इंडिया गठबंधन में सीट बंटवारे की राह में बड़ी बाधा बन गयी प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी

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महाराष्ट्र के कांग्रेस नेताओं का कहना था कि शरद पवार की एनसीपी और उद्धव ठाकरे की शिवसेना में बगावत होने के बाद कांग्रेस ही राज्य में सबसे पुरानी पार्टी बची है। पूर्व मुख्यमंत्री और महाराष्ट्र कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अशोक चव्हाण ने कहा कि पार्टियों के बीच समायोजन की जरूरत है।

विपक्षी गठबंधन इंडिया की चार बैठकों के बावजूद सीटों के तालमेल और प्रधानमंत्री पद की दावेदारी का मुद्दा उलझने से लोकसभा चुनाव में भाजपा से मजबूती से संयुक्त रूप से मुकाबला करने पर संशय बना हुआ है। गठबंधन के दल अपनी सुविधा के हिसाब से चुनावी गणित लगा रहे हैं। क्षेत्रीय दल राज्यों के हिसाब से सीटों की दावेदारी जता रहे हैं। कोई भी दल यह नहीं चाहता कि उसके प्रभाव वाले राज्य में कांग्रेस या अन्य दलों से सीटों की शेयरिंग की जाए। यही कारण है कि विपक्षी एकता पर अभी तक सवालिया निशान लगे हुए हैं। इंडिया गठबंधन की बैठक में शिवसेना ने 23 सीटों पर अपना दावा किया। उद्धव गुट ने कहा कि पिछले लोकसभा चुनाव में उनके उम्मीदवारों ने काफी सीटें जीतीं थीं लेकिन अभी ज्यादातर उम्मीदवार एकनाथ शिंदे कैंप में जा चुके हैं। कांग्रेस ने अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए महाराष्ट्र में 23 सीटों की सहयोगी शिवसेना (यूबीटी) की मांग को खारिज कर दिया।

महाराष्ट्र के कांग्रेस नेताओं का कहना था कि शरद पवार की एनसीपी और उद्धव ठाकरे की शिवसेना में बगावत होने के बाद कांग्रेस ही राज्य में सबसे पुरानी पार्टी बची है। पूर्व मुख्यमंत्री और महाराष्ट्र कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अशोक चव्हाण ने कहा कि पार्टियों के बीच समायोजन की जरूरत है। उन्होंने कहा कि हालांकि हर पार्टी सीटों की बड़ी हिस्सेदारी चाहती है, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए शिवसेना की 23 सीटों की मांग काफी ज्यादा है। कांग्रेस नेता संजय निरुपम ने उद्धव ठाकरे की यूबीटी की 23 संसदीय सीटों की मांग पर तंज कसते हुए कहा कि शिवसेना 23 सीटों की मांग कर सकती है, लेकिन वे उनका क्या करेंगे? शिवसेना के नेता चले गए हैं, जिससे संकट पैदा हो गया है। उम्मीदवारों की कमी शिवसेना के लिए एक समस्या है। वर्ष 2019 में अविभाजित शिवसेना बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन का हिस्सा थी। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली पार्टी अब एमवीए का हिस्सा है, जिसमें कांग्रेस और एनसीपी शामिल हैं। जून 2022 में एकनाथ शिंदे और 40 अन्य विधायकों ने शिवसेना नेतृत्व के खिलाफ विद्रोह कर दिया था, जिससे पार्टी में विभाजन हो गया और उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली महा विकास अघाड़ी (एमवीए) सरकार गिर गई। इसके बाद शिंदे ने राज्य में सरकार बनाने के लिए बीजेपी से हाथ मिला लिया।

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इंडिया गठबंधन में सीट शेयरिंग का इंतजार किए बगैर ही समाजवादी पार्टी भी उत्तर प्रदेश में इलेक्शन की तैयारी कर रही है। सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इंडिया गठबंधन की जीत को लेकर बड़ा दावा कर दिया। अखिलेश यादव के मुताबिक अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन उत्तर प्रदेश की सभी 80 सीटों पर जीत दर्ज करेगा। उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी लोकसभा चुनाव की तैयारी में जुटी हुई है। इंडिया गठबंधन उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटें जीतेगा। पूर्व सीएम ने ये भी कहा कि 80 सीटें जीतकर बीजेपी को सत्ता से बाहर करना है। सपा अध्यक्ष के बयान से जाहिर है कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लिए कोई स्थान नहीं बचा है। अर्थात कांग्रेस को अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश से बाहर का रास्ता दिखा दिया है। हालांकि कांग्रेस ने अभी तक इस पर कोई प्रतिक्रिया जाहिर नहीं की है। लेकिन यह निश्चित है कि अखिलेश यादव आसानी से कांग्रेस से सीट शेयरिंग करने को तैयार नहीं होंगे। दरअसल कांग्रेस नहीं चाहती कि बैठक में कोई ठोस निर्णय से पहले किसी तरह की जल्दबाजी करे। ऐसे में विपक्ष की एकता के बिखराव का ठीकरा कांग्रेस के सिर फूटेगा। इसी से कांग्रेस फिलहाल बचना चाहती है। सीट शेयरिंग का मुद्दा इंडिया गठबंधन के लिए सुलझाना आसान नहीं है।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) अध्यक्ष ममता बनर्जी ने इंडिया गठबंधन को लेकर कहा कि इंडिया गठबंधन देशभर में बीजेपी से मुकाबला करेगा। बंगाल में इस लड़ाई का नेतृत्व टीएमसी करेगी। इससे जाहिर है कि ममता ने कांग्रेस को साफ संदेश दे दिया है कि पश्चिम बंगाल में सीट शेयरिंग का मुगालता नहीं पाले। इस पर भी कांग्रेस की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। कांग्रेस के लिए बिहार में भी सीट शेयरिंग के दरवाजे आसानी से खुलने की संभावना नहीं है। ममता और अखिलेश की तरह बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार भी इस बात के समर्थक रहे हैं कि जिन राज्यों में जिन दलों का प्रभाव है, अर्थात पिछले लोकसभा चुनाव में जिस दल की सीटें जितनी हैं, उस हिसाब से सीट शेयरिंग की जाए। ऐसे में बिहार में कांग्रेस के लिए तालमेल बिठाना मुश्किल है। कमोबेश यही स्थिति अरविन्द केजरीवाल की पार्टी आप की है। केजरीवाल भी कांग्रेस को दिल्ली और पंजाब से बाहर रखना चाहते हैं। केजरीवाल की पार्टी के अन्य नेता इस बात के संकेत दे चुके हैं, यदि समझौता हुआ भी तो कांग्रेस के हिस्से में नाममात्र की सीटे ही आएंगी। सीट शेयरिंग की तरह ही प्रधानमंत्री पद का मुद्दा भी विपक्षी एकता की कवायद को आगे बढ़ाने में मुश्किल पैदा कर रहा है। हालांकि यह मुद्दा तुलनात्मक रूप से फिलहाल इतना बड़ा नहीं है। दिल्ली में हुई बैठक में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और ममता बनर्जी द्वारा कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए प्रस्तावित करने पर यह मुद्दा गरमा गया। हालांकि खरगे ने प्रधानमंत्री पद का दावेदार होने से इंकार कर दिया। खरगे ने प्रधानमंत्री पद के चेहरे के मुद्दे को ठंडे बस्ते में रखने की इच्छा व्यक्त की थी और इस बात पर जोर दिया था कि इंडिया गठबंधन को पहले पर्याप्त संख्या में लोकसभा सीटें जीतने की जरूरत है। ममता और केजरीवाल ने खरगे के नाम का दांव बड़ा सोच समझ कर चला। इससे राहुल गांधी के लिए परेशानी बढ़ सकती है।

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के अध्यक्ष शरद पवार ने कहा कि 1977 का लोकसभा चुनाव विपक्ष ने मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए बिना लड़ा था। पवार ने यह भी भरोसा जताया कि अगले आम चुनाव के लिए 'इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इन्क्लूसिव अलायंस (इंडिया) एक व्यवहार्य विकल्प के रूप में उभरेगा। उन्होंने कहा कि 1977 का लोकसभा चुनाव विपक्ष ने बिना प्रधानमंत्री पद का चेहरा पेश किए लड़ा था। चुनाव में विपक्ष की जीत के बाद मोरारजी देसाई को इस पद के लिए चुना गया। पवार ने कहा कि राज्यों में हाल के विधानसभा चुनावों में खराब नतीजों के बावजूद हमें विश्वास है कि लोग इंडिया गठबंधन को एक व्यवहार्य विकल्प के रूप में स्वीकार करेंगे। हम सभी एहतियात बरत रहे हैं। अभी तक सीट-बंटवारे पर कोई बातचीत नहीं हुई है। लेकिन सर्वसम्मति बनाने और मतभेदों को सुलझाने के लिए बातचीत शुरू हो गई है।

प्रधानमंत्री पद की दावेदारी के बीच इस बात के कयास लगाए गए कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार खरगे का नाम आगे बढ़ाए जाने से नाराज हैं। नीतीश कुमार ने उन अटकलों को खारिज कर दिया कि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनाने का सुझाव और उन्हें गठबंधन का संयोजक नहीं बनाए जाने के कारण उन्हें मायूसी हुई और वे इसको लेकर नाराज हैं। खरगे का नाम प्रस्तावित किए जाने के बारे में उन्होंने कहा कि बैठक में मुद्दा (एक नेता के नाम का) आया। मैंने शुरू में ही स्पष्ट कर दिया था कि हमारी अपनी कोई इच्छा नहीं है। सब लोग साथ मिलकर चलें यही हम चाहते हैं। फिर एक और नाम प्रस्तावित किया गया, मैंने कहा कि यह ठीक है। यह बात दीगर है कि नीतिश की पार्टी के कई नेता उनका नाम प्रधानमंत्री पद के लिए बता चुके हैं। इंडिया गठबंधन की चार बैठकों के बावजूद सीट शेयरिंग को लेकर कोई नतीजा नहीं निकलने से इस बात के साफ संकेत हैं कि यह मुद्दा बोतल के जिन्न की तरह है, जिसके निकलते ही दल की एकता के भंग होने का खतरा है। सभी दल अपनी ताकत बढ़ाने के लिए दूसरे दलों से सीट शेयरिंग के लिए आसानी से तैयार नहीं होंगे। इसमें सबसे ज्यादा फजीहत कांग्रेस की होनी तय है। कांग्रेस को कोई भी दल सीट नहीं देना चाहता। कांग्रेस को सीट देनी भी पड़े तो नाममात्र की सीटों पर ही टरकाया जाएगा। इस बात की संभावना क्षीण है कि कांग्रेस क्षेत्रीय दलों के सीट शेयरिंग फार्मूले से सहमत होगी, ऐसे में प्रमुख राज्य कांग्रेस के हाथ से निकल जाएंगे, जिसे कांग्रेस कदापि नहीं चाहेगी। इसी वजह से गठबंधन की कवायद पर संशय के बादल मंडरा रहे हैं।

-योगेन्द्र योगी 

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