परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में भारत की ऐतिहासिक सफलता

Nuclear Energy
ANI

तमिलनाडु के कलपक्कम में स्थित प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर भारत का पहला स्वदेशी फास्ट ब्रीडर परमाणु रिएक्टर है। 500 मेगावाट क्षमता वाले इस उन्नत रिएक्टर को इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र ने डिजाइन और भारतीय नाभिकीय विद्युत् निगम लिमिटेड ने निर्मित किया है।

पश्चिमी एशिया युद्ध और तनाव के मध्य भारत ने परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र मे आत्मनिर्भरता प्राप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि प्राप्त की है। भारत ने तमिलनाडु के कलपक्कम स्थित परमाणु ऊर्जा संयंत्र में क्रिटिकैलिटी प्राप्त कर ली है। अब रूस के बाद भारत दूसरा ऐसा देश बन गया है जहां ऑटो मोड में परमाणु चेन रिएक्शन प्रारंभ हो गया है। यह सपना महान वैज्ञानिक स्वर्गीय होमी जहांगीर भाभा का थो जो अब पूर्ण हुआ है।वैज्ञानिकों की यह सफलता भारत को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने में सहायता देगी। यह 2070 के नेट जीरो लक्ष्य की ओर बड़ा कदम है। 

अगर यह कार्य सफलता पूर्वक आगे बढ़ता रहा तो भारत जल्द ही पारंपरिक जीवाश्म ईंधन से ऊर्जा बनाने की जगह स्वच्छ अक्षय ऊर्जा बनाने के लिए तैयार हो जाएगा। भारत के 500 मेगावाट क्षमता वाले प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर के प्रथम क्रिटिकैलिटी स्तर पर पहुंचने के बाद सरकार ने कहा कि फास्ट ब्रीडर रिएक्टर उच्च तापीय दक्षता के साथ विश्वसनीय, कम कार्बन उर्त्सजन वाली बेस लोड बिजली आपूर्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। नियंत्रित परमाणु विखंडन श्रृंखला प्रतिक्रिया की शुरूआत का यह मील का पत्थर देश को दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने और स्वदेशी परमाणु प्रौद्योगिकी क्षमताओं को आगे बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड द्वारा निर्धारित सभी सुरक्षा मानदंडों को पूरा करने के बाद पीएफबीआर ने क्रिटिकैलिटी प्राप्त कर ली। 

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तमिलनाडु के कलपक्कम में स्थित प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर भारत का पहला स्वदेशी फास्ट ब्रीडर परमाणु रिएक्टर है। 500 मेगावाट क्षमता वाले इस उन्नत रिएक्टर को इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र ने डिजाइन और भारतीय नाभिकीय विद्युत् निगम लिमिटेड ने निर्मित किया है। इसे बनाने में 200 से अधिक भारतीय उद्योगों ओर लघु एवं मध्यम उद्योगों की भूमिका रही है। इस रिएक्टर को भविष्य में थोरियम- 232 का उपयोग करने के लिए भी डिजाइन किया गया है। जो स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन के लिए भारत के विशाल थोरियम भंडार का दोहन करने के दीर्घकालिक लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। 

क्या होती है क्रिटिकैलिटी- यह परमाणु रिएक्टर के संचालन की वह स्थिति है जिसमें परमाणु विखंडन की श्रृंखला प्रक्रिया स्थिर हो जाती है। इसका अर्थ यह है कि यह रिएक्टर अब बिना किसी बाहरी दखल के मौजूदा ईंधन के द्वारा ऊर्जा बनाने के लिए तैयार हो गया है। क्रिटिकैलिटी प्राप्त करना सीधे बिजली बनाना नहीं है अपितु यह उसके लिए पहली अनिवार्यता है। अब इस रिएक्टर की क्षमता और कुशलता को समझने के लिए कम क्षमता वाले कुछ परीक्षण किये जाएंगे जिसके बाद इसे पावर ग्रिड से जोड़कर बिजली उत्पादन शुरू किया जा सकता है। 

यह उपलब्धि मात्र एक रिएक्टर चलाने की नहीं है, इससे भारत की परमाणु ऊर्जा क्षमता बढ़ेगी। इससे 2070 तक नेट जीरो लक्ष्य प्राप्त करने में सफलता मिलेगी। फास्ट ब्रीडर रिएक्टर कम कचरा पैदा करता है यह यूरेनियम और प्लूटोनियम का बेहतर उपयोग करता है । इससे भविष्य में  बिजली सस्ती होगी। देश ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में मजबूत बनेगा। भविष्य में और अधिक ऐसे रिएक्टर बनाए जा सकेंगे जो थोरियम का इस्तेमाल कर बिजली बनाएंगे । 

यह रिएक्टर 2004 में शुरू हुआ था लेकिन कई तकनीकी चुनौतियों, देरी और लागत बढ़ने के कारण अब जाकर क्रिटिकैलिटी प्राप्त कर सका है। तरल सोडियम को संभालना, सुरक्षा मानक पूरा करना और बहुत सारे परीक्षण करना असान नहीं था। इसका बजट बढ़ा  किंतु सरकार का पूरा समर्थन मिलता रहा। अब यह सफलता दिखाती है कि भारत कठिन टेक्नोलॉजी में भी आत्मनिर्भर हो सकता है। पूर्व परमाणु ऊर्जा आयोग अध्यक्ष डा. अनिल काकोदकर ने इस सफलता को ऐतिहासिक बताया है  और कहा कि यह भारत के तीन चरण के कार्यक्रम को नई दिशा व गति देगा। यह उन्नत रिएक्टर खपत से अधिक ईधन उत्पादन करने में सक्षम है जो देश की वैज्ञानिक क्षमता को और इंजीनियरिंग कौशल की मजबूती को दर्शाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे कार्यक्रम के तीसरे चरण में भारत के विशाल थोरियम भंडार के उपयोग की दिशा में एक निर्णायक कदम बताया है। प्रधानमंत्री मोदी ने इस परियोजना में शामिल वैज्ञानिकों और इंजीनियरों  को बधाई दी और इस सफलता को भारत वैज्ञानिक कौशल का प्रमाण बताया।  

सरकार ने 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है। जापान फ्रांस और  अमेरिका आदि देश सुरक्षा चिंताओं के कारण ऐसी परियोजनाएं बंद कर चुके हैं परंतु भारत की स्थिति और जरूरत दोनों ही अलग है। 

- मृत्युंजय दीक्षित 

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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