अजहर मसूद के मामले में आखिरकार चीन को घुटने पर आना ही पड़ा

By योगेन्द्र योगी | Publish Date: May 6 2019 12:16PM
अजहर मसूद के मामले में आखिरकार चीन को घुटने पर आना ही पड़ा
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चीन यह नहीं चाहता था कि सम्मेलन के ऐन मौके पर भारत की तरफ इस मामले में कोई तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की जाए। भारत के इस परियोजना के नहीं जुड़ने से चीन कई देशों की निगाहों में संदिग्ध हो गया है। इस सम्मेलन में कई देशों में शिरकत नहीं की।

आखिरकार चीन को घुटने पर आना ही पड़ गया। विश्व समुदाय के सामने झुकते हुए चीन ने कुख्यात आतंकी सरगना अजहर मसूद के मामले में संयुक्त राष्ट्रसंघ में वीटो से तकनीकी प्रावधान हटा लिया। इससे मसूद को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित किया जा सका। बीते एक महीने में यह तीसरा मौका है जब चीन अपनी हेकड़ी दूसरे देशों पर नहीं जमा सका। उल्टे उसे ही रास्ते पर आने के लिए मजबूर होना पड़ गया। इससे पहले चीन के विरोध की अनदेखी करते हुए अमरीका नौसेना के युद्धपोत ताइवान जलडमररूमध्य से होकर गुजरे। चीन और ताइवान को अलग करने वाले 180 किलोमीटर लम्बे जलडमरूमध्य पर चीन अपना दावा जताता रहा है। चीन की नाराजगी की परवाह किए बगैर अमरीका ने कहा कि इस क्षेत्र से गुजरना यह दर्शाता है कि हिंद−प्रशांत क्षेत्र में आवाजाही को कोई रोक नहीं सकता।
 
चीन ने हाल ही में अपनी महत्वाकांक्षी परियोजना बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआर) के लिए आयोजित किए गए सम्मेलन से पूर्व भारत की आपत्तियों के मद्देनजर इस परियोजना के नक्षे से अरूणांचल प्रदेश और पाक के हिस्से वाले कश्मीर को भारत के नक्षे में दर्शाया। चीन का यह कदम आश्चर्य से कम नहीं है। भारत ने बीआआर परियोजना के प्रमुख घटक चीन−पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) विरोध में दूसरी बार सम्मेलन का बहिष्कार किया। 
चीन यह नहीं चाहता था कि सम्मेलन के ऐन मौके पर भारत की तरफ इस मामले में कोई तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की जाए। भारत के इस परियोजना के नहीं जुड़ने से चीन कई देशों की निगाहों में संदिग्ध हो गया है। इस सम्मेलन में कई देशों में शिरकत नहीं की। इन देशों को डर था कि चीन कहीं उन्हें श्रीलंका की तरह अपना आर्थिक गुलाम नहीं बना ले। चीन की दूरगामी आर्थिक नीति से घबराकर मलेषिया ने भी इस परियोजना को सीमित कर दिया है। 
 
चीन को तीसरा झटका लगा अमरीक की उइगर मुस्लिमों के साथ की जाने वाली ज्यादतियों को लेकर की गई खुली आलोचना से। इस मुद्दे पर अमरीका ने भी चीन को तगड़ी लताड़ लगाई। अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने चीन को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि दुनिया मुसलमानों के प्रति चीन के पाखंड का जोखिम नहीं उठा सकती। चीन आतंकवाद को लेकर बेनकाब इसलिए भी हो गया कि एक तरफ उरगर मुस्लिमों को आतंकी बताकर कुचलने में लगा हुआ है और दूसरी तरफ पाक में छिपे बैठे अंतरराष्ट्रीय आतंकी सरगना का बचाव कर रहा था।


 
ह्यूमन राइट वॉच ने भी चीन उइगर मुस्लिमों पर चीन की दमनकारी नीतियों की निन्दा की है। वॉच ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव को पत्र लिखकर चीन के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने को लेकर पत्र लिखा। हालांकि संयुक्त राष्ट्रसंघ (यूएन) इस मुद्दे से आंखे फेरे हुए है। यूएन ने एक बार भी चीन इस मुद्दे को लेकर चीन की तीखी आलोचना नहीं की। इसके विपरीत बर्मा में रोहिंग्या मुसलमानों से ज्यादितयों को लेकर यूएन खूब सक्रिय रहा। यूएन ने बर्मा में एक प्रतिनिधि दल को जांच के लिए भेजा। लेकिन ऐसी कवायद उइगर मुस्लिमों की हालत को लेकर नहीं की गई। वीटो पावर होने के कारण यूएन चीन के खिलाफ अभी ऐसे बयानों और कार्यवाइयों से मुंह चुराता रहा है।
 
आतंकी सरगना अजहर मसूद के मामले में चहुंओर से घिरने के बाद ही मजबूरी में चीन रास्ते पर आया। ब्रिटेन, अमरीका और फ्रांस ने चीन के वीटों पर जवाब तलब के बाद चीन को भारी दवाब में आ गया। चीन को लगने लगा कि भारत से निपटने के इस तरीके से वह पूरी दुनियां की आंखों में किरकिरी बन गया है। चीन भारत से खुन्नुस निकालने के लिए अभी तक मसूद को मोहरा बनाए हुए था। यह कूटनीति चीन के लिए उल्टी पड़ गई। चीन के सामने विश्व समुदाय से अलग−थलग पड़ने का खतरा खड़ा हो गया। 


यही वजह रही कि चीन पाकिस्तान के दवाब के बावजूद अजहर मसूद को समर्थन देने की कूटनीति पर कायम नहीं रह सका। इस मुद्दे पर पाकिस्तान की पहले ही काफी फजीहत हो चुकी है। पाकिस्तान आतंकियों को लेकर कई तरह के आर्थिकों प्रतिबंधों का सामना कर रहा है। उसका आर्थिक ढांचा बुरी तरह से चरमराया हुआ है। चीन की समझ में यह बात अब आने लगी है कि यदि बीआरआर जैसे प्रोजेक्ट में अन्य देशों की विश्वसनीयता बनाए रखनी है तो विष्व की आवाज को दरकिनार नहीं किया जा सकता। इस मामले में यदि चीन अड़ा रहता तो निष्चित तौर पर अन्य वीटो पावर वाले देषों के साथ दूसरे देशों से चीन के रिश्तों में खटास आ जाती। 
 
चीन की आर्थिक ताकत में इन देशों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। महज भारत से दुश्मनी रखने और पाकिस्तान को खुश रखने की चीन इतनी बड़ी कीमत अदा नहीं कर सकता। चीन के बैकफुट पर आने से आतंकवाद को लेकर भारत की ओर से विश्व में चलाई जा रही मुहिम को मजबूती मिलेगी। अमरीका और यूरोपीय देश आतंकवाद का दंश झेल चुके हैं। इसीलिए भारत की आवाज सुनी गई। 
 
विश्व के अन्य देश घोषित तौर पर किसी देश द्वारा आतंकवादियों के संरक्षण−पोषण की अनदेखी नहीं कर सकते। दूसरे देशों को भी यह बात समझ में आ गई है कि किसी पड़ोसी देश से दुश्मनी निकलाने के लिए ऐसी कवायद की आग उन तक भी पहुंच सकती है। श्रीलंका में हुए आतंकी हिंसा इसका नया उदाहरण है। इसी आशंका को भांपते हुए ही विश्व समुदाय ने चीन के खिलाफ एकजुट होकर भारत का साथ दिया। अब देखना यही है कि उरीगर मुस्लिमों सहित अन्य मुद्दों पर चीन कब तक विश्व की अनसुनी करता है। देर−सबेर अन्य विवादित मुद्दों पर भी चीन को अपने रुख में बदलाव लाना होगा। पूरी दुनियां की उपेक्षा करके चीन किसी भी हालत में तरक्की नहीं कर सकता। 
 
- योगेन्द्र योगी
 

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