US-Iran Deal से इजरायल बाहर! क्या समझौते का होगा पालन, ट्रंप vs नेतन्याहू अब होने वाला है?

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अभिनय आकाश । Jun 16 2026 2:09PM

जंग खत्न होने के तारीखों को लेकर नेतन्याहू को अपने देश के भीतर भी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा है। उनकी अपनी सरकार के कुछ लोग भी सवाल उठा रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इजरायल पर जंग रोकने का दबाव बनाया है और कई मामलों में इजरायल को वाशिंगटन की शर्तें माननी पड़ी हैं।

अमेरिका और ईरान के बीच जंग खत्म करने को लेकर समझौता हो गया है। लेकिन इस समझौते ने इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को मुश्किलों में ला खड़ा कर दिया है। वजह ये है कि जिस जंग में इजरायल सबसे आगे था। उसी जंग को खत्म करने वाले समझौते की शर्तें उसे अभी तक ठीक से पता भी नहीं है। 15 जून की शाम नेतन्याहू ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की। ध्यान देने वाली बात ये है कि ये प्रेस कॉन्फ्रेंस उस वक्त हुई है जब अमेरिका और ईरान के बीच जंग खत्म करने के लिए एक मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्ट्रैंडिंग यानी एमओयू पर सहमति बन चुकी थी। समझौते पर डिजीटली साइन हो चुका है और 19 जून को स्विजरलैंड में इसकी औपचारिक साइनिंग होनी है। प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक पत्रकार ने समझौते के बारे में पूछा तो नेतन्याहू ने माना की इजरायल को अभी तक नहीं पता है कि इस डील में लिखा क्या है? इसका मतलब ये हो सकता है कि ईरान और अमेरिका के बीच जो भी बातचीत हो रही है, उससे इजरायल लगभग बाहर ही रहा है। इसके बावजूद नेतन्याहू ने इस छह हफ्ते तक चले इस अमेरिका और इजरायल के सैन्य अभियान को बड़ी कामयाबी बताया है। उन्होंने कहा कि इजरायल को एक न्यूक्लियर हथियारों से लैस ईरान के खतरे से बचा लिया। नेतन्याहू ने कहा कि समझौता हो या न हो ईरान के पास न्यूक्लियर हथियार नहीं होंगे। न आज न कल, जब तक मैं इजरायल का प्रधानमंत्री हूं ऐसा नहीं होने दूंगा। यही मेरे जीवन का मिशन है। दरअसल, जंग खत्न होने के तारीखों को लेकर नेतन्याहू को अपने देश के भीतर भी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा है। उनकी अपनी सरकार के कुछ लोग भी सवाल उठा रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इजरायल पर जंग रोकने का दबाव बनाया है और कई मामलों में इजरायल को वाशिंगटन की शर्तें माननी पड़ी हैं। लेकिन नेतन्याहू का दावा है कि ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम इजरायल के लिए तत्काल खतरा था और अमेरिका के साथ मिलकर उसे खत्म कर दिया गया। उन्होंने कहा कि हमने इजरायल के इतिहास का सबसे बड़ा सैन्य अभियान चलाया। इसके बाद उन्होंने अपनी उपलब्धियां गिनाई। 

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अमेरिका और ईरान के बीच समझौते के बाद मध्य पूर्व की राजनीति में नए समीकरण बन रहे हैं, लेकिन इस्राइल ने साफ संकेत दिया है कि वह अपनी सुरक्षा नीति में कोई नरमी नहीं बरतेगा। यरुशलम सेंटर फॉर सिक्योरिटी एंड फॉरेन अफेयर्स (JCFA) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सागिव स्टीनबर्ग ने कहा है कि इस्राइल हिज्बुल्लाह के खिलाफ अपनी सैन्य कार्रवाई जारी रखेगा और जरूरत पड़ने पर अमेरिका की सहमति के बिना भी ईरान पर हमला कर सकता है।

एएनआई से बातचीत में स्टीनबर्ग ने कहा कि इस्राइल की उत्तरी सीमा की सुरक्षा उसके लिए सर्वोच्च प्राथमिकता है। उन्होंने कहा, 'हमने देखा कि 7 अक्टूबर को क्या हुआ था। इस्राइल अब वही गलती दोबारा नहीं दोहरा सकता कि कोई भी हमारे नागरिकों की हत्या करे, उन्हें अगवा करने की कोशिश करे। हमारी सीमाओं पर कोई भी आतंकवादी संगठन मौजूद नहीं रह सकता जो किसी सुबह हमला कर दे और लोगों की हत्या या अपहरण कर ले। ऐसा दोबारा नहीं होने दिया जाएगा। स्टीनबर्ग के अनुसार, इस्राइल का मुख्य लक्ष्य उत्तरी क्षेत्र में शांति बहाल करना और हिज्बुल्लाह से पैदा होने वाले खतरे को पूरी तरह समाप्त करना है। उन्होंने कहा कि यदि कोई सुरक्षा खतरा सामने आता है तो इस्राइल कार्रवाई करेगा, भले ही अमेरिका उससे सहमत न हो।

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डील के 14 प्वाइंट्स

1. ईरान, लेबनान व अन्य मोचों पर युद्ध बंद।

2. अमेरिका की ओर से ईरान की संप्रभुता और आंतरिक मामलों में दखल नहीं देगा।

3. 30 दिन में अमेरिकी नाकाबंदी खत्म।

4. ईरानी क्षेत्र से अमेरिकी सेनाएं हटेंगी।

5. 30 दिन में होर्मुज को खोला जाएगा।

6. ईरानी तेल, पेट्रो केमिकल और अन्य निर्यातों से अमेरिकी प्रतिबंध हटाए जाएंगे।

7. ईरान का निर्यात पर पूर्ण अधिकार।

8. अमेरिका और उसके सहयोगी खाड़ी देश ईरान के पुनर्निर्माण पैकेज के लिए साढ़े 28 लाख करोड़ रुपए का पैकेज देंगे।

9. परमाणु मुद्दे और ईरान पर से पूर्ण प्रतिबंध हटाने के लिए 60 दिन की वार्ता अवधि (नेगोशिएशन पीरियड) होगी।

10. एनएनपीटी के तहत ईरान परमाणु बम नहीं बनाने का लिखित आश्वासन देगा।

11. वार्ता अवधि में अमेरिका सैन्य जमाव नहीं करेगा और न ही नए प्रतिबंध लगाएगा।

12. वार्ता की शुरुआत में ही अमेरिका ईरान की करीब 1.25 लाख करोड़ रुपए की संपत्ति को डीफ्रीज करेगा।

13. वार्ता की शर्तें लागू करने के लिए एक क्रियान्वयन समिति का गठन भी होगा।

14. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद फाइनल एग्रीमेंट की औपचारिक घोषणा करेगा।

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इजराइल, परमाणु मुद्दा, होर्मुज और मुआवजा अहम

इजराइल ईरान की बढ़ती ताकत को कुचलना चाहता है। लेबनान में ईरान समर्थक हिजबुल्ला और यमन में हूती विद्रोहियों पर हमले कर डील में बाधा पैदा करेगा। ईरान ने परमाणु मुद्दे पर फिलहाल अपने 460 किलो परिष्कृत यूरेनियम को सौंपने का ऐलान नहीं किया है। ईरान ओमान को साथ लेकर होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों से सर्विस टैक्स लेने पर अड़ा हुआ है। जबकि अमेरिका यहां पर टैक्स वसूली के विरुद्ध है। अमेरिका और खाड़ी के देश ईरान के पुनर्निर्माण के लिए 28 लाख करोड़ के पैकेज पर आसानी से राजी नहीं होंगे। सऊदी अरब और यूएई विरोध करेंगे।

भारत की 55% तेल, 90% LPG सप्लाई आसान

भारत की 55% तेल और 90% एलपीजी की सप्लाई होर्मुज से होती है। अब ये आसान होगी। डील के ऐलान के बाद होर्मुज से गुजरने वाला पहला गैस टैंकर 'दिशा' रहा। कतर से टैंकर भारत पहुंचेगा। खाड़ी देशों में 90 लाख भारतीय रहते हैं। भारत को आने वाले रेमिटेंस में से 55 अरब डॉलर खाड़ी देशों से ही आता है। ये कुल रेमिटेंस का लगभग 40% है। भारत का खाड़ी देशों को कृषि और खाद्य निर्यात 11.8 अरब डॉलर का है। इनमें से यूएई और सऊदी अरब को सर्वाधिक निर्यात होता है। बासमती, केले और अन्य फल कृषि अर्थव्यवस्था को संबल देंगे।

क्या डील का पालन होगा

इजरायल के रक्षा मंत्री इजरायल काट्ज ने कहा कि सेना लेबनान, सीरिया और गाजा के सुरक्षा क्षेत्रों में अनिश्चित समय तक बनी रहेगी। एक्सपर्ट का कहना है कि लेबनान इस समझौते की सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है। जब तक इजरायल सेना लेबनान में रहेगी, पूर्ण युद्धविराम संभव नहीं होगा। समझौते के बाद नेतन्याहू की आलोचना बढ़ गई है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि इजरायल अपने मुख्य उद्देश्यों को हासिल नहीं कर पाया। इसे नेतन्याहू की व्यक्तिगत हार के रूप में देखा जा रहा है। मध्य-वामपंथी डेमोक्रेट्स पार्टी के नेता याइर गोलान ने इसे कई वर्षों की असफलता का परिणाम बताया। 

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