CSR की प्रकृति को समझिये, कंपनियां सब हड़पना नहीं देश को बहुत कुछ देना चाहती हैं

By कौशलेंद्र प्रपन्न | Publish Date: Jul 24 2019 3:08PM
CSR की प्रकृति को समझिये, कंपनियां सब हड़पना नहीं देश को बहुत कुछ देना चाहती हैं
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हमें सीएसआर की प्रकृति और चरित्र को समझने की ज़रूरत है। आम धारणा तो यही बनी हुई है कि कंपनियां अपने फायदे के लिए सामाजिक कार्य करती हैं। ये सरकारी स्कूलों, स्थानों, संस्थानों आदि को हड़प लेंगी। यह धारणा आम सामाजिक लोगों में गहरे बैठी हुई है।

देश के विकास में सरकार नीति बनाती है। दिशा-निर्देश एवं योजनाएं बनाकर समाज के हर तबके तक पहुंचाने की कोशिश करती है। बतौर सरकारी नीतियों के हर सामाजिक धड़ों की जिम्मेदारी बनती है कि वह समाज और देश के विकास के लिए तत्पर हो। यही कोई छह सात साल पहले भारत सरकार ने भी कॉरपोरेट सामाजिक जिम्मेदारी यानी सीएसआर गतिविधियों के लिए नियम बनाए। इस नियम के अंतर्गत आने वाले विभिन्न औद्योगिक घराने अपने लाभ की दो फीसदी रकम सामाजिक विकास में खर्च कर रहे हैं। कभी इसका असर देखना हो तो आप दिल्ली, पुणे, हैदराबाद, मुंबई, चेन्नई आदि जगहों पर जाकर क्षेत्र में देखें। हालांकि आज सीएसआर के अंतर्गत अलग-अलग कंपनियां विभिन्न क्षेत्रों में अपनी अहम भूमिका निभा रही हैं।
 
टेक महिन्द्रा फाउंडेशन देश के तकरीबन 11 शहरों में रोजगार उत्पाद, शिक्षा−शिक्षण, स्वास्थ्य−रख−रखाव आदि क्षेत्र में चड़ीगढ़, दिल्ली एवं एनसीआर, मुंबई के अलावा चेन्नई, कोलकाता, नागपुर, विशाखापत्तनम आदि में काम कर रही है। देश के विभिन्न क्षेत्रों में 150 से ज्यादा प्रोजेक्टों के ज़रिए रोजगार, कौशल विकास, शिक्षा की बेहतरी के अभियान को मजबूती प्रदान करने में लगी है। वैसे ही येस बैंक, हिन्दुस्थान लिवर, जिंक, अंबुजा सीमेंट आदि भी पर्यावरण, पानी संरक्षण एवं रोजगार उत्पाद में अपनी भूमिकाएं निभा रहे हैं। प्रकारांतर से सीएसआर पहली नज़र में निजी प्रयास व कंपनी की परियोजनाएं लगेंगी किन्तु व्यापक स्तर पर देखें तो पाएंगे कि जहां सरकारी प्रयास और योजनाएं विफल हुई हैं वहां सरकार के साथ कंपनियां हाथ मिलाकर समाज के उत्थान के लिए आगे आई हैं।
दिल्ली के पूर्वी दिल्ली नगर निगम और उत्तरी दिल्ली नगर के साथ मिल कर टेक महिन्द्रा फाउंडेशन प्राथमिक शिक्षकों की प्रोफेशन डेवलप्मेंट में योगदान देने के लिए अंतरूसेवाकालीन अध्यापक शिक्षा संस्थान चला रही है। पूर्वी दिल्ली नगर निगम में पिछले पांच वर्षों में टेक महिन्द्रा फाउंडेशन ने तकरीबन आठ हज़ार से ज्यादा शिक्षकों को प्रशिक्षित करने का काम सफलतापूर्वक संपन्न किया है। हर साल इस संस्थान में 1500 से अधिक शिक्षकों, प्रधानाचार्यों, स्कूल निरीक्षकों को प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है। एक प्रकार से सेवाकालीन शिक्षकों को प्रशिक्षण प्रदान करने का काम सरकार को करना है। जबकि ज़मीनी हक़ीकत है कि दिल्ली व दिल्ली के बाहर स्थापित शिक्षक−प्रशिक्षण संस्थान इस काम में बहुत अधिक उल्लेखनीय कार्य नहीं कर पा रहे हैं। आंकड़ों में समझें तो हाल ही में ज़ारी राष्टीश्य शिक्षा नीति मसौदा के अनुसार देश भर में नब्बे से ज़्यादा शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान निजी हैं बाकी के आठ प्रतिशत संस्थान सरकार चला रही है। 
 
टेक महिन्द्रा फाउंडेशन रोजगार और दिव्यांगों को लाभ पहुंचाने के लिए भी काम कर रही है। विभिन्न राज्यों के प्रमुख शहरों में टेक महिन्द्रा फाउंडेशन के केंद्रों पर बच्चों को रोजगारपरक दक्षता प्रदान करने का काम पिछले लगभग दस वर्षों से हो रहा है। वहीं दूसरी कंपनियां भी विभिन्न क्षेत्रों में अपनी भूमिका निभा रही हैं। कंपनियां जल संरक्षण, बच्चों को स्किल प्रदान करने और स्वास्थ्य आदि क्षेत्रों में भी सरकारी योजनाओं को अमली जामा पहनाने में जुटी हुई हैं। सीएसआर की गतिविधियों को सरकार भी रेखांकित कर रही है।


 
हाल ही में द सीएसआर जर्नल की ओर देश के विभिन्न सीएसआर कंपनियों की गतिविधियों का मूल्यांकन किया गया। अंतिम राउंड में टेक महिन्द्रा फाउंडेशन द्वारा चलाई जा रही अंतःसेवाकालीन अध्यापक शिक्षा संस्थान को स्किल और एजुकेशन कैटेगरी में एक्सेलेंस अवार्ड, दूसरा रनरअप पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वहीं महिन्द्रा एंड महिन्द्रा राइज को पर्यावरण कैटेगरी में सम्मानित किया गया। साथ ही यस बैंक को बेस्ट प्रोजेक्ट फॉर हेल्थ एंड सेनिटेशन कैटेगरी के लिए पुरस्कृत किया गया। इस प्रकार के सम्मान कहीं न कहीं सीएसआर को प्रोत्साहित ही करती हैं। कंपनियों को एक मोटिवेशन मिलता है कि कंपनियां सीएसआर के तहत कुछ परिवर्तनीय और प्रमुख काम कर रही हैं।
हमें सीएसआर की प्रकृति और चरित्र को समझने की ज़रूरत है। आम धारणा तो यही बनी हुई है कि कंपनियां अपने फायदे के लिए सामाजिक कार्य करती हैं। ये सरकारी स्कूलों, स्थानों, संस्थानों आदि को हड़प लेंगी। यह धारणा आम सामाजिक लोगों में गहरे बैठी हुई है। हमें इस धारणा को साफ करना होगा। हालांकि कंपनियां अपने मुनाफे में से ही काम करती हैं। इसे स्वीकारने में किसी को भी गुरेज़ नहीं होगा कि कंपनियां जो भी लाभ कमाती हैं उसका कुछ अंश समाज को विभिन्न क्षेत्रों में मदद कर लौटाती हैं। बात यह भी सच है कि कई प्रोजेक्ट महज काग़ज़ों पर हैं मसलन डेटा, रिपोर्ट आदि में। वहीं ऐसी सीएसआर गतिविधियां भी हैं जो सच्चे अर्थ में समाज में परिवर्तन में अपनी सकारात्मक और सतत विकास में रचनात्मक भूमिका सुनिश्चित कर रहे हैं। इन्हें नकारा भी नहीं जा सकता और हाशिए पर भी नहीं धकेल सकते।  
गांधी जी ने वर्धा में शिक्षा मंत्रियों के सम्मेलन में कहा था- हर हाथ को काम और हर हाथ को शिक्षा। इस सपने को पूरा करने में न केवल सरकारी योजनाएं लगी हुई हैं बल्कि सरकार के साथ-साथ सीएसआर के प्रयास भी लगे हुए हैं। इसे दूसरे शब्दों में ऐसे समझ सकते हैं कि यदि देश में रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा आदि क्षेत्र को बेहतर बनाना है कि सरकार के साथ-साथ नागरिक समाज को भी अपनी भूमिका सुनिश्चित करनी होगी। वरना आरोप−प्रत्यारोप तो पिछले सत्तर वर्षों से लगा ही रहे हैं। दूसरी प्रमुख बात यहां रेखांकित करने की यह है कि सतत विकास लक्ष्य को 2030 तक हासिल करने की इच्छा रखते हैं तो हमें कुछ ठोस और रणनीतिबद्ध तरीके से योजनाएं बना कर उन्हें व्यवहार में लाना होगा। सीएसआर गतिविधियों के तहत कंपनियां दूर दराज़ इलाकों में इन्हीं कामों में लिप्त हैं। कुछ महज अपने कामों में जुटे हैं तो कुछ आंकड़ों के पहाड़ खड़े करने में। हमें आंकड़ों से बाहर निकल कर जमीन पर गांधी जी के सपनों को साकार करना होगा। इसमें सरकार और सीएसआर को एक मंच पर एकमना होकर काम करने की आवश्यकता पड़ेगी।
 
-कौशलेंद्र प्रपन्न 
(भाषा एवं शिक्षा शास्त्र विशेषज्ञ)
 

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