मानवीय कार्यों को प्रोत्साहन देने का अवसर है विश्व मानवीय दिवस

महात्मा गांधी ने कहा है कि आपको मानवता में विश्वास खोना नहीं चाहिए। मानवता एक महासागर है। यदि महासागर की कुछ बूंदें गंदी हैं, तो भी महासागर गंदा नहीं होता है।’ ऐसे ही विश्वास को जागृत करने के लिये ही विश्व मानवता दिवस की आयोजना की गई है।
विश्व मानवीय दिवस प्रत्येक वर्ष 19 अगस्त को मनाया जाता है। इस दिवस पर उन लोगों को याद किया जाता है, जिन्होंने मानवीय उद्देश्यों के कारण दूसरों की सहायता के लिए अपनी जान न्योछावर कर दी। इस दिवस को विश्वभर में मानवीय कार्यों एवं मूल्यों को प्रोत्साहन दिए जाने के अवसर के रूप में भी देखा जाता है। इसको मनाने का निर्णय संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा स्वीडिश प्रस्ताव के आधार पर किया गया। इसके अनुसार किसी आपातकाल की स्थिति में संयुक्त राष्ट्र देशों द्वारा आपस में सहायता के लिए मानवीय आधार पर पहल की जा सकती है। इस दिवस को विशेष रूप से 2003 में संयुक्त राष्ट्र के बगदाद, इराक स्थित मुख्यालय पर हुए हमले की वर्षगांठ के रूप में मनाया जाना आरंभ किया गया था जो विश्व में मानवीय कार्यों एवं मानव-मूल्यों को प्रेरित करने वाली भावना का जश्न मनाने का भी एक अवसर है। इसका उद्देश्य उन लोगों की पहचान करना है जो दूसरों की मदद करने में विपरीत परिस्थितियों को सामना कर रहे हैं एवं मानवता की रक्षा के लिये प्रतिबद्ध है।
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यह दिन दुनिया भर में मानवीय जरूरतों पर ध्यान आकर्षित करने की मांग करता है और इन जरूरतों को पूरा करने में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के महत्व की आवश्यकता को व्यक्त करता है। हर साल, आपदाओं एवं मानव-भूलों से लाखों लोगों विशेषतः दुनिया के सबसे गरीब, सबसे हाशिए पर आ गये लोग और कमजोर व्यक्तियों को अपार दुःख का सामना करना पड़ता है। मानवतावादी सहायताकर्मी इन आपदा प्रभावित समुदायों एवं लोगों को राष्ट्रीयता, सामाजिक समूह, धर्म, लिंग, जाति या किसी अन्य कारक के आधार पर भेदभाव के बिना जीवन बचाने में सहायता और दीर्घकालिक पुनर्वास प्रदान करने का प्रयास करते हैं। वे सभी संस्कृतियों, विचारधाराओं और पृष्ठभूमि को प्रतिबिंबित करते हैं और मानवतावाद के प्रति अपनी प्रतिबद्धता से वे एकजुट हो जाते हैं। इस तरह की मानवतावादी सहायता मानवता, निष्पक्षता, तटस्थता और स्वतंत्रता सहित कई संस्थापक सिद्धांतों पर आधारित है। मार्टिन लूथर किंग ने इसकी उपयोगिता को उजागर करते हुए कहा कि यह प्यार और स्नेह है, जो हमारी दुनिया और हमारी सभ्यता को बचाएगा।
आज समूची दुनिया में मानवीय चेतना के साथ खिलवाड़ करने वाली त्रासद एवं विडम्बनापूर्ण परिस्थितियां सर्वत्र परिव्याप्त हैं- जिनमें आतंकवाद सबसे प्रमुख है। जातिवाद, अस्पृश्यता, सांप्रदायिकता, महंगाई, गरीबी, भिखमंगी, विलासिता, अमीरी, अनुशासनहीनता, पदलिप्सा, महत्वाकांक्षा, उत्पीड़न और चरित्रहीनता आदि अनेक परिस्थितियों से मानवता पीड़ित एवं प्रभावित है। उक्त समस्याएं किसी युग में अलग-अलग समय में प्रभावशाली रहीं होंगी, इस युग में इनका आक्रमण समग्रता से हो रहा है। आक्रमण जब समग्रता से होता है तो उसका समाधान भी समग्रता से ही खोजना पड़ता है। हिंसक परिस्थितियां जिस समय प्रबल हों, अहिंसा का मूल्य स्वयं बढ़ जाता है। महात्मा गांधी ने कहा है कि आपको मानवता में विश्वास खोना नहीं चाहिए। मानवता एक महासागर है। यदि महासागर की कुछ बूंदें गंदी हैं, तो भी महासागर गंदा नहीं होता है।’ ऐसे ही विश्वास को जागृत करने के लिये ही विश्व मानवता दिवस की आयोजना की गई है।
किसी भी युग में हो रहे नैतिक पतन को रोक कर मानवीय चेतना के ऊधर्वारोहण के लिए अमानवतावादी दृष्टिकोण का निरसन आवश्यक होता है। सामाजिक मूल्य-परिवर्तन और मानदंडों की प्रस्थापना से लोकचेतना में परिष्कार हो सकता है। इस दृष्टि से विश्व मानवता दिवस की उपयोगिता बढ़-चढ़ कर सामने आ रही है। इसलिये आड्रे हेपबर्न ने कहा था कि जब तक दुनिया अस्तित्व में है, अन्याय और अत्याचार होते रहेंगे। जो लोग सक्षम और समर्थ हैं, उनकी जिम्मेदारी अधिक है कि वे लोग अपने से निर्बल लोगों को भी स्नेह दें।
हिंसा, आतंक, अप्रामाणिकता, संग्रह, स्वार्थ, शोषण और क्रूरता आदि के दंश मानवता को मूर्छित कर रहे हैं। इस मूर्छा को तोड़ने के लिए अहिंसा और सह-अस्तित्व का मूल्य बढ़ाना होगा तथा सहयोग एवं संवेदना की पृष्ठभूमि पर स्वस्थ समाज-संरचना की परिकल्पना को आकार देना होगा। दूसरों के अस्तित्व के प्रति संवेदनशीलता मानवता का आधार तत्व है। जब तक व्यक्ति अपने अस्तित्व की तरह दूसरे के अस्तित्व को अपनी सहमति नहीं देगा, तब तक वह उसके प्रति संवेदनशील नहीं बन पाएगा। जिस देश और संस्कृति में संवेदनशीलता का स्रोत सूख जाता है, वहाँ मानवीय रिश्तों में लिजलिजापन आने लगता है। अपने अंग-प्रत्यंग पर कहीं प्रहार होता है तो आत्मा आहत होती है। किंतु दूसरों के साथ ऐसी घटना घटित होने पर मन का एक कोना भी प्रभावित नहीं होता। यह संवेदनहीनता की निष्पत्ति है। इस संवेदनहीन मन की एक वजह सह-अस्तित्व का अभाव भी है। आज हम इतने संवेदनशून्य हो गये हैं कि औरों का दुःख-दर्द, अभाव, पीड़ा, औरों की आहें हमें कहीं भी पिघलाती नहीं। देश और दुनिया में निर्दोष लोगों की हत्याएं, हिंसक वारदातें, आतंकी हमले, अपहरण, जिन्दा जला देने की रक्तरंजित सूचनाएं, महिलाओं के साथ व्यभिचार-बलात्कार की वारदातें पढ़ते-देखते हैं पर मन इतना आदती बन गया कि यूं लगता है कि यह सब तो रोजमर्रा का काम है। न आंखों में आंसू छलकते हैं, न पीड़ित मानवता के साथ सहानुभूति जुड़ती है। न सहयोग की भावना जागती है और न नृशंस क्रूरता पर खून खौलता हैं। हमें सिर्फ स्वयं को बचाने की चिन्ता है। तभी औरों का शोषण करते हुए नहीं सकुचाते। हमें संवेदना को जगाना होगा। तभी जे.के. राउलिंग ने कहा भी है कि हमें दुनिया को बदलने के लिये जादू की आवश्यकता नहीं है। हम बस मानव की सेवा करके ऐसा आसानी से कर सकते हैं।
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हत्या, अपहरण, डकैती, मारपीट, बलात्कार आदि जितनी अमानवीय घटनाएँ होती हैं, उनका संबंध क्रूरता के साथ है। क्रूर व्यक्ति कभी संवेदनशील नहीं हो सकता। संवेदना के अभाव में किसी के सुख-दुख में दूसरे की संभागिता नहीं हो पाती। यह तभी संभव है, जब अपने अनुभव के आईने पर दूसरों के सुख-दुख प्रतिबिम्बित हों। संवेदनशील व्यक्ति द्वारा किसी को दुख पहुँचाने की बात तो दूर, वह उसकी सहज पीड़ा को देखकर ही द्रवित हो जाता है। मानवता को उपेक्षा का दंश भोगना पड़ा तो उसे मूर्छित होने से कोई बचा नहीं सकेगा। चिंता का मुख्य बिंदु यह नहीं है कि मूल्यों का हृ्रास हो रहा है। आज की सबसे बड़ी समस्या है-आस्थाहीनता की। नैतिकता के आधार पर जीवन नहीं चल सकता, इस अवधारणा का हमला इतना तीव्र है कि दिग्गज लोगों का मन भी डांवाडोल हो रहा है। आस्था एक विधायक भाव है। यह प्रशस्त जीवन जीने के लिए रास्ता ही नहीं बनाता है, प्राणों में नए उत्साह का संचार कर देती है। आज अनुभव किया जा रहा है कि देश एवं दुनिया विकृतियों की शूली पर चढ़ा है। नैतिक मूल्यों के आधार पर ही मनुष्य उच्चता का अनुभव कर सकता है और मानवीय प्रकाश पा सकता है। मानवता का प्रकाश सार्वकालिक, सार्वदेशिक और सार्वजनिक है। इस प्रकाश का जितनी व्यापकता से विस्तार होगा, मानव समाज का उतना ही भला होगा। इसके लिए तात्कालिक और बहुकालिक योजनाओं का निर्माण कर उनकी क्रियान्विति से प्रतिबद्ध रहना जरूरी है। यही विश्व मानवता दिवस मनाने को सार्थक बना सकता है।
-ललित गर्ग
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