अमेरिकी कार्रवाई के बाद गड़बड़ाई विश्व व्यवस्था

अमेरिका की शह पर सीरिया के शासक के खिलाफ बशर अल-असद के शासन के खिलाफ कार्रवाई जारी रही। सीरिया में तेरह वर्षों तक खूनी गृहयुद्ध चलता रहा। इसके बाद हार कर सात दिसंबर 2024 को विद्रोही ताकतों ने दमिश्क पर कब्जा कर लिया और बशर अल-असद के शासन का पतन हो गया। तब से लेकर सीरिया जल रहा है।
दूसरे विश्व युद्ध के बाद कुछ अपवादों को छोड़ दें तो दुनिया ने सभ्य होने की तरफ लगातार कदम बढ़ाए। लेकिन इक्कीसवीं सदी का चौथाई हिस्सा बीतने के बाद लग रहा है कि एक बार फिर दुनिया आधुनिकता की चादर लपेटे मध्य युगीन बर्बरता की ओर बढ़ रही है। 28 फरवरी, 2026 को अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमले के बाद ऐसी सोच वैश्विक स्तर पर बढ़ी है। इस हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला रूहोल्लाह मुसावी खोमैनी समेत कई सैन्य अधिकारियों की मौत ने दुनिया को एक बार फिर हिलाकर रख दिया है। दुनिया के कमजोर देश एक बार फिर आशंकित हो उठे हैं। उन्हें यह डर सताने लगा है कि अमेरिका के खिलाफ अगर उन्होंने नीतियां अपनाईं तो हो सकता है कि अमेरिका अपने तरीके से योजना बनाकर उस पर हमला कर दे।
अमेरिका ने ईरान पर हमले के लिए जिन कारणों को गिनाया है, उनमें सबसे प्रमुख कारण है, ईरान के परमाणु कार्यक्रम रोकना, ईरान की मिसाइल क्षमताओं को खत्म करना और वहां की मौजूदा शासन व्यवस्था को बदलना है। अमेरिका ने तर्क दिया है कि ईरान परमाणु हथियार विकसित करने के करीब था, जो दुनिया और क्षेत्रीय सहयोगियों के लिए एक "अस्वीकार्य सुरक्षा खतरा" है। ट्रंप का कहना है कि ईरान ने अपनी परमाणु महत्वाकांक्षाओं को त्यागने के हर अवसर को ठुकरा दिया था। ट्रंप का यह भी कहना है कि उसके 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' का उद्देश्य ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल सुविधाओं और नौसैनिक संपत्तियों को पूरी तरह नष्ट करना है।
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यह ठीक है कि अयातुल्ला खोमैनी की अगुआई वाले ईरान में इस्लामिक शासन व्यवस्था काम कर रही है, जिसे उसके नागरिकों के बड़े वर्ग का समर्थन हासिल नहीं था। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि ईरान की संप्रभुता को चोट पहुंचाई जाए। अमेरिका ने वही किया है। अगर ईरान की जनता अयातुल्ला खोमैनी के शासन को खत्म करती तो और बात होती, लेकिन अमेरिकी हमले में खोमैनी का मारा जाना दूसरे तरह की बात है। इससे आने वाले दिनों में कई खतरे उत्पन्न होंगे। ईरान पर हमले के बाद यह आशंका बढ़ गई है कि अमेरिकी नागरिकों के खिलाफ दुनिया में क्रोध पनपे। यह भी हो सकता है कि आतंकी घटनाएं बढ़ें। गुरिल्ला युद्ध और ईरान समर्थित ताकतों द्वारा आतंकवाद के मुखौटे में अमेरिका और उसके समर्थकों को निशाना बनाया जाए। इससे दुनिया की चिंताएं बढ़ना अस्वाभाविक नहीं है।
अमेरिका की सैन्य कार्रवाइयों का हालिया इतिहास बताता है कि उनका घोषित उद्देश्य पूरा नहीं हुआ। नौ सितंबर 2011 को न्यूयार्क के ट्विन टॉवर पर हमले के बाद अमेरिका ने आतंकवाद का खात्मा करने के लिए अफगानिस्तान स्थित तालिबान और अलकायदा पर कार्रवाई की थी, उस अफगानिस्तान में अब तालिबान का शासन फिर से स्थापित हो चुका है। अफगानिस्तान को छोड़कर भागने का फैसला अमेरिकी राष्ट्रपति रहते जो बाइडेन ने लिया था। अफगानिस्तानी तालिबान पर हमले का एक मकसद वहां लोकतंत्र की स्थापना थी, लेकिन अब वहां तालिबान का इस्लामी शासन है और अमेरिका किनारे है। दिलचस्प यह है कि अफगानिस्ता के खिलाफ कार्रवाई के लिए जिस पाकिस्तान ने अमेरिका को सहयोग दिया था, वह पाकिस्तान अब अफगानिस्तान से जूझ रहा है।
इराक के तानाशाह सद्दाम हुसैन के खिलाफ अमेरिका ने अपने सहयोगी देशों के साथ सैन्य कार्रवाई शुरू की। उसका बहाना इराक के पास व्यापक जनसंहार के रासायनिक हथियार होने को बनाया गया। दिलचस्प यह है कि इराक में सद्दाम हुसैन का शासन खत्म हो गया। तीस दिसंबर 2006 को उन्हें फांसी पर अमेरिका समर्थित न्याय तंत्र के जरिए लटका दिया गया, लेकिन इराक में अब तक ना तो लोकतंत्र आ पाया है और न ही शांति।
कुछ इसी तरह साल 2011 में लीबिया में अमेरिका ने सैन्य हस्तक्षेप किया। तब अमेरिका का उद्देश्य लीबिया के तानाशाह कर्नल मुअम्मर गद्दाफी के खिलाफ हुए नागरिक विद्रोह को समर्थन देकर लीबिया में लोकतंत्र की स्थापना करना था। इसके लिए संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव को जरिया बनाया गया। इसके बाद 19 मार्च 2011 को अमेरिका ने अपने कुछ सहयोगी देशों के साथ मिलकर हवाई हमले और मिसाइल हमले शुरू किए। तब से लेकर अब तक अमेरिका में कार्रवाई जारी है। अमेरिकी विशेष बलों ने बेंगाज़ी में 2012 के लीबिया के अमेरिकी राजनयिक मिशन पर हमले के आरोपी अहमद अबू खट्टाला को गिरफ्तार किया। इसके बाद अमेरिका ने 2015 से लेकर 2019 के बाद तक आईएसआईएस और अल-कायदा के खिलाफ ड्रोन और हवाई हमले जारी रखे। जबकि अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के बीच लीबिया के ही लोगों के हाथों तानाशाह मुअम्मर गद्दाफी 20 अक्टूबर 2011 को मारे जा चुके थे। भीड़ ने उन्हें उनके गृह नगर सिर्त में पकड़ा गया और वहीं उनकी हत्या कर दी गई। तब से लेकर लीबिया अब भी जल रहा है और वहां शांति और लोकतंत्र अब तक इंतजार कर रहे हैं।
अमेरिका की शह पर सीरिया के शासक के खिलाफ बशर अल-असद के शासन के खिलाफ कार्रवाई जारी रही। सीरिया में तेरह वर्षों तक खूनी गृहयुद्ध चलता रहा। इसके बाद हार कर सात दिसंबर 2024 को विद्रोही ताकतों ने दमिश्क पर कब्जा कर लिया और बशर अल-असद के शासन का पतन हो गया। तब से लेकर सीरिया जल रहा है। हाल ही में वेनेजुएला के शासक निकोलस मादुरो को अमेरिकी सैनिकों ने तीन जनवरी 2026 को गिरफ्तार कर लिया। तब से वे अमेरिकी कैद में हैं और वहां नया शासन स्थापित हो गया है। अमेरिका दावा करता है कि वह लोकतांत्रिक देश है। वह पूरी दुनिया में अपनी तरह लोकतंत्र स्थापित करने का दावा करता है। लेकिन जहां भी वह कार्रवाई करता है, वहां लोकतंत्र आते हुए नहीं दिखता। ईरान में भी कुछ वैसा ही हो सकता है। यही वजह है कि अमेरिकी दादागिरी के खिलाफ विश्व के बड़े हिस्से में क्षोभ है। ट्रंप के दौर में ऐसी कार्रवाइयों से विश्व आर्डर गड़बड़ा गया है। संयुक्त राष्ट्र संघ किनारे बैठ घटनाओं को होते देखभर रहा है।
अमेरिका की निगाह बहुत पहले से ईरान पर है। भूराजनीतिक मामलों के कुछ जानकारों का मानना है कि ईरान पर अमेरिकी हमला चीन की ताकत को रोकने की कोशिश भी है। इसकी वजह यह है कि चीन अपने तेल का तकरीबन नब्बे प्रतिशत हिस्सा ईरान से ही आयात करता रहा है। ईरान पर अमेरिकी और इजरायली हमले के बाद चीन की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ने लगा है। चीन ने अपने दफ्तरी कामकाज में कटौती करने का ऐलान किया है। पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे राष्ट्रों में तो सरकारी दफ्तरों के लिए काम करने वाली गाड़ियों की संख्या को आधा कर दिया गया है और वहां दफ्तरों को हफ्ते में सिर्फ चार दिन खोलने का आदेश दिया गया है। इसके साथ ही वहां स्कूल और कॉलेज बंद कर दिए गए हैं। भारत में भी युद्ध का असर दिखने लगा है। सरकार ने यहां पच्चीस दिनों बाद ही दूसरा एलपीजी सिलिंडर बुक करने का नियम लागू कर दिया है। भारत के सॉफ्टवेयर शहर बेंगलुरू के पेइंग गेस्ट अकोमोडेशन के खाने में कटौती के नोटिस वहां रह रहे युवाओं को मिल रहे हैं। कहा जा रहा है कि वहां घरेलू गैस की कमी हो गई है, इस वजह से वहां पीजी में रोटी, पूरी या पुड़ी और इस तरह के खाने की चीजें नहीं मिलेंगी, सिर्फ दाल-चावल से लोगों को काम चलाना होगा। हालांकि सरकार का कहना है कि उसके पास तेल और गैस का पर्याप्त भंडार है। लेकिन उसने घरेलू गैस की कीमतों में साठ रूपए प्रति सिलिंडर और औद्योगिक गैस की कीमतों में 116 रूपए की बढ़ोतरी कर दी है। इससे देश में उहापोह और अफरातफरी जैसे हालात बनते नजर आ रहे हैं।
जिस तरह रूस और यूक्रेन का युद्ध खत्म होता नजर नहीं आ रहा है, ईरान पर हमले भी थमते नजर नहीं आ रहे। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बार-बार कह रहे हैं कि अगर ईरान ने समर्पण नहीं किया तो ईरान पर बीस गुना ज्यादा ताकत से अमेरिका हमला करेगा। इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू बार-बार कह रहे हैं कि ईरान में सत्ता परिवर्तन वहां की जनता को ही करना है। एक तरह से वहां की शासन व्यवस्था को बदलने के लिए लोगों को युद्ध से उपजी परिस्थितियों के बीच उकसाया जा रहा है।
सवाल यह है कि इससे अमेरिका और इजरायल को क्या फायदा होगा। सीधे तौर पर अमेरिका भले ही स्वीकार न करे, लेकिन यह तय है कि इस युद्ध के बाद अमेरिका का खाड़ी के तेल भंडारों पर नियंत्रण हो जाएगा। जहां तक इजरायल की बात है तो ईरान के कमजोर होने के बाद स्थानीय भू राजनीतिक माहौल में उसकी ताकत बढ़ जाएगी और वह पश्चिमी एशिया में बिना किसी अवरोध और चिंता के आगे बढ़ता रहेगा।
अमेरिका को लेकर कहा जा रहा है कि अगर ट्रंप नहीं होते तो युद्ध नहीं होता। अमेरिका को लेकर लोगों को अपनी यह सोच बदलनी होगी। चाहे रिपब्लिकन हों या डेमोक्रेट, वे अमेरिका के वर्चस्व को बनाए रखने के लिए पूरी ताकत लगाते हैं। जार्ज बुश जूनियर ने ढाई दशक पहले इराक और अफगानिस्तान पर हमला जब किया था, तब उन्होंने एक तरह से पूरी दुनिया पर सवाल उठाए थे। उन्होंने कहा था कि या तोआप अमेरिका की तरफ हैं या फिर आतंक की तरफ। चूंकि न्यूयार्क के ट्रेड टावर पर हमले की घटना के बाद बुश ने ऐसा कहा था, इसलिए किसी देश ने खुलकर इसका विरोध नहीं किया। तब बुश डेमोक्रेट थे, और अब रिपब्लिकन ट्रंप हैं। दोनों की नीतियों में कम से कम हमले को लेकर कोई अंतर नहीं है। तब बुश ने इराक, यमन और अफगानिस्तान को तबाह किया था, अब ट्रंप ईरान को कर रहे हैं। ट्रंप के बारे में माना जाता है कि अपनी ही डेमोक्रेटिक पार्टी में वे लोकप्रिय नहीं हैं। शायद इसे ही देखते हुए कुछ रिपब्लिकन सांसदों ने अमेरिकी कांग्रेस में युद्ध के खिलाफ प्रस्ताव पेश किया था, लेकिन यह प्रस्ताव गिर गया। इससे साफ है कि अमेरिका कम से कम खुद को आगे रखने और उसके लिए युद्ध करने को कोई गुनाह नहीं मानता। सत्ता चाहे डेमोक्रेट के पास हो या फिर रिपब्लिकन पार्टी के पास। यह बात और है कि ईरान की तरफ से दागी जा रही मिसाइलों की जद में सऊदी अरब, बहरीन आदि देश भी हैं।
ईरान के खिलाफ अमेरिकी और इजरायली कार्रवाई के बाद दुनिया एक बार फिर दहशत और मध्ययुगीन हिंसक समाज की ओर बढ़ती नजर आ रही है। एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र संघ की उपयोगिता और जरूरत सवालों के घेरे में है। ऐसे में दुनिया का अगला कदम क्या हो, इस पर कोई ठोस राय नहीं दिख रही है। युद्ध हर हाल में रोका जाना चाहिए, लेकिन युद्ध को रोक पाना मामूली इंन्सानों और तमाम देशों के राजनेताओं में नहीं हैं। यह ट्रंप और नेतन्याहू पर निर्भर करता है कि वे युद्ध को कब और कैसे रोकने का फैसला लेते हैं।
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