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पांच दिवसीय यह पर्व खुशियों के साथ ही सामाजिक संदेश भी देते हैं

By अजय कुमार | Publish Date: Nov 6 2018 11:32AM

पांच दिवसीय यह पर्व खुशियों के साथ ही सामाजिक संदेश भी देते हैं
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चौदह वर्षों के वनवास के बाद मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान राम के अयोध्या वापस आने की खुशी में मनाया जाने वाला पर्व दीपावली अपने साथ कई खुशियां लेकर आता है। पांच दिनों तक मनाया जाने वाला पांच पर्वों का अनूठा त्योहार है दीपावली। इसमें प्रथम दिन धनतेरस, दूसरे दिन नरक चतुर्दशी, तीसरे दिन दीपावली, चौथे दिन गोवर्धन पूजा और अंत में पांचवें दिन यमद्वितीया या गोवर्धन पूजा का पर्व मनाया जाता है। भगवान राम जब असुर राज रावण को मारकर अयोध्या नगरी वापस आए तब नगरवासियों ने अयोध्या को साफ−सुथरा करके रात को दीपकों की ज्योति से दुल्हन की तरह जगमगा दिया था। तब से आज तक यह परंपरा रही है कि कार्तिक अमावस्या के गहन अंधकार को दूर करने के लिए रोशनी के दीप प्रज्ज्वलित किए जाते हैं।
 
दीपावली मनाने के पीछे एक प्रसिद्ध कथा यह भी है कि एक बार राजा से ज्योतिषी ने कहा कि कार्तिक की अमावस्या की आधी रात को तुम्हारा अभाग्य एक सांप के रूप में आएगा। यह सुनकर राजा ने अपनी प्रजा को आज्ञा दी कि वे अपने घरों को अच्छी तरह से साफ करें और सारा शहर रात भर रोशनी से प्रकाशित किया जाए। रानी सर्प देवता का गुणगान करती व जागती रहीं, लेकिन दुर्भाग्य की घड़ी में राजा के बिस्तर के पास जलता हुआ दीप अनायास बुझ गया और सांप ने राजा को डस लिया, परंतु सर्प देवता रानी की स्वर लहरी को सुनकर अत्यंत खुश हुआ और रानी को एक वर मांगने को कहा, रानी ने इस वर से अपने पति का जीवनदान मांगा। सर्प देवता राजा के प्राण वापस लाने के लिए यम के पास गया। राजा का जीवनमंत्र पढ़ा गया तो शून्य नंबर दिखाई दिया जिसका तात्पर्य हुआ कि राजा पृथ्वी पर अपना जीवन समाप्त कर चुका है। लेकिन सांप ने बड़ी चतुराई से आगे सात नंबर डाल दिया। जब यम ने पत्र देखा तो कहा, लगता है कि मृत शरीर को अपने जीवन के 70 साल और देखना है। जल्दी से इसे वापस ले जाओ। सो सांप राजा की आत्मा को वापस ले आया। राजा के प्राण वापस आने पर बस उसी दिन से दीपावली का पर्व राजा के पुनर्जीवित होने की खुशी में मनाया जाता है।
 
दक्षिण भारत को छोड़कर पूरे भारत में इस कार्तिक अमावस्या तक वर्षा समाप्त हो जाती है। हो सकता है पूर्वजों ने वर्षा से सीले हुए मकानों की पुताई, रंगाई करके फिर से सजाने के लिए यह उत्सव मनाना शुरू किया हो। इस दिन नवांकुरित गेंहू या ज्वार की पूजा की जाती है। पश्चिम बंगाल में यह दिन महाकाली की विशेष पूजा के रूप में मनाया जाता है। हमारे देश में यह सबसे उल्लास वाला पर्व है। दीपावली पर शहरों से लेकर गांव तक की रौनक में चार चांद लग जाते हैं। बाजार नये−नये सामानों से सज जाते हैं। बाजारों में रौनक तो देखते ही बनती है। दीपावली की रात्रि को महानिशीथ के नाम से जाना जाता है। इस रात्रि में कई लोगों द्वारा तंत्र−मंत्र से महालक्ष्मी की पूजा−अर्चना कर पूरे साल के लिए सुख−समृद्धि और धन लाभ की कामना की जाती है। दीपावली के पर्व का आगाज धनतेरस से ही माना जाता है। धनतेरस पर सामान खरीदना शुभ माना जाता है। इस बार खरीदारी का शुभ मुहूर्त सिर्फ एक घंटा 57 मिनट यानी करीब दो घंटे का है।
 
पांच पर्वों के त्योहार का पहला पर्व धनतेरस है। धनतेरस को धनवंतरी त्रियोदशी भी कहा जाता है। मान्यता है कि भगवान धनवंतरी सागर मंथन के दौरान हाथ में कलश लेकर जन्मे थे। इसी कारण धनतेरस के दिन बर्तन खरीदना शुभ माना जाता है। प्राचीन काल में लोग इस दिन नए बर्तन खरीदकर उसमें खीर पकवान रखकर धनवंतरी भगवान को भोग लगाते थे। स्वास्थ्य कामना से प्रसाद ग्रहण कर लोगों में वितरित करते थे। मान्यता है कि स्थिर लग्न में धनतेरस को पूजा करने से माता लक्ष्मी की असीम कृपा बनी रहती। धनवंतरी देवता को पीतल भी बहुत प्रिय था, चाहे तो पीतल के बर्तन खरीद सकते हैं। भगवान कुबेर को चांदी बहुत प्रिय होती है। धनतेरस के दिन चांदी के बर्तन या जेवर या फिर सिक्का खरीद सकते हैं।
 
धनतेरस पर इस बार सामान खरीदने का शुभ मुहूर्त सिर्फ 1.57 मिनट के लिए होगा। यह शाम 6.20 से शुरू होकर 8.17 मिनट तक रहेगा। इस दिन धन के देवता भगवान कुबेर और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। धनतेरस कार्तिक मास के 13वें दिन और दिवाली से दो दिन पहले मनाया जाता है। मान्यता है कि धनतेरस के दिन समुद्र मंथन के दौरान ही मां लक्ष्मी और भगवान कुबेर प्रकट हुए थे। इसी कारण धनतेरस के दिन सोने−चांदी और बरतन खरीदना शुभ माना जाता है। इस बार धनतेरस पांच नवंबर को मनाया जायेगा।
 
धनतेरस के बाद दूसरा दिन नरक चौदस या नर्क चतुर्दशी या नर्का पूजा के नाम से भी प्रसिद्ध है। मान्यता है कि कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी के दिन प्रातःकाल तेल लगाकर अपामार्ग (चिचड़ी) की पत्तियाँ जल में डालकर स्नान करने से नरक से मुक्ति मिलती है। विधि−विधान से पूजा करने वाले व्यक्ति सभी पापों से मुक्त हो स्वर्ग को प्राप्त करते हैं। शाम को दीपदान की प्रथा है जिसे यमराज के लिए किया जाता है। तीसरे दिन मुख्य पर्व दीपावली मनाई जाती है। ज्योतिषियों के अनुसार इस बार अमावस्या तिथि छह नवंबर को रात्रि 10.07 बजे लग रही है जो अगले दिन रात्रि 9.19 बजे तक रहेगी। दीपावली के दिन स्वयं सिद्ध मुहूर्त होता है। इस दिन किसी भी तरह का शुभ कार्य कर सकते हैं। मां महालक्ष्मी का पूजन करने से पद, प्रतिष्ठा और एश्वर्य की प्राप्ति होती है।
 
दीपावली के पूजन का प्रमुख काल प्रदोष काल माना जाता है। इसमें स्थिर लग्न की प्रधानता मानी जाती है। अतः दीपावली पूजन का मुहूर्त सात नवंबर को स्थिर लग्न वृषभ शाम 6.03 से रात 8 बजे तक उत्तम रहेगा। इसके पहले भी पूजन किया जा सकता है। स्थिर लग्न कुंभ दोपहर में 1.27 बजे से 2.58 बजे तक शुभ रहेगा। हालांकि इस बार स्थिर लग्न सिंह अमावस्या में नहीं मिल रहा है, अतः हर सनातनी को रात्रि 9.19 से पूर्व पूजन अवश्य कर लेना चाहिए।
 
कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को मनाई जाती है दीपावली। उसके अगले दिन होती है गोवर्धन पूजा। यानी पांच पर्वों की श्रृंखला का यह चौथा पर्व है। इस साल ये पूजा 8 नवंबर को होगी। कई क्षेत्रों में इसे अन्नकूट पूजा भी कहा जाता है। इसका तात्पर्य है अन्न का समूह। इस पूजा में कई तरह के अन्न भगवान को चढ़ाए जाए हैं। बाद में उन्हें प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। इसी कारण इस त्योहार का नाम अन्नकूट पड़ा। अन्नकूट या गोवर्धन पूजा की शुरुआत द्वापर युग से हुई थी। लोग इस दिन आंगन में गाय के गोबर से भगवान गोवर्धन नाथ (श्री कृष्ण) जी की अल्पना बनाकर उनकी पूजा करते हैं। फिर गिरिराज को खुश करने के लिए लोग उन्हें अन्नकूट का भोग लगाते हैं।
 
पांच दिवसीय त्योहार के पांचवें दिन मनाया जाता है भाई दूज का पर्व। भाई दूज को यम द्वितीया भी कहा जाता है। भाई दूज का पर्व भाई−बहन के रिश्ते पर आधारित पर्व है, जिसे बड़ी श्रद्धा और परस्पर प्रेम के साथ मनाया जाता है। रक्षाबंधन के बाद, भाईदूज ऐसा दूसरा त्योहार है, जो भाई बहन के अगाध प्रेम को समर्पित है। इस दिन विवाहिता बहनें अपने भाई को भोजन के लिए अपने घर पर आमंत्रित करती हैं और गोबर से भाई दूज परिवार का निर्माण कर, उसका पूजन अर्चन कर भाई को प्रेम पूर्वक भोजन कराती हैं। बहन अपने भाई को तिलक लगाकर, उपहार देकर उसकी लम्बी उम्र की कामना करती हैं। भाई दूज से जुड़ी कुछ मान्यताएं हैं जिनके आधार पर अलग−अलग क्षेत्रों में इसे अलग−अलग तरह ये मनाया जाता है।
 
भाई दूज से जुड़ी मान्यता के अनुसार सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज तथा यमुना का जन्म हुआ। यमुना अपने भाई यमराज से स्नेहवश निवेदन करती थी कि वे उसके घर आकर भोजन करें। लेकिन यमराज व्यस्त रहने के कारण यमुना की बात को टाल जाते थे। कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमुना अपने द्वार पर अचानक यमराज को खड़ा देखकर हर्ष−विभोर हो गई। प्रसन्नचित्त हो भाई का स्वागत−सत्कार किया तथा भोजन करवाया। इससे प्रसन्न होकर यमराज ने बहन से वर मांगने को कहा। तब बहन ने भाई से कहा कि आप प्रतिवर्ष इस दिन मेरे यहां भोजन करने आया करेंगे तथा इस दिन जो बहन अपने भाई को टीका करके भोजन खिलाए उसे आपका भय न रहे। यमराज 'तथास्तु कहकर यमपुरी चले गए। ऐसी मान्यता है कि जो भाई आज के दिन यमुना में स्नान करके पूरी श्रद्धा से बहनों के आतिथ्य को स्वीकार करते हैं उन्हें तथा उनकी बहन को यम का भय नहीं रहता।
 
-अजय कुमार

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