ममता बनर्जी की राजनीति खत्म या पिक्चर अभी बाकी है? Operation Crown Prince ने कैसे मचाया भूचाल?

Mamata Banerjee
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हम आपको याद दिला दें कि तृणमूल कांग्रेस की स्थापना ममता बनर्जी ने 1998 में कांग्रेस से अलग होकर की थी। इसके बाद उन्होंने वाम मोर्चे के लंबे शासन के खिलाफ जन आंदोलन खड़ा किया और 2011 में ऐतिहासिक जीत हासिल कर बंगाल की सत्ता पर कब्जा जमाया।

पश्चिम बंगाल की राजनीति में पिछले कुछ सप्ताहों के भीतर जिस तेजी से घटनाक्रम बदला है, उसने तृणमूल कांग्रेस और उसकी संस्थापक ममता बनर्जी के राजनीतिक भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कभी बंगाल की राजनीति पर मजबूत पकड़ रखने वाली तृणमूल कांग्रेस आज अपने सबसे बड़े संकट से गुजर रही है। विधानसभा चुनाव में भाजपा के हाथों मिली करारी हार के बाद पार्टी के भीतर लंबे समय से सुलग रहा असंतोष अब खुली बगावत में बदल चुका है। महज 13 दिनों के भीतर घटनाओं की ऐसी श्रृंखला सामने आई, जिसने 28 वर्ष पुरानी पार्टी को विभाजन की कगार पर पहुंचा दिया।

हम आपको याद दिला दें कि तृणमूल कांग्रेस की स्थापना ममता बनर्जी ने 1998 में कांग्रेस से अलग होकर की थी। इसके बाद उन्होंने वाम मोर्चे के लंबे शासन के खिलाफ जन आंदोलन खड़ा किया और 2011 में ऐतिहासिक जीत हासिल कर बंगाल की सत्ता पर कब्जा जमाया। 2016 और 2021 के चुनावों में भी पार्टी ने शानदार प्रदर्शन किया। लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के हाथों मिली हार ने पार्टी की राजनीतिक जमीन हिला दी। सबसे बड़ा झटका यह था कि ममता बनर्जी को अपने पारंपरिक गढ़ भवानीपुर में शुभेंदु अधिकारी के खिलाफ हार का सामना करना पड़ा। इसके साथ ही विधानसभा में टीएमसी की संख्या घटकर केवल 80 विधायकों तक सिमट गई।

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चुनावी हार के बाद ही पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर असंतोष बढ़ने लगा था। कई विधायकों को लगने लगा कि संगठन और निर्णय प्रक्रिया में सांसद अभिषेक बनर्जी का प्रभाव लगातार बढ रहा है। पार्टी के भीतर यह धारणा मजबूत होने लगी कि तृणमूल का केंद्र धीरे-धीरे एक परिवार तक सीमित होता जा रहा है। छह मई को नवनिर्वाचित विधायकों की बैठक में ममता बनर्जी द्वारा अभिषेक बनर्जी के लिए खड़े होकर तालियां बजाने का आग्रह इस असंतोष को और बढ़ाने वाला साबित हुआ।

पार्टी में मतभेद पहली बार खुलकर 19 मई को सामने आए, जब रिताब्रता बनर्जी और संदीपन साहा ने पार्टी नेतृत्व पर सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि चुनाव से हटने की घोषणा करने वाले विधायक जहांगीर खान के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की गई? चूंकि जहांगीर को अभिषेक बनर्जी का करीबी माना जाता था, इसलिए इसे सीधे तौर पर अभिषेक के प्रभाव को चुनौती माना गया। इसके बाद घटनाओं ने तेजी पकड़ ली। 22 मई को दिल्ली के बंग भवन में रिताब्रता बनर्जी और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की कथित मुलाकात ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी। रिताब्रता ने बाद में विपक्षी नेताओं को प्रशासनिक बैठकों में बुलाने के शुभेंदु अधिकारी के फैसले की सार्वजनिक सराहना की। इसके बाद तृणमूल के भीतर संदेह और गहरा गया।

25 मई को विवाद ने नया मोड़ लिया, जब विधायक दल के नेतृत्व से जुड़े दस्तावेजों पर जाली हस्ताक्षर किए जाने के आरोप सामने आए। रिताब्रता बनर्जी और संदीपन साहा ने विधानसभा अध्यक्ष से इसकी औपचारिक शिकायत की। मामला पुलिस और सीआईडी जांच तक पहुंच गया। इसके साथ ही पार्टी के भीतर का असंतोष खुली राजनीतिक लड़ाई में बदल गया। स्थिति तब और गंभीर हो गई जब 30 मई को अभिषेक बनर्जी पर सोनारपुर में हमला हुआ। हालांकि सभी दलों ने इसकी निंदा की, लेकिन तृणमूल के भीतर अपेक्षित एकजुटता दिखाई नहीं दी। इससे साफ संकेत मिला कि नेतृत्व और विधायकों के एक हिस्से के बीच दूरी बढ़ चुकी है।

31 मई को ममता बनर्जी ने अपने कालीघाट आवास पर बैठक बुलाई, लेकिन उसमें कम उपस्थिति ने यह स्पष्ट कर दिया कि पार्टी पर उनकी पकड़ कमजोर पड़ रही है। आखिरकार एक जून को पार्टी ने रिताब्रता बनर्जी और संदीपन साहा को निष्कासित कर दिया। लेकिन यह कदम बगावत रोकने की बजाय उसे और तेज करने वाला साबित हुआ। बागी खेमे ने अपनी मुहिम को “ऑपरेशन क्राउन प्रिंस” नाम दिया, जिसे अभिषेक बनर्जी के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ अभियान के रूप में देखा गया।

बुधवार को यह संकट निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया, जब 58 विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष को पत्र सौंपकर रिताब्रता बनर्जी को विधायक दल का नेता चुनने की जानकारी दी। विधानसभा अध्यक्ष ने इस दावे को स्वीकार कर लिया। इसके साथ ही बागी गुट को तृणमूल कांग्रेस के आधिकारिक विधायक दल के रूप में मान्यता मिल गई। यह ममता बनर्जी के राजनीतिक जीवन की अब तक की सबसे बड़ी चुनौती मानी जा रही है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तृणमूल कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी उसका स्पष्ट वैचारिक आधार न होना रहा है। वाम विरोध की राजनीति ने पार्टी को सत्ता तक पहुंचाया, लेकिन सत्ता मिलने के बाद संगठनात्मक एकता कमजोर पड़ती गई। अब जब चुनावी हार ने पार्टी की शक्ति कम कर दी है, तो व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं और उत्तराधिकार की लड़ाई खुलकर सामने आ गई है।

फिर भी ममता बनर्जी को राजनीति से बाहर मान लेना जल्दबाजी होगी। बंगाल की राजनीति में उनका संघर्ष, जनाधार और राजनीतिक अनुभव अभी भी उन्हें एक मजबूत नेता बनाता है। लेकिन यह भी सच है कि तृणमूल कांग्रेस अब अपने इतिहास के सबसे कठिन दौर से गुजर रही है और आने वाले समय में यह तय होगा कि पार्टी इस संकट से उबर पाएगी या बंगाल की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत होगी।

-नीरज कुमार दुबे

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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