माओवाद का खात्मा और साय सरकार की पुनर्वास नीति

इसी तरह झारकंड सरकार ने भी माओवादियों को समर्पण के लिए प्रोत्साहित करने के लिए 'आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति' बनाई। जिसके तहत समर्पण के बाद माओवादियों को आर्थिक सहायता दी जाती है। उनके कौशल विकास के कार्यक्रम चलाए जाते हैं और उन्हें रोजगार के साथ ही आवास की व्यवस्था की जाती है।
कभी देश के एक तिहाई हिस्से पर अपनी समानांतर सरकार चलाने वाली माओवादी विचारधारा का क्या आज अंत हो जाएगा? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हो चुका है, क्योंकि नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली केंद्रीय सरकार ने आज ही के दिन को माओवादी आतंकवाद का आखिरी दिन घोषित कर रखा है। ठीक एक हफ्ते पहले यानी 25 मार्च को बस्तर के मुख्यालय जगदलपुर में शीर्ष माओवादी नेता पापा राव के नेतृत्व में 18 माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया, तब कहा गया कि राव आखिरी महत्वपूर्ण नक्सली कमांडर हैं और उन्होंने भी हथियार सौंप दिए हैं।
2014 के आम चुनावों में बीजेपी ने अपने घोषणा पत्र में माओवाद पर लगाम का वादा किया था। तब झीरम घाटी कांड की याद ताजा थी, छत्तीसगढ़ कांग्रेस का तकरीबन समूचे शीर्ष नेतृत्व को माओवादियों ने घेरकर मार डाला था। वैसे खुद नक्सली भी मानते रहे हैं कि उनके लिए कांग्रेस और बीजेपी सरकारों में खास अंतर नहीं रहा। अलबत्ता कांग्रेस सरकार माओवादी हिंसा के खिलाफ सख्त कदम उठाने से बचती रही हैं, जिस तरह बीजेपी की अगुआई वाली सरकारें उठाती रही हैं। बस्तर में छह अप्रैल 2010 को बारूदी सुरंगों के जरिए केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के 76 जवानों को उड़ाने के बाद नक्सलियों के खिलाफ राष्ट्रव्यापी गुस्सा था। तत्कालीन मनमोहन सरकार ने माओवादियों के खिलाफ सैनिक कार्रवाई का मन बना लिया था, लेकिन सिविल सोसायटी के दबाव में यह विचार उसे छोड़ना पड़ा। लेकिन बीजेपी ने माओवादियों को कोई रियायत नहीं दी। 2019 में गृहमंत्रालय की कमान संभालने के बाद अमित शाह ने खुलेआम नक्सलियों को चेतावनी देनी शुरू कर दी कि या तो वे हथियार डालें या फिर गोली खाने के लिए तैयार रहें। इसके साथ ही उन्होंने 31 मार्च 2026 तक माओवादी हिंसा से देश को मुक्त करने का ऐलान कर दिया।
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जिस तरह शीर्ष नक्सली कमांडर या तो मारे गए हैं या फिर उन्होंने हथियार डाले हैं, उससे लगता है कि बीजेपी सरकार का अपना वादा पूरा करने जा रही है। माओवादी विचारधारा के प्रभाव में घर-परिवार, सुख-चैन छोड़कर जंगलों की खाक छानने और सत्ता से जूझने वाले माओवादी युवाओं को मुख्यधारा में लाने में सिर्फ केंद्रीय सुरक्षा बलों की गोलियों का दबाव ही काम नहीं आया, बल्कि इसमें राज्यों की पुनर्वास योजनाओं का भी बड़ा योगदान रहा है। छत्तीसगढ़ ने 2025-26 की अपनी पुनर्वास नीति में हिंसा छोड़ने वाले नक्सलियों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए कई कदम उठाए, जिनमें उसका 'पूना मारगेम' अभियान प्रमुख रहा। इन शब्दों का अर्थ है 'नया रास्ता’। इसके तहत दंडकारण्य क्षेत्र के सैकड़ों माओवादी कैडरों को मुख्यधारा में वापस लाने की सफल कोशिश हुई। इसके तहत नक्सलियों की वापसी के बाद उन्हें नई जिंदगी शुरू करने के लिए तत्काल डेढ़ लाख रूपए तक की आर्थिक सहायता दी गई, साथ ही उन्हें तीन साल के लिए मासिक वजीफा और व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जाना शुरू हुआ। मकसद यह रहा कि हथियार छोड़ने के बाद मुख्यधारा में लौटे माओवादी आत्मनिर्भर जिंदगी बिता सकें। छत्तीसगढ़ की विष्णुदेव साय सरकार ने हथियार सौंपने वाले माओवादियों को अलग से प्रोत्साहन राशि देने की भी व्यवस्था की। इससे राज्य में माओवादियों के समर्पण में तेजी आई। हथियार छोड़ने वाले माओवादियों के बच्चों की शिक्षा का इंतजाम किया गया, इसके साथ ही उन्हें सुरक्षित आवास भी मुहैया कराए गए। इसके साथ ही उन्हें वापसी के बाद भयमुक्त जीवन गुजारने के लिए परिवार की सुरक्षा की गारंटी भी दी गई।
इसी तरह झारकंड सरकार ने भी माओवादियों को समर्पण के लिए प्रोत्साहित करने के लिए 'आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति' बनाई। जिसके तहत समर्पण के बाद माओवादियों को आर्थिक सहायता दी जाती है। उनके कौशल विकास के कार्यक्रम चलाए जाते हैं और उन्हें रोजगार के साथ ही आवास की व्यवस्था की जाती है। साथ ही उन्हें और उनके परिवार को सुरक्षा की गारंटी दी जाती है। झारखंड की इस नीति का उद्देश्य समर्पित नक्सलियों को सम्मानजनक जीवन जीने के लिए आत्मनिर्भर बनाना है। इसके तहत हथियार जमा करने पर पूर्व नक्सलियों को प्रोत्साहन राशि, उन्हें तत्काल पुनर्वास अनुदान और घरेलू सामान के लिए नकद सहायता दी जाती है। साथ ही उनको कौशल प्रशिक्षण दिया जाता है, ताकि वे भविष्य में अपना रोजगार कर सकें। इसके साथ ही उनके बच्चों को मुफ्त शिक्षा व छात्रवृत्ति की सुविधा भी दी जाती है। उन्हें आवास के लिए भूमि या प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर भी दिए जाते हैं। इसी तरह मुख्यधारा में लौटे नक्सलियों को खेती के लिए प्राथमिकता के आधार पर सोलर पंप और बिजली कनेक्शन भी देने का इंतजाम है। पूर्व नक्सलियों पर चल रहे छोटे मामलों को झारखंड सरकार जहां वापस ले रही है, वहीं गंभीर मामलों में कानूनी सहायता मुहैया करा रही है। कुछ ऐसे ही इंतजाम पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में किए गए हैं।
कभी माओवादियों के डर से बस्तर में सड़कें तक बनाना संभव नहीं था, बिजली पहुंचाना भी कठिन था। झारखंड के भी दूरदराज के इलाके में ऐसा ही हाल था। लेकिन केंद्र सरकार की शह पर राज्य सरकार ने नक्सली हिंसा प्रभावित क्षेत्र में भी सड़क, स्कूल और अस्पतालों का निर्माण कराने में तेजी आई। बस्तर के कुछ इलाके में रेलवे लाइन भी पहुंच गई है। नक्सली इलाके में सड़कें भी बेहतर हो गई हैं। इन कदमों से माओवादी प्रभाव में रहने वाले इलाकों में भरोसा बहाली में मदद मिली। सरकारी योजनाओं के साथ ही सरकार के प्रति भी स्थानीय लोगों का रवैया बदला।
कभी पशुपति से तिरुपति यानी नेपाल से आंध्र तक का जंगली इलाका लाल गलियारे के रूप में विख्यात था। यहां सुरक्षा बलों के लिए भी घुसना आसान नहीं था। इसमें देश के तकरीबन एक तिहाई जिले आते थे। इन जिलों में माओवादी वैचारिकी के असर वाले हथियारबंद दस्तों की सत्ता चलती थी। माओवादी स्कूलों, रेलवे लाइनों, पुलिस थानों, डाकघरों को निशाना बनाते थे। साथ ही वे इलाके की जनता को यह समझाने में कामयाब रहे थे कि मौजूदा व्यवस्था और तंत्र सिर्फ और सिर्फ उनका शोषण ही कर रहा है। चूंकि विकास की धारा इन इलाकों में माओवादी हथियारबंद दस्तों के अवरोध के चलते बह नहीं पा रही थी, इसलिए अविश्वास का माहौल बढ़ता रहा। लेकिन मोदी सरकार ने सत्ता संभालते ही एक तरफ माओवादियों को उन्हीं की तर्ज में गोली का जवाब गोली से देना शुरू किया, वहीं दूसरी तरफ उनके पुनर्वास के साथ ही नक्सल प्रभावित इलाकों में विकास की धारा को भी बहाने की कोशिश तेज की। माओवादी कहते रहे हैं कि सत्ता की राह बंदूक की गोली से निकलती है, बारूद से निकलती है, मोदी सरकार ने कुछ उसी अंदाज में माओवादी सत्ता की राह को बंदूक और बारूद से रोका, लेकिन दूसरी तरफ पुनर्वास अभियान भी जारी रखा। इसमें राज्यों की भूमिका खास रही। चूंकि छत्तीसगढ़ और झारखंड नक्सली हिंसा से सबसे ज्यादा प्रभावित रहे हैं, इसलिए दोनों राज्यों ने इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। जिसका नतीजा सामने है।
कभी पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से शुरू हिंसक और माओवादी विचारधारा का असर देश के एक तिहाई हिस्से पर रहा। लेकिन अब यह विचारधारा और उसके हथियारबंद अनुयायी निस्तेज नजर आ रहे हैं। कह सकते हैं कि वामपंथ की तरह माओवादी विचारधारा भी भारत में कुंद हो गई। नक्सली हिंसा पर लगाम इस लगाम का ही प्रतीक है। वैसे यह भी सच है कि विचारधाराएं कभी नहीं मरतीं, एक विचारधारा के रूप में वह माओवाद भी जिंदा रह सकता है। लेकिन अब उसके उस तरह प्रतिबद्ध अनुयायी नहीं होंगे, उनकी गोलियों की आवाज और धमक भी नहीं होगी। अगर यह विचारधारा लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोकतांत्रिक तरीके से आगे बढ़े तो शायद ही किसी को एतराज होगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि अगर यह विचारधारा जिंदा भी बचती है तो वह लोकतांत्रिक ढंग से आगे बढ़ेगी, हथियारों के दम पर नहीं।
-उमेश चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं
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