डर या बहकावे का इस्तेमाल किया गया है। हां, कुछ इस्लामी संगठनों के ऐसे प्रमाण जरूर मिले हैं, जो बाकायदा धर्म-परिवर्तन (तगय्युर) की मुहिम चलाए हुए हैं। लेकिन यदि यहूदी और पारसियों को छोड़ दें तो ऐसा कौन-सा मजहब है, जिसके लोग अपना संख्या-बल बढ़ाने की कोशिश नहीं करते ? इसका बड़ा कारण स्पष्ट है। वे यह मानते हैं कि ईश्वर, अल्लाह, गॉड या यहोवा को प्राप्त करने का उनका मार्ग ही सर्वश्रेष्ठ और एकमात्र मार्ग है। और फिर संख्या-बल राजनीतिक वजन भी बढ़ाता है।

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सिर्फ हिंदू धर्म ही एकमात्र ऐसा है, जो यह मानता है कि ‘एकं सदविप्रा बहुधा वदन्ति’ याने सत्य तो एक ही है लेकिन विद्वान उसे कई रूप में जानते हैं। इसीलिए भारत के हिंदू, जैन, बौद्ध या सिख लोगों ने धर्म-परिवर्तन के लिए कभी तीर, तलवार, तोप और तिजोरी का सहारा नहीं लिया। ईसा मसीह और पैगंबर मुहम्मद का ज़माना कुछ और था और अदभुत क्रांतिकारी था लेकिन उसके बाद का ईसाइयत और इस्लाम का धर्मांतरण का इतिहास काफी शोचनीय रहा है। यूरोप में लगभग एक हजार साल के इतिहास को अंधकार-युग के नाम से जाना जाता है और यदि आप भारत, अफगानिस्तान, ईरान और मध्य एशिया के मध्युगीन इतिहास को पढ़ें तो आपको पता चलेगा कि यदि आप सूफियों को छोड़ दें तो इस्लाम जिन कारणों से भारत में फैला है, उनका इस्लाम के सिद्धांतों से कुछ लेना-देना नहीं है। भारत में ईसाइयत और अंग्रेजों की गुलामी एक ही सिक्के के दो पहलू रहे हैं। इसका तोड़ आर्य समाज ने निकाला था। ‘शुद्ध आंदोलन’ लेकिन वह भी अधर में लटक गया, क्योंकि मजहब पर जात भारी पड़ गई। ‘घर वापसी’ का भी वही हाल है। 

मजहब और जाति, आज की राजनीति के सबसे मजबूत हथियार बन गए हैं। लेकिन जहां सच्चा प्रेम हो, वहां मजहब, जात, पैसा, हैसियत वगैरह के तत्व अपने आप दरी के नीचे सरक जाते हैं। दुनिया में प्रेम से बड़ा कोई मज़हब नहीं है। मैं तो यह मानता हूं कि यदि कोई भी कानून इस सच्चे प्रेम में अंड़गा लगाता है तो वह अनैतिक है। ऐसा कोई भी कानून असंवैधानिक घोषित हो जाएगा, जो हिंदू और मुसलमानों पर एक-जैसा लागू नहीं होगा। कोई कानून ऐसा बने कि हिंदू लड़की मुसलमान लड़के से शादी न कर सके और इसके विपरीत मुसलमान लड़की हिंदू लड़के से शादी कर सके तो वह कानून अपने आप रद्द हो जाएगा। अमेरिका में 1960 तक गोरों और कालों के बीच शादी पर ऐसा कानून लागू होता था लेकिन वह रद्द हो गया।

हमें ऐसे सबल भारत का निर्माण करना है, जिसमें अन्तर्जातीय और अन्तर्धार्मिक परिवार पूर्ण समन्वय में रहते हों। मुझे स्वयं पिछले 50-55 वर्षों में अमेरिका, रुस, चीन, फ्रांस, ब्रिटेन, मोरिशस, अफगानिस्तान आदि देशों में ऐसे परिवारों के साथ रहने का मौका मिला है कि जिनमें हिंदू पति अपनी मुसलमान पत्नी के साथ रोज़ा रखता है और मुस्लिम पत्नी मगन होकर कृष्ण-भजन गाती है, हिंदू पति गिरजे में जाता है और उसकी अमेरिकी गोरी पत्नी मंदिर में आरती उतारती है। यदि आपके दिल में सच्चा प्रेम है तो सारे भेदभाव हवा हो जाते हैं। मंदिर, मस्जिद, गिरजे की दीवारें गिर जाती हैं और आप उस सर्वशक्तिमान को स्वतः उपलब्ध हो जाते हैं।

-डॉ. वेदप्रताप वैदिक