चीन-रूस जैसे मित्र देशों ने छोड़ा साथ, मुस्लिम उम्माह के नाम पर भी नहीं बनी बात, अकेला महाशक्तियों से लड़ता-मरता ईरान इतिहास में अपना नाम दर्ज करा जाएगा?

ईरान के सुप्रीम लीडर का मारे जाना ईरान के लिए एक ऐसी क्षति समझी जा सकती है जिसकी भरपाई नहीं हो सकती है। ईरान पर यह हमला पिछले हमले की तरह ही धोखा देकर किया गया है। ईरान को अमेरिका ने बातचीत में उलझाया और अचानक इजराइल के साथ मिलकर हमला कर दिया।
ईरान में अमेरिका और इजराइली हमलों ने बुरी तरह तबाही मचाई है। शनिवार यानी कि 28 फरवरी को हुए हमलों में ईरान के सुप्रीम लीडर समेत कई बड़े ऑफिशियल के मारे जाने की खबर सामने आ गई। ईरान ने भी जवाबी हमले किए हैं। लेकिन ईरान के सुप्रीम लीडर का मारे जाना ईरान के लिए एक ऐसी क्षति समझी जा सकती है जिसकी भरपाई नहीं हो सकती है। ईरान पर यह हमला पिछले हमले की तरह ही धोखा देकर किया गया है। ईरान को अमेरिका ने बातचीत में उलझाया और अचानक इजराइल के साथ मिलकर हमला कर दिया। अब सवाल आता है कि क्या ईरान के दोस्त देशों ने भी उसका साथ छोड़ दिया और उसे अकेले ही अमेरिका ईरान से लड़ना पड़ेगा? ईरान के कई सारे दुश्मन हैं। लेकिन आखिरकार ईरान का दोस्त कौन है? इजराइल और अमेरिका के युद्ध में आखिरकार किस देश ने ईरान का साथ दिया? बता दें अमेरिकी प्रतिबंधों की वजह से ईरान दुनिया से अलग-थलग ही रहा है। लेकिन उसके टॉप दोस्तों में रूस चीन को गिना जाता है। हालांकि सुप्रीम लीडर पर होने वाले हमले के लिए आगाह या बचाव यह दो देश भी नहीं कर पाए।
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ईरान की ज्योग्राफी
ईरान के उत्तर में अज़रबैजान, आर्मेनिया, तुर्कमेनिस्तान और कैस्पियन सागर स्थित हैं। इसके पूर्व में पाकिस्तान और अफगानिस्तान हैं; दक्षिण में फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी हैं; और पश्चिम में तुर्की और इराक स्थित हैं।
ईरान के दो तरह के सहयोगी
हालिया तनाव के बाद से ईरान काफी कमजोर हुआ। ईरान के सहयोगी दो तरह के हैं। पहले क्षेत्र के कुछ मिलिशिया जैसे हिजबुल्ला, हूती, मिलिशिया, इराक आदि। वहीं वहीं देशों में चीन और रूस को ईरान का सहयोगी माना जाता है। साथ ही नॉर्थ कोरिया और वेनेजुएला भी ईरान के मित्र देशों की सूची में आते हैं। रूस और चीन की बात करें तो दोनों सहयोगी ने ईरान को अभी तक कोई सीधी सैन्य मदद नहीं दी है। दोनों देशों ने केवल कूटनीतिक स्तर पर ईरान का समर्थन किया है। जैसे कि हमलों की निंदा करना, तत्काल युद्ध विराम की मांग करना और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में चर्चा शुरू करवाना।
क्या किसी इस्लामिक देश ने ईरान का साथ दिया?
हमले से पहले जीसीसी मेंबर देशों ने साफ कहा था कि वह अपना एयर स्पेस ईरान पर हमला करने के लिए नहीं होने देंगे। लेकिन शनिवार को देखा गया कि अमेरिका और इजराइल ने अरेबियन सी के साथ-साथ जॉर्डन, इराक और सीरिया जैसे देशों का एयर स्पेस इस्तेमाल कर हमले किए हैं। वहीं सऊदी अरब, बहरीन और क़तर बेस पर भी अमेरिकी जहाजों की इक्विटी नोट की गई। इसके अलावा ओमान ने तनाव का कूटनीतिक समाधान करने की कोशिश की तो पर सफल नहीं हो पाया। मध्य पूर्व में ईरान का सऊदी अरब और यूएई से भी हाइड्रोलॉजिकल तौर पर तनाव रहा है।
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आतंकवाद और मादक पदार्थों के कारण ईरान-पाकिस्तान संबंधों में तनाव है
पाकिस्तान और ईरान की साझा 904 किलोमीटर की सीमा वाला क्षेत्र मादक पदार्थों की तस्करी और उग्रवाद का केंद्र है। यह बलूचिस्तान क्षेत्र है, जो दोनों देशों में फैला हुआ है और सांप्रदायिक मतभेदों और बलूची अलगाववादी गतिविधियों ने स्थिति को बदतर बना दिया है। अमेरिका और ईरान द्वारा नामित सुन्नी आतंकवादी समूह जैश अल-अदल का दक्षिणपूर्वी ईरान में आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देने का एक लंबा इतिहास है। संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रीय खुफिया निदेशक (डीएनआई) के अनुसार, आतंकवादी समूह 2013 से ईरान में नागरिकों और सरकारी अधिकारियों पर घात लगाकर हमला, हत्या, हमले, हिट-एंड-रन छापे, अपहरण में शामिल रहा है। अक्टूबर 2013 में समूह ने 14 ईरानी सीमा रक्षकों की हत्या कर दी। 2019 में इसने ईरान के अर्धसैनिक समूह, इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स पर आत्मघाती हमला किया, जिसमें 27 कर्मी मारे गए। उसी वर्ष उसने 14 ईरानी सुरक्षाकर्मियों का भी अपहरण कर लिया। यह कहने की जरूरत नहीं है कि दोनों देशों के बीच सुन्नी-शिया सांप्रदायिक विभाजन कड़वे रिश्ते के केंद्र में है। वर्तमान में पाकिस्तान के लिए ईरान के प्रतिद्वंद्वी सऊदी अरब के साथ अच्छे संबंध बेहद महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि रियाद इस्लामाबाद का एक प्रमुख वित्तीय दाता है। पाकिस्तान अमेरिका के साथ भी अच्छे संबंध बनाए रखने की कोशिश करता है, जिसमें उसे कभी सफलता मिलती है तो कभी नहीं। फिलहाल, पाकिस्तान को डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व वाली वाशिंगटन डीसी सरकार से दुर्लभ समर्थन मिल रहा है, और ईरान के प्रति किसी भी तरह का मुखर समर्थन करके वह इसे खतरे में नहीं डाल सकता।
ईरान के उत्तरी पड़ोसी
ईरान के सबसे मित्रवत पड़ोसी उत्तर में स्थित हैं, आर्मेनिया और तुर्कमेनिस्तान। अज़रबैजान में शिया आबादी काफी अधिक है, लेकिन ईरान में सत्ता में मौजूद शिया मौलवियों के अज़रबैजान के साथ संबंध अच्छे नहीं हैं। अज़रबैजान और आर्मेनिया नागोर्नो-काराबाख को लेकर लंबे समय से संघर्ष कर रहे हैं, जो अज़रबैजान का हिस्सा है लेकिन वहां जातीय अर्मेनियाई लोग रहते हैं। ईरान ने इस संघर्ष में हारने वाले पक्ष, आर्मेनिया का समर्थन किया है। तेहरान को यह भी संदेह है कि अज़रबैजान अपनी सीमाओं के भीतर अज़ेरी विद्रोह को भड़का रहा है और इज़राइल को ईरान पर जासूसी करने के लिए अपने क्षेत्र का उपयोग करने की अनुमति दे रहा है।
ईरान और अफगानिस्तान के संबंध
दोनों पड़ोसी देशों के बीच हेलमंद नदी के जल पर ईरान के अधिकार को लेकर लंबे समय से टकराव रहा है। सत्ता और शासन बदलता रहा, लेकिन विवाद ज्यों का त्यों चलता रहा। पहले तालिबान शासन के साथ तेहरान के संबंध तनावपूर्ण थे। 1998 में तो सुन्नी कट्टरपंथी तालिबान ने अफगानिस्तान के मजार-ए-शरीफ शहर में 10 ईरानी राजनयिकों और एक पत्रकार की हत्या कर दी थी। हालांकि, ईरान ने अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी का स्वागत किया था। लेकिन इसमें भी उसका खुद का स्वार्थ छिपा था क्योंकि एकदम नाक के नीचे बैठे अमेरिकी सैनिक उसके लिए रोज़ाना का खतरा थे। फिलहाल, तालिबान 2.0 और तेहरान सावधानीपूर्वक अपने संबंधों को आगे बढ़ा रहे हैं।
ईरान और तुर्की के संबंध
एक बार फिर, यह बेहद जटिल है। कभी महान रहे ओटोमन और फारसी साम्राज्य प्रतिद्वंद्वी थे, लेकिन वर्तमान ईरान और तुर्की यह मानते हैं कि किसी के पास दूसरे पर कोई महत्वपूर्ण सैन्य बढ़त नहीं है, और वे काफी हद तक व्यावहारिक रूप से शांतिपूर्ण बने रहे हैं। हालांकि, क्षेत्र में परोक्ष शक्तियों के निरंतर संघर्ष में, अंकारा और तेहरान खुद को विरोधी पक्षों में पाते हैं। उदाहरण के लिए, सीरिया में, ईरान ने बशर अल-असद शासन का समर्थन किया और तुर्की ने विद्रोहियों का। तुर्की अजरबैजान का सहयोगी भी है। रेसेप तैयप एर्दोगन के नेतृत्व में तुर्की इजरायल की बढ़ती ताकत और सामर्थ्य से घृणा करता है, लेकिन ईरान द्वारा परमाणु बम बनाने में असमर्थ होने से काफी हद तक खुश है।
ईरान और इराक के संबंध
इसे जटिल कहना भी कम होगा। ईरान में 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद मौजूदा शासन सत्ता में आया और इसके लगभग एक साल बाद ही इराक ने उस पर आक्रमण कर दिया। इस विनाशकारी युद्ध में लाखों लोग मारे गए। सद्दाम हुसैन के पतन के बाद से दोनों देशों के संबंधों को सामान्य बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं। इज़राइल के प्रति साझा नापसंदगी ने इसमें मदद की है, जबकि ईरान की गैर-सरकारी संगठनों को बढ़ावा देने की प्रवृत्ति इसके विपरीत रही है। ईरान इराक में अर्धसैनिक समूहों का समर्थन करता है, जिन्हें सामूहिक रूप से पॉपुलर मोबिलाइजेशन फोर्सेज कहा जाता है। इनमें कटाएब हिजबुल्लाह और असाइब अहल अल-हक जैसे संगठन शामिल हैं। ईरान को उम्मीद है कि हमले की स्थिति में ये संगठन उसकी मदद करेंगे। हालांकि, अतीत से सबक लेते हुए, ईरान इराक की आंतरिक राजनीति में खुले तौर पर हस्तक्षेप करने से बचता है।
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