बदलाव की उम्मीद थी मगर बिखराव की ओर बढ़ गयी है कांग्रेस

बदलाव की उम्मीद थी मगर बिखराव की ओर बढ़ गयी है कांग्रेस

कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक के समय जिस तरह से पार्टी में लैटर बम फूटने के साथ आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हुआ है। वह यह दर्शाने के लिए काफी है कि पिछले साल लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद से कांग्रेस अभी तक उबर नहीं पाई है।

नेहरू-इंदिरा वाली कांग्रेस काफी बदल गई है। आज के तमाम कांग्रेसी नेताओं का गांधी परिवार से विश्वास उठ गया है। पिछले करीब 10-12 वर्षों में कांग्रेस में जो गिरावट का दौर शुरू हुआ है, वह थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। कांग्रेस अपने इतिहास के सबसे बुरे दिनों से गुजर रही है। एक वह दौर था जब नेहरू-इंदिरा के नाम पर कांग्रेस की ‘झोली’ वोटों से भर जाया करती थी। तब गांधी परिवार की ‘शान’ में उनके चाटुकार नेता ‘इंदिरा इज इंडिया’, 'इंडिया इज इंदिरा’ जैसे नारे गढ़ दिया करते थे। पार्टी का कोई नेता गांधी नेतृत्व के खिलाफ मुंह खोलना तो दूर उसकी तरफ आंख उठा कर भी नहीं देख पाता था, एक यह दौर है जब गांधी परिवार के खिलाफ पार्टी के छोटे-मोटे नेता नहीं दिग्गज नेताओं की नाराजगी तक की चर्चा ‘चौक-चैराहों’ पर हो रही है। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि गांधी परिवार न पार्टी को ‘धार’ दे पा रहा है, न उसका मर्म ही उसे समझ आ रहा है। गांधी परिवार के पास न तो नेहरू जैसी दूरदर्शिता है न आयरन लेडी इंदिरा जैसी निर्णय लेने की क्षमता, जो गांधी परिवार और कांग्रेस की सियासत की ‘थाथी’ हुआ करती थीं। सोनिया गांधी बढ़ती उम्र के कारण ज्यादा काम नहीं कर पा रही हैं वहीं राहुल और प्रियंका की सोच सोशल मीडिया पर बयानबाजी तक सीमित है, जो कांग्रेसी प्रियंका वाड्रा में दूसरी इंदिरा देखते थे, उनका भ्रम भी दूर हो गया है। वह समझ गए हैं कि उनके द्वारा दादी-पोती का चेहरा-मोहरा एक जैसा होने के चलते प्रियंका की काबिलियत को लेकर जो निष्कर्ष निकाला गया था, वह ‘थोथा चना’ साबित हुआ। गांधी परिवार की अपरिपक्वता के चलते कांग्रेस की ‘झोली’ खाली होती जा रही है। तमाम राज्यों में वह हासिये पर पहुंच गई है। आज की तारीख में छत्तीसगढ़, पंजाब और राजस्थान ही तीन ऐसे राज्य हैं, जहां बिना बैसाखी के कांग्रेस सत्ता में है लेकिन इसके लिए गांधी परिवार को श्रेय नहीं जाता है। न तो पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह, गांधी परिवार को ‘घास’ डालते हैं न राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत आलाकमान की सुनते हैं। सचिन पायलट के बगावत प्रकरण के समय यह बात और भी पुख्ता तौर पर साबित हो गई थी।

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स्थिति यह है कि अपना वजूद बचाने के लिए गांधी परिवार ने कांग्रेस को उन क्षेत्रीय दलों की ‘पूंछ’ थमा दी जो स्वयं मझधार में हैं। गांधी परिवार स्पष्ट सोच के साथ कांग्रेस की राजनीति को आगे बढ़ाने की बजाए क्षेत्रीय दलों की पूंछ पकड़कर कांग्रेस की वैतरणी (पुराणों में वर्णित नरकलोक की नदी) पार लगाना चाह रही है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी की सोची-समझी सियासत के सामने सोनिया से लेकर राहुल-प्रियंका तक ‘दगे कारतूस’ नजर आ रहे हैं। यही हाल करीब-करीब अन्य क्षेत्रीय दलों के दिग्गजों का भी है।

बहरहाल, ऐन कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक के समय जिस तरह से पार्टी में लैटर बम फूटने के साथ आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हुआ है। वह यह दर्शाने के लिए काफी है कि पिछले साल लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद से कांग्रेस अभी तक उबर नहीं पाई है। तब हार की जिम्मेदारी लेते हुए राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था और उनकी मां सोनिया गांधी को पार्टी के अंतरिम अध्यक्ष के तौर पर कमान संभालनी पड़ी थी। खैर, बैठक से पूर्व पार्टी के 20 से ज्यादा वरिष्ठ नेताओं की सोनिया गांधी को लिखी चिट्ठी ने देश की इस सबसे पुरानी पार्टी में भूचाल ला दिया है। इन नेताओं ने पार्टी के लिए पूर्णकालिक अध्यक्ष समेत संगठन में बड़े बदलाव की वकालत की है। इसके बाद सोनिया ने कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक शुरू होते ही अंतरिम अध्यक्ष का पद छोड़ने की पेशकश कर दी। मगर अफसोस इस बात का है कि गांधी परिवार यह समझने को तैयार ही नहीं है कि कैसे उनके बाप-दादा द्वारा खड़ी की गई कांग्रेस को मजबूत किया जाए। यही वजह है कांग्रेस के दिग्गज नेताओं ने जब सोनिया गांधी को पत्र लिखकर अपनी नाराजगी जताई तो उस पर सकारात्मक सोच की बजाए राहुल ने इन नेताओं की विश्वसनीयता पर ही सवाल खड़े कर दिए। राहुल ने इन नेताओें पर आरोप पर आरोप लगाया है कि जब कांग्रेस मध्य प्रदेश और राजस्थान में संकट से जूझ रही थी तब इन नेताओं ने ऐसी चिट्ठी क्यों लिखी। राहुल ने तो पत्र लिखने वाले कांग्रेसी नेताओं की भाजपा से मिलीभगत तक की बात कह दी। यह कांग्रेस और गांधी परिवार के लिए ठीक नहीं है।

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राहुल गांधी ने जिस तरह से चिट्ठी लिखने वाले नेताओं की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा किया उस पर प्रतिक्रिया भी मिलनी शुरू हो गयी। कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में सोनिया गांधी को लिखी गई चिट्ठी पर बवाल के बीच लखनऊ सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ चुके आचार्य प्रमोद कृष्णम ने तंज कसा है। ट्वीट करके आचार्य प्रमोद कृष्णम ने कहा कि कार्यसमिति बैठक से पार्टी को एक सशक्त नेतृत्व देने की उम्मीद की जा रही थी, लेकिन यहां तो उलटा रायता बिखरना शुरू हो गया। वहीं, एक और ट्वीट में आचार्य प्रमोद कृष्णम ने कहा कि कांग्रेस कार्यसमिति महान है, जो भीतर बोला जा रहा है वो अविलंब हूबहू मीडिया में आ रहा है। इसके साथ ही आचार्य प्रमोद ने पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल के बयान का समर्थन किया, जो सिब्बल ने राहुल गांधी के आरोप के जवाब में दिया है।

कपिल सिब्बल ने कहा, ‘राहुल गांधी कह रहे हैं हम भारतीय जनता पार्टी से मिले हुए हैं। मैंने राजस्थान हाईकोर्ट में कांग्रेस पार्टी का सही पक्ष रखा, मणिपुर में पार्टी को बचाया। पिछले 30 साल में ऐसा कोई बयान नहीं दिया जो किसी भी मसले पर भारतीय जनता पार्टी को फायदा पहुंचाए। फिर भी कहा जा रहा है कि हम भारतीय जनता पार्टी के साथ हैं।’ राहुल गांधी के आरोप पर कपिल सिब्बल के अलावा गुलाम नबी आजाद ने भी जवाब दिया। कार्यसमिति बैठक में कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद ने कहा कि अगर वह किसी भी तरह से भाजपा से मिले हुए हैं, तो वह अपना इस्तीफा दे देंगे। आजाद ने कहा कि चिट्ठी लिखने की वजह कांग्रेस की कार्यसमिति थी हालांकि बाद में वह भी सिब्बल की तरह अपने बयान से पलट गये।

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सवाल उठता है कि सोनिया के इंकार के बाद कांग्रेस के पास क्या विकल्प बच रहे हैं? क्या राहुल गांधी फिर संभालेंगे कमान? पार्टी का एक धड़ा प्रियंका गांधी वाड्रा की तरफ भी उम्मीद भरी नजरों से देख रहा है। इस बीच गांधी परिवार के लिए थोड़ी-बहुत राहत की बात यही बची है कि अभी भी पार्टी के कई नेता फिर से राहुल को पार्टी की कमान सौंपने की मांग कर रहे हैं, भले ही इसके पीछे की सबकी अपनी-अपनी सियासी वजह हो। पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह से लेकर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने राहुल को पुनः अध्यक्ष बनाए जाने की मांग की है। पिछले साल लोकसभा चुनाव में पार्टी की करारी हार के बाद अपने पद से इस्तीफा देने वाले राहुल ने पार्टी नेताओं की मांग पर कोई बयान नहीं दिया है। सूत्रों का कहना है कि राहुल तत्काल तो पार्टी अध्यक्ष का पद नहीं संभालेंगे। उन्होंने कहा कि इस बात की संभावना है कि सोनिया कुछ समय के लिए अंतरिम अध्यक्ष बनी रहें और इस दौरान पूर्णकालिक अध्यक्ष की खोज की जाए, लेकिन यह बात पहले भी कई बार दोहराई जा चुकी है। सोनिया की स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं उन्हें लगातार परेशान कर रही हैं।

पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि हो सकता है कि सोनिया की मदद के लिए 4 उपाध्यक्षों की नियुक्ति की जाए या फिर सोनिया ही राहुल के अध्यक्ष पद के लिए हामी भरने तक किसी को अंतरिम अध्यक्ष नियुक्त कर दें। हालांकि इस बात की संभावना बेहद कम नजर आ रही है। पार्टी के कई नेता प्रियंका गांधी वाड्रा की भी वकालत कर रहे हैं। हालांकि खुद प्रियंका ने इस बारे में कोई पत्ते नहीं खोले है। संभावना इस बात की भी है कि राहुल की नासमझी वाली बयानबाजी से नाराज होकर कुछ दिग्गज नेता कुछ समय के लिए ही सही पार्टी से अपने आप को अलग-थलग कर लें।

-अजय कुमार