गृहमंत्री अमित शाह ने कुछ खास कारणों के चलते गुपकार को 'गैंग' की संज्ञा दी है

  •  ललित गर्ग
  •  नवंबर 19, 2020   16:48
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गृहमंत्री अमित शाह ने कुछ खास कारणों के चलते गुपकार को 'गैंग' की संज्ञा दी है
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मोदी सरकार के सामने कश्मीर में लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था को स्थापित करना सबसे बड़ी प्राथमिकता है। पर कुछ गुपकार से जुड़े स्वार्थी राजनेता एवं राजनीतिक दल किसी कोने में आदर्श की स्थापना होते देखकर अपने बनाए स्वार्थप्रेरित समानान्तर आदर्शों की वकालत कर रहे हैं।

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने हाल ही में नैशनल कॉन्फ्रेंस, पीडीपी, पीपल्स कॉन्फ्रेंस और सीपीआईएम रूपी पीपल्स अलायंस फॉर गुपकार डिक्लेरेशन (पीएजीडी) नामक राजनीतिक मोर्चा पर तीखा हमला बोलते कहा कि गुपकार गैंग जम्मू-कश्मीर को फिर से आतंक, हिंसा, अशांति और उत्पात के दौर में ले जाना चाहता है। यह गुपकार राजनीतिक दल राज्य में स्थानीय निकायों के चुनाव लड़ रहा है। अभी तक कांग्रेस का इनके साथ घोषित तौर पर कोई समझौता नहीं है, लेकिन स्थानीय स्तर पर सीटों का तालमेल होने की चर्चा है। गुपकार की बढ़ती सक्रियता से कहीं कश्मीर में शांति, अमन एवं लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर फिर से अंधेरे ना छाये?

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गृहमंत्री ने गुपकार को एक राजनीतिक दल की बजाय एक गैंग कहकर संबोधित किया है, इससे भले ही कुछ लोग सहमत न हों, लेकिन इसे गैंग कहने के कुछ तो कारण रहे होंगे। एक पूरा वातावरण जो मिल रहा है, परिवेश निर्मित किया जा रहा है, वह आतंक एवं अशांति को बढ़ाने वाला है, घटाने वाला बिलकुल नहीं लगता। क्यों आवश्यकता है कि राष्ट्र-विरोधी, आतंक एवं अशांतिमूलक गतिविधियों एवं विचारों को संक्रामक बनाया जाए? प्रांत की शांति व्यवस्था एवं विकास की प्रक्रिया को बाधित किया जाये। गुपकार की आक्रामक एवं राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों के बीच हम कल्पना कैसे करें कि हिंसा नहीं बढ़ेगी, आतंक नहीं पनपेगा और अशांति नहीं बढ़ेंगी? इसलिए सबसे पहले ध्यान देना है कश्मीर के परिवेश पर, वहां के वातावरण पर। वहां के स्थानीय राजनीतिक दलों ने अपने चारों ओर किस प्रकार के वातावरण का निर्माण कर रखा है? वह जब तक नहीं बदलेगा, तब तक हिंसा-आतंक को उत्तेजना देने वाली घटनाएं और निमित्त उभरेंगे।

आतंक एवं हिंसाग्रस्त इस प्रांत में शांति स्थापना के लिये भारत सरकार के प्रयत्न निश्चित ही जीवंत लोकतंत्र का आधार बने हैं। जरूरत है कश्मीर में राजनीतिक एवं साम्प्रदायिक संकीर्णता की तथाकथित आवाजों की बजाय सुलझी हुई सभ्य राजनीतिक आवाजों को सक्रिय होने का मौका दिया जाए, विकास एवं शांति के नये रास्ते उद्घाटित किये जायें, इसी दृष्टि से गृहमंत्री का गुपकार पर खास तौर पर हमलावर होना स्वाभाविक है। अगर ये दल राज्य में अनुच्छेद 370 की वापसी की मांग पर अड़े हुए हैं तो उनकी इस मांग से किस तरह और क्यों सहमत हुआ जा सकता है। भारत का संविधान और यहां की लोकतांत्रिक व्यवस्था उन्हें शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने की इजाजत देती है, लेकिन उनकी राष्ट्र-विरोधी गतिविधियां एवं बयान किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है।

  

केन्द्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी यह कहती रही है कि अनुच्छेद 370 के तहत विशेष प्रावधान खत्म करने का फैसला राज्य की जनता के हित में किया गया है, जिसकी लम्बे समय से आवश्यकता महसूस की जा रही थी। अब चुनाव वह उपयुक्त मौका है जब भाजपा के कार्यकर्ता घर-घर जाकर लोगों को इस फैसले की खूबियां समझा सकते हैं और उन्हें समझाना भी चाहिए। जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक संगठनों की अलोकतांत्रिक गतिविधियों एवं प्रांत में आतंक-अशांति एवं हिंसा को बल देने वाले बयानों एवं मनसूंबों का भी बेपर्दा करना चाहिए। इसी से वहां लोकतंत्र स्थापित हो सकेगा। दूर बैठकर भी हर भारतीय इस बात को गहराई से महसूस कर रहा है और देख रहा है कि जम्मू-कश्मीर में शांति, सौहार्द, विकास एवं सह-जीवन का वातावरण बन रहा है। वहां संविधान के साये में लोकतंत्र प्रशंसनीय रूप में पलता हुआ दिख रहा है। लेकिन गुपकार में सत्ताविहीन असंतुष्टों की तरह आदर्शविहीन असंतुष्टों की भी एक लम्बी पंक्ति है जो सत्ता की लालसा में शांति कम, खतरे ज्यादा उत्पन्न कर रही है। वे सब चाहते हैं कि हम आलोचना करें, अच्छाई में भी बुराई खोजे, शांति एवं सौहार्द की स्थितियों को भी अशांत बताये, पर वे शांति का, सुशासन का, विकास का उदाहरण प्रस्तुत नहीं करते। हम गलतियां निकालें पर दायित्व स्वीकार नहीं करें। ऐसा वर्ग आज जम्मू-कश्मीर के लिये विडम्बना एवं त्रासदी बने मुद्दों को लेकर एक बार फिर सक्रिय है। वे लोग अपनी रचनात्मक शक्ति का उपयोग करने में अक्षम है, इसलिये स्थानीय निकाय के चुनावों में लोकतांत्रिक अधिकारों को आधार बनाकर अस्तव्यस्तता एवं अशांति को बढ़ाने में विश्वास करते हैं।

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भले ही इस राज्य में उग्रवाद के चरम उठान के दिनों में भी गुपकार से जुड़ी पार्टियां न केवल चुनाव प्रक्रिया से जुड़ी रहकर राज्य में सरकार चलाती रही हैं बल्कि इनके सैंकड़ों नेता-कार्यकर्ता आतंकी हमलों में मारे गए हैं और अलग-अलग समय में ये केंद्र सरकार का भी हिस्सा रही हैं, लेकिन यह भी बड़ा सच है कि इन्होंने आतंकवाद को पनपने का अवसर देते हुए, अशांति का वातावरण बनाते हुए एवं विकास को अवरूद्ध करके ही अपनी राजनीतिक हितों की रोटियां सेंकी हैं। यह भी एक सच है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इन दलों के प्रमुख नेता कश्मीर को लेकर भारत के पक्ष का समर्थन करते रहे हैं। आज भी ये स्थानीय चुनावों में पूरी शिद्दत से शामिल हो रहे हैं, चुनाव बहिष्कार की बात नहीं कर रहे। लेकिन ये दल राज्य में अनुच्छेद 370 की वापसी की मांग पर अड़े हुए हैं, पाकिस्तान के सुर में सुर मिलाते हैं तो किस तरह उनसे सहमति बने? 

गृहमंत्री अमित शाह ने कश्मीर के इन राजनीतिक संगठनों को आपराधिक गिरोह या गैंग करार किया है तो इसमें कोई अतिश्योक्ति प्रतीत नहीं होती है। यह एक साहसभरा कदम है, साहस का परिचय तो कश्मीर में केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 को हटाकर भी दिया, उससे भी अधिक उसने शांति एवं व्यवस्था बनाये रखने की स्थितियों को निर्मित कर परिपक्वता का परिचय दिया है। अनुच्छेद-370 के हटने के बाद की नवीन स्थितियों में कश्मीर की जनता ने राहत की सांस ली है, नवीन परिवेश में वहां किसी बड़ी अप्रिय, हिंसक, आतंकी एवं अराजक स्थिति का न होना, वहां की जनता का केन्द्र सरकार में विश्वास का परिचायक है। प्रांत में हर कदम लोकतांत्रिक सावधानी, सूझबूझ एवं विवेक से उठाना, समय की मांग है, चाहे स्थानीय निकायों के चुनाव हों या उनमें सक्रिय गुपकार की राजनीतिक गतिविधियां। कहीं ऐसा न हो कि घाटी में गलत एवं अराजक राजनीतिक दलों को प्रश्रय देने से वहां हिंसा एवं आतंक का नया दौर शुरू हो जाये।

नरेन्द्र मोदी सरकार के सामने कश्मीर में लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था को स्थापित करना सबसे बड़ी प्राथमिकता है। पर कुछ गुपकार से जुड़े स्वार्थी राजनेता एवं राजनीतिक दल किसी कोने में आदर्श की स्थापना होते देखकर अपने बनाए स्वार्थप्रेरित समानान्तर आदर्शों की वकालत कर रहे हैं। यानी स्वस्थ परम्परा का मात्र अभिनय। प्रवंचना का ओछा प्रदर्शन। ऐसे लोग कहीं भी हो, उन्नत जीवन एवं सशक्त राष्ट्र की बड़ी बाधा है। कश्मीर में भी ऐसे बाधक लोग लोकतंत्र का दुरुपयोग करते हुए दिखाई दे रहे हैं। कुछ ऐसे व्यक्ति सभी जगह होते हैं जिनसे हम असहमत हो सकते हैं, पर जिन्हें नजरअन्दाज करना मुश्किल होता है। चलते व्यक्ति के साथ कदम मिलाकर नहीं चलने की अपेक्षा उसे अडंगी लगाते हैं। सांप तो काल आने पर काटता है पर दुर्जन तो पग-पग पर काटता है। कश्मीर को शांति, विकास एवं सह-जीवन की ओर अग्रसर करते हुए ऐसे दुर्जन लोगों से सावधान रहना होगा। यह निश्चित है कि सार्वजनिक जीवन में सभी एक विचारधारा, एक शैली व एक स्वभाव के व्यक्ति नहीं होते। अतः आवश्यकता है दायित्व के प्रति ईमानदारी के साथ-साथ आपसी तालमेल व एक-दूसरे के प्रति गहरी समझ की। भारत विविधता में एकता का ''मोजायॅक'' राष्ट्र है, जहां हर रंग, हर दाना विविधता में एकता का प्रतिक्षण बोध करवाता है। अगर हम हर कश्मीरी में स्थानीय निकाय के चुनावों में आदर्श स्थापित करने के लिए उसकी जुझारू चेतना को विकसित कर सकें तो निश्चय ही आदर्शविहिन असंतुष्टों यानी गुपकारों की पंक्ति को छोटा कर सकेंगे। और ऐसा होना कश्मीर में अशांति एवं आतंक की जड़ों को उखाड़ फेंकने का एवं शांति स्थापना का सार्थक प्रयत्न होगा।

-ललित गर्ग

(पत्रकार, स्तंभकार, लेखक)







साक्षात्कारः किसान नेता राकेश टिकैत ने कहा- इस बार आर पार की लड़ाई है

  •  डॉ. रमेश ठाकुर
  •  नवंबर 30, 2020   09:25
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साक्षात्कारः किसान नेता राकेश टिकैत ने कहा- इस बार आर पार की लड़ाई है
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''नरेंद्र मोदी को एक बात नहीं भूलनी चाहिए। 2014 और 2019 में उनकी जीत में किसानों की भूमिका सबसे बड़ी रही। उसके बदले सरकार ने किसानों को सिर्फ कोरे आश्वासनों के अलावा कुछ नहीं दिया। फसली समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी की बात में भी बेमानी दिखी।''

देश की राजधानी बीते कुछ दिनों से किसानों से घिरी है। खेती-किसानी छोड़ अन्नदाता इस समय दिल्ली में डेरा डाले हुए हैं। आंदोलन केंद्र सरकार द्वारा पारित कृषि सुधार अधिनियम के खिलाफ हो रहा है जिसमें पंजाब सहित उत्तर भारत के लाखों किसान शामिल हैं। जनाक्रोश को देखते हुए केंद्र सरकार ने फिलहाल बातचीत का पासा फेंका है। किसानों के दिल्ली कूच करने और उनकी क्या हैं मांगे आदि को जानने के लिए डॉ रमेश ठाकुर ने भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत से विस्तृत बातचीत की। पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश।

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प्रश्न- इस बार का मूवमेंट आर-पार की लड़ाई में दिखाई पड़ता है? 

उत्तर- जी बिल्कुल! अब आश्वासन का झुनझुना नहीं चाहिए हमें। मुकम्मल लिखित जवाब चाहिए। ये आंदोलन नहीं, बल्कि किसान क्रांति है। दिल्ली बॉर्डर पर हमारा काफिला पहुंचा तो पता चला कि हमें रोकने के लिए चारो ओर से पुलिस-आर्मी का पहरा बिछा दिया। लेकिन अबकी बार हम मरने से भी पीछे नहीं हटेंगे। सर्दी में हम पर वाटर कैनन से भिंगोया गया, आंसू गैस के गोले दागे गए, पानी की बौछारें छोड़ी गईं। किसानों पर लाठियां तक भांजी गई। शर्म आनी चाहिए केंद्र सरकार को हम किसान हैं, कोई आतंकवादी नहीं। हम अपना हक-हकूक मांग रहे हैं, आपसे दुआ या भीख नहीं? मोदी जी इतना समझ लेना इस बार हम खाली हाथ दिल्ली से नहीं लौटेंगे।

प्रश्न- मांगों के एजेंडे में नए कृषि सुधार अधिनियम ही हैं या कुछ और?

उत्तर- पहली बात तो ये है कि केंद्र सरकार द्वारा पारित तीनों नए कृषि सुधार अधिनियम को हम लागू नहीं होने देंगे। क्योंकि इससे किसान निश्चित रूप से उजड़ जाएंगे, खेतीविहीन हो जाएंगे। सड़कों पर आ जाएंगे। दूसरी मांग है स्वामी नाथन आयोग की सिफ़ारिशें लागू करना। जिस पर सरकार ने विचार करने का पिछले साल हमें आश्वासन दिया था। उस समय मांग को पूरा करने के लिए केंद्र सरकार ने थोड़ा समय मांगा था। लेकिन अब मियाद खत्म हो गई है। सरकार अपने वादे से मुकर गई। इन्हीं मांगों को पूरा करने के लिए हमारा आंदोलन हो रहा है।

प्रश्न- ये पांचवां बड़ा आंदोलन है, पूर्व की तरह सरकार ने फिर बातचीत का पांसा फेंका है? 

उत्तर- अब हम झांसे में नहीं आने वाले। किसानों ने पटकथा आर-पार की लिख दी है। सरकार के पास इस बार आखिरी मौका है। इस बार अगर सरकार ने पलटी मारी, तो देख लेना अन्नदाता किस तरह से सबक सिखाएंगे। नरेंद्र मोदी को एक बात नहीं भूलनी चाहिए। 2014 और 2019 में उनकी जीत में किसानों की भूमिका सबसे बड़ी रही। उसके बदले सरकार ने किसानों को सिर्फ कोरे आश्वासनों के अलावा कुछ नहीं दिया। फसली समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी की बात में भी बेमानी दिखी। दिल्ली का तख्ता पलटने में किसान अब देरी नहीं करेगा। किसानों का गुस्सा अब अपनी चरम सीमा को पार कर चुका है। हमें आश्वासन का झुनझुना नहीं चाहिए। अन्नदाताओं को अपनी किसानी का मेहनताना चाहिए।

प्रश्न- आंदोलन को खालिस्तान से जोड़ा जा रहा है?

उत्तर- खालिस्तान आतंकी हैं जो गतिविधियों में लिप्त रहते हैं। ये अन्नदाता हैं जो आपका पेट भरते हैं। शर्म आनी चाहिए उन लोगों को जो इनके दामन पर दाग लगाते हैं। पूरा मूवमेंट अहिंसक तरीके से हो रहा है। आंदोलित किसानों को हिदासतें दी गई हैं कि वह किसी भी सुरक्षाकर्मी से न उलझें। देखिए, वातानुकूलित कमरों में बैठकर किसानों की असल समस्याओं को नहीं समझ सकते। समझने के लिए खेतों में उतरना होगा। लेकिन ऐसा सफ़ेदपोश कर नहीं सकते, उससे उनके सफेद कपड़े मैले हो जाएंगे। आजादी के बाद से किसान इस वक्त सबसे बड़ी समस्याओं से गुजर रहे हैं। मंडियों में धान की ब्रिकी नहीं हो रही। किसान मारे-मारे फिर रहे हैं। शासन-प्रशासन सभी आँखें मूंदे हैं।

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प्रश्न- सूचना ऐसी भी है कि मौजूद किसान आंदोलन में कुछ स्वार्थी तत्व भी शामिल हैं?

उत्तर- ये दुष्प्रचार मात्र है। आंदोलन में जितने भी संगठन शामिल हैं सभी खाटी के किसान हैं। मेरे पिता जी महेंद्र सिंह टिकैत ने किसानों के हितों के लिए कितना संघर्ष किया। अन्नदाताओं की लड़ाई लड़ते-लड़ते अपने प्राण न्योछावर कर दिए। देश के किसान उनकी कुर्बानी को कभी नहीं भूल पाएंगे। हमारे भीतर भी उनका ही खून है। इसलिए आखिरी दम तक हम भारत के किसानों हितों के लिए निस्वार्थ लड़ते रहेंगे।

प्रश्न- उम्मीद है आपको, केंद्र सरकार इस बार मांगें मान लेगी? 

उत्तर- हर हाल में मानना पड़ेगा। वरना ख़ामियाज़ा भुगतने की लिए तैयार रहें। तख्त ताज उखाड़ फेंक देंगे। किसानों ने अपनी मांगे मनवाने का ब्लू प्रिंट तैयार किया हुआ है। इसके बाद समूचे भारत में किसान क्रांति आ जाएगी। दूध, सब्जी-राशन के अलावा ग्रामीण अंचल की सभी सामग्रियों की सप्लाई बंद कर देंगे। ऐसा करने के बाद देश में जो अराजकता फैलेगी, उसकी जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ केंद्र सरकार होगी। दिल्ली इस बार हम आर-पार की लड़ाई लड़ने पहुंचे हैं। खाली हाथ नहीं जाएंगे। हमें पता है आंदोलन को खत्म करने के लिए कोशिशें हो रही हैं। लेकिन हम डटे हैं, दिल्ली छोड़कर नहीं जाएंगे।

-फोन पर किसान नेता राकेश टिकैत ने जैसा डॉ. रमेश ठाकुर से कहा।







तीनों सशस्त्र बलों के लिए बेहद शक्तिशाली हथियार बनी ब्रह्मोस मिसाइल

  •  योगेश कुमार गोयल
  •  नवंबर 30, 2020   08:25
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तीनों सशस्त्र बलों के लिए बेहद शक्तिशाली हथियार बनी ब्रह्मोस मिसाइल
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ब्रह्मोस मिसाइल को पनडुब्बियों, विमानों और जमीन से अर्थात् तीनों ही स्थानों से सफलतापूर्वक लांच किया जा सकता है, जो भारतीय वायुसेना को समुद्र अथवा जमीन के किसी भी लक्ष्य पर हर मौसम में सटीक हमला करने के लिए सक्षम बनाती है।

भारत पिछले करीब तीन माह के दौरान एंटी रेडिएशन मिसाइल ‘रूद्रम-1’, परमाणु आयुध ले जाने में सक्षम मिसाइल ‘शौर्य’ सहित कई मिसाइलों का सफल परीक्षण कर चुका है। दरअसल भारत अपने दुष्ट पड़ोसी देशों चीन और पाकिस्तान को ईंट का जवाब पत्थर से देने की क्षमता विकसित करने के लिए इन दोनों देशों के साथ सीमा पर जारी तनाव के बीच अपनी ताकत बढ़ाने में जोर-शोर से जुटा है और यही कारण है कि पिछले तीन महीनों से एक के बाद एक भारत द्वारा लगातार क्रूज और बैलेस्टिक मिसाइलों के सफल परीक्षण किए जा रहे हैं। भारत की इन सामरिक तैयारियों को इसी से समझा जा सकता है कि जितने मिसाइल परीक्षण विगत दो-तीन माह के अंदर किए जा चुके हैं, उतने तो इससे पहले पूरे वर्षभर में भी नहीं होते थे। भारत और रूस के संयुक्त प्रयासों से बनाई गई सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ‘ब्रह्मोस’ के भी अलग-अलग संस्करणों के परीक्षण किए गए हैं तथा पहले से बनी इन शक्तिशाली मिसाइलों को अब और ज्यादा शक्तिशाली बनाते हुए भारत पूरी दुनिया को अपनी स्वदेशी ताकत का अहसास कराने का सफल प्रयास कर रहा है। ब्रह्मोस अपनी श्रेणी में दुनिया की सबसे तेज परिचालन प्रणाली है और डीआरडीओ द्वारा इस मिसाइल प्रणाली की सीमा को अब मौजूदा 290 किलोमीटर से बढ़ाकर करीब 450 किलोमीटर कर दिया गया है। ब्रह्मोस मिसाइल के नौसेना संस्करण का 18 अक्तूबर को अरब सागर में सफल परीक्षण किया गया था। परीक्षण के दौरान ब्रह्मोस ने 400 किलोमीटर की दूरी पर मौजूद लक्ष्य पर अचूक प्रहार करने की अपनी क्षमता को बखूबी प्रदर्शित किया था।

24 नवम्बर को अंडमान निकोबार में सतह से सतह पर अचूक निशाना लगाने वाली सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ‘ब्रह्मोस’ के ‘लैंड अटैक वर्जन’ का सफल परीक्षण किया गया। परीक्षण के दौरान एक अन्य द्वीप पर मौजूद लक्ष्य को ब्रह्मोस द्वारा सफलतापूर्वक नष्ट किया गया। इस परीक्षण की खास बात यह रही कि अब ब्रह्मोस मिसाइल के इस संस्करण की मारक क्षमता 290 से बढ़कर 400 किलोमीटर हो गई है, जिसकी रफ्तार ध्वनि की गति से तीन गुना ज्यादा है। भारत द्वारा चीन और पाकिस्तान के साथ बढ़ते तनाव के बीच ब्रह्मोस के इस नए संस्करण को परीक्षण से पहले ही चीन के साथ लगती सीमा पर तैनात किया जा चुका है। सैन्य सूत्रों के अनुसार भारतीय वायुसेना और नौसेना अगले कुछ दिनों में ब्रह्मोस के कुछ और नए संस्करणों का भी अलग-अलग परीक्षण करेंगी। ब्रह्मोस अब न केवल भारत के तीनों सशस्त्र बलों के लिए एक बेहद शक्तिशाली हथियार बन गई है बल्कि गर्व का विषय यह है कि अभी तक जहां भारत अमेरिका, फ्रांस, रूस इत्यादि दूसरे देशों से मिसाइलें व अन्य सैन्य साजोसामान खरीदता रहा है, वहीं भारत अपनी इस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल को दूसरे देशों को निर्यात करने की दिशा में अब तेजी से आगे बढ़ रहा है।

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ब्रह्मोस मिसाइल को पनडुब्बियों, विमानों और जमीन से अर्थात् तीनों ही स्थानों से सफलतापूर्वक लांच किया जा सकता है, जो भारतीय वायुसेना को समुद्र अथवा जमीन के किसी भी लक्ष्य पर हर मौसम में सटीक हमला करने के लिए सक्षम बनाती है। बेहद ताकतवर ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलें भारतीय वायुसेना के 40 से भी अधिक सुखोई लड़ाकू विमानों पर लगाई जा चुकी हैं, जिससे सुखोई लड़ाकू विमान पहले से कई गुना ज्यादा खतरनाक हो गए हैं। हाल ही में सुखोई-30 लड़ाकू विमान ने एक ऑपरेशन के तहत पंजाब के हलवारा एयरबेस से उड़ान भरते हुुए ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल से बंगाल की खाड़ी में अपने टारगेट को निशाना बनाया था। उल्लेखनीय है कि सुखोई विमान की दूर तक पहुंच के कारण ही इस विमान को ‘हिंद महासागर क्षेत्र का शासक’ भी कहा जाता है और ब्रह्मोस से लैस सुखोई तो अब दुश्मनों के लिए बेहद घातक हो गए हैं।

मिसाइलें प्रमुख रूप से दो प्रकार की होती हैं, क्रूज मिसाइल और बैलिस्टिक मिसाइल। क्रूज और बैलिस्टिक मिसाइलों में अंतर यही है कि क्रूज मिसाइल बहुत छोटी होती हैं, जिन पर ले जाने वाले बम का वजन भी ज्यादा नहीं होता और अपने छोटे आकार के कारण उन्हें छोड़े जाने से पहले बहुत आसानी से छिपाया जा सकता है जबकि बैलिस्टिक मिसाइलों का आकार काफी बड़ा होता है और वे काफी भारी वजन के बम ले जाने में सक्षम होती हैं। बैलिस्टिक मिसाइलों को छिपाया नहीं जा सकता, इसलिए उन्हें छोड़े जाने से पहले दुश्मन द्वारा नष्ट किया जा सकता है। क्रूज मिसाइल वे मिसाइलें होती हैं, जो कम ऊंचाई पर तेजी से उड़ान भरती हैं और रडार की आंख से भी आसानी से बच जाती हैं। बैलिस्टिक मिसाइल उर्ध्वाकार मार्ग से लक्ष्य की ओर बढ़ती हैं जबकि क्रूज मिसाइल पृथ्वी के समानांतर अपना मार्ग चुनती हैं। छोड़े जाने के बाद बैलिस्टिक मिसाइल के लक्ष्य पर नियंत्रण नहीं रहता जबकि क्रूज मिसाइल का निशाना एकदम सटीक होता है। ब्रह्मोस मिसाइल मध्यम रेंज की रेमजेट सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है, जिसे पनडुब्बियों, युद्धपोतों, लड़ाकू विमानों और जमीन से दागा जा सकता है। यह दस मीटर की ऊंचाई पर भी उड़ान भर सकती है और रडार के अलावा किसी भी अन्य मिसाइल पहचान प्रणाली को धोखा देने में भी सक्षम है, इसीलिए इसे मार गिराना लगभग असंभव माना जाता रहा है। इस मिसाइल का नाम भारत की ब्रह्मपुत्र नदी तथा रूस की मस्कवा नदी को मिलाकर रखा गया है और इसका 12 जून 2001 को पहली बार सफल लांच किया गया था। यह मिसाइल दुनिया में किसी भी वायुसेना के लिए गेमचेंजर साबित हो सकती है।

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ब्रह्मोस एक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है और डीआरडीओ अब रूस के सहयोग से इस मिसाइल की मारक दूरी और भी ज्यादा बढ़ाने के साथ ही इन्हें हाइपरसोनिक गति पर उड़ाने पर भी कार्य कर रहा है। दरअसल सुपरसोनिक मिसाइलों की गति ध्वनि की रफ्तार से तीन गुना अर्थात् तीन मैक तक होती है और इनके लिए रैमजेट इंजन का प्रयोग किया जाता है जबकि हाइपरसोनिक मिसाइलों की रफ्तार ध्वनि की गति से पांच गुना से भी ज्यादा होती है और इनके लिए स्क्रैमजेट यानी छह मैक स्तर के इंजन का प्रयोग किया जाता है। फिलहाल ब्रह्मोस के जो संस्करण उपलब्ध हैं, वे सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलें ही हैं, जो ध्वनि के वेग से करीब तीन गुना अधिक 2.8 मैक गति से अपने लक्ष्य पर जबरदस्त प्रहार करती हैं। यह दुनिया में अपनी तरह की ऐसी एकमात्र क्रूज मिसाइल है, जिसे सुपरसॉनिक स्पीड से दागा जा सकता है। दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक मिसाइल ब्रह्मोस अपने लक्ष्य के करीब पहुंचने से मात्र बीस किलोमीटर पहले भी अपना रास्ता बदल सकने वाली तकनीक से लैस है और यह केवल दो सैकेंड में चौदह किलोमीटर तक की ऊंचाई हासिल कर सकती है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यही है कि इसके दागे जाने के बाद दुश्मन को संभलने का मौका नहीं मिलता और यह पलक झपकते ही दुश्मन के ठिकाने को नष्ट कर देती है।

-योगेश कुमार गोयल

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार तथा सामरिक मामलों के विश्लेषक हैं)







ट्रांसपेरेन्सी इन्टरनेशनल की रपट के मुताबिक भ्रष्टाचार ही आज का शिष्टाचार है

  •  डॉ. वेदप्रताप वैदिक
  •  नवंबर 28, 2020   12:03
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ट्रांसपेरेन्सी इन्टरनेशनल की रपट के मुताबिक भ्रष्टाचार ही आज का शिष्टाचार है
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हर नौकरशाह अपने मालिक की नस-नस से वाकिफ होता है। उसे उसके हर भ्रष्टाचार का पता होता है। इसीलिए नौकरशाह के भ्रष्टाचार पर नेता उंगली नहीं उठा सकता है। भ्रष्टाचार की इस नारकीय वैतरणी के जल का सेवन करने में सरकारी बाबू और पुलिसवाले भी पीछे क्यों रहें ?

ट्रांसपेरेन्सी इन्टरनेशनल की ताजा रपट के अनुसार एशिया में सबसे अधिक भ्रष्टाचार यदि कहीं है तो वह भारत में है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को इससे गंदा प्रमाण-पत्र क्या मिल सकता है ? इसका अर्थ क्या हुआ ? क्या यह नहीं कि भारत में लोकतंत्र या लोकशाही नहीं, नेताशाही और नौकरशाही है ? भारत में भ्रष्टाचार की ये दो ही जड़े हैं। पिछले पांच-छह साल में नेताओं के भ्रष्टाचार की खबरें काफी कम आई हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि भारत की राजनीतिक व्यवस्था भ्रष्टाचार मुक्त हो गई है। उसका भ्रष्टाचार मुक्त होना असंभव है। यदि नेता लोग रिश्वत नहीं खाएंगे, डरा-धमकाकर पैसा वसूल नहीं करेंगे और बड़े सेठों की दलाली नहीं करेंगे तो वे चुनावों में खर्च होने वाले करोड़ों रु. कहां से लाएंगे ? 

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उनके रोज खर्च होने वाले हजारों रु. का इंतजाम कैसे होगा ? उनकी और उनके परिवार की ऐशो-इसरत की जिंदगी कैसे निभेगी ? इस अनिवार्यता को अब से ढाई हजार साल पहले आचार्य चाणक्य और यूनानी दार्शनिक प्लेटो ने अच्छी तरह समझ लिया था। इसीलिए चाणक्य ने अपने अति शुद्ध और सात्विक आचरण का उदाहरण प्रस्तुत किया और प्लेटो ने अपने ग्रंथ ‘रिपब्लिक’ में ‘दार्शनिक राजा’ की कल्पना की, जिसका न तो कोई निजी परिवार होता है और न ही निजी संपत्ति। लेकिन आज की राजनीति का लक्ष्य इसका एकदम उल्टा है। परिवारवाद और निजी संपत्तियों के लालच ने हिंदुस्तान की राजनीति को बर्बाद करके रख दिया है। उसको ठीक करने के उपायों पर फिर कभी लिखूंगा लेकिन नेताओं का भ्रष्टाचार ही नौकरशाहों को भ्रष्ट होने के लिए प्रोत्साहित करता है।

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हर नौकरशाह अपने मालिक (नेता) की नस-नस से वाकिफ होता है। उसे उसके हर भ्रष्टाचार का पता या अंदाज होता है। इसीलिए नौकरशाह के भ्रष्टाचार पर नेता उंगली नहीं उठा सकता है। भ्रष्टाचार की इस नारकीय वैतरणी के जल का सेवन करने में सरकारी बाबू और पुलिसवाले भी पीछे क्यों रहें ? इसीलिए एक सर्वेक्षण से पता चला था कि भारत के लगभग 90 प्रतिशत लोगों के काम रिश्वत के बिना नहीं होते। इसीलिए अब से 60 साल पहले इंदौर में विनोबाजी के साथ पैदल-यात्रा करते हुए मैंने उनके मुख से सुना था कि आजकल भ्रष्टाचार ही शिष्टाचार है। हमारे नेताओं और नौकरशाहों को गर्व होना चाहिए कि एशिया में सबसे अधिक शिष्ट (भ्रष्ट) होने की उपाधि भारत को उन्हीं की कृपा से मिली है।

-डॉ. वेदप्रताप वैदिक