Houthis से सीधे भिड़ने से पीछे हट गये America, Israel और Pakistan, मगर China ने हिम्मत दिखाते हुए संभाला मोर्चा

Houthis China
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हम आपको याद दिला दें कि सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये ने अगस्त में मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। समझौते में किसी एक सदस्य पर सशस्त्र हमला तीनों पर हमला माना गया है और सामूहिक प्रतिरोध तथा रक्षा सहयोग मजबूत करने की बात कही गई है।

हूतियों के हमले से परेशान सऊदी अरब ने मदद के लिए पाकिस्तान का दरवाजा खटखटाया, लेकिन पाकिस्तान ने सीधे यमन के युद्धक्षेत्र में उतरने से दूरी बनाए रखी। सऊदी अरब ने फिर अमेरिका से सैन्य मदद मांगी, मगर वाशिंगटन ने भी हूतियों के खिलाफ सीधे हमले से इंकार कर दिया। इसके बाद रियाद ने उस इजराइल की ओर भी रुख किया, जिसके साथ उसके औपचारिक राजनयिक संबंध तक नहीं हैं। वहां से खुफिया और सुरक्षा सहयोग मिला, लेकिन वह भी सऊदी अरब की जरूरत के मुताबिक निर्णायक सैन्य समाधान साबित नहीं हुआ। आखिरकार रियाद को चीन की ओर देखना पड़ा और यहीं से पश्चिम एशिया के शक्ति संतुलन की तस्वीर अचानक बदलती दिखाई दी। चीन ने सीधे हूतियों पर हमला करने की बजाय उनके सबसे महत्वपूर्ण समर्थक ईरान पर दबाव डालने का रास्ता चुना है।

हम आपको याद दिला दें कि सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये ने अगस्त में मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। समझौते में किसी एक सदस्य पर सशस्त्र हमला तीनों पर हमला माना गया है और सामूहिक प्रतिरोध तथा रक्षा सहयोग मजबूत करने की बात कही गई है। लेकिन हूतियों के खिलाफ यमन में सीधे सैन्य अभियान के सवाल पर पाकिस्तान ने पलटी मार ली। यानी कागज पर सामूहिक सुरक्षा की भाषा जितनी मजबूत है, युद्ध के मैदान में उसकी व्यावहारिक सीमा उतनी ही स्पष्ट दिखाई दे रही है।

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वहीं सऊदी अरब की अगली उम्मीद अमेरिका से थी। रियाद ने सीधे अमेरिकी सैन्य समर्थन की मांग की, लेकिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने हूतियों के खिलाफ सऊदी अभियान में सीधे अमेरिकी हमलों की मंजूरी नहीं दी। वाशिंगटन ने खुफिया और लक्ष्य संबंधी सहयोग तक अपनी भूमिका सीमित रखी। यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सऊदी अरब और अमेरिका के बीच सात दशकों से ज्यादा पुराना सुरक्षा-सहयोग ढांचा है। वर्ष 1951 के पारस्परिक रक्षा सहायता समझौते से शुरू हुआ यह रिश्ता बाद में हथियारों की आपूर्ति, सैन्य प्रशिक्षण, वायु और मिसाइल रक्षा तथा व्यापक सुरक्षा सहयोग में बदल गया। अमेरिका खुद सऊदी अरब को दशकों से क्षेत्रीय सुरक्षा साझेदार और अपने सबसे बड़े रक्षा उपकरण खरीदारों में एक बताता रहा है।

यही वजह है कि आज सऊदी अरब को हूतियों के हमलों के बीच अकेले जूझते देख उन तमाम देशों में भी बेचैनी पैदा हो गयी है, जिन्होंने लंबे समय से अमेरिकी सुरक्षा छतरी पर भरोसा करते हुए अपनी स्वतंत्र सैन्य क्षमता को उसी अनुपात में विकसित नहीं किया। खाड़ी और पश्चिम एशिया के वे देश, जो अमेरिकी सुरक्षा साझेदारी को बाहरी खतरों से बचाव की महत्वपूर्ण गारंटी मानते रहे हैं, अब यह सवाल पूछने पर मजबूर हैं कि संकट की घड़ी में अमेरिकी सुरक्षा प्रतिबद्धता की वास्तविक सीमा आखिर कितनी है। सऊदी अरब के मामले ने इस बहस को और तीखा कर दिया है। देखा जाये तो यदि इतना पुराना और गहरा सुरक्षा साझेदार भी सीधे सैन्य समर्थन के लिए वाशिंगटन की ओर देखता रह जाए, तो अमेरिकी सुरक्षा आश्वासनों पर निर्भर दूसरे देशों के रणनीतिक गणित पर इसका असर पड़ना तय है।

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे असहज करने वाला पहलू यह है कि वाशिंगटन ने अपने लिए सुरक्षा का रास्ता निकालने में हूतियों से गोपनीय बातचीत करने में भी संकोच नहीं किया। ओमान की राजधानी मस्कट में अमेरिकी अधिकारियों और हूती प्रतिनिधियों के बीच गुप्त बैठक हुई। सूत्रों के अनुसार हूतियों ने अमेरिकी जहाजों को निशाना नहीं बनाने और वर्ष 2025 के युद्धविराम के प्रति प्रतिबद्ध रहने का आश्वासन दिया। इसके बाद अमेरिका ने सऊदी अरब के लिए सीधे युद्ध में उतरने से दूरी बनाए रखी।

इस घटनाक्रम ने सऊदी अरब के सामने एक बेहद कठोर रणनीतिक सवाल खड़ा कर दिया है कि जिस अमेरिका के साथ उसने दशकों तक सुरक्षा साझेदारी बनाई, उसी अमेरिका ने अपने हितों की रक्षा के लिए हूतियों से संवाद का रास्ता खोल लिया, लेकिन सऊदी अरब की तत्काल सैन्य सहायता की मांग पर प्रत्यक्ष युद्ध में उतरने से इंकार कर दिया। यही वह कारण है जहां अमेरिकी सुरक्षा छतरी पर भरोसा करने वाले दूसरे देशों की चिंताएं भी गहरी होती हैं।

इसके अलावा, जब पारंपरिक सहयोगियों से अपेक्षित सैन्य समर्थन नहीं मिला तो सऊदी अरब ने अप्रत्याशित कदम उठाया। अमेरिकी मध्य कमान के माध्यम से सऊदी अरब और इजराइल के बीच संपर्क स्थापित हुआ। इजराइल से मुख्य रूप से हूतियों की सैन्य तैनाती, संभावित हमलों और महत्वपूर्ण ठिकानों से संबंधित खुफिया सहायता पर चर्चा हुई। इजराइली पक्ष से सऊदी बुनियादी ढांचे और रणनीतिक ठिकानों की रक्षा के लिए खुफिया तथा वायु रक्षा क्षमताओं से संबंधित सहायता की संभावना भी सामने आई है। लेकिन यह सहायता प्रत्यक्ष इजराइली सैन्य हस्तक्षेप में नहीं बदली। यानी रियाद को यहां भी वह सैन्य समाधान नहीं मिला जिसकी उसे हूतियों की तेजी से बढ़ती पकड़ के सामने जरूरत थी।

यहीं चीन की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। हूतियों ने लाल सागर के तट और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य के आसपास तेजी से बढ़त बनाई है। यह सऊदी तेल निर्यात और समुद्री परिवहन के लिए गंभीर खतरा है। इसी पृष्ठभूमि में सऊदी अरब ने चीन से हस्तक्षेप की अपील की। चीन ने सार्वजनिक रूप से संयम, बातचीत और सुरक्षित नौवहन की बहाली की मांग की, लेकिन पर्दे के पीछे उसका संदेश कहीं ज्यादा सीधा था। चीन ने तेहरान से कहा है कि वह हूतियों पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल करे और उन्हें नियंत्रित करे, ताकि संघर्ष लाल सागर तथा ऊर्जा मार्गों में और न फैले। चीन ने हूतियों को रोकने के लिए अपनी सबसे बड़ी ताकत यानि आर्थिक और कूटनीतिक पकड़ का इस्तेमाल किया है।

हम आपको बता दें कि चीन एक दशक से अधिक समय से ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और ईरानी तेल का सबसे महत्वपूर्ण खरीदार भी है। 2025 में ईरान के समुद्री रास्ते से होने वाले तेल निर्यात का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा चीन ने खरीदा था। यही आर्थिक रिश्ता बीजिंग को तेहरान पर प्रभाव डालने की क्षमता देता है। इसके अलावा 2023 में चीन ने सऊदी अरब और ईरान के बीच संबंध बहाल कराने में मध्यस्थ की भूमिका भी निभाई थी। इसलिए बीजिंग के पास दोनों पक्षों से संवाद का वह चैनल मौजूद है जो अमेरिका के पास नहीं है।

देखा जाये तो इस पूरे संकट का सबसे बड़ा सामरिक पहलू केवल सऊदी अरब की सुरक्षा नहीं है। मामला दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार की सुरक्षा तक पहुंच चुका है। एक तरफ होरमुज जलडमरूमध्य पर तनाव है और दूसरी तरफ हूतियों की बढ़ती पकड़ बाब-अल-मंदेब पर दबाव बना रही है। यदि दोनों प्रमुख समुद्री मार्ग लंबे समय तक बाधित होते हैं तो तेल, गैस और वैश्विक समुद्री व्यापार पर एक साथ दबाव पड़ सकता है। यही चीन की सबसे बड़ी चिंता है। चीन की अर्थव्यवस्था ऊर्जा आयात पर निर्भर है और खाड़ी क्षेत्र उसके लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसलिए बीजिंग के लिए हूती संकट अब केवल सऊदी अरब या यमन का मामला नहीं रहा।

बहरहाल, सऊदी अरब के सामने अब केवल हूतियों की चुनौती नहीं है, बल्कि उसके पारंपरिक सुरक्षा साझेदारों की सीमाएं भी उजागर हो गई हैं। पाकिस्तान समझौते की भाषा तक सीमित है, अमेरिका प्रत्यक्ष युद्ध से पीछे है, इजराइल की मदद फिलहाल खुफिया और रक्षा सहयोग तक सीमित है और चीन पहली बार इस संकट में निर्णायक मध्यस्थ की भूमिका आजमा रहा है। अगर बीजिंग ईरान के जरिए हूतियों पर वास्तविक दबाव डालने में सफल होता है, तो पश्चिम एशिया में शक्ति के खेल का एक नया अध्याय खुल सकता है। अगर वह भी असफल होता है, तो लाल सागर और बाब-अल-मंदेब का संकट केवल सऊदी अरब का संकट नहीं रहेगा, यह वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए बहुत बड़ी चुनौती बन सकता है।

-नीरज कुमार दुबे

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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