“फ्लेक्सिबल जियोपॉलिटिक्स” के अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक निहितार्थ

सवाल है कि आखिर इससे किसका भला होगा? तो इसके कई जवाब होंगे, जिनमें पहला है महाशक्तियों का सबसे अधिक लाभ: संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन और आंशिक रूप से रूस-भारत जैसी शक्तियाँ इस नीति से सबसे अधिक फायदा उठाती हैं। पूर्वक सवाल है क्यों? तो सीधा सा जवाब है कि वे परिस्थितियों के अनुसार गठबंधन बदल सकती हैं।
"लचीली भूराजनीति” यानी फ्लेक्सिबल जियोपॉलिटिक्स का जन्मदाता भारत की देखा-देखी अब पूरी दुनिया में इसका प्रचलन बढ़ रहा है। इसे मोदी डॉक्ट्रिन कहना ज्यादा उचित होगा, जो गुटनिरपेक्षता का हाइब्रिड पालिसी संस्करण है। आम कहानी वाली भाषा में कहें तो “खुल जा सिमसिम और बंद हो जा सिमसिम” वाली वैश्विक कूटनीति ही अब लचीली भूराजनीतिक बन चुकी है।
दरअसल, फ्लेक्सिबल जियोपॉलिटिक्स यानी लचीली भूराजनीति का अर्थ ऐसी अवसरवादी विदेश नीति से है, जिसमें देश अपने हित के अनुसार कभी दोस्ती का दरवाज़ा खोलते हैं और कभी तुरंत बंद कर लेते हैं। आज की दुनिया में यही “फ्लेक्सिबल जियोपॉलिटिक्स” तेजी से बढ़ रही है।
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जिसके सफल उपयोगकर्ता टीम पीएम मोदी हैं। इसका सबसे बड़ा लाभ भारत जैसे उन देशों को होता है जो आर्थिक रूप से शक्तिशाली हों, तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर हों, सैन्य रूप से सक्षम हों, और बहुध्रुवीय दुनिया में संतुलन साधना जानते हों। यही वजह है कि भारत इसे अपनाकर दुनिया के शीर्षस्थ देशों की कतार में शामिल होने की दिशा में बढ़ता जा रहा है।
सवाल है कि आखिर इससे किसका भला होगा? तो इसके कई जवाब होंगे, जिनमें पहला है महाशक्तियों का सबसे अधिक लाभ: संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन और आंशिक रूप से रूस-भारत जैसी शक्तियाँ इस नीति से सबसे अधिक फायदा उठाती हैं। पूर्वक सवाल है क्यों? तो सीधा सा जवाब है कि वे परिस्थितियों के अनुसार गठबंधन बदल सकती हैं। आर्थिक प्रतिबंधों, सैन्य दबाव और तकनीकी नियंत्रण का इस्तेमाल कर सकती हैं। “मित्र” और “प्रतिद्वंद्वी” दोनों से व्यापार जारी रख सकती हैं। उदाहरण: अमेरिका, चीन से प्रतिस्पर्धा भी करता है और व्यापार भी। चीन रूस का साझेदार है लेकिन पश्चिमी बाजार भी नहीं छोड़ना चाहता। वहीं, रूस पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद एशियाई देशों से संबंध मजबूत कर रहा है।
दूसरा, मध्यम शक्तियों का भी फायदा: भारत, तुर्किये, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) जैसे देश “मल्टी-अलाइनमेंट” नीति से लाभ उठा रहे हैं। भारत इसका बड़ा उदाहरण है, जो क्वाड (Quad) में भी है, ब्रिक्स (BRICS) में भी, रूस से रक्षा सहयोग भी रखता है, और अमेरिका से तकनीकी साझेदारी भी बढ़ाता है। इससे रणनीतिक स्वतंत्रता बनी रहती है, निवेश कई दिशाओं से आता है, और वैश्विक मंचों पर प्रभाव बढ़ता है।
तीसरा, कॉर्पोरेट और टेक कंपनियों को बड़ा लाभ: एप्पल (Apple), टेस्ला (Tesla), माइक्रोसॉफ्ट (Microsoft) जैसी वैश्विक कंपनियाँ देशों की प्रतिस्पर्धा का लाभ उठाती हैं। क्योंकि देश उन्हें निवेश आकर्षित करने के लिए टैक्स छूट देते हैं, सप्लाई चेन अपने यहाँ लाने की कोशिश करते हैं, और टेक्नोलॉजी कंपनियों को रणनीतिक साझेदार मानते हैं।
# सवाल है कि ऐसी मतलबी कूटनीति से नुकसान किसका? तो जवाब होगा कि-
पहला, छोटे और कमजोर देशों का: अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और छोटे एशियाई देशों पर दबाव बढ़ता है कि वे किसी एक खेमे का समर्थन करें। वे कर्ज जाल, प्रतिबंध, राजनीतिक दबाव, और सामरिक प्रतिस्पर्धा के बीच फँस जाते हैं।
दूसरा, वैश्विक स्थिरता का: ऐसी कूटनीति में भरोसा कम होता है। देश स्थायी मित्र नहीं बल्कि “तात्कालिक हित” देखते हैं। इससे युद्धों की आशंका बढ़ती है, व्यापारिक तनाव बढ़ता है, और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ कमजोर पड़ती हैं।
भारत के लिए क्या संदेश?
वहीं, भारत के लिए यह दौर अवसर भी है और चुनौती भी। यदि भारत नवाचार, निर्माण, रक्षा आत्मनिर्भरता, ऊर्जा सुरक्षा, और तकनीकी क्षमता को मजबूत करता है, तो वह इस बदलती दुनिया में “संतुलनकारी शक्ति” बन सकता है। लेकिन यदि आर्थिक और तकनीकी शक्ति पर्याप्त न हो, तो ऐसी “खुल जा सिमसिम” कूटनीति में बड़े देश छोटे देशों को केवल रणनीतिक मोहरे की तरह इस्तेमाल कर सकते हैं।
निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि इस प्रकार की वैश्विक कूटनीति का सबसे बड़ा लाभ उन्हीं देशों और कंपनियों को मिलेगा जिनके पास शक्ति, पूँजी, तकनीक और विकल्प हैं। जबकि कमजोर देशों के लिए यह अनिश्चितता, दबाव और निर्भरता का नया युग भी बन सकता है।
- कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
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