कांग्रेस के बिना हमारा लोकतंत्र बिना ब्रेक की मोटर-कार जैसा है

  •  डॉ. वेदप्रताप वैदिक
  •  नवंबर 20, 2020   12:03
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कांग्रेस के बिना हमारा लोकतंत्र बिना ब्रेक की मोटर-कार जैसा है
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भारतीय लोकतंत्र में पैदा हुए इस खलल का असर किस पार्टी पर नहीं पड़ा है ? क्या भारत की कोई भी पार्टी यह दावा कर सकती है कि उसके अध्यक्ष या नेता का चुनाव उसके सभी सदस्य खुले रूप में करते हैं ? पार्टियों की कार्यसमिति के सदस्य भी नहीं चुने जाते।

बिहार के चुनाव-परिणामों का असर सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं है। वे अखिल भारतीय राजनीति का आईना बन गए हैं। हर राजनीतिक दल उसमें अपना चेहरा देख रहा है। भाजपा का चेहरा तो चमचमा ही उठा है लेकिन उसके प्रतिद्वंद्वी दल कांग्रेस के चेहरे पर तो धुंध ही छा गई है। बिहार में उसे 70 में से सिर्फ 19 सीटें मिली हैं और वोट सिर्फ 9.48 प्रतिशत मिले हैं। बिहार के साथ-साथ मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक आदि राज्यों में जो उप-चुनाव हुए, उनमें तो कांग्रेस की हालत और भी बदतर सिद्ध हुई है।

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लगभग सभी राज्यों में नेता लोग कांग्रेस को छोड़-छोड़कर भाजपा आदि दलों में जा रहे हैं। इसी कारण देश के कई छोटे राज्यों में कांग्रेस की सरकारें नहीं बन सकीं। जो नेता कांग्रेस में अभी तक बने हुए हैं, यह उनकी मजबूरी है। कांग्रेस के 23 नेताओं ने अपनी पार्टी की इस दुर्दशा पर एक पत्र लिखकर कांग्रेस की कार्यवाहक अध्यक्ष सोनिया गांधी का ध्यान भी खींचा है। उस पत्र का जवाब तो उन्हें अभी तक नहीं मिला है लेकिन उनमें से कुछ नेताओं को अपदस्थ कर दिया गया है। बिहार तथा अन्य राज्यों में हार के सवाल को कुछ नेताओं ने फिर उठाया है लेकिन पार्टी नेतृत्व ऐसे नाजुक मुद्दों पर सार्वजनिक बहस की इजाजत नहीं देता है।

ऐसे मुद्दों पर सार्वजनिक बहस हो या न हो लेकिन अफसोस की बात है कि उन पर पार्टी के अंदर भी खुलकर बहस नहीं होती लेकिन कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता और सामान्य कार्यकर्ता निजी बातचीत में अपनी निराशा, व्यथा और किंकर्तव्यविमूढ़ता प्रकट करने में कोई संकोच नहीं करते। कांग्रेस की हालत आज एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी-जैसी हो गई है। इसका बुरा असर देश की लगभग सभी प्रांतीय पार्टियों पर भी पड़ गया है। यदि कांग्रेस मां-बेटा पार्टी बन गई है तो कई पार्टियां बाप-बेटा पार्टी, चाचा-भतीजा पार्टी, भाई-भाई पार्टी, बुआ-भतीजा पार्टी, पति-पत्नी पार्टी, ससुर-दामाद पार्टी आदि बनकर रह गई हैं। भारतीय राजनीति में इस परिवारवाद का जन्म 1971 की इंदिरा गांधी की प्रचंड विजय के बाद शुरू हुआ, जो अब तक चला आ रहा है।

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भारतीय लोकतंत्र में पैदा हुए इस खलल का असर किस पार्टी पर नहीं पड़ा है ? क्या भारत की कोई भी पार्टी यह दावा कर सकती है कि उसके अध्यक्ष या नेता का चुनाव उसके सभी सदस्य खुले रूप में करते हैं ? पार्टियों की कार्यसमिति के सदस्य भी नहीं चुने जाते। वे भी नामजद कर दिए जाते हैं। प्रांतीय अधिकारी भी इसी तरह ऊपर से थोप दिए जाते हैं। यह कला कांग्रेस की है। अब इसे सभी पार्टियों ने सीख लिया है।

जब तक पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र नहीं होगा, देश में नाम मात्र का ही लोकतंत्र चलता रहेगा। पार्टियों में यदि आंतरिक लोकतंत्र हो तो उसका सबसे पहला असर तो यह होगा कि उसके नेता चुनाव द्वारा नियुक्त होंगे। ऊपर से थोपे नहीं जाएंगे। दूसरा, एक ही नेता बरसों-बरस पार्टी पर थुपा नहीं रहेगा। समय और जरूरत के मुताबिक नए नेताओं को मौका मिलेगा। पार्टियों के नेता और हमारी सरकारें भी अक्सर बदलती रहें तो उनके सेहत ठीक रहती है। वे पापड़ की तरह होते हैं। उन्हें जल्दी-जल्दी न पलटें तो उनके जलने का डर बना रहता है।

बराक ओबामा ने अपने संस्मरणों में जो लिखा है, उससे क्या सबक निकलता है ? उन्होंने कहा है कि सोनिया गांधी ने डॉ. मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री इसीलिए बनाया कि उनसे राहुल गांधी को कोई खतरा नहीं था। दूसरे शब्दों में हमारी राजनीति राष्ट्रहित से ज्यादा व्यक्तिगत या पारिवारिक हित से प्रेरित होती है। यह परिदृश्य देश की लगभग सभी पार्टियों में देखा जा सकता है। पार्टियों के अध्यक्ष ऐसे लोगों को बनाया जाता है, जो बड़े नेताओं के इशारों पर थिरकते रहें।

डॉ. वेदप्रताप वैदिक 







ममता जिस पार्टी को बाहरी बता रही हैं उसके नाम में ही 'भारतीय' शामिल है

  •  नीरज कुमार दुबे
  •  दिसंबर 1, 2020   13:42
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ममता जिस पार्टी को बाहरी बता रही हैं उसके नाम में ही 'भारतीय' शामिल है
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ममता को बताना चाहिए कि किस नेता के बंगाल में आने से कब-कब शांति भंग हुई। सर्वाधिक राजनीतिक हिंसा वाले राज्यों में शुमार पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं पर अकसर भाजपा कार्यकर्ताओं की पिटाई और उनकी हत्या कर दिये जाने का आरोप लगता रहा है।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दावा किया है कि भाजपा बाहरी लोगों की पार्टी है और राज्य में उनका कोई स्थान नहीं है। लेकिन ममता बनर्जी यह बात भूल गयी हैं कि जिसे वह बाहरी पार्टी बता रही हैं उस पार्टी को लोकसभा चुनावों में राज्य की जनता ने 18 सीटों पर विजय दिलाई। ममता बनर्जी को इस बात का भी जवाब देना चाहिए कि वह भाजपा को बाहरी तो बता रही हैं लेकिन बांग्लादेशी घुसपैठियों के लिए कौन-सा शब्द इस्तेमाल करेंगी? जिस मुख्यमंत्री पर आरोप हो कि वह महामारी के समय अपने राज्य लौटने वाले प्रवासी मजदूरों की ट्रेन नहीं आने दे रही हों, यही नहीं कथित रूप से प्रवासी मजदूरों की ट्रेन को कोरोना एक्सप्रेस करार दे दिया गया हो...वह सरकार बाहरी और भीतरी का खेल खेले तो सवाल तो उठेंगे ही। ममता बनर्जी भाजपा नेताओं पर बाहरी होने का आरोप लगा रही हैं लेकिन कौन भूला है कि गत वर्ष लोकसभा चुनावों के दौरान बांग्लादेशी अभिनेता फिरदौस ने बंगाली अभिनेत्री पायल सरकार और अभिनेता अंकुश के साथ टीएमसी के लिए चुनाव प्रचार किया था और एक रोड शो में हिस्सा लिया था। 

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ममता बनर्जी कह रही हैं कि पश्चिम बंगाल में बाहरी लोगों के लिए कोई जगह नहीं है। जो लोग सिर्फ चुनावों के दौरान राज्य में आते हैं और राज्य की शांति को बाधित करने की कोशिश करते हैं, उनका कोई स्वागत नहीं है। यहाँ ममता बनर्जी को यह भी बताना चाहिए कि किस नेता के बंगाल में आने से कब-कब शांति भंग हुई। सर्वाधिक राजनीतिक हिंसा वाले राज्यों में शुमार पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं पर अकसर भाजपा कार्यकर्ताओं की पिटाई और उनकी हत्या कर दिये जाने का आरोप लगता रहा है। ऐसे में अशांति कौन फैला रहा है इस पर सवाल तो बनता ही है। 

जरूरत इस बात की है कि तृणमूल कांग्रेस मुद्दों पर आधारित चुनाव लड़े लेकिन ऐसा होता दिख नहीं रहा है। चुनावों से पहले जनता को सौगातें देने की जो शुरुआत ममता सरकार ने की है उस पर भी सवाल उठेंगे ही। आखिर क्यों अब जाकर मुख्यमंत्री को सुध आई कि राज्य सरकार द्वारा चलाई जा रही ‘स्वास्थ्य साथी’ योजना का लाभ प्रदेश के सभी लोगों को दिया जाये। महामारी के समय में जब देश के अधिकांश राज्यों में नागरिक केंद्र सरकार की आयुष्मान योजना का लाभ उठा रहे हैं तो पश्चिम बंगाल की जनता को इस केंद्रीय सुविधा से क्यों दूर रखा गया है। 

पश्चिम बंगाल का विधानसभा चुनाव राज्य से संबंधित मुद्दों पर नहीं हो इसके लिए तृणमूल कांग्रेस पूरा प्रयास कर रही है। एक तो पार्टी ने तैयारी कर ली है कि इस चुनाव को बाहरी बनाम भीतरी बना दिया जाये। इसके अलावा जरा पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के एक हालिया बयान पर गौर कीजिये। उन्होंने कहा है कि वह बंगाल को कभी भी ‘दंगा-प्रभावित गुजरात’ नहीं बनने देंगी। ममता बनर्जी बंगाल को आगे बढ़ाने के नाम पर सत्ता में आई थीं लेकिन आज बंगाल कहाँ है? जिस गुजरात को वह दंगों के साथ जोड़ रही हैं जरा उस राज्य का हाल देखिये। औद्योगिक विकास, रोजगार, निवेश आदि सभी मोर्चों पर गुजरात सबसे अग्रणी राज्य है। अगर भाजपा के किसी नेता ने कह दिया है कि हम बंगाल को गुजरात बना देंगे तो सिर्फ नकारात्मक बात ही आगे क्यों प्रस्तुत करना चाहिए, गुजरात के अनेकों सकारात्मक पहलू हैं उनसे भी प्रेरणा ली जा सकती है।

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मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने दस साल के कार्यकाल में क्या किया इसका बखान करने की बजाय वह दूसरे मुद्दों को लगातार उठा रही हैं। जैसे अब उन्होंने कहा है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस और देश के स्वतंत्रता आंदोलन में उनके योगदान को लंबे समय से "उपेक्षित" किया गया और स्वतंत्रता संग्राम के खिलाफ रहे लोगों को ‘‘राजनीतिक रंग" में रंगकर इतिहास को बदलने का प्रयास किया जा रहा है। ममता बनर्जी ने कहा कि "लापता" होने के 75 साल बाद भी, लोगों को इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि नेताजी के साथ आखिर हुआ क्या था। यह सही है कि हर भारतीय यह जानना चाहता है कि नेताजी के साथ आखिर में क्या हुआ था लेकिन नेताजी को चुनावी मुद्दा बनाया जाये यह गलत है। बहरहाल, ममता बनर्जी जिस पार्टी के नेताओं को बाहरी बता रही हैं, उस पार्टी के नाम में ही भारतीय शामिल है।

-नीरज कुमार दुबे







गुरुनानक देव जी ने जो सीखें दी हैं वह हर काल में प्रासंगिक बनी रहेंगी

  •  डॉ. नीलम महेंद्र
  •  नवंबर 30, 2020   08:50
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गुरुनानक देव जी ने जो सीखें दी हैं वह हर काल में प्रासंगिक बनी रहेंगी
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जब गुरुनानक देव जी कहते हैं कि “एक ओंकार, सतनाम”, तो उनके आध्यात्म की इस परिभाषा को केवल उनके अनुयायी ही नहीं बल्कि प्राचीन वेद विज्ञान से लेकर आधुनिक विज्ञान भी स्वीकार करने पर विवश हो जाता है। वे कहते हैं, एक ओंकार सतनाम यानी ओंकार ही एक अटल सत्य है।

एक ओंकार सतनाम, कर्तापुरख, निर्मोह निर्वैर, अकाल मूरत, अजूनी सभं. गुरु परसाद ॥

॥ जप ॥

आद सच, जुगाद सच, है भी सच, नानक होसे भी सच ॥

ये गुरु नानक देव जी के मुख से निकले केवल कुछ शब्द नहीं हैं। ना ही इनकी ये पहचान है कि ये गुरुग्रंथ साहिब का पहला भजन है। ये तो वो मूल मंत्र हैं जो ना सिर्फ सिख संगत को उस सर्वशक्तिमान ईश्वर के गुणों से रूबरू कराता है बल्कि सम्पूर्ण मानव समाज को ही दिशा दिखाता है। श्री गुरुनानक देव जी के मुख से निकले ये शब्द वो बीज हैं जो कालांतर में सिख धर्म की नींव बने। विश्व के पांचवें सबसे बड़े धर्म के संस्थापक गुरुनानक देव जी की सीखों की वर्तमान समय में प्रासंगिकता की बात करने से पहले हम सिख शब्द को समझ लें। दरअसल सिख का अर्थ होता है शिष्य। अर्थात् जो गुरुनानक देव जी की सीखों को एक शिष्य की भांति अपने आचरण और जीवन में अपना ले, वो सिख है और हम सभी जानते हैं कि उनकी सीखों में सबसे बड़ा धर्म मानवता है इसलिए उनकी सीखें हर काल में प्रासंगिक हैं।

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जब गुरुनानक देव जी कहते हैं कि “एक ओंकार, सतनाम”, तो उनके आध्यात्म की इस परिभाषा को केवल उनके अनुयायी ही नहीं बल्कि प्राचीन वेद विज्ञान से लेकर आधुनिक विज्ञान भी स्वीकार करने पर विवश हो जाता है। वे कहते हैं, एक ओंकार सतनाम यानी ओंकार ही एक अटल सत्य है। ओंकार यानी ॐ। यह तो हम सभी जानते हैं कि हम जो भी कहते हैं, जिन भी शब्दों का उच्चारण करते हैं उनकी एक सीमा होती है लेकिन ओंकार असीमित है। प्राचीन ऋषियों ने भी ॐ को अजपा कहा है क्योंकि ॐ शब्दातीत है यानी शब्दों से परे है। और आधुनिक विज्ञान भी यह स्वीकार करता है कि ॐ कोई ध्वनि नहीं बल्कि एक अनाहत नाद है। क्योंकि ध्वनि तो दो वस्तुओं के टकराने से या कंपन से उत्पन्न होती है लेकिन ॐ किसी से टकराने से उत्पन्न नहीं हुआ। जहाँ टकराहट हो वहाँ भला ॐ कहाँ? जब भीतर बिल्कुल शांति हो, अंदर के सारे स्वर बंद हो जाएं, सभी द्वंद्व मिट जाएं तो एक अनाहत से हमारा संपर्क होता है और हम ॐ से जुड़ पाते हैं और एक अनोखी ऊर्जा को महसूस कर पाते हैं। ॐ का हमारे भीतर के सत्य और शुभ से लेना देना है। इसलिए जब वे कहते हैं एक ओंकार तो वे कहना चाहते हैं कि ईश्वर एक ही है जो हम सब के भीतर ही निवास करता है और यही सबसे बड़ा सत्य भी है।

जब 15वीं सदी में गुरुनानक देव जी ने सिख धर्म की स्थापना की थी, तो यह धर्म के प्रति लोगों के नज़रिए पर एक क्रांतिकारी बदलाव की शुरुआत थी। यह उस विरोधाभासी सोच पर प्रहार था जो व्यक्ति के सांसारिक जीवन और उसके आध्यात्मिक जीवन को अलग करती थी। अपने विचारों से गुरुनानक देव जी ने उस काल के सामाजिक और धार्मिक मूल्यों की नींव ही हिला दी थी। उन्होंने पहली बार लोगों को यह विचार दिया कि मनुष्य का सामाजिक जीवन उसके आध्यात्मिक जीवन की बाधा नहीं है बल्कि उसका अविभाज्य हिस्सा है। सदियों की परंपरागत सोच के विपरीत गुरुनानक जी वो पहले ईश्वरीय दूत थे जिन्होंने जोर देकर कहा था कि ईश्वर पहाड़ों या जंगलों में भूखा रहकर खुद को कष्ट देने से नहीं मिलते बल्कि वो सामाजिक जीवन जीते हुए दूसरों के कष्टों को दूर करने से मिलते हैं। उनके अनुसार व्यक्तिगत मोक्ष का रास्ता सेवा कार्य द्वारा समाज के लोगों को दुखों से मोक्ष दिला कर निकलता था। इसके लिए उन्होंने अपने भक्तों को सेवा ते सिमरन का मंत्र दिया। उस दौर में जब लोगों को यकीन था कि ईश्वर से एकाकार के लिए संन्यास के मार्ग पर चलना आवश्यक है, उन्होंने अपने भक्तों को मध्यम मार्ग अपनाने पर बल दिया जिस पर चलकर गृहस्थ आश्रम का पालन भी हो सकता है और आध्यात्मिक जीवन भी अपनाया जा सकता है। आज के भौतिकवादी युग में गुरुनानक देव जी का यह नज़रिया आत्मकल्याण ही नहीं समाज कल्याण की दृष्टि से भी बेहद प्रासंगिक है। और उन्होंने अपने इस जीवन दर्शन को अपनी जीवन यात्रा से चरितार्थ करके भी दिखाया। अपने जीवन काल में उन्होंने खुद एक गृहस्थ जीवन जीते हुए आध्यात्म की ऊँचाइयों को छूने वाले एक संत का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण समाज के सामने प्रस्तुत किया। इस सोच के विपरीत कि संसार माया है, मिथ्या है, झूठ है, फरेब है, उन्होंने कहा कि संसार ना सिर्फ सत्य है बल्कि वो साधन है, वो कर्मभूमि है जहाँ हम ईश्वर की इच्छा से उनकी इच्छानुसार कर्म करने के लिए आए हैं। उनका मानना था, हुकम राजायी चलना नानक लिख्या नाल अर्थात सब कुछ परमात्मा की इच्छा के अनुसार होता है और हमें बिना कुछ कहे इसे स्वीकार करना चाहिए।

लेकिन परमात्मा के करीब जाने के लिए संसार से दूर होने की आवश्यकता नहीं है बल्कि उस परमपिता के द्वारा दिए गए इस जीवन में हमारा नैतिकता पूर्ण आचरण ही हमारे जीवन को उसका आध्यात्मिक रूप और रंग देता है। उन्होंने ध्यान, तप योग से अधिक सतकर्म को और रीति रिवाज से अधिक महत्व मनुष्य के व्यक्तिगत नैतिक आचरण को दिया। इसलिए वे कहते थे कि सत्य बोलना श्रेष्ठ आचरण है लेकिन सच्चाई के साथ जीवन जीना सर्वश्रेष्ठ आचरण है। आज जब पूरी दुनिया में दोहरे चरित्र का होना ही सफलता प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण गुण बन गया हो और नैतिक मूल्यों का लगातार ह्रास हो रहा हो, तो गुरुनानक जी की यह सीखें सम्पूर्ण विश्व के लिए पथप्रदर्शक का काम कर सकती हैं।

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आज जब मशीनीकरण के इस युग में हम उस मोड़ पर पहुंच गए हों जहाँ समय के अभाव में मनुष्य खुद भी कुछ कुछ रोबोटकि-सा होता जा रहा हो और उसका सुकून भी छिनता जा रहा हो, तो गुरुनानक देव जी की दिखाई राह उसे वापस ईश्वर से जोड़कर दैवीय सुकून का एहसास करा कर असीम मानसिक शांति दे सकती है। ईश्वर से जुड़ने के लिए वो वैराग्य त्याग तप या फिर सांसारिक सुखों से दूर होने की बजाए संसार को प्रेम से गले लगाने की सीख देते थे, दूसरों के दुखों को दूर करने की सीख देते थे जिसके लिए उन्होंने जीवन जीने की बहुत ही व्यवहारिक राह दिखाई थी जो आज भी प्रासंगिक है। आज के दौर में जब मनुष्य अपने खुद के लिए भी समय न निकाल पा रहा हो ऐसे समय में गुरुनानक देव जी के द्वारा जीवन जीने के लिए दिए गए बेहद सरल तीन सूत्र निस्संदेह मनुष्य को न सिर्फ खुद से बल्कि अपने परिवार और समाज दोनों से जोड़कर असीम शांति का अनुभव करा कर उसके तन मन और जीवन तीनों में एक नई ऊर्जा भर सकते हैं। ये तीन सूत्र हैं, जपना, कीर्त करना और वंड के छकना।

1. जपना, यानी सबसे पहले जप करना अर्थात् उस परम पिता का नाम जपना जब भी समय मिले जहाँ भी जगह मिले पूरी श्रद्धा से उस सर्वशक्तिमान को याद करना उसका शुक्रिया अदा करना। उनका कहना था कि इसके लिए मंदिर या माजिद जाने की जरूरत नहीं है क्योंकि ईश्वर तो हमारे भीतर है। वो खुद भी कहीं भी कभी भी ईश्वर के ध्यान में बैठ जाते थे। कभी बकरियाँ चराते समय तो कभी खेतों में, कभी किसी पेड़ के नीचे तो कभी समुद्र में।

2. दूसरा कीर्त मतलब कमाई करना, क्योंकि प्रभु ने हमें जो परिवार दिया है उसका पालन करने के लिए हमें कर्म करना चाहिए। वे कहते थे, किसी से मांग कर नहीं खाना और ना किसी का हक मार कर खाना। अपनी मेहनत पर ही हमारा हक है और मेहनत करना हमारा फ़र्ज़ है।

3. तीसरा वंड के छकना मतलब बांट कर खाना। वे कहते थे कि हर मनुष्य को अपनी कमाई का दसवां हिस्सा परोपकार में लगाना चाहिए। वो स्पष्ट कहते थे कि धन को केवल जेब तक ही सीमित रखना चाहिए उसे अपने हृदय में स्थान नहीं बनाने देना चाहिए वो क्योंकि मानव की मुक्ति का मार्ग समाज के दुखों की मुक्ति से होकर निकलता है धन दौलत इकट्ठा करने से नहीं।

दरअसल वो जानते थे कि कोई भी समाज तब तक तरक्की नहीं कर सकता और ना ही स्वस्थ रह सकता है जब तक कि उस समाज में कर्म के महत्व को एक गौरव नहीं प्रदान किया जाता। इसलिए उन्होंने कर्म को मानव जीवन का ना सिर्फ एक महत्त्वपूर्ण गुण बताया अपितु उसे मनुष्य की सामाजिक और आध्यात्मिक जिम्मेदारी भी बताया। यही कारण है कि आज भी देश या विदेश के किसी भी संकट के समय चाहे वो युद्ध हो या कोई प्राकृतिक आपदा, सिख संगत मदद के लिए सबसे आगे रहती है। सिख समाज ना सिर्फ गुरुद्वारे में लंगर बल्कि जरूरत के वक्त जरूरतमंदों को निःशुल्क स्वच्छ भोजन पानी और अन्य बुनियादी सुविधाएं देने के लिए आगे आता है।

इसके अलावा गुरुनानक देव जी का कहना था कि इस धरती पर सभी मनुष्य समान हैं वे ऊंच नीच को नहीं मानते थे और ना ही जात पात के भेदभाव को। उनका कहना था कि न कोई हिन्दू है ना मुसलमान। सभी लोग एक ही ईश्वर की संतानें हैं। आज जब पूरे विश्व में धर्म के नाम पर आतंकवाद और हिंसा की घटनाएं लगातार हो रही हैं तो गुरुनानक जी के ये शब्द बहुत महत्वपूर्ण और प्रासंगिक हो जाते हैं। उनका स्पष्ट मानना था कि दुनिया में दुख क्लेश और असंतोष का मूल कारण जाति और धर्म के नाम पर किया जाने वाला भेदभाव है। और इस भेदभाव को मिटाने के लिए भी उन्होंने बहुत ही सीधा और सरल उपाय बताया था, संगत ते पंगत। अर्थात् बिना किसी धर्म जाति नस्ल या रंग के भेदभाव के बिना एक पंगत यानी पंक्ति में बैठकर एक साथ भोजन यानी लंगर की शुरुआत की। इसके पीछे गुरुनानक जी का स्पष्ट संदेश था कि जितने भी संघर्ष हैं, युद्ध हैं, असुरक्षा और निराशा की भावना, गरीबी और अन्य सामाजिक बीमारियाँ हैं, इंसान इन पर तब तक विजय नहीं प्राप्त कर सकता जब तक कि वो अपने अहम का त्याग ना कर दे। उनका मानना था कि यह स्वयं मनुष्य के हाथ में है कि उसके हृदय में ईश्वर का वास हो या फिर उसके अहम का। इसलिए वे समझाते थे कि किस बात का घमंड? तुम्हारा कुछ नहीं है, खाली हाथ आए थे खाली हाथ जाओगे। कुछ करके जाओगे तो लोगों के दिलों में हमेशा जिंदा रहोगे। आज जब हम अपने आसपास समाज में भौतिकवाद में जकड़े लोंगो में वी आई पी संस्कृति और स्वार्थपूर्ण आचरण का बोलबाला देखते हैं तो गुरुनानक देव जी की यह बातें और उनकी एहमियत सहसा स्मरण हो उठती हैं।

लेकिन अपनी सीखों से विश्व इतिहास में पहली बार मानवता और सत्कर्मों को ही सबसे बड़ा धर्म बताकर सिख धर्म की नींव रखने वाले गुरुनानक देव जी ने समाज में एक और जो सबसे बड़े क्रांतिकारी बदलाव का आगाज़ किया, वो था स्त्रियों को बराबरी का दर्जा देना। 15वीं शताब्दी वो दौर था जब चाहे इस्लाम हो चाहे ईसाईयत स्त्री को अपवित्र माना जाता था और हिन्दू धर्म में भले ही स्त्री को देवी का दर्जा प्राप्त था लेकिन ईश्वर की प्राप्ति के लिए व्यक्ति को साधु का जीवन व्यतीत करना पड़ता था, विवाहित जीवन और स्त्री से दूर रहना पड़ता था, गुरुनानक देव जी ने ना सिर्फ स्त्री को पुरूष के साथ समानता का दर्जा दिया बल्कि वैवाहिक जीवन को भी पवित्रता प्रदान की। अगर हमने गुरुनानक जी के संदेशों को गहराई से समझा होता और एक समाज के रूप में अपने आचरण में उतारा होता तो आज हमें महिला सशक्तिकरण और स्त्री मुक्ति जैसे शब्दों की बातें ही नहीं करनी पड़ती।

दरअसल गुरुनानक देव जी का आध्यात्म आडंबर युक्त नहीं आडंबर मुक्त है। इसलिए जब वे नौ वर्ष के थे और उनका जनेऊ संस्कार होना था, तो उन्होंने जनेऊ पहनने से साफ इंकार कर दिया था। उनका कहना था कि मनुष्य जब इस संसार को छोड़ कर जाएगा तो कपास से बना जनेऊ का यह धागा तो यहीं रह जाता है। मुझे जनेऊ पहनाना ही है तो वो जनेऊ पहनाओ जो मेरे साथ परलोक में भी जाए। जब उनसे पूछा गया कि ऐसा जनेऊ किस प्रकार का होता है, तो उन्होंने कहा,

“दया कपाह संतोख सूत जत गंदी सत बट

ऐह जनेऊ जीअ का हई तां पाडें घत” अर्थात्

इस जनेऊ को बनाने के लिए जब दया रूपी कपास, संतोष रूपी सूत, जत रूपी गांठ और सत रूपी बल का प्रयोग किया गया हो तो यह आत्मा का जनेऊ बन जाता है। यह जनेऊ पहन कर मनुष्य जब अच्छे काम करता है, सच्ची नेक कमाई करता है तो वह नीच जाति का होकर भी स्वर्ण जाति का बन जाता है। ऐसे गुरुनानक देव जी की सीखें हर काल में प्रासंगिक रहेंगी।

-डॉ. नीलम महेंद्र







'शाहीन बाग' के जैसा नजर आ रहा है पंजाब के किसानों का यह आंदोलन

  •  राकेश सैन
  •  नवंबर 28, 2020   11:54
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'शाहीन बाग' के जैसा नजर आ रहा है पंजाब के किसानों का यह आंदोलन
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राजनीतिक दल समस्या हल करने की बजाय बयानबाजी करके इसे और उलझाते जा रहे हैं। चूंकि पंजाब में लगभग एक साल बाद विधानसभा चुनावों का बिगुल बज जाना है, इसलिए कोई भी इस आंदोलन का लाभ लेने से पीछे हटने के लिए तैयार दिखाई नहीं दे रहा है।

पिछले साल नागरिकता संशोधन अधिनियम (सी.ए.ए.) को लेकर हुए शाहीन बाग आंदोलन और केंद्र सरकार द्वारा पारित कृषि सुधार अधिनियम को लेकर पंजाब सहित उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में हो रहे किसान आंदोलन के बीच की समानता को उर्दू शायर फैज के शब्दों में यूं बयां किया जा सकता है कि- 'वो बात सारे फसाने में जिसका जिक्र न था, वो बात उनको बहुत नागवार गुजरी है।' सीएए में देश के किसी नागरिक का जिक्र न था परंतु भ्रम फैलाने वालों ने इसे मुसलमानों का विरोधी बताया और भोले-भाले लोगों को सड़कों पर उतार दिया। अब उसी तर्ज पर कृषि सुधार अधिनियम को लेकर भ्रम फैलाया जा रहा है, इसमें न तो फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम.एस.पी.) को समाप्त करने की बात कही गई है और न ही मंडी व्यवस्था खत्म करने की परंतु इसके बावजूद आंदोलनकारी इस मुद्दे को जीवन मरन का प्रश्न बनाए हुए हैं।

अधिनियम के अस्तित्व में आने के बाद से ही पंजाब में चला आ रहा किसान आंदोलन बीच में मद्धम पड़ने के बाद किसानों के 'दिल्ली चलो' के आह्वान के बाद फिर जोर पकड़ रहा है। जैसी आशंका जताई जा रही थी वही हुआ, आंदोलन के चलते पिछले लगभग दो महीनों से परेशान चले आ रहे लोगों को किसानों के अड़ियल रवैये से मुश्किलें और बढ़ गई हैं। आंदोलनकारियों को सीमा पर रोके जाने के बाद हरियाणा पुलिस से किसानों की कई जगह झड़प हुई। ज्यादातर जगहों पर किसानों को रोकने की तमाम कोशिशें बेकार साबित हुईं। लंबे जाम और किसानों के आक्रामक रुख को देखते हुए पुलिस ने ज्यादा सख्ती नहीं की और उन्हें आगे बढ़ने दिया, लेकिन संगरूर के खनौरी और बठिंडा के डबवाली बैरियर पर किसान हरियाणा में प्रवेश नहीं कर सके। इन दोनों जगहों पर किसानों ने सड़क पर धरना लगा दिया। साफ-सी बात है कि आने वाले दिनों में आम लोगों की परेशानी और बढ़ने वाली है, क्योंकि किसान पूरी तैयारी के साथ दोनों जगहों पर डटे हैं। उनकी संख्या भी हजारों में है। चाहे कुछ मार्गों पर रेल यातायात कुछ शुरू हुआ है परंतु यह पूरी तरह बहाल नहीं हो पाया है। अब सड़क मार्ग भी बाधित होने के कारण समस्या और बढ़ गई है। इसके साथ ही सरकार और किसानों के बीच टकराव भी बढ़ता जा रहा है। इसके पीछे राजनीति भी कम जिम्मेदार नहीं है। राजनीतिक दल समस्या हल करने की बजाय बयानबाजी करके इसे और उलझाते जा रहे हैं। किसानों को अलग-अलग राजनीतिक दलों का समर्थन हासिल है। चूंकि पंजाब में लगभग एक साल बाद विधानसभा चुनावों का बिगुल बज जाना है, इसलिए कोई भी इस आंदोलन का लाभ लेने से पीछे हटने के लिए तैयार दिखाई नहीं दे रहा है।

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केंद्र सरकार द्वारा लाए गए तीन कृषि कानूनों को लेकर जो विरोध हो रहा है वह साधारण लोगों के लिए तो क्या कृषि विशेषज्ञों व प्रगतिशील किसानों के लिए भी समझ से बाहर की बात है। कुछ राजनीतिक दल व विघ्नसंतोषी शक्तियां अपने निजी स्वार्थों के लिए किसानों को भड़का कर न केवल अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं बल्कि ऐसा करके वह किसानों का बड़ा नुकसान भी करने जा रहे हैं। कितना हास्यास्पद है कि पंजाब के राजनीतिक दल उन्हीं कानूनों का विरोध कर रहे हैं जो राज्य में पहले से ही मौजूद हैं और उनकी ही सरकारों के समय में इन कानूनों को लागू किया गया था। इन कानूनों को लागू करते समय इन दलों ने इन्हें किसान हितैषी बताया था और आज वे किसानों के नाम पर ही इसका विरोध कर रहे हैं। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह किसानों के इसी आक्रोश का राजनीतिक लाभ उठाने के उद्देश्य से पंजाब विधानसभा में केंद्र के कृषि कानूनों को निरस्त भी कर चुके हैं और अपनी ओर से नए कानून भी पारित करवा चुके परंतु उनका यह दांवपेंच असफल हो गया क्योंकि प्रदर्शनकारी किसानों ने पंजाब सरकार के कृषि कानूनों को भी अस्वीकार कर दिया है।

संघर्ष के पीछे की राजनीति समझने के लिए हमें वर्ष 2006 में जाना होगा। उस समय पंजाब में कांग्रेस सरकार ने कृषि उत्पाद मंडी अधिनियम (एग्रीकल्चरल प्रोड्यूस मार्किट एमेंडमेंट एक्ट) के जरिए राज्य में निजी कंपनियों को खरीददारी की अनुमति दी थी। कानून में निजी यार्डों को भी अनुमति मिली थी। किसानों को भी छूट दी गई कि वह कहीं भी अपने उत्पाद बेच सकता है। साल 2019 के आम चुनावों में कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणापत्र में इन्हीं प्रकार के कानून बनाने का वायदा किया था जिसका वह आज विरोध कर रही है। अब चलते हैं साल 2013 में, जब राज्य में अकाली दल बादल व भारतीय जनता पार्टी गठजोड़ की स. प्रकाश सिंह बादल के नेतृत्व में सरकार सत्तारुढ़ थी। बादल सरकार ने इस दौरान अनुबंध कृषि (कांट्रेक्ट फार्मिंग) की अनुमति देते हुए कानून बनाया। कृषि विशेषज्ञ और अर्थशास्त्री स. सरदारा सिंह जौहल अब पूछते हैं कि अब जब केंद्र ने इन दोनों कानूनों को मिला कर नया कानून बनाया है तो कांग्रेस व अकाली दल इसका विरोध किस आधार पर कर रहे हैं।

पंजाब में चल रहे कथित किसान आंदोलन का संचालन अढ़ाई दर्जन से अधिक किसान यूनियनें कर रही हैं। कहने को तो भारतीय किसान यूनियन किसानों के संगठन हैं परंतु इनकी वामपंथी सोच जगजाहिर है। दिल्ली में चले शाहीन बाग आंदोलन में किसान यूनियन के लोग हिस्सा ले चुके हैं, केवल इतना ही नहीं देश में जब भी नक्सली घटना या दुर्घटना घटती है तो भारतीय किसान यूनियनें इस पर अपना समर्थन या विरोध प्रकट करती हैं। इस किसान आंदोलन को भड़काने के लिए गीतकारों से जो गीत गवाए जा रहे हैं उनकी भाषा विशुद्ध रूप से विषाक्त नक्सलवादी चाशनी से लिपटी हुई है। ऊपर से रही सही कसर खालिस्तानियों व कट्टरवादियों ने पूरी कर दी। प्रदेश में चल रहे कथित किसान आंदोलन में कई स्थानों पर खालिस्तान को लेकर भी नारेबाजी हो चुकी है। सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर एक नहीं बल्कि भारी संख्या में पेज ऐसे चल रहे हैं जो इस आंदोलन को खालिस्तान से जोड़ कर देख रहे हैं और युवाओं को भटकाने का काम कर रहे हैं।

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सच्चाई तो यह है कि केंद्र के नए कृषि अधिनियम अंतत: किसानों के लिए लाभकारी साबित होने वाले हैं। इनके अंतर्गत ऑनलाइन मार्किट भी लाई गई है, जिसमें किसान अपनी फसल को इसके माध्यम से कहीं भी अपनी मर्जी से बेच सकेगा। इस कानून में राज्य सरकारों को भी अनुमति दी गई है कि वह सोसायटी बना कर माल की खरीददारी कर सकती हैं और आगे बेच भी सकती हैं। पंजाब में सहकारी क्षेत्र के वेरका मिल्क प्लांट इसके उदाहरण हैं। नए कानून के अनुसार, किसानों व खरीददारों में कोई झगड़ा होता है तो उपमंडल अधिकारी को एक निश्चित अवधि में इसका निपटारा करवाना होगा। इससे किसान अदालतों के चक्कर काटने से बचेगा। हैरत की बात यह है कि किसानों को नए कानून के इस लाभ के बारे में कोई भी नहीं जानकारी दे रहा। एक और हैरान करने वाला तथ्य है कि केंद्र सरकार ने हाल ही में पंजाब में धान की खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य के आधार पर की है परंतु इसके बावजूद एमएसपी को लेकर प्रदर्शनकारियों में धुंधलका छंटने का नाम नहीं ले रहा और उन बातों को लेकर विरोध हो रहा है जिनका जिक्र तक नए कृषि कानूनों में नहीं है।

-राकेश सैन