Indonesia में PM Modi ने कर दिया बड़ा खेल, Indo Pacific के सारे समीकरण ही बदल कर रख दिये

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में जिस दृढ़ता से कहा कि भारत विस्तारवाद नहीं बल्कि विकासवाद के मार्ग पर चलता है, वह सीधे तौर पर उस वैश्विक शक्ति संतुलन की ओर इशारा था जहां कई ताकतें समुद्री इलाकों पर दबदबा बनाने की कोशिश कर रही हैं।
भारत और इंडोनेशिया के रिश्तों ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि बदलती वैश्विक राजनीति में दोनों देश केवल पुराने मित्र नहीं, बल्कि भविष्य के रणनीतिक साझेदार भी हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया यात्रा ने हिंद महासागर और इंडो पैसिफिक क्षेत्र में भारत की बढ़ती भूमिका को नई मजबूती दी है। जकार्ता में जिस गर्मजोशी और सम्मान के साथ प्रधानमंत्री मोदी का स्वागत हुआ, उसने साफ संकेत दिया कि भारत अब एशिया की राजनीति, सुरक्षा और विकास की दिशा तय करने वाली प्रमुख शक्ति बन चुका है। देखा जाये तो प्रधानमंत्री की इंडोनेशिया यात्रा लोकतंत्र, समुद्री सुरक्षा, आर्थिक सहयोग और सांस्कृतिक विरासत पर आधारित एक नए क्षेत्रीय गठबंधन की मजबूत नींव भी साबित हुई।
इंडोनेशिया की संसद में प्रधानमंत्री मोदी का संबोधन इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण क्षण रहा। उन्होंने भारत और इंडोनेशिया को केवल दो देश नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से जुड़े सभ्यतागत साझेदार बताया। रामायण, महाभारत, नालंदा और प्रम्बानन मंदिर का उल्लेख करते हुए मोदी ने साफ कहा कि समुद्र ने दोनों देशों को कभी अलग नहीं किया, बल्कि यही समुद्र दोनों को जोड़ने वाला पुल बना। उनका यह संदेश केवल सांस्कृतिक संदेश नहीं था, बल्कि इंडो पैसिफिक की नई भू-रणनीतिक सोच का संकेत भी था।
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में जिस दृढ़ता से कहा कि भारत विस्तारवाद नहीं बल्कि विकासवाद के मार्ग पर चलता है, वह सीधे तौर पर उस वैश्विक शक्ति संतुलन की ओर इशारा था जहां कई ताकतें समुद्री इलाकों पर दबदबा बनाने की कोशिश कर रही हैं। मोदी ने स्पष्ट किया कि भारत और इंडोनेशिया यदि साथ खड़े होते हैं तो लोकतंत्र पर दुनिया का भरोसा और मजबूत होगा। यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इंडो पैसिफिक क्षेत्र आज वैश्विक राजनीति का सबसे संवेदनशील केंद्र बन चुका है।
इस यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि दोनों देशों के बीच हुए 20 ऐतिहासिक समझौते रहे। रक्षा, समुद्री सुरक्षा, अंतरिक्ष, दुर्लभ खनिज, दूरसंचार, कृषि, स्वास्थ्य, डिजिटल ढांचा और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में हुए ये समझौते आने वाले वर्षों में भारत और इंडोनेशिया की साझेदारी को नई ऊंचाई देने वाले हैं। सबसे अधिक चर्चा ब्रह्मोस मिसाइल प्रणाली और हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलों पर हुए समझौतों की रही। यह हिंद महासागर क्षेत्र में सामरिक संतुलन को मजबूत करने वाला कदम है।
देखा जाये तो भारत द्वारा इंडोनेशिया के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाना कई मायनों में बेहद महत्वपूर्ण है। मलक्का जलडमरूमध्य के पास स्थित इंडोनेशिया वैश्विक समुद्री व्यापार का अहम केंद्र है। दुनिया के बड़े हिस्से का व्यापार इसी मार्ग से गुजरता है। ऐसे में भारत और इंडोनेशिया के तटरक्षक बलों के बीच समुद्री सुरक्षा सहयोग बढ़ना सीधे तौर पर हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की रणनीतिक उपस्थिति को मजबूत करेगा। यह साझेदारी समुद्री डकैती, अवैध गतिविधियों और किसी भी प्रकार की आक्रामक विस्तारवादी नीति के खिलाफ एक मजबूत सुरक्षा ढांचा तैयार करेगी।
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने बयान में महा सागर दृष्टि का उल्लेख करते हुए साफ कहा कि भारत मुक्त, खुला और नियम आधारित इंडो पैसिफिक चाहता है। यह संदेश पूरी दुनिया और खासतौर पर चीन के लिए था कि भारत किसी गुट की राजनीति नहीं बल्कि संतुलित और स्थिर वैश्विक व्यवस्था का समर्थक है। आसियान की केंद्रीय भूमिका पर भारत का जोर यह भी दिखाता है कि नई दिल्ली दक्षिण पूर्व एशिया को केवल व्यापारिक साझेदार नहीं बल्कि रणनीतिक सहयोगी मानती है।
हम आपको बता दें कि मोदी की इस यात्रा में तकनीक और डिजिटल क्षेत्र में हुए समझौते भी बेहद महत्वपूर्ण रहे। भारत के डिजिटल सार्वजनिक ढांचे के आधार पर इंडोनेशिया ओपन नेटवर्क की शुरुआत, भुगतान प्रणाली को जोड़ने की तैयारी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता तथा स्टार्टअप सहयोग पर सहमति इस बात का संकेत है कि भारत अब तकनीकी नेतृत्व की दिशा में भी निर्णायक भूमिका निभा रहा है। भारतीय प्रबंधन संस्थान बेंगलुरु का परिसर इंडोनेशिया में खोलने का फैसला शिक्षा और ज्ञान कूटनीति के क्षेत्र में भारत की बढ़ती ताकत को दर्शाता है।
साथ ही प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि उन्होंने मोदी सरकार की कई योजनाओं को अपनाया है। उन्होंने हंसी मजाक में कहा कि उन्हें खुशी है कि इन योजनाओं पर किसी का अधिकार नहीं है। लेकिन इस हल्के फुल्के बयान के भीतर भारत के विकास मॉडल की अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता का बड़ा संदेश छिपा था। इंडोनेशिया द्वारा भारत की कृषि तकनीक, सूखी जमीन को उपजाऊ बनाने के प्रयोग और जनकल्याण योजनाओं का अध्ययन यह दिखाता है कि दुनिया अब भारत को केवल बाजार नहीं बल्कि समाधान देने वाले राष्ट्र के रूप में देख रही है।
प्रधानमंत्री मोदी को इंडोनेशिया का सर्वोच्च नागरिक सम्मान बिंतांग आदिपूर्ण दिया जाना भी इस यात्रा की बड़ी उपलब्धि रहा। यह सम्मान केवल एक व्यक्ति का नहीं बल्कि भारत की बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा का प्रतीक है। मोदी ने इसे भारत और इंडोनेशिया की साझा लोकतांत्रिक परंपराओं तथा सभ्यतागत रिश्तों को समर्पित किया। यह सम्मान बताता है कि दुनिया में भारत की साख पहले से कहीं अधिक मजबूत हुई है।
साथ ही भारत और इंडोनेशिया के बीच दुर्लभ खनिज, इस्पात आपूर्ति श्रृंखला और दुर्लभ पृथ्वी चुंबकों पर हुए समझौते भविष्य की वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिहाज से भी बेहद अहम हैं। आने वाले समय में प्रौद्योगिकी और रक्षा उत्पादन के लिए दुर्लभ खनिजों की भूमिका निर्णायक होगी। ऐसे में भारत का इंडोनेशिया के साथ इस क्षेत्र में साझेदारी करना दूरगामी रणनीतिक सोच का परिचायक है। देखा जाये तो भारत अब दुनिया को यह संदेश दे रहा है कि वह विकास, लोकतंत्र, सुरक्षा और सांस्कृतिक शक्ति का ऐसा संगम है जो वैश्विक व्यवस्था को नई दिशा दे सकता है।
बहरहाल, मोदी सरकार की विदेश नीति की सबसे बड़ी सफलता यही है कि उसने भारत को रक्षात्मक सोच से निकालकर निर्णायक वैश्विक नेतृत्व की भूमिका में पहुंचा दिया है। कभी केवल दक्षिण एशिया तक सीमित माना जाने वाला भारत आज इंडो पैसिफिक की धुरी बन चुका है। दुनिया के बड़े राष्ट्र भारत के साथ साझेदारी को अपनी रणनीतिक आवश्यकता मान रहे हैं। इंडोनेशिया यात्रा ने एक बार फिर साबित कर दिया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की विदेश नीति आत्मविश्वास, सांस्कृतिक गौरव, सामरिक दूरदृष्टि और वैश्विक प्रभाव का नया अध्याय लिख रही है।
-नीरज कुमार दुबे
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