AIUDF, ISF और Welfare Party से पीछा छुड़ाकर कांग्रेस क्या संदेश देना चाहती है ?

AIUDF, ISF और Welfare Party से पीछा छुड़ाकर कांग्रेस क्या संदेश देना चाहती है ?

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पार्टी को फैमिली बिजनेस की तरह चला रहे नेताओं से कहते रहे कि यह सब पार्टी की मूल विचारधारा के खिलाफ है और कांग्रेस सांप्रदायिकता के खिलाफ लड़ाई में चयनात्मक नहीं हो सकती है, लेकिन ऐसे नेताओं को कार्रवाई का डर दिखा कर चुप करा दिया गया।

2014 के लोकसभा चुनावों से कांग्रेस की हार का जो सिलसिला शुरू हुआ था वह तेजी से आगे बढ़ता ही जा रहा है। एक ओर तो कांग्रेस अपने अंतर्विरोधों से नहीं उबर पा रही है तो दूसरी ओर उसका युवा नेतृत्व अनुभवी नेताओं को दरकिनार कर खुद ही बार-बार नये-नये प्रयोग करने में लगा हुआ है। इस सबसे कांग्रेस को नुकसान पर नुकसान तो हो ही रहा है साथ ही पार्टी अपनी विचारधारा और अपने सिद्धांतों से भी पूरी तरह भटकी हुई नजर आ रही है। बात हालिया विधानसभा चुनावों की ही कर लें तो कांग्रेस नेतृत्व ने अनुभवी नेताओं की बार-बार चेतावनी के बावजूद पश्चिम बंगाल में इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) और असम में एआईयूडीएफ (AIUDF) जैसे साम्प्रदायिक दलों से गठबंधन किया था। यही नहीं केरल में भी जमात-ए-इस्लामी के राजनीतिक मोर्चे वेलफेयर पार्टी ऑफ इंडिया के साथ कांग्रेस ने निकाय चुनावों में समझौता कर सबको चौंका दिया था।

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कांग्रेस ने अपनी विचारधारा और सिद्धांतों को दी तिलांजलि

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पार्टी को फैमिली बिजनेस की तरह चला रहे नेताओं से कहते रहे कि यह सब पार्टी की मूल विचारधारा के खिलाफ है और कांग्रेस सांप्रदायिकता के खिलाफ लड़ाई में चयनात्मक नहीं हो सकती है, लेकिन ऐसे नेताओं को कार्रवाई का डर दिखा कर चुप करा दिया गया। भाजपा के सुर में सुर मिलाने का आरोप अपनी ही पार्टी की ओर से लगाये जाने से दुखी होकर कांग्रेस के जी-23 समूह के नेता तो चुप हो गये लेकिन भारत के कोने-कोने में फैले गांधीवादी हैरान थे कि कैसे देश की सबसे पुरानी पार्टी, जिसके नेताओं ने धर्मनिरपेक्ष भारत की बुनियाद रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, वह आज सत्ता पाने के लिए तड़प रही है और गोपाल कृष्ण गोखले, मदन मोहन मालवीय, मोती लाल नेहरू, लाला लाजपत राय, अबुल कलाम आजाद, महात्मा गांधी, सरोजिनी नायडू, जवाहर लाल नेहरू, वल्लभ भाई पटेल, सुभाष चंद्र बोस तथा डॉ. राजेंद्र प्रसाद जैसे महान नेताओं द्वारा दिखाये गये रास्ते से पूरी तरह भटक गयी है।

कांग्रेस की चाल, चरित्र और चेहरा बदला

देश की एकजुटता के लिए पूर्व में अथक प्रयास करने वाली कांग्रेस का चेहरा और चरित्र देखिये। दक्षिण और पूर्वोत्तर में मुस्लिमों का मत पाने के लिए वह कट्टरपंथी मुस्लिम पार्टियों के साथ समझौता करती है और उत्तर तथा पश्चिम में अपनी हिंदू पहचान को आगे बढ़ाना चाहती है। सबने देखा कि किस तरह महाराष्ट्र में कांग्रेस ने अपनी विचारधारा के विपरीत विचारों वाली शिवसेना के साथ सिर्फ सत्ता के लिए भागीदारी करने में जरा भी संकोच नहीं किया। उद्देश्य सिर्फ सत्ता हासिल करना हो, उद्देश्य सिर्फ भाजपा को सत्ता से दूर रखना हो तब भी बात समझ आती है लेकिन कांग्रेस सेकुलर होने का दिखावा करते हुए जिस तरह धर्म और जाति की राजनीति करने के मार्ग पर तेजी से आगे बढ़ रही है वह लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं है।

सबका विश्वास क्यों खोना चाहती है कांग्रेस?

जिस तेजी से कांग्रेस ने जनता का विश्वास खोया उसी तेजी से वह गठबंधन साथियों या विपक्षी दलों का भी विश्वास खो सकती है क्योंकि सत्ता पाने की बेताबी में उसने आईएसएफ, एआईयूडीएफ और वेलफेयर पार्टी से गठबंधन कर इन्हें धर्मनिरपेक्ष दल होने का तमगा प्रदान करने में एक पल की भी देरी नहीं लगाई थी लेकिन जब इन पार्टियों से गठबंधन का कोई फायदा नहीं हुआ तो इनसे पीछा छुड़ाने के लिए इन्हें भाजपा का एजेंट या भाजपा के इशारे पर काम करने वाले दल का तमगा भी तुरंत ही प्रदान कर दिया। वैसे कांग्रेस नेतृत्व ने चतुराई दिखाते हुए इन पार्टियों से गठबंधन भी राज्य इकाई के माध्यम से करवाया और साथ छोड़ने का ऐलान भी राज्य इकाई ने ही किया। इस तरह कांग्रेस के प्रथम परिवार ने यह दर्शाने का प्रयास किया कि इस सबसे उनका कुछ लेना-देना नहीं था लेकिन जिस पार्टी में किसी भी राज्य के पार्टी जिलाध्यक्षों की सूची भी केंद्रीय नेतृत्व जारी करता हो वहां किसी दल से चुनावों में गठबंधन कोई राज्य इकाई अपने आप कर लेगी, यह असंभव है। कांग्रेस जिस तरह से पार्टियों से गठबंधन सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए करती है और लाभ नहीं होने पर उससे पीछा छुड़ा लेती है, वह आदत गठबंधन की राजनीति का अगुआ बनने के उसके प्रयासों पर पानी भी फेर सकती है। कांग्रेस ने आईएसएफ के बाद अब एआईयूडीएफ से पीछा छुड़ाकर अपनी छवि सुधारने का जो प्रयास किया है उसमें सफलता तो शायद ही मिले बल्कि इसका उलटा असर यह भी हो सकता है कि वह अब जी-23 नेताओं और भाजपा के निशाने पर एक बार फिर आ जायेगी। कांग्रेस को कट्टरपंथी दलों से समझौता करने के मुद्दे पर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में कोई घेर नहीं पाये इसलिए भी कांग्रेस ने उक्त दलों से पीछा छुड़ाया है लेकिन वह भूल रही है कि यह जो पब्लिक है वह सब जानती है।

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क्या मुस्लिमों की वाकई चिंता करती है कांग्रेस?

आपको शायद याद हो कि जुलाई 2018 में एक उर्दू दैनिक इंकलाब ने दावा किया था कि राहुल गांधी ने उस समाचार-पत्र से बातचीत में कांग्रेस को मुस्लिमों की पार्टी बताया था। इस पर काफी विवाद भी हुआ था। सवाल है कि राहुल गांधी ने भले बोला हो लेकिन क्या कांग्रेस वाकई मुस्लिमों की पार्टी है? क्या कांग्रेस को मुस्लिमों की जरा-सी भी चिंता है ? मुस्लिमों को सदा वोट बैंक की तरह उपयोग करने वाली कांग्रेस ने इस कौम का राजनीतिक और आर्थिक उद्धार होने ही नहीं दिया तो वह कैसे मुस्लिमों की पार्टी हो गयी ? कांग्रेस के नेता और पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने भले लाल किले की प्राचीर से देश के प्राकृतिक संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यकों का बताया हो लेकिन उन्हें पहला हक तो छोड़िये उनका वाजिब हक ही नहीं दिया गया। कांग्रेस ने आजादी के बाद से मुस्लिमों के लिए क्या-कुछ किया इसके लिए किसी नेता के बयान पर ध्यान देने की बजाय सच्चर कमिटी की रिपोर्ट को ही देख लीजिये सबकुछ साफ हो जायेगा।

कांग्रेस में कौन बड़ा मुस्लिम नेता है?

कांग्रेस आने वाले चुनावों में भी मुस्लिम वोटों के लिए बड़ी-बड़ी बातें करेगी, लेकिन देश की सबसे पुरानी पार्टी खुद मुस्लिमों को कितना महत्व देती है यह इसी बात से पता लग जाता है जब आप कांग्रेस के केंद्रीय पदाधिकारियों की सूची देखते हैं। इस सूची में आपको मुकुल वासनिक, तारिक अनवर ही बड़े पदों पर नजर आयेंगे लेकिन इन्हें कितने राजनीतिक अधिकार हैं यह जगजाहिर है। कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिवों की सूची में जरूर कुछ मुस्लिम नेताओं के नाम हैं लेकिन वह सिर्फ अपने-अपने प्रदेशों तक सीमित हैं। यही नहीं कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्षों की सूची देख लीजिये, दो-तीन ही अल्पसंख्यकों के नाम प्रदेश अध्यक्ष के रूप में नजर आयेंगे, अन्य कुछ राज्यों में इनको सिर्फ कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में नामित कर दिया गया है। गुलाम नबी आजाद, सलमान खुर्शीद तथा उनके जैसे अन्य नेता जो जनाधार या राजनीतिक अनुभव रखते हैं, वह आज कांग्रेस में किनारे कर दिये गये हैं।

बहरहाल, कांग्रेस ने अपने अनुभवी नेताओं की बात नहीं सुनी, यही कारण है कि पहली बार पश्चिम बंगाल विधानसभा में उसका एक भी विधायक नहीं है। कांग्रेस ने अपने अनुभवी नेताओं की बात नहीं समझी यही कारण है कि असम की सत्ता उसके हाथों में आते-आते रह गयी। कांग्रेस ने अपने वरिष्ठ नेताओं की बातों पर ध्यान नहीं दिया यही कारण है कि केरल, जहाँ सत्ता में आने की उसकी बारी एक तरह से निश्चित थी वहां भी पार्टी हार गयी। आज देश में ऐसी स्थिति है कि किसी भी राज्य में कांग्रेस ही ऐसी पार्टी है जिसके विधायकों का पाला बदल आसानी से राजनीतिक दल करवा लेते हैं। कांग्रेस की यह हालत देखकर उसकी तुलना उन छात्रों से की जा सकती है जो इस साल सीबीएसई की परीक्षा रद्द होने के बावजूद भी फेल हो गये।

-नीरज कुमार दुबे