सिद्धू जी राजनीति लाफ्टर शो नहीं है, जरा अपने CM अमरिंदर सिंह से प्रेरणा लीजिये

सिद्धू जी राजनीति लाफ्टर शो नहीं है, जरा अपने CM अमरिंदर सिंह से प्रेरणा लीजिये

नवजोत सिंह सिद्धू भले अपनी शेरो शायरी से लोगों का दिल जीतते रहे हैं और ठोको ताली बोल बोल कर लोगों की तालियां बटोरते रहे हैं लेकिन उन्हें यह समझ होनी चाहिए कि शायरी और जुमलों से राजनीति नहीं चलती।

पंजाब सरकार के कैबिनेट मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू आखिरकार चाहते क्या हैं ? क्या उन्हें भारत से ज्यादा पाकिस्तान भाता है ? यह सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि भारत में जब करतारपुर साहिब कोरीडोर के लिए आधारशिला रखी जा रही थी तो उस कार्यक्रम से सिद्धू ने यह कह कर किनारा कर लिया कि वह राजनीति से धर्म को दूर रखते हैं। लेकिन वह पाकिस्तान में करतारपुर साहिब कोरीडोर के उद्घाटन समारोह में जाने के लिए आतुर हैं क्योंकि पाकिस्तान सरकार ने उन्हें न्योता भेजा है। क्या यह सवाल नहीं उठाया जाना चाहिए कि भारत सरकार के या फिर पंजाब सरकार के आयोजन से ज्यादा सिद्धू को पाकिस्तान सरकार का आयोजन क्यों भा रहा है ?

लाहौर में राफेल मुद्दा उठाने का क्या तुक ?

आयोजन में शामिल होना तक तो ठीक था लेकिन सिद्धू ने लाहौर पहुँच कर राफेल मामले को उठा दिया। अपने घरेलू मुद्दे वो भी रक्षा सौदे से संबंधित मुद्दे पाकिस्तान में उठाकर सिद्धू क्या देश से गद्दारी नहीं कर रहे हैं। लाहौर में मीडिया से बातचीत में उन्होंने पाकिस्तान सेनाध्यक्ष से गले मिलने की बात पर कहा कि मैं गले मिला था कोई राफेल डील नहीं की थी। उन्होंने कहा है कि जब दो पंजाबी मिलते हैं तो गले मिलते हैं और यह सामान्य बात है। उम्मीद है सिद्धू की इस गुस्ताखी को अमरिंदर सिंह गंभीरता से लेंगे ?


राजनीति कोई लाफ्टर शो नहीं

नवजोत सिंह सिद्धू भले अपनी शेरो शायरी से लोगों का दिल जीतते रहे हैं और ठोको ताली बोल बोल कर लोगों की तालियां बटोरते रहे हैं लेकिन उन्हें यह समझ होनी चाहिए कि शायरी और जुमलों से राजनीति नहीं चलती। यह हैरानी वाली बात है कि पंजाब सरकार के मुख्यमंत्री और सरकार के कैबिनेट मंत्री के बीच किसी विषय को लेकर इतना विरोधाभास है कि वह लगातार सुर्खियां बन रहा है। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने जहां पाकिस्तान सरकार के निमंत्रण को ठुकराते हुए उस देश को आतंकवादी करार दिया और आतंक बंद नहीं करने पर सबक सिखाने की सरेआम चेतावनी दी वहीं राज्य सरकार में कैबिनेट मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू अपने मुख्यमंत्री के रुख से इत्तेफाक नहीं रखते। उन्होंने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान को फरिश्ता करार दिया है। सिद्धू ने सिख श्रद्धालुओं की बहुप्रतीक्षित मांग को स्वीकार करने के लिए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को ‘‘फरिश्ता’’ करार दिया। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज सिद्धू को पिछले पाकिस्तान दौरे के दौरान बेफिजूल की बातें करने पर झिड़की भी लगा चुकी हैं।

सिद्धू को पाकिस्तान का आतंक नहीं दिखता

यह सही है कि सिखों की एक बड़ी माँग पूरी हुई है लेकिन सिद्धू को इतना ज्यादा आतुर होने की बजाय पाकिस्तान की पृष्ठभूमि पर भी ध्यान देना चाहिए। पाकिस्तान की हर पहल के पीछे कोई ना कोई साजिश भी होती है, एक तरफ वह पंजाब में आतंकवाद फैलाने की साजिश रच रहा है तो दूसरी ओर सिखों को खुश करने का भी दिखावा कर रहा है। संभव है पाकिस्तानी साजिश के और भी पहलू हों। हाल ही में अमृतसर में निरंकारी संत समागम के एक कार्यक्रम में हुए ग्रेनेड हमले के पीछे पाकिस्तान का ही हाथ होने की बात सामने आयी थी। पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह जोकि पूर्व फौजी भी हैं, ने करतारपुर साहिब कोरीडोर के लिए आधारशिला रखने के कार्यक्रम के दौरान पाकिस्तान को भारत के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियां रोकने की चेतावनी देते हुए काफी खरी-खरी सुनाई है। पाकिस्तान नहीं जाने के अपने निर्णय का बचाव करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा है कि पंजाब 20 वर्षों से आतंकवाद से पीड़ित है और आज भी भुगत रहा है... इसलिए हिंसा रूकने तक मैं पाकिस्तान नहीं जाऊंगा। मेरा दिल वहां जाने के लिए कहता है लेकिन मैंने अपने लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की प्रतिबद्धता जताई है।

सिद्धू का रिमोट कंट्रोल किसके पास है ?

यहाँ पंजाब के मुख्यमंत्री के रुख की तारीफ करनी होगी। वाकई उन्होंने एक फौजी और एक प्रतिबद्ध मुख्यमंत्री का जो रुख होना चाहिए, वही रुख दिखाया है। लेकिन उन्हें अपनी सरकार के मंत्री सिद्धू पर लगाम भी लगानी चाहिए क्योंकि ऐसा लग रहा है कि नवजोत सिंह सिद्धू कहीं और से आदेश ले रहे हैं और अमरिंदर सिंह से ऊपर हो गये हैं। सिद्धू की इस बयानबाजी के पीछे पंजाब कांग्रेस और पार्टी आलाकमान के उस गुट का भी हाथ हो सकता है जोकि अमरिंदर सिंह को पसंद नहीं करता लेकिन उनके पास अमरिंदर सिंह का कोई विकल्प भी नहीं है। इसलिए सिद्धू के जरिये जहां अमरिंदर को नीचा दिखाया जा रहा है वहीं सिद्धू को आगे की 'जिम्मेदारी' के लिए तैयार भी किया जा रहा है। सिद्धू जिस तरह कहते हैं कि हम हैं- 'राहुल भाई के रक्षक'। उससे साफ है कि वह पार्टी आलाकमान के करीब हैं इसलिए उन पर कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है।

भाजपा भी मौका देख चौका मारने में जुटी

अब सिद्धू और अमरिंदर सिंह में मतभेद हैं, यह कोई छिपी बात तो रही नहीं इसलिए भाजपा ने भी खेल खेलना शुरू कर दिया है। पार्टी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने नवजोत सिंह सिद्धू से कहा है कि पाकिस्तान जाने की अनुमति जो उन्होंने विदेश मंत्रालय से मांगी है उसे वह मुख्यमंत्री के मार्फत भिजवाएं। केंद्र सरकार जानती है कि सिद्धू पहले तो ऐसा करेंगे नहीं और अगर करेंगे तो अमरिंदर सिंह भी धर्मसंकट में फंसेंगे कि अनुमति के लिए उनका आग्रह केंद्र सरकार को प्रेषित किया जाये या नहीं।

बहरहाल, अब सिद्धू या कोई अन्य यदि पाकिस्तान सरकार के कार्यक्रम में भारत सरकार के मंत्रियों के जाने पर सवाल उठा रहा है तो उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि पाकिस्तान की किसी भी ऐसी पहल का जोकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी खबर हो उसका भारत की तरफ से भी सकारात्मक जवाब आना जरूरी होता है। चूँकि मामला धर्म से जुड़ा हुआ है इसलिए भी भारत सरकार ने नरम रुख दिखाते हुए सिख धर्म से संबंधित दो मंत्रियों- हरसिमरत कौर बादल और हरदीप सिंह पुरी को वहां भेजने का निर्णय लिया है। लेकिन भारत का पाकिस्तान के प्रति क्या रुख है यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह कह कर साफ कर दिया है कि हम मुंबई हमला मामले को भूले नहीं हैं और मौके की ताक में हैं। भारत सरकार के मंत्रियों के जाने की आलोचना तब करनी चाहिए थी जब विदेश मंत्री पाकिस्तान जातीं। 

-नीरज कुमार दुबे