शिक्षक व किताबें बोरिंग लगती हैं और स्मार्ट डिवाइसें ज्ञान का खजाना लगती हैं !

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आज तकनीक आधारित शिक्षा ने निश्चित ही शिक्षा के स्वरूप को बदल दिया है। इन शिक्षकों के हाथ में स्मॉट फोन भी महज सिरदर्द से ज्यादा नहीं होता। यदि इन्हें सरकार टैबलेट भी देती है तो उनके लिए कोई खास काम का नहीं होता। वो तकनीक उनके बच्चों के खेलने में प्रयोग होती है।

''एलेक्जा लाइट ऑन कर दो।'' एलेक्जा प्ले ''लकड़ी की काठी'' ''एलेक्जा डिम द लाइट'' ये एलेक्जा कौन है? यह एलेक्जा कहां रहती है? किसकी दासी या दोस्त है जो बार-बार कई बार आपके आदेश का पालन करती है। कभी भी मानने से इंकार नहीं करती। हां तभी यह सॉरी कहती है जब उसे आपकी भाषा या कमांड समझ नहीं आती। एलेक्जा आपकी भाषा समझती और बात भी करती है। लेकिन यदि आप पूछ लें एलेक्जा तुम्हारी आंखें कहां हैं? कान कहां हैं? तब वह उत्तर देती है सॉरी मेरे पास नहीं हैं। बच्चों के लिए तो कौतूहल का विषय है ही एलेक्जा, बल्कि उन पीढ़ियों के लिए भी हैरान करती है एलेक्जा जो कृत्रिम बौदि्धकता का नाम नहीं सुने हों।

यह एलेक्जा किसी और कंपनी में निर्मित होती है तब उसका नाम कुछ और हो जाता है। जैसे हमारे जन्म लेने के घर−परिवार, जाति, धर्म बदल जाए तो हमारे नाम भी बदल जाते हैं। इसे अंग्रेजी में आर्टिफिसियल इंटेलिजेंसिया कहते हैं। यानी एआई। बहुत संभव है आने वाले दिनों में स्कूली कक्षाओं में एलेक्जा जैसी कोई एआई बच्चों को कोई कविता सुना रही हो, ईदगाह कहानी सुना रही हो और शिक्षक पास में बैठे कमांड भर दे रहे हों या फिर कहानी की मूल संवेदना की परते खोल रहे हों।

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हाल ही में ज़ारी राष्ट्रीय शिक्षा नीति मसौदा 2019 सूचना संचार प्रौद्योगिकी आईसीटी को लेकर बड़ी ही शिद्दत से स्कूली, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर आईसीटी को लागू करने की योजनाएं लेकर आने और अमलीजामा पहनाने की रणनीति की ओर हमारा ध्यान खींचती है। रा.शि. नीति 2019 का अध्याय 19 खासकर शिक्षा में प्रौद्योगिकी पाठ में उद्देश्य स्पष्ट करते हैं, ''शिक्षकों की तैयारी और विकास, शिक्षण−अधिगम और मूल्यांकन प्रक्रिया को बेहतर बनाने, वंचित समूहों तक शिक्षा की पहुंच को सुलभ बनाने और शैक्षिक योजना, प्रशासन और प्रबंधन की प्रक्रिया सहित शिक्षा के सभी क्षेत्रों में प्रौद्योगिकी का उपयुक्त एकीकरण करना।'' इस मकसद को पाने के लिए शिक्षकों को सतत् पेशेवर विकास कार्यक्रमों से जोड़ने की योजना भी बनाई और बताई गई है। 

इस दस्तावेज़ के शुरुआती अध्यायों को देखें तो पाते हैं कि बार बार शिक्षकों के पेशेवर विकास पर जोर दिया गया है। हम यहां यह भी स्पष्ट करते चलें कि पेशेवर विकास से क्या मायने हैं? हर पेशे की अपनी खास अपेक्षाएं होती हैं और दक्षताएं भी। मसलन वकील, डॉक्टर, पत्रकार लेखक आदि की पेशेवर विकास तो यही मानी जा सकती है कि ये लोग अपने क्षेत्र में होने वाले शोध, प्रपत्रों, साहित्यों को पढ़ें और अपने काम में उसे शामिल भी करें। किस कोर्ट ने किस बैंच ने फलां जैसे केस में क्या कदम उठाए और क्या न्याय सुनाया इसकी समझ और जानकारी होगी तो वकील को अपने वर्तमान केस को समझने और चुनौतियों को कम करने में मदद मिलेगी। वैसे ही यदि कोई लेखक है तो उसे अपने क्षेत्र का साहित्य सतत् पढ़ते रहना चाहिए। इससे पूर्व के कामों की पुनरावृत्ति से बच सकते हैं और उस काम में एक नया आयाम जोड़ सकते हैं। जब हम शिक्षक की बात करते हैं तो इस वर्ग के लिए सतत् पेशेवर विकास यही हो सकता है कि कैसे बेहतर शिक्षण करें। कैसे अपनी कक्षा के बच्चों को सीखने−सिखाने की प्रक्रिया से आनंददायक तरीके से जोड़ सकते हैं। ऐसा क्या और कौन सी विधि अपनाएं जिससे हमारे बच्चों में पढ़ने की दक्षता विकसित हो जाए। यही चिंताएं शिक्षक को कई बार नया सोचने और अनुसंधान करने की ओर धकेलती हैं। यही पेशेवराना नवाचार अन्य शिक्षकों के लिए नजी़र साबित हो।

शिक्षकों के सतत पेशेवर विकास के लिए राष्ट्रीय स्तर का शैक्षिक तकनीक फोरम का गठन किया जाएगा। इसे नेशनल एजूकेशन टेक्नालोजी फोरम नाम से रेखांकित किया गया है। इस फोरम के ज़रिए देश भर के विश्वविद्यालयों, कॉलेजों, स्कूलों, स्कूल कॉम्प्लेक्स को नेटवर्क और हब से जोड़ा जाएगा। शिक्षकों को कंटेंट, वीडियो, टेक्स्ट आदि ऑन लाइन और ऑफ लाइन उपलब्ध कराई जाएंगी जिसका प्रयोग शिक्षक अपनी कक्षा में पढ़ाने के दौरान इस्तेमाल करेगा। आईसीटी पर खास जोर इस रूप में भी दिया गया है कि इस आईसीटी के इस्तेमाल से दूर दराज़ के युवाओं, बच्चों, महिलाओं आदि को भी शिक्षा से जोड़ सकें। जो बच्चे व बच्चियां स्कूल नहीं आ सकते किन्तु उनके पास फोन भर है या स्कूल कॉम्प्लेक्स आ सकती हैं तो उन्हें इन लैबों में शिक्षा मुहैया कराई जा सके। जो भी वर्ग पूर्व में शिक्षा हासिल करने से वंचित रहा है वो और शिक्षा की मुख्यधारा से बाहर न रह सकें। बच्चों की परीक्षा मूल्यांकन करने से लेकर प्रबंधित करने आदि के कामों को भी आईसीटी के ज़रिए आसान बनाने की कोशिश इस नीति में नज़र आती है। 

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इस तथ्य से भी इंकार नहीं कर सकते कि जो शिक्षक शिक्षण के पेशे में 1990 या उससे पूर्व जुड़े थे, उन्हें पाठ्यपुस्तकों से पढ़ाने में सहजता होती है। उनकी स्वयं की पेशेवर तैयारी और प्रशिक्षण तब वैसी नहीं दी गई होगी जैसी आज दी जा रही है। आज तकनीक आधारित शिक्षा ने निश्चित ही शिक्षा के स्वरूप को बदल दिया है। इन शिक्षकों के हाथ में स्मॉट फोन भी महज सिरदर्द से ज्यादा नहीं होता। यदि इन्हें सरकार टैबलेट भी देती है तो उनके लिए कोई खास काम का नहीं होता। वो तकनीक उनके बच्चों के खेलने में प्रयोग होती है। यह स्पष्ट तौर पर वे शिक्षक स्वीकार भी करते हैं कि हमारे लिए तो किताबें ही ठीक हैं। हमें तो इसे चलाना भी नहीं आता। सो ऐेसे शिक्षकों को आईसीटी का प्रशिक्षण देने की जिम्मा सरकार उठा रही है व सरकार की विभिन्न शैक्षिक संस्थाएं उठाएंगी। हमारे हर शिक्षक को कम्प्यूटर चलाने, मेल खोलने, कंपोज करने, वर्ड में काम करने और एक्सेल में शीट बनाने की तालीम दी जाएगी। इससे शिक्षकों को दूसरों पर निर्भर नहीं रहना होगा। आईसीटी आज की तारीख में न केवल शिक्षा बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में खास महत्वपूर्ण हो चुकी है। श्रीकांत वर्मा की एक कविता की पंक्ति ''जो रचेगा वो कैसे बचेगा, जो बचेगा वो कैसे रचेगा।'' शिक्षक अपनी अहम भूमिका से बच नहीं सकता। जो शिक्षक अपनी पेशेवर दक्षता का प्रयोग कक्षा में नहीं करता उसे बच्चे स्वीकार नहीं कर पाते। 

शिक्षक के पेशेवर मांग से यह भी अर्थ ध्वनित होती है कि शिक्षक स्वयं पढ़ना पसंद करे और पढ़ाने को आनंद के साथ जोड़ कर कक्षा तक ले जाएं। पढ़ने से सीधा तात्पर्य अखबार, पत्रिका आदि तक महदूद नहीं है और न ही पाठ्यपुस्तकों को पढ़ना भर है, बल्कि अन्यान्य साहित्य पढ़ना इस श्रेणी में शामिल होता है। आज की तारीख में पढ़ने के लिए समय निकालना और पढ़ने की आदत को बचाए रखना एक चुनौतीपूर्ण काम है। हमारे आसपास सूचना और सूचना तकनीक के मार्फत टेरा बाइट में सूचनाएं रोज अपने मोबाइल पर आती हैं ? क्या उन सभी को देखना पढ़ना मान सकते हैं ? संभव ही नहीं। क्योंकि इसे पढ़ने में क्षणिक आनंद और रोमांच तो है किन्तु इसका स्थायित्व कम है। इसलिए पढ़ने को अकादमिक क्षेत्र में एक प्रमुख गतिविधि के तौर पर गिना जाता रहा है। यह प्रकारांतर से शिक्षक के सतत पेशेवर विकास का हिस्सा माना जा सकता है।

हमारा शिक्षक कक्षा−कक्ष में कैसे प्रस्तुत हो, कैसे अपनी कक्षा की परिकल्पना करे, कैसे पाठ योजना और गतिविधि आदि के मध्य समायोजन स्थापित करे आदि भी शिक्षकीय पेशेगत विकास में शामिल हो सकती हैं। जब एक शिक्षक अपनी कक्षा व स्कूल की परिधि में प्रवेश करता है संभव है वहीं से या उससे भी पूर्व पर चिंतन स्तर पर अपने कंटेंट और कंटेंट डिलिवर करने की योजनाएं बनाता है तब भी यह पेशेवराना बरताव कर रहा होता है। इसे स्वीकार करने में ज़रा भी किसी को गुरेज़ नहीं कि आज शिक्षकों के पास शिक्षण के अतिरिक्त अन्यान्य काम भी हैं जिन्हें करने होते हैं। उदाहरण के लिए एक प्रमुख काम यही लेते हैं कि यू डाइस की रिपोर्ट हर साल जारी होती है उसे हमारे स्कूल शिक्षक व प्रधानाचार्य भर को भेजते हैं। यदि इस डेटा को तैयार करने में आईसीटी की मदद ली जाए तो अंत समय में भागमभाग नहीं होगी। न ही ज्यादा सिरदर्दी वाला होगा। लेकिन क्योंकि हमारे शिक्षक और स्कूली प्रधानाचार्य आईसीटी से भयभीत रहते हैं। बल्कि कहना चाहिए भयांक्रांत रहते हैं। उनके मन से इसी भय को दूर करने के लिए रा.शि. नीति 2019 कई प्रावधानों की वकालत करती है। शिक्षकों और प्रधानाचार्यों को आईसीटी में दक्ष बनाना मकसद नहीं बल्कि स्कूली कामकाज को कर सकें ऐसे कौशल विकसित कर सकें।

आईसीटी को जमीन पर उतारने के लिए कई अहम कदम उठाने की आवश्यकता पड़ेगी। हालांकि नीति के स्तर पर यह रा.शि. नीति मानती और वकालत भी करती है कि शिक्षकों को पेशेवर विकास के लिए विभिन्न संस्थानों को जिम्मेदारी सौंपी जाएगी। अब देखना यह होगा कि वे संस्थाएं कितनी संजीदगी से रणनीति निर्माण कर इसे मुकम्मल करते हैं। सिफारिशें देने को तो कोठारी समिति, 1968, 1986/92 की पुनरीक्षा समिति ने भी दिए थे किन्तु उन पर कितना अमल हो सका यह विचारणीय है। हालांकि 2025 तक का लक्ष्य रखा गया है कि व्यावसायिक और प्रौद्योगिकी के ज़रिए वंचित वर्ग आदि तक शिक्षा की पहुंच हो जाएगी। 

-कौशलेंद्र प्रपन्न

(भाषा एवं शिक्षा शास्त्र विशेषज्ञ)

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