युवाओं का देश होने के बाद भी खुशहाली के मामले में पिछड़ता भारत

By देवेन्द्रराज सुथार | Publish Date: Apr 13 2019 2:53PM
युवाओं का देश होने के बाद भी खुशहाली के मामले में पिछड़ता भारत
Image Source: Google

आखिर क्या कारण है कि भारत विश्व की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के बाद भी अपने लोगों को खुशी नहीं दे पा रहा है। नेताओं के द्वारा देश के विकास व जन जीवन के सुधार की घोषणाओं व भाषणों के बाद भी लोगों को खुशी हासिल क्यों नहीं हो पा रही हैं। देश के विकास व तरक्की को लेकर यह बड़ा सवाल है।

खुशी किसी भी देश व स्वस्थ समाज के विकास का आवश्यक गुण होता है। लोगों के चेहरे पर खुशी का भाव और गमों का अभाव ही किसी देश व समाज की संपन्नता और समृद्धि की ओर संकेत करता है। विकास का अर्थ भी लोगों की खुशी से ही है। खुशी के बिना विकास अधूरा है। खुशी जैसे परम आनंद को खरीदा नहीं जा सकता है बल्कि वह अच्छाई और बेहतरी की राहों से स्वत: ही चला आता है। हमें खुश रहना फिनलैंड से सीखना चाहिए। जिसने दूसरी बार वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट में पहला पायदान हासिल कर अपने देश के सबसे खुशनुमा होने की सार्वजनिक घोषणा कर दी है। लेकिन भारत के लिए यह रिपोर्ट खुशी देने वाली नहीं है। भारत लगातार वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट में लुढ़कता जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास समाधान नेटवर्क द्वारा कुल 156 देशों को लेकर तैयार की गई इस रिपोर्ट में भारत का स्थान 140वां है। जबकि पिछली साल भारत का स्थान 133वां था। यानी की भारत एक साल के अंतराल के साथ सात कदम पीछे चला गया है। गौरतलब है कि खुशहाली का आकलन छह बिंदुओं के आधार पर तय किया जाता है। इनमें आमदनी, स्वास्थ्य, जीवन प्रत्याशा, सामाजिक समर्थन, स्वतंत्रता, विश्वास और उदारता जैसे मानवीय तत्व शामिल हैं। 
 
आखिर क्या कारण है कि भारत विश्व की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के बाद भी अपने लोगों को खुशी नहीं दे पा रहा है। नेताओं के द्वारा देश के विकास व जन जीवन के सुधार की घोषणाओं व भाषणों के बाद भी लोगों को खुशी हासिल क्यों नहीं हो पा रही हैं। देश के विकास व तरक्की को लेकर यह बड़ा सवाल है। फिनलैंड के सबसे ज्यादा खुश रहने की वजह वहां की बेहतर स्वास्थ्य सेवा, अच्छी शिक्षा, मजबूत सामाजिक ढांचा, मानवीय विकास व सुविधाएं, सुशासन व ईमानदार पुलिस प्रशासन है। कुल 55 लाख की जनसंख्या वाले फिनलैंड देश में लोग एक-दूसरे के प्रति कई ज्यादा भरोसामंद हैं। जबकि इसकी तुलना में भारत की स्थिति काफी हद तक अलग-थलग है। भारतीय समाज आज भी तनाव में जीवन बसर कर रहा है। हमारी सामाजिक संरचना कमजोर होती जा रही है। वस्तुत: लड़ाई-झगड़े की घटनाओं में वृद्धि इसका परिणाम है। आजादी के सात दशक बाद भी देश में एक बड़ी आबादी रोटी, कपड़ा और मकान के लिए तरस रही हैं। महिला सुरक्षा और युवा रोजगार जैसी समस्याएं देश का सुख-चैन छीन रही हैं। वहीं बढ़ती जनसंख्या हमारे विकास की योजनाओं पर पानी फेरने का काम करने के साथ ही देश को पीछे धकेल रही है।
 


सच्चाई तो यह है भारत जैसे देश में जहां अब भी एक अरब की आबादी स्वच्छ पानी के लिए संघर्षरत है वहां खुशी के मामले में पीछे खिसकना तो स्वाभाविक है। किसी भी देश में भौतिक प्रगति और आर्थिक समृद्धि का प्रत्यक्ष संबंध व्यक्ति की प्रसन्नता से होता है। लेकिन हमारे देश में अजब किस्म का विरोधाभास दिखता है। विचारणीय है कि 'सबका साथ-सबका विकास' का दावा करने वाली सरकार के शासन में असमानता की खाई दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। वैश्विक असमानता सूचकांक में भारत इस वक्त दुनिया के 180 मुल्कों में 135वें स्थान पर है। यानी हमारे यहां ‘आर्थिक विकास’, ‘ग्रोथ रेट’ और तमाम तरह के कर-सुधारों का लाभ सबको नहीं मिल पा रहा है। कुछ लोग खूब तरक्की कर रहे हैं, जबकि बहुत सारे लोग बेहाल हो रहे हैं। इससे असमानता तेजी से बढ़ रही है। पता नहीं क्यों अपने देश के अमीर लोग इस स्थिति से तनिक भी विचलित नहीं नजर आते। वे क्यों नहीं सोचते कि दुनिया उन्हें ‘भुक्खड़ों और बर्बाद लोगों के महादेश’ का ‘अमीर’ मानती है? वे अपने इस निजी और राष्ट्रीय-अपमान से आहत क्यों नहीं होते? दुनिया का सर्वाधिक खुशहाल इलाका कहलाने वाले यूरोप में कौन-सा ऐसा देश होगा, जहां भारत की तरह सिर्फ 1 फीसदी लोग पूरे मुल्क की 58 फीसदी संपदा के मालिक हों और 10 फीसदी लोग देश की लगभग 80 फीसदी संपदा पर काबिज हों? इससे भारत में तेजी से बढ़ती गैर-बराबरी का अंदाजा अच्छी तरह लगाया जा सकता है, लेकिन हमारे योजनाकारों के लिये यह चिंता का सबब नहीं है। 
वहीं खुशहाल देश के निर्माण के लिए आमजन का उत्तम स्वास्थ्य एक अहम तत्व होने के बाद भी भारत में स्वास्थ्य सेवाओं का हाल बेहाल है। हमारे देश की स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता का अंदाजा तो इस बात से हो जाता है कि देश में 14 लाख डॉक्टरों की कमी हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के आधार पर जहां प्रति एक हजार आबादी पर एक डॉक्टर होना चाहिए। वहां भारत में सात हजार की आबादी पर एक डॉक्टर है। भारत स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में बांग्लादेश, चीन, भूटान और श्रीलंका समेत अपने कई पड़ोसी देशों से पीछे हैं। इसका खुलासा शोध एजेंसी 'लैंसेट' ने अपने 'ग्लोबल बर्डेन ऑफ डिजीज' नामक अध्ययन में हुआ है। इसके अनुसार, भारत स्वास्थ्य देखभाल, गुणवत्ता व पहुंच के मामले में 195 देशों की सूची में 145वें स्थान पर हैं। विडंबना है कि आजादी के सात दशक बाद भी हमारे देश में स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार नहीं हो सका हैं। सरकारी अस्पतालों का तो भगवान ही मालिक है ! दरअसल हमारे देश का संविधान समस्त नागरिकों को जीवन की रक्षा का अधिकार तो देता हैं लेकिन जमीनी हकीकत बिलकुल इसके विपरीत है। हमारे देश में स्वास्थ्य सेवा की ऐसी लचर स्थिति है कि सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकों की कमी व उत्तम सुविधाओं का अभाव होने के कारण मरीजों को अंतिम विकल्प के तौर पर निजी अस्पतालों का सहारा लेना पड़ता हैं। देश में स्वास्थ्य जैसी अतिमहत्वपूर्ण सेवाएं बिना किसी विजन व नीति के चल रही है। ऐसे हालातों मे गरीब के लिए इलाज करवाना अपनी पहुंच से बाहर होता जा रहा हैं। ग़ौरतलब है कि हम स्वास्थ्य सेवाओं पर सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी को सबसे कम खर्च करने वाले देशों में शुमार हैं। आंकड़ों के मुताबिक, भारत स्वास्थ्य सेवाओं में जीडीपी का महज़ 1.3 प्रतिशत खर्च करता है, इस मामले में नेपाल और पाकिस्तान जैसे देशों से भी हम पीछे हैं, यह शर्म की बात है।


 
विद्रूपताओं, समस्याओं, कुरीतियों, अंधविश्वास और अनेक भ्रम में जीने वाले भारतीय समाज को जब तक गरीबी, बेरोजगारी व कुपोषण की खाई से बाहर नहीं निकाला जाएगा तब तक हमारी खुशी केवल सरकारी कागजों का ही मौसम गुलाबी करती रहेगी। हमारे देश का भविष्य नंगा और भूखा यूं ही सड़कों पर कचरा बीनता रहेगा। आवयश्यकता अब देश में उदारीकृत नीतियां की नहीं बल्कि देश के हर पीड़ित, वंचित, शोषित जन का असल मायनों में उ़द्धार करने वाली नैतिकता की है। और यह नैतिकता सरकार, नौकरशाही और देश के हर आमजन के मन में रचे-बसे भ्रष्टाचार के दानव का अंत किये बगैर नहीं आएगी। देश के नेताओं को अब देश की दरिद्रता और बेबसी की पुकार सुनकर जगना ही होगा। केवल वायदों के लिए नहीं बल्कि देश की लड़खड़ाती नैया के खेवनहार बनकर आमजन को खुशी के घाट तक ले जाने के लिए आगे आना ही होगा। 
 
- देवेन्द्रराज सुथार


रहना है हर खबर से अपडेट तो तुरंत डाउनलोड करें प्रभासाक्षी एंड्रॉयड ऐप   



Disclaimer: The views expressed here are solely those of the author in his/her private capacity and do not necessarily reflect the opinions, beliefs and viewpoints of Prabhasakshi and do not in any way represent the views of Prabhasakshi.

Related Story