वैश्विक संकट के बीच मानवता की अंतिम सुरक्षा-रेखा है ऊर्जा संरक्षण

ऊर्जा संरक्षण का एक महत्वपूर्ण आयाम औद्योगिक क्षेत्र भी है। उद्योगों में ऊर्जा दक्षता बढ़ाने से उत्पादन लागत में कमी आती है और प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ती है। आज आवश्यकता इस बात की है कि ऊर्जा संरक्षण को केवल सरकारी नीति या अभियान के रूप में न देखा जाए बल्कि इसे एक सामाजिक संस्कृति के रूप में विकसित किया जाए।
आज जब विश्व एक बार फिर भू-राजनीतिक तनावों के दौर से गुजर रहा है और ईरान, अमेरिका तथा इजरायल के बीच टकराव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को अस्थिर कर दिया है, तब ऊर्जा केवल विकास का साधन नहीं बल्कि अस्तित्व का प्रश्न बन चुकी है। तेल और गैस के दामों में उतार-चढ़ाव, आपूर्ति श्रृंखलाओं में व्यवधान और ऊर्जा स्रोतों पर बढ़ती निर्भरता ने पूरी दुनिया को यह सोचने पर विवश कर दिया है कि क्या आधुनिक सभ्यता ने अपनी बुनियाद अत्यधिक अस्थिर संसाधनों पर खड़ी कर दी है। इस परिप्रेक्ष्य में ऊर्जा संरक्षण केवल एक विकल्प नहीं बल्कि मानवता की सुरक्षा का सबसे सरल, सस्ता और प्रभावी उपाय बनकर उभर रहा है। ऊर्जा आधुनिक जीवन का अभिन्न अंग है, चाहे वह उद्योगों की मशीनें हों, परिवहन के साधन हों, डिजिटल अर्थव्यवस्था हो या घरेलू जीवन की सुविधाएं किंतु विडंबना यह है कि जिस ऊर्जा पर हमारी प्रगति आधारित है, वही अब संकट का कारण बनती जा रही है।
संयुक्त राष्ट्र की ‘एनर्जी प्रोग्रेस रिपोर्ट 2024’ के अनुसार आने वाले दशक में वैश्विक ऊर्जा मांग में लगभग 25 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान है जबकि जीवाश्म ईंधनों के भंडार तेजी से सीमित होते जा रहे हैं। ऐसे में यदि ऊर्जा संरक्षण और दक्षता को प्राथमिकता नहीं दी गई तो भविष्य में ऊर्जा संकट केवल आर्थिक चुनौती नहीं रहेगा बल्कि सामाजिक अस्थिरता और वैश्विक संघर्षों का कारण भी बन सकता है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य इस खतरे को और स्पष्ट करता है। पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव ने तेल आपूर्ति पर अनिश्चितता बढ़ा दी है, जिससे अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें अस्थिर हो रही हैं। भारत जैसे ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। दरअसल भारत अपनी कुल तेल आवश्यकता का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है। ऐसे में वैश्विक संकट का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था, महंगाई और आम नागरिक के जीवन पर पड़ता है। पैट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि केवल परिवहन लागत को नहीं बढ़ाती बल्कि खाद्य पदार्थों से लेकर निर्माण सामग्री तक हर क्षेत्र में महंगाई को जन्म देती है। इस परिप्रेक्ष्य में ऊर्जा संरक्षण राष्ट्रीय आर्थिक सुरक्षा का भी एक महत्वपूर्ण आधार बन जाता है।
भारत तेजी से विकसित हो रही अर्थव्यवस्था है और यहां ऊर्जा की मांग निरंतर बढ़ रही है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी की ‘इंडिया एनर्जी आउटलुक 2024’ रिपोर्ट के अनुसार, 2030 तक भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी ऊर्जा उपभोक्ता अर्थव्यवस्था बन जाएगा। ऐसे में यदि ऊर्जा खपत को संतुलित नहीं किया गया तो विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखना कठिन हो जाएगा। यही कारण है कि भारत ने ऊर्जा दक्षता और संरक्षण को अपनी नीति का केंद्रीय तत्व बनाया है। ऊर्जा दक्षता ब्यूरो द्वारा लागू ऊर्जा संरक्षण अधिनियम और ‘उजाला’ जैसे कार्यक्रमों ने यह साबित किया है कि छोटे-छोटे प्रयास भी बड़े परिणाम दे सकते हैं। 36 करोड़ से अधिक एलईडी बल्बों का वितरण और उससे हुई 48 बिलियन यूनिट बिजली की बचत इस बात का प्रमाण है कि यदि नीति और जनभागीदारी साथ आएं तो ऊर्जा संरक्षण एक जनांदोलन बन सकता है।
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ऊर्जा संरक्षण का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह किसी नई तकनीक या बड़े निवेश पर निर्भर नहीं है बल्कि यह हमारे दैनिक व्यवहार में छोटे-छोटे बदलावों से ही संभव है। उदाहरण के लिए, अनावश्यक रूप से जलती लाइटों को बंद करना, ऊर्जा-कुशल उपकरणों का उपयोग करना, एयर कंडीशनर का सीमित प्रयोग, सार्वजनिक परिवहन को अपनाना और सौर ऊर्जा जैसे विकल्पों को बढ़ावा देना, ये सभी कदम न केवल ऊर्जा बचाते हैं बल्कि पर्यावरण को भी सुरक्षित रखते हैं। यदि भारत का प्रत्येक परिवार प्रतिदिन केवल एक यूनिट बिजली की बचत करे तो यह देश के लिए ऊर्जा क्रांति के समान होगा। ऊर्जा संरक्षण का संबंध केवल बिजली तक सीमित नहीं है बल्कि यह जल, पर्यावरण और स्वास्थ्य से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। ऊर्जा उत्पादन में जल का व्यापक उपयोग होता है और जल की बर्बादी सीधे ऊर्जा की बर्बादी में बदल जाती है। इसी प्रकार, ऊर्जा के अत्यधिक उपयोग से कार्बन उत्सर्जन बढ़ता है, जो जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापमान वृद्धि का मुख्य कारण है। आज जब दुनिया 1.5 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य को बचाने के लिए संघर्ष कर रही है, तब ऊर्जा संरक्षण इस दिशा में सबसे प्रभावी हथियार साबित हो सकता है।
अक्षय ऊर्जा इस संकट का दीर्घकालिक समाधान प्रस्तुत करती है लेकिन इसकी सफलता भी ऊर्जा संरक्षण पर ही निर्भर करती है। सौर, पवन और जैव ऊर्जा जैसे स्रोतों का विस्तार तभी प्रभावी होगा, जब ऊर्जा की कुल मांग को नियंत्रित किया जाए। भारत ने 2030 तक 500 गीगावॉट अक्षय ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य निर्धारित किया है, जो न केवल ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम है बल्कि वैश्विक जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करने में भी महत्वपूर्ण योगदान देगा। ग्रीन हाइड्रोजन मिशन और स्मार्ट ग्रिड जैसी तकनीकें इस दिशा में नई संभावनाएं खोल रही हैं लेकिन इन सबका मूल आधार ऊर्जा का विवेकपूर्ण उपयोग ही है। शहरीकरण के बढ़ते दबाव ने भी ऊर्जा खपत को तेजी से बढ़ाया है। महानगरों में ऊंची इमारतें, एयर कंडीशनिंग सिस्टम और बढ़ती वाहन संख्या ऊर्जा की मांग को कई गुना बढ़ा देती है। ऐसे में हरित भवन निर्माण, सौर पैनलों का उपयोग और सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देना आवश्यक हो जाता है। यदि भवन निर्माण में ऊर्जा दक्षता को प्राथमिकता दी जाए तो बिजली की खपत में 30 से 40 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है। यह न केवल पर्यावरण के लिए लाभकारी होगा बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगा।
ऊर्जा संरक्षण का एक महत्वपूर्ण आयाम औद्योगिक क्षेत्र भी है। उद्योगों में ऊर्जा दक्षता बढ़ाने से उत्पादन लागत में कमी आती है और प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ती है। आज आवश्यकता इस बात की है कि ऊर्जा संरक्षण को केवल सरकारी नीति या अभियान के रूप में न देखा जाए बल्कि इसे एक सामाजिक संस्कृति के रूप में विकसित किया जाए। विद्यालयों में ऊर्जा शिक्षा को अनिवार्य बनाया जाए, मीडिया के माध्यम से जनजागरूकता बढ़ाई जाए और प्रत्येक नागरिक को यह समझाया जाए कि ऊर्जा की बचत केवल व्यक्तिगत लाभ नहीं बल्कि राष्ट्रीय कर्तव्य है। जब तक ऊर्जा संरक्षण हमारी आदत नहीं बनेगा, तब तक किसी भी नीति या तकनीक का पूर्ण लाभ नहीं मिल सकेगा।
वैश्विक ऊर्जा संकट के इस दौर में भारत के पास एक अवसर भी है, एक ऐसे मॉडल के रूप में उभरने का, जो विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित कर सके। यदि भारत ऊर्जा संरक्षण, अक्षय ऊर्जा और तकनीकी नवाचार के समन्वय से आगे बढ़ता है तो वह न केवल अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा कर सकता है बल्कि विश्व के लिए एक प्रेरणा भी बन सकता है। यह समझना आवश्यक है कि ऊर्जा का संकट केवल संसाधनों का संकट नहीं है बल्कि यह हमारी सोच और व्यवहार का संकट भी है। यदि हम ऊर्जा को अनमोल संसाधन मानकर उसका विवेकपूर्ण उपयोग करना सीख लें तो न केवल वर्तमान संकट से उबर सकते हैं बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित और समृद्ध दुनिया भी सुनिश्चित कर सकते हैं। ऊर्जा संरक्षण कोई जटिल विज्ञान नहीं बल्कि एक सरल जीवनशैली है और यही जीवनशैली आज धरती को बचाने की सबसे प्रभावी चाबी बन चुकी है।
- योगेश कुमार गोयल
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, पर्यावरण मामलों के जानकार और पर्यावरण पर चर्चित पुस्तक ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ के लेखक हैं)
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