क्या बदलेगा IPL का पूरा Format? Lalit Modi के दावे से मचा हड़कंप, हजारों करोड़ हैं दांव पर

Lalit Modi
प्रतिरूप फोटो
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Ankit Jaiswal । Apr 7 2026 7:18PM

आईपीएल के संस्थापक ललित मोदी ने 10 टीमों के बावजूद कम मैच कराने के फैसले की आलोचना करते हुए इसे हजारों करोड़ का वित्तीय नुकसान बताया है, जिससे अब लीग के आर्थिक मॉडल और खिलाड़ियों के कार्यभार के बीच संतुलन बनाने की बहस तेज हो गई है।

आईपीएल को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है और इस बार वजह है लीग के पूर्व आयुक्त ललित मोदी का बड़ा दावा। उन्होंने कहा है कि मौजूदा प्रारूप के कारण लीग हर साल हजारों करोड़ रुपये के अतिरिक्त राजस्व से वंचित हो रही है।

बता दें कि हाल ही में दो टीमों की ऊंची कीमत पर बिक्री के बाद आईपीएल की कुल वैल्यू को लेकर काफी उत्साह देखा गया, लेकिन ललित मोदी का मानना है कि मौजूदा ढांचा पूरी क्षमता के हिसाब से काम नहीं कर रहा है। मौजूद जानकारी के अनुसार उन्होंने यह सवाल उठाया है कि जब लीग में टीमों की संख्या बढ़कर दस हो चुकी है, तो फिर सभी टीमों के बीच पूरा घरेलू और बाहरी मुकाबलों का प्रारूप क्यों लागू नहीं किया जा रहा है।

गौरतलब है कि आईपीएल की शुरुआत में हर टीम के लिए तय था कि वह बाकी सभी टीमों के खिलाफ दो-दो मुकाबले खेलेगी। अगर इसी मॉडल को लागू किया जाए तो लीग चरण में कुल मुकाबलों की संख्या करीब 90 तक पहुंच सकती है, जिसके बाद नॉकआउट मुकाबले होते हैं। लेकिन फिलहाल लीग 74 मुकाबलों के साथ ही चल रही है, जिससे कई संभावित मैच कम हो जाते हैं।

ललित मोदी का कहना है कि हर मुकाबले से मिलने वाली आय का बड़ा हिस्सा सीधे बोर्ड और टीमों को जाता है। ऐसे में जब मैच कम होते हैं तो सीधा असर टीमों की कमाई और उनकी वैल्यू पर पड़ता है। उन्होंने यह भी कहा कि यह सिर्फ खेल का मामला नहीं बल्कि एक व्यावसायिक समझौता है, जिसमें टीमों को घरेलू और बाहरी दोनों तरह के मुकाबले मिलने चाहिए।

मौजूद जानकारी के अनुसार उन्होंने अनुमान लगाया है कि अगर पूरा घरेलू-बाहरी प्रारूप लागू किया जाए तो केवल प्रसारण अधिकारों से ही हजारों करोड़ रुपये की अतिरिक्त कमाई हो सकती है। उनका दावा है कि इससे बोर्ड को बड़ा फायदा होगा और टीमों की कमाई भी बढ़ेगी, जिससे उनकी बाजार कीमत अपने आप बढ़ जाएगी।

आईपीएल दुनिया की सबसे बड़ी क्रिकेट लीगों में से एक बन चुकी है और इसकी लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है। ऐसे में प्रारूप को लेकर उठ रहे सवाल यह संकेत देते हैं कि भविष्य में लीग के ढांचे पर फिर से विचार किया जा सकता है। हालांकि, व्यस्त अंतरराष्ट्रीय कैलेंडर और खिलाड़ियों के कार्यभार जैसे मुद्दे भी इस फैसले को प्रभावित करते हैं।

कुल मिलाकर यह बहस अब सिर्फ मैचों की संख्या तक सीमित नहीं रही, बल्कि लीग के आर्थिक मॉडल और दीर्घकालिक रणनीति से भी जुड़ गई है। आने वाले समय में इस पर क्या फैसला होता है, यह देखना दिलचस्प होगा।

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