कृषि क्षेत्र तो बेहाल था ही एक और स्वदेशी रोजगार हथकरघा उद्योग भी दम तोड़ रहा है

  •  दीपक गिरकर
  •  अगस्त 8, 2019   11:32
  • Like
कृषि क्षेत्र तो बेहाल था ही एक और स्वदेशी रोजगार हथकरघा उद्योग भी दम तोड़ रहा है

बुनकरों को 14 से 16 घंटे काम करना पड़ता हैं और मजदूरी बहुत कम मिलती है। कई बुनकर कर्ज में डूबे हुए हैं। बहुत सारे हथकरघा बुनकर मजबूर होकर रोजगार छोड़ रहे हैं और कुछ बुनकरों ने परेशान होकर आत्महत्या कर ली हैं।

हथकरघा उद्योग भारत में रोजगार का स्वदेशी और प्राचीन जरिया है। कृषि के बाद हथकरघा ही एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें मजदूरों की बहुत बड़ी संख्या है। हथकरघा सर्वाधिक रोजगार देने वाला कुटीर उद्योग है। महात्मा गांधी ने हथकरघा को उद्योग बनाकर युवाओं को स्वावलंबी बनाने का सपना देखा था। महिलाएं हथकरघा उद्योग की रीढ़ हैं। देश की 50 फीसदी से ज्यादा बुनकरों की आबादी देश के उत्तर-पूर्व राज्यों में है, जिसमें से ज्यादातर महिलाएं हैं। इस क्षेत्र में लगातार संकट मंडराता ही जा रहा है। बुनकरों को 14 से 16 घंटे काम करना पड़ता हैं और मजदूरी बहुत कम मिलती है। कई बुनकर कर्ज में डूबे हुए हैं। बहुत सारे हथकरघा बुनकर मजबूर होकर रोजगार छोड़ रहे हैं और कुछ बुनकरों ने परेशान होकर आत्महत्या कर ली हैं। इन हथकरघा बुनकरों की माली हालत बहुत अधिक खराब है।

स्वास्थ्य बीमा योजनाएं इन तक पहुँची नहीं हैं। बुनकरों को सांस से संबंधित बीमारियां हो रही हैं लेकिन उन्हें उचित स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध नहीं हो पाती हैं। बीमार बुनकरों और गर्भवती महिला बुनकरों को अवकाश की सुविधा नहीं है। दुनिया भर में हाथ से बने उत्पादों की मांग बढ़ रही है। बुनकरों द्वारा हथकरघों पर बनाई साड़ियां हजारों रूपये में बिकती हैं और हर साल बाजार में बिकने वाली साड़ियों की कीमत बढ़ती जा रही है, लेकिन बुनकरों की मजदूरी नहीं बढ़ रही है। बुनकरों की मजदूरी की दर में इजाफा नहीं हुआ है। बुनकर मजदूरों को 20 साल पहले की दर से ही मजदूरी मिल रही हैं। इस व्यवसाय में बड़े कारोबारी और बिचौलिएं पैसा बना रहे हैं। पूरे हथकरघा उद्योग पर बड़े कारोबारियों और बिचौलियों का कब्जा है। ये बुनकरों की आवाज को दबा देते हैं। बुनकर सिर्फ मजदूर ही रह गए हैं, वे कारोबारी नहीं बन पाए हैं। बुनकर अपने परिवार की रोजी-रोटी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। वे मजदूरी में अपने परिवार का भरण-पोषण नहीं कर पा रहे हैं। बुनकर बदहाल हैं। यह कहा जाता है कि भारतीय बुनकरों कि स्थिति जो अंग्रेजों के शासन के समय थी उससे बेहतर नहीं है। बुनकरों का दर्द किसी को भी नहीं दिखाई दे रहा है। सरकार का ध्यान पॉवरलूम क्षेत्र पर अधिक है। बुनकरों के हाथों से बने कपड़ों की मांग हमारे देश में तो है ही लेकिन विदेशों में भी काफी मांग है।

इसे भी पढ़ें: रूठे दोस्त को अंतरराष्ट्रीय मित्रता दिवस पर ये Gift देकर मनाएं

इस व्यवसाय से विदेशी मुद्रा मिलती है लेकिन वह विदेशी मुद्रा बड़े कारोबारियों और बिचौलियों के जेब में जाती है। बुनकरों, कारीगरों को उनकी कड़ी मेहनत की सिर्फ मजदूरी मिलती है जो कि अत्यंत कम होती है। सरकार को ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि बुनकर, कारीगर सीधे बाजार में अपना माल बेच सकें। बुनकरों के चेहरे की चमक लौटाने के लिए सरकार ने "ई-बाजार" मॉडल के रूप में हाईटेक कदम उठाया था लेकिन यह योजना भी अन्य योजनाओं के सामान फ्लॉप साबित हुई। बुनकरों को एक ही छत के नीचे सरकारी सेवाएं मिलनी चाहिए। वैसे फैशन उद्योग ने तो हथकरघा से बने कपड़ों को दिल से अपनाया है।

हथकरघा उद्योग में अधिक संकट वर्ष 1995 के बाद शुरू हुआ। वर्ष 1996 में सरकार ने चीन के लिए बाजार खोल दिया था। हमारे यहां बुनकर हथकरघा में कपड़ा तैयार करते हैं, यदि किसी कपड़े को तैयार करने की लागत एक सौ रूपये है तो वही कपड़ा चीन हमारे यहां 80 रूपये में बेच रहा है।

हथकरघा उद्योग के बुनकरों की बहुत-सी समस्याएँ हैं। सभी सरकार बुनकरों की समस्याओं के समाधान का वादा करती है लेकिन कोई भी सरकार अपने वादे पूरे नहीं करती है। देश की आर्थिक नीतियों में बुनकरों के लिए कोई जगह नहीं है। बुनकरों के लिए जरी, रेशम, कपास और अन्य प्रकार के सूत और धागा कच्चा माल होता है। एक ओर कच्चे माल के दामों में वृद्धि से बुनकरों के लिए साड़ी बनाना मुश्किल होता जा रहा है और दूसरी ओर उन्हें अच्छी गुणवत्ता वाला कच्चा माल नहीं मिल रहा है। बिजली की कटौती से बुनकरों की आर्थिक हालत और खराब हो गई है। दिन में बिजली कटौती की वजह से उन्हें दिन के बजाय रात में काम करना पड़ता है। उत्पाद के प्रत्येक स्तर पर और साथ ही अंतिम उत्पाद पर जीएसटी लगाया जा रहा है। जीएसटी लगाने के पूर्व बुनकर व्यापारियों से सूत क्रेडिट पर प्राप्त करते थे लेकिन जीएसटी के कार्यान्वयन के पश्चात बाजार में बुनकरों को क्रेडिट पर काम करना असंभव हो गया है। राष्ट्रीय हथकरघा विकास निगम लिमिटेड (एनएचडीसी) की स्थापना इसलिए की गई थी कि बुनकरों को अपेक्षित गुणवत्ता का सूत और धागा उचित मूल्य पर निर्बाध रूप से मिलता रहे। लेकिन सूत और धागे की आपूर्ति को व्यापारियों द्वारा नियंत्रित किया जाता हैं। इस उद्योग में कार्यरत अनेक इकाइयों का आकार अनार्थिक है। अधिकाँश इकाइयां पुरानी मशीनरी और पुराने संयंत्र से कपड़ा निर्माण कर रही हैं जिसकी लागत भी ज्यादा आती है।

  

बुनकरों के कल्याण के लिए सरकार ने कई कदम उठाये। सरकार ने हथकरघा उद्योग के विकास के लिए दर्जनों कल्याणकारी योजनाएं जैसे क्लस्टर योजना, बुनकर स्वास्थ्य बीमा योजना, बुनकर सब्सिडी योजना, पॉवरलूम सब्सिडी योजना, प्रधानमंत्री मुद्रा योजना, हथकरघा संवर्धन सहायता योजना प्रारंभ की लेकिन बुनकरों की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। समस्त बुनकर आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं और ये सारी कल्याणकारी योजनाएं दम तोड़ चुकी हैं। हथकरघा संवर्धन सहायता योजना तो पिछले वर्ष ही शुरू हुई थी जिसमें बुनकरों को नए करघों की लागत का 90 फीसदी सरकार मूल्य सरकार को वहन करना था और मात्र 10 फीसदी मूल्य बुनकर को वहन करना था। यह स्कीम बहुत अच्छी है लेकिन इस उद्योग में बजट की कमी और कार्यपालिका द्वारा योजना का उचित क्रियान्वयन नहीं होने से यह योजना भी अपना दम तोड़ चुकी है।

इसे भी पढ़ें: बढ़ते शहरीकरण और सिकुड़ते जंगलों ने बाघों से उनका आशियाना छीना है

हथकरघा उद्योग में केंद्र सरकार का बजट वित्तीय वर्ष 2016-17 में 710 करोड़ रूपये, वर्ष 2017-18 में 604 करोड़ रूपये, वर्ष 2018-19 में 386 करोड़ रूपये का था और वित्तीय वर्ष 19-20 में मात्र 456.80 करोड़ रूपये का है। वर्ष प्रतिवर्ष सरकार इस क्षेत्र के बजट आवंटन में अनुचित तरह से काफी कमी करती जा रही है जिससे इस क्षेत्र में कार्य कर रहे लोग निरूत्साहित होते जा रहे हैं। कम बजट आवंटित होने से महिलाओं की एक बहुत बड़ी संख्या और उनके परिवार को रोजी-रोटी के लाले पड़ गए हैं। यह बहुत बड़ी विडम्बना है कि सरकार हथकरघा उद्योग के उत्पादन के आंकड़ों की तुलना पॉवरलूम सेक्टर से करती है। मुद्रा स्कीम के तहत 50 हजार रूपये से लेकर दस लाख रूपये तक के ऋण की सुविधा बुनकरों के लिए उपलब्ध है। इस प्रधानमंत्री मुद्रा योजना में भी बिचौलियों और दलालों के कारण कुछ बुनकरों को कर्ज तो मिला लेकिन ऋण की राशि इतनी कम थी कि बुनकर इस उद्योग से संबंधित सारी मशीनरी नहीं खरीद पाए और वे अपना उत्पादन प्रारंभ नहीं कर पाए और इन पर कर्ज का बोझ और हो गया। नाबार्ड भी इस क्षेत्र में तुलनात्मक रूप से प्रतिवर्ष वित्त पोषण कम करता जा रहा है। सरकार के अनुसार बुनकरों के बच्चे जो इग्नू और एनआईओएस में स्कूलों और विश्वविद्यालयों में शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं, उनकी फीस का 75 फीसदी भुगतान सरकार करेगी। यह योजना भी कागज़ पर अच्छी है। लेकिन क्या हकीकत में इन हथकरघा मजदूरों के बच्चें स्कूलों में पढ़ रहे हैं? इनके बच्चे स्कूलों में प्रवेश ले लेते हैं लेकिन बीच में पढ़ाई छोड़कर मजदूर बनने को मजबूर हो रहे हैं।

हथकरघा उद्योग राष्ट्र की गौरवशाली धरोहर है। इस उद्योग का संरक्षण करना और बुनकर मजदूरों की मदद करना अब आवश्यक हो गया है, नहीं तो यह खूबसूरत कला विलुप्त हो जायेगी। राष्ट्रपति श्री राम नाथ कोविंद ने श्रीमती स्मृति मोरारका को बनारस की हथकरघा कला के संरक्षण, उसको बढ़ावा देने और इस कला के प्रचार-प्रसार के लिए महिलाओं के सर्वोच्च नागरिक सम्मान नारी शक्ति पुरस्कार से सम्मानित किया है। श्रीमती स्मृति मोरारका हथकरघा मजदूरों को नई तकनीक से रूबरू करवा रही हैं। यह उद्योग असंगठित क्षेत्र में है, इस कारण यहाँ के बुनकर मजदूरों की माली हालत बहुत अधिक खस्ता है। इस हथकरघा उद्योग के बहुत सारे लोग मालिक से मजदूर बन गए हैं। कई बुनकरों ने सरकारी सहायता और प्रोत्साहन नहीं मिलने से दूसरे व्यवसाय की तरफ अपना रूख कर लिया हैं। इस उद्योग के लिए मशीनरी और संयंत्र के आधुनिकीकरण की शीघ्र आवश्यकता है। जब तक इस क्षेत्र को सरकारी सहायता नहीं मिलेगी और सरकारी प्रोत्साहन प्राप्त नहीं होगा तब तक इस क्षेत्र के उद्योग पनप नहीं पाएंगे। इस उद्योग को आवंटित बजट की अधिकाँश राशि विपणन केंद्रों के निर्माण में खर्च हुई है। ये विपणन केंद्र सिर्फ शो-पीस बन कर रह गए हैं। हथकरघा उद्योग को सहारे की जरूरत है। हथकरघा उद्योग के बुनकरों के भी कर्ज माफ़ होने चाहिए। हथकरघा उद्योग में दीर्घकालीन ढांचागत सुधार किये जाने की जरूरत है। हथकरघा क्षेत्र का पुनरुद्धार सरकार की प्राथमिकता में सबसे ऊपर होना चाहिए। 

-दीपक गिरकर







ट्रैक्टर परेड निकालने पर अड़े किसान क्या भीड़ के दौरान अनुशासन कायम रख पाएँगे?

  •  दीपक कुमार त्यागी
  •  जनवरी 21, 2021   13:23
  • Like
ट्रैक्टर परेड निकालने पर अड़े किसान क्या भीड़ के दौरान अनुशासन कायम रख पाएँगे?

देश में पिछले कुछ दिनों से हर नुक्कड़ पर, सत्ता पक्ष व विपक्ष के राजनीतिक गलियारों में और बुद्धिजीवियों के बीच में इस बेहद ज्वंलत मसले पर बहस जारी है। केंद्र सरकार की तरफ से किसानों को परेड निकालने से रोकने के लिए मनाने के हर संभव प्रयास किये जा रहे हैं।

कड़कड़ाती कड़ाके की हाड़ कंपकंपा देने वाली भयंकर शीतलहर में हमारे देश का अन्नदाता अपने हक को लेने के लिए सड़कों पर धरना देकर बैठा हुआ है। देश की राजधानी दिल्ली की सीमाओं की सड़कों पर व देश में अन्य भागों में बहुत जगहों पर केंद्र सरकार के द्वारा लाये गये तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग को लेकर पिछले बहुत लंबे समय से हमारे प्यारे किसान जगह-जगह पर धरनारत हैं। मसले के समाधान के लिए केंद्र सरकार से किसानों की बार-बार वार्ता होने के बाद भी अभी तक भारत सरकार व किसानों के बीच कोई भी सर्वमान्य हल नहीं निकल पाया है, किसान तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग पर अड़े हुए हैं, वहीं केंद्र सरकार बिंदुवार चर्चा करके असहमत बिंदुओं में संशोधन करने की बात कह रही है। लेकिन धरातल पर वास्तविकता यह है कि किसान संगठनों व केंद्र सरकार के बीच मामला आंदोलन के एक-एक दिन गुजरने के साथ और लंबा खिचता जा रहा है, जिसके चलते उतना ही यह मामला पेचीदा होकर सुलझने की जगह दिन-प्रतिदिन और ज्यादा उलझता जा रहा है।

इसे भी पढ़ें: जब तक स्वार्थी नेताओं को नहीं हटाएंगे किसान तब तक नहीं निकल सकता मुद्दे का हल

अपनी विभिन्न मांगों को लेकर धरना दे रहे किसानों को अब धीरे-धीरे दो माह होने वाले हैं, लेकिन फिर भी किसानों की समस्याएं अभी भी जस की तस बनी हुई हैं, जिसके चलते अब किसान आंदोलन देश के विभिन्न भागों में बहुत तेजी से विस्तार लेता जा रहा है। अब तो यह मामला देश की सर्वोच्च अदालत में भी पहुंच गया है, जिसने चार सदस्यीय कमेटी का गठन किया है, जो किसानों से बात करके सर्वोच्च न्यायालय को अपनी रिपोर्ट देगी। हालांकि कमेटी का गठन होते ही वो सदस्यों की वजह से विवादों के दायरे में आ गयी, किसान संगठनों के कुछ नेताओं ने विभिन्न न्यूज चैनलों पर कमेटी के सदस्यों के चयन पर आपत्ति दर्ज कराते हुए उनको तीनों कृषि कानूनों का समर्थक बताया है और उनकी निष्पक्षता पर प्रश्नचिन्ह लगाया है, जिसके बाद एक सदस्य ने तो कमेटी में रहने से इंकार ही कर दिया है।

खैर हमारे देश में राजनीति जो करवा दे वो भी कम है, लेकिन अब देश में किसानों का हितैषी बनने को लेकर के पक्ष विपक्ष व निष्पक्ष लोगों के बीच में जबरदस्त चर्चा के साथ किसान राजनीति अपने चरम पर है। देश की आजादी से लेकर आज तक किसानों को उनका हक ना देने वाले राजनीतिक दलों से लेकर के हर कोई अपने आपको अन्नदाता किसानों का कट्टर हितैषी दिखाने पर लगा हुआ है। वैसे विचारणीय बात यह है कि जिस तरह से देश में आजादी के बाद से ही गरीबी को खत्म करने के लिए विभिन्न सरकारों के द्वारा समय-समय पर बहुत सारी योजनाएं चलाई गयीं और हर वक्त राजनीतिक दलों के द्वारा उनका श्रेय लेने में भी कोई कोरकसर नहीं छोड़ी जाती है ठीक उसी प्रकार से ही किसानों के नाम पर भी देश में आजादी के बाद से यही स्थिति है, राजनीतिक दल हमेशा श्रेय लेने से चूके नहीं हैं। लेकिन अफसोस फिर भी सबसे बड़ी दुख की बात यह है कि ना तो देश से गरीबी समाप्त होने का नाम ले रही है और ना ही हमारे अन्नदाता किसानों को भी उनकी समस्याओं का समाधान व हक अभी तक मिल पा रहा है। हाँ, देश में लंबे समय से गरीब व किसानों का हितैषी बनने के लिए राजनीतिक लोगों के द्वारा केवल और केवल हर वर्ष की आंकड़ेबाजी अवश्य जारी है। आंकड़ों की बाजीगरी व धरातल के हालातों में बहुत अंतर होने के कारण उत्पन्न आक्रोश की वजह से ही किसान अब सड़कों पर उतरे हुए हैं और वो अब अपने हक के लिए आरपार की लड़ाई लड़ने के मूड़ में नजर आ रहे हैं, जिसके चलते ही वो दिल्ली की सीमाओं के साथ देश के अन्य भागों में अपना घर-बार छोड़कर अनिश्चितकालीन लंबे धरने पर बैठे हुए हैं और सरकार व आम जनमानस का अपनी मांगों की तरफ ध्यान आकर्षित करवाने के लिए समय-समय पर विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन कर रहे हैं।

उसी क्रम में कुछ किसान संगठन राष्ट्रीय महापर्व गणतंत्र दिवस 26 जनवरी पर दिल्ली की आउटर रिंगरोड व देश के विभिन्न भागों में ट्रैक्टर परेड के आयोजन करने के लिए बड़े पैमाने पर तैयारी कर रहे हैं। जिसको लेकर केंद्र सरकार व देश की शीर्ष सुरक्षा एजेंसियों के माथे पर चिंता की रेखाएं हैं। देश के प्रत्येक नागरिक के लिए बेहद महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दिन 26 जनवरी पर किसी भी अनहोनी की आशंका को रोकने के लिए सरकार व सुरक्षा एजेंसियां सक्रिय हैं। 'केन्द्र सरकार तो ट्रैक्टर परेड पर रोक लगाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय तक चली गयी है, जिस पर सोमवार को सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया शरद अरविंद बोबडे ने कहा, 'दिल्ली में रैली निकाले जाने के मामले में हमने पहले ही कहा था कि यह कानून व्यवस्था का मामला है और यह पुलिस को देखना है।' उन्‍होंने कहा, 'यह देखना पुलिस का काम है, कोर्ट का नहीं कि कौन दिल्ली में प्रवेश करेगा, कौन नहीं करेगा, कैसे करेगा!' सीजेआई ने कहा कि पुलिस को कानून व्यवस्था बनाए रखने का अधिकार है, हमें बताने की जरूरत नहीं है। इसके साथ ही उन्‍होंने कहा कि दिल्‍ली पुलिस गणतंत्र दिवस की गरिमा सुनिश्चित करे।

इसे भी पढ़ें: किसान आंदोलन का हल सर्वोच्च न्यायालय की बजाय सरकार ही निकाले तो बेहतर

वहीं अब किसान आंदोलन में विदेशी फंडिंग के तार खालिस्तानी संगठनों से जुड़ने के अंदेशों को देखते हुए जांच करने के लिए देश की महत्वपूर्ण सुरक्षा एजेंसी एनआईए भी एक्टिव हो गयी है। सूत्रों के अनुसार उसने किसान संगठनों के कुछ शीर्ष नेताओं व अन्य बहुत सारे महत्वपूर्ण लोगों से पूछताछ करने के लिए नोटिस भेजे हैं। जिसके बाद उत्पन्न हालात को देखकर हमारे कुछ राजनीतिक विश्लेषक सरकार व किसानों के बीच भविष्य में टकराव का अंदेशा व्यक्त कर रहे हैं। किसानों के द्वारा ट्रैक्टर परेड करने की घोषणा के बाद से ही देश के अधिकांश आम लोगों के मन में एक विचार बहुत तेजी से कौंध रहा है कि देश के सबसे बड़े राष्ट्रीय महापर्व गणतंत्र दिवस 26 जनवरी पर क्या सुरक्षा की दृष्टि से किसानों का इस तरह से ट्रैक्टर परेड निकालना उचित है?

क्या किसानों का ट्रैक्टर परेड का कार्यक्रम बहुत अधिक जोखिम भरा नहीं है?

देश में पिछले कुछ दिनों से हर नुक्कड़ पर, सत्ता पक्ष व विपक्ष के राजनीतिक गलियारों में और बुद्धिजीवियों के बीच में इस बेहद ज्वंलत मसले पर बहस जारी है। केंद्र सरकार की तरफ से किसानों को परेड निकालने से रोकने के लिए मनाने के हर संभव प्रयास किये जा रहे हैं। इसको रोकने के लिए केंद्र सरकार ने न्यायालय को बताया है कि सुरक्षा एजेंसी के जरिये उन्हें जानकारी मिली है कि गणतंत्र दिवस के मौके पर किसान प्रदर्शनकारी ट्रैक्टर परेड निकालने वाले हैं। जिसका उद्देश्य राष्ट्रीय महत्ता के इस महत्वपूर्ण समारोह को प्रभावित करना है, हालांकि किसान संगठन समारोह में किसी भी प्रकार का विघ्न डालने की रणनीति से इंकार कर रहे हैं, वो केवल गरिमापूर्ण ढंग से परेड निकालने की बात कर रहे हैं। लेकिन पूर्व में जिस तरह से कुछ लोगों की वजह से किसानों के धरने के बीच ही देश को तोड़ने की बात करने वाले लोगों के फोटो लगे थे उस घटना से सबक लेकर अब किसान संगठनों को ट्रैक्टर परेड के दौरान अत्यधिक सतर्कता बरतनी होगी, उनको आत्ममंथन करना होगा कि क्या किसान संगठन इतनी बड़ी संख्या में आये ट्रैक्टरों के बीच अनुशासन बना कर रख सकते हैं, क्योंकि 26 जनवरी गणतंत्र दिवस के दिन किसानों की ट्रैक्टर परेड में कोई भी देश विरोधी घटना घटित ना हो पाये इसको रोकने की जिम्मेदारी किसानों की खुद होगी, क्योंकि अगर कोई भी घटना घटित हो जाती है तो भविष्य में किसान आंदोलन की मंशा पर प्रश्नचिह्न लगने का काम हो सकता है और वैसे भी यह हमारे प्यारे देश की आन-बान-शान व अस्मिता के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं है। किसान संगठनों व उससे जुड़े लोगों को ध्यान रखना होगा कि धरना प्रदर्शन करने का उनका अधिकार है। तो यह ध्यान रखना भी उनकी जिम्मेदारी है कि आंदोलन व परेड के दौरान कोई ऐसी घटना घटित ना हो जाये जिससे कि कोई देशद्रोही व्यक्ति देश की मान प्रतिष्ठा को इस किसान आंदोलन की आड़ में धूमिल करने का दुस्साहस कर सके। एक वीर जाबांज जवान की तरह देश के लिए सभी कुछ न्यौछावर करने के लिए तत्पर रहने वाले अन्नदाता किसानों को हर हाल में देश की आन-बान-शान व स्वाभिमान का ध्यान रखना होगा।

-दीपक कुमार त्यागी

(स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार व रचनाकार)







आज भी प्रेरणा और हिम्मत देते हैं गुरू गोबिंद सिंह के उपदेश

  •  योगेश कुमार गोयल
  •  जनवरी 20, 2021   13:20
  • Like
आज भी प्रेरणा और हिम्मत देते हैं गुरू गोबिंद सिंह के उपदेश

शौर्य और साहस के प्रतीक तथा इतिहास को नई धारा देने वाले अद्वितीय, विलक्षण और अनुपम व्यक्तित्व के स्वामी गुरु गोबिंद सिंह जी को इतिहास में एक विलक्षण क्रांतिकारी संत व्यत्वित्व का दर्जा प्राप्त है।

सिखों के 10वें गुरु गोबिंद सिंह जी का 354वां प्रकाश पर्व पटना में तख्त श्री हरिमंदिर पटना साहिब में 20 जनवरी को मनाया जा रहा है। हिन्दू कैलेंडर के अनुसार गुरु गोबिंद सिंह का जन्म 1667 ई. में पौष माह की शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को 1723 विक्रम संवत् को पटना साहिब में हुआ था और इस साल 20 जनवरी को यह तिथि है, इसीलिए इसी दिन गुरु गोबिंद सिंह का प्रकाशोत्सव मनाया जाएगा। वैसे गुरु गोबिंद सिंह जयंती दिसम्बर तथा जनवरी के महीने में कभी-कभार एक वर्ष में दो बार भी आती है, जिसकी गणना हिन्दू विक्रमी संवत् कैलेंडर के अनुसार ही की जाती है। बचपन में गुरु गोबिंद सिंह जी को गोबिंद राय के नाम से जाना जाता था। उनके पिता गुरु तेग बहादुर सिखों के 9वें गुरु थे। पटना में रहते हुए गुरू जी तीर-कमान चलाना, बनावटी युद्ध करना इत्यादि खेल खेला करते थे, जिस कारण बच्चे उन्हें अपना सरदार मानने लगे थे। पटना में वे केवल 6 वर्ष की आयु तक ही रहे और सन् 1673 में सपरिवार आनंदपुर साहिब आ गए। यहीं पर उन्होंने पंजाबी, हिन्दी, संस्कृत, बृज, फारसी भाषाएं सीखने के साथ घुड़सवारी, तीरंदाजी, नेजेबाजी इत्यादि युद्धकलाओं में भी महारत हासिल की। कश्मीरी पंडितों के धार्मिक अधिकारों की रक्षा के लिए उनके पिता और सिखों के 9वें गुरु तेग बहादुर जी द्वारा नवम्बर 1975 में दिल्ली के चांदनी चौक में शीश कटाकर शहादत दिए जाने के बाद मात्र 9 वर्ष की आयु में ही गुरु गोबिंद सिंह जी ने सिखों के 10वें गुरू पद की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाली और खालसा पंथ के संस्थापक बने।

इसे भी पढ़ें: महान दानवीर, क्रांतिवीर और शूरवीर श्री गुरु गोबिंद सिंह जी का पूरा जीवन है प्रेरणादायी

शौर्य और साहस के प्रतीक तथा इतिहास को नई धारा देने वाले अद्वितीय, विलक्षण और अनुपम व्यक्तित्व के स्वामी गुरु गोबिंद सिंह जी को इतिहास में एक विलक्षण क्रांतिकारी संत व्यत्वित्व का दर्जा प्राप्त है। अत्याचार और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने के लिए उनका वाक्य ‘सवा लाख से एक लड़ाऊं तां गोबिंद सिंह नाम धराऊं’ सैकड़ों वर्षों बाद आज भी प्रेरणा और हिम्मत देता है। ‘भै काहू को देत नहि, नहि भय मानत आन’ वाक्य के जरिये वे कहते थे कि किसी भी व्यक्ति को न किसी से डरना चाहिए और न ही दूसरों को डराना चाहिए। उन्होंने समाज में फैले भेदभाव को समाप्त कर समानता स्थापित की थी और लोगों में आत्मसम्मान तथा निडर रहने की भावना पैदा की। एक आध्यात्मिक गुरु होने के साथ-साथ वे एक निर्भयी योद्धा, कवि, दार्शनिक और उच्च कोटि के लेखक भी थे। उन्हें विद्वानों का संरक्षक भी माना जाता था। दरअसल कहा जाता है कि 52 कवियों और लेखकों की उपस्थिति सदैव उनके दरबार में बनी रहती थी और इसीलिए उन्हें ‘संत सिपाही’ भी कहा जाता था। उन्होंने स्वयं कई ग्रंथों की रचना की थी।

‘बिचित्र नाटक’ को गुरु गोबिंद सिंह की आत्मकथा माना जाता है, जो उनके जीवन के विषय में जानकारी का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत है। यह ‘दशम ग्रंथ’ का एक भाग है, जो गुरु गोबिंद सिंह की कृतियों के संकलन का नाम है। इस दशम ग्रंथ की रचना गुरू जी ने हिमाचल के पोंटा साहिब में की थी। कहा जाता है कि एक बार गुरु गोबिंद सिंह अपने घोड़े पर सवार होकर हिमाचल प्रदेश से गुजर रहे थे और एक स्थान पर उनका घोड़ा अपने आप आकर रुक गया। उसी के बाद से उस जगह को पवित्र माना जाने लगा और उस जगह को पोंटा साहिब के नाम से जाना जाने लगा। दरअसल ‘पोंटा’ शब्द का अर्थ होता है ‘पांव’ और जिस जगह पर घोड़े के पांव अपने आप थम गए, उसी जगह को पोंटा साहिब नाम दिया गया। गुरु जी ने अपने जीवन के चार वर्ष पोंटा साहिब में ही बिताए, जहां अभी भी उनके हथियार और कलम रखे हैं।

1699 में बैसाखी के दिन तख्त श्री केसगढ़ साहिब में कड़ी परीक्षा के बाद पांच सिखों को ‘पंज प्यारे’ चुनकर गुरु गोबिंद सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना की थी, जिसके बाद प्रत्येक सिख के लिए कृपाण या श्रीसाहिब धारण करना अनिवार्य कर दिया गया। वहीं पर उन्होंने ‘खालसा वाणी’ भी दी, जिसे ‘वाहे गुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतेह’ कहा जाता है। उन्होंने जीवन जीने के पांच सिद्धांत दिए थे, जिन्हें ‘पंच ककार’ (केश, कड़ा, कृपाण, कंघा और कच्छा) कहा जाता है। गुरु गोबिंद सिंह ने ही ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ को सिखों के स्थायी गुरु का दर्जा दिया था। सन् 1708 में गुरु गोबिंद सिंह ने महाराष्ट्र के नांदेड़ में शिविर लगाया था। वहां जब उन्हें लगा कि अब उनका अंतिम समय आ गया है, तब उन्होंने संगतों को आदेश दिया कि अब गुरु ग्रंथ साहिब ही आपके गुरु हैं। गुरु जी का जीवन दर्शन था कि धर्म का मार्ग ही सत्य का मार्ग है और सत्य की हमेशा जीत होती है। वे कहा करते थे कि मनुष्य का मनुष्य से प्रेम ही ईश्वर की भक्ति है, अतः जरूरतमंदों की मदद करो। अपने उपदेशों में उनका कहना था कि ईश्वर ने मनुष्यों को इसलिए जन्म दिया है ताकि वे संसार में अच्छे कर्म करें और बुराई से दूर रहें।

इसे भी पढ़ें: पराक्रमी व प्रसन्नचित व्यक्तित्व के धनी थे गुरु गोविन्द सिंह

उन्होंने कई बार मुगलों को परास्त किया। आनंदपुर साहिब में तो मुगलों से उनके संघर्ष और उनकी वीरता का स्वर्णिम इतिहास बिखरा पड़ा है। सन् 1700 में दस हजार से भी ज्यादा मुगल सैनिकों को सिख जांबाजों के सामने मैदान छोड़कर भागना पड़ा था और गुरु जी की सेना ने 1704 में मुगलों के अलावा उनका साथ दे रहे पहाड़ी हिन्दू शासकों को भी करारी शिकस्त दी थी। मुगल शासक औरंगजेब की भारी-भरकम सेना को भी आनंदपुर साहिब में दो-दो बार धूल चाटनी पड़ी थी। गुरु गोबिंद सिंह के चारों पुत्र अजीत सिंह, फतेह सिंह, जोरावर सिंह और जुझार सिंह भी उन्हीं की भांति बेहद निडर और बहादुर योद्धा थे। अपने धर्म की रक्षा के लिए मुगलों से लड़ते हुए गुरु गोबिंद सिंह ने अपने पूरे परिवार का बलिदान कर दिया था। उनके दो पुत्रों बाबा अजीत सिंह और बाबा जुझार सिंह ने चमकौर के युद्ध में शहादत प्राप्त की थी। 26 दिसम्बर 1704 को गुरु गोबिंद सिंह के दो अन्य साहिबजादों जोरावर सिंह और फतेह सिंह को इस्लाम धर्म स्वीकार नहीं करने पर सरहिंद के नवाब द्वारा दीवार में जिंदा चुनवा दिया गया था और माता गुजरी को किले की दीवार से गिराकर शहीद कर दिया गया था। नांदेड़ में दो हमलावरों से लड़ते समय गुरु गोबिन्द सिंह के सीने में दिल के ऊपर गहरी चोट लगी थी, जिसके कारण 18 अक्तूबर 1708 को नांदेड में करीब 41 वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु हो गई थी। नांदेड़ में गोदावरी नदी के किनारे बसे हुजूर साहिब में उन्होंने अंतिम सांस ली थी।

- योगेश कुमार गोयल

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं तथा तीन दशकों से साहित्य और पत्रकारिता में सक्रिय हैं)







महाराष्ट्र में सरपंच पद के लिए बोली लगना लोकतंत्र को शर्मसार करने वाली घटना

  •  डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा
  •  जनवरी 19, 2021   13:12
  • Like
महाराष्ट्र में सरपंच पद के लिए बोली लगना लोकतंत्र को शर्मसार करने वाली घटना

इन संस्थाओं के चुनावों में निष्पक्ष चुनावों की या यों कहें कि निष्पक्ष मतदान की बात की जाए तो उसका कोई मतलब ही नहीं है। साफ हो जाता है कि कुछ ठेकेदार बोली लगाकर सरपंच बनवा देते हैं और आम मतदाता देखता ही रह जाता है।

भले ही महाराष्ट्र के राज्य चुनाव आयोग द्वारा उमरेन और खोड़ामाली गांव के सरपंच के चुनावों पर रोक लगा दी गयी हो पर यह स्थानीय स्वशासन चुनाव व्यवस्था की पोल खोलने के लिए काफी है। यह तो सरपंच पद के लिए लगाई जा रही बोली का वीडियो वायरल हो गया इसलिए मजबूरी में चुनावों पर रोक लगाने का निर्णय करना पड़ा। अन्यथा जब इस तरह से महाराष्ट्र की प्याज मण्डी में उमरेन के सरपंच पद के लिए एक करोड़ 10 लाख से चलते चलते दो करोड़ पर बोली रुकी, उससे साफ हो जाता है कि लोकतंत्र की सबसे निचली सीढ़ी के सरपंच पद को बोली लगाकर किस तरह से शर्मशार किया जा रहा है। यह कोई उमरेन की ही बात नहीं है अपितु यही स्थिति खोड़ामली की भी रही वहां की सरपंची शायद कम मलाईदार होगी इसलिए बोली 42 लाख पर अटक गई। इससे यह तो साफ हो जाता है कि जो स्वप्न स्थानीय स्वशासन का देखा गया था उसकी कल्पना करना ही बेकार है। यह भी सच्चाई से आंख चुराना ही होगा कि केवल इस तरह की घटना उमरेन या खोड़ामाली की ही होगी और अन्य स्थानों पर सरपंच के चुनाव पूरी ईमानदारी, निष्पक्षता और पारदर्शिता से हो रहे होंगे। लोकतंत्र के सबसे निचले पायदान जिसकी सबसे अधिक निष्पक्षता और पारदर्शिता से चुनाव की आशा की जाती है उसके चुनावों की यह तस्वीर बेहद निराशाजनक और चुनावों पर भ्रष्टाचारियों की पकड़ को उजागर करती है। हालांकि देश की पंचायतीराज संस्थाओं के चुनावों को लेकर सबसे अधिक सशंकित और आतंकित इन चुनावों में लगे कार्मिक होते हैं क्योंकि स्थानीय स्तर की राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता इस कदर बढ़ जाती है कि कब एक दूसरे से मारपीट या चुनाव कार्य में लगे कार्मिकों के साथ अनहोनी हो जाए इसका कोई पता नहीं रहता।

इसे भी पढ़ें: गाँव-गाँव में पार्टी की मजबूती के लिए भाजपा ने बनाया मेगा प्लान  

उमरेन की सरपंचाई की बोली इतनी अधिक लगने का कारण वहां प्याज की मण्डी होना है। इससे साफ हो जाता है कि लोकतंत्र का सबसे निचला पायदान भी भ्रष्टाचार से आकंठ डूबा हुआ है। यदि कोई यह दावा करता हो कि इस तरह की बोली से चुनाव कार्य से जुड़े लोग अंजान होंगे तो यह सच्चाई पर परदा डालना होगा क्योंकि इतनी बड़ी घटना किसी एक दो स्थान पर नहीं अपितु इसकी जड़ें कहीं गहरे तक जमी हुई हैं, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। दुर्भाग्य की बात है कि जिस लोकतंत्र की हम दुहाई देते हैं और जिस स्थानीय स्वशासन यानी कि गांव के विकास की गाथा गांव के लोगों द्वारा चुने हुए लोगों के हाथ में हो, उसकी उमरेन जैसी तस्वीर सामने आती है तो यह बहुत ही दुखदायी व गंभीर है। यह साफ है कि दो करोड़ या यों कहें कि बोली लगाकर जीत के आने वाले सरपंच से ईमानदारी से काम करने की आशा की जाए तो यह बेमानी ही होगा। जो स्वयं भ्रष्ट आचरण से सत्ता पा रहा है उससे ईमानदार विकास की बात की जाए तो यह सोचना अपने आप में निरर्थक हो जाता है। ऐसे में विचारणीय यह भी हो जाता है कि हमारा ग्राम स्तर का लोकतंत्र किस स्तर तक गिर चुका है। इससे यह भी साफ हो जाता है कि इन संस्थाओं के चुनावों में निष्पक्ष चुनावों की या यों कहें कि निष्पक्ष मतदान की बात की जाए तो उसका कोई मतलब ही नहीं है। साफ हो जाता है कि कुछ ठेकेदार बोली लगाकर सरपंच बनवा देते हैं और आम मतदाता देखता ही रह जाता है।

इसे भी पढ़ें: विधान परिषद चुनाव में भाजपा के विधायक भागने को तैयार: अखिलेश यादव

दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का हम दावा करते हैं और वह सही भी है। लोकतंत्र की दुहाई देने वाले अमेरिका की स्थिति हम इन दिनों देख ही रहे हैं। इसके अलावा हमारी चुनाव व्यवस्था की सारी दुनिया कायल है। हमारी चुनाव व्यवस्था पर हमें गर्व भी है और होना भी चाहिए। पर जिस तरह की उमरेन या इस तरह के स्थानों पर घटनाएं हो रही हैं निश्चित रूप से लोकतंत्र के लिए यह दुःखद घटना है। अब यहां चुनाव पर रोक लगाने से ही काम नहीं चलने वाला है अपितु महाराष्ट्र के चुनाव आयोग, सरकार भ्रष्टाचार निरोधक संस्थाओं, न्यायालयों आदि को स्वप्रेरणा से आगे आकर बोली लगाने वालों और इस तरह की प्रक्रिया से जुड़े लोगों के खिलाफ सख्त कार्यवाही करनी चाहिए ताकि स्थानीय लोकतंत्र अपनी मर्यादा को तार-तार होने से बच सके। यह हमारी समूची प्रक्रिया पर ही प्रश्न उठाती घटना है और चाहे इस तरह की घटना को एक दो स्थान पर या पहली बार ही बताया जाए पर इसकी पुनरावृत्ति देश के किसी भी कोने में ना हो इसके लिए आगे आना होगा। जानकारी में आते ही सख्त कदम और इस तरह की भ्रष्टाचारी घटनाओं के खिलाफ आवाज बुलंद की जाती है तो यह लोकतंत्र के लिए शुभ होगा। गैर सरकारी संगठनों और जो देश के चुनाव आयोग की सुव्यवस्थित इलेक्‍ट्रोनिक मतदान व्यवस्था यानि ईवीएम के खिलाफ आवाज उठाते हैं उन्हें अब मुंह छिपाए बैठने के स्थान पर मुखरता से आगे आना होगा तभी उनकी विश्वसनीयता तय होगी। देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था इस तरह की घटनाओं से शर्मशार होती है इसे हमें समझना होगा नहीं तो लोकतांत्रिक व्यवस्था की पवित्रता कलुषित होगी।

-डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा







This website uses cookie or similar technologies, to enhance your browsing experience and provide personalised recommendations. By continuing to use our website, you agree to our Privacy Policy and Cookie Policy.Accept