नवरात्रि पर उपवास रखने से पहले जानें यह नियम

  •  मिताली जैन
  •  अप्रैल 5, 2019   18:42
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नवरात्रि पर उपवास रखने से पहले जानें यह नियम
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नवरात्रि के दिनों में व्रती व्यक्ति को अपने खानपान को लेकर बेहद सावधानी बरतनी चाहिए। यूं तो बाजार में भी व्रत की थाली व अन्य खाने पीने का सामान मिल जाता है, लेकिन कोशिश करें कि आप घर का बना साफ−सुथरा भोजन ही करें।

नवरात्रि का तो मौका ही होता है, मैया के प्रति अपना अथाह प्रेम और श्रद्धाभाव प्रदर्शित करने का। यूं तो मैया अपने भक्तों पर हमेशा ही अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखती है। लेकिन नवरात्रि के नौ दिन भक्तगण भी उपवास करके मैया को प्रसन्न करने की कोशिश करते हैं। पर क्या आप जानते हैं कि नवरात्रि व्रत रखने के भी अपने नियम होते हैं और अगर कोई भी व्यक्ति नवरात्रि पर व्रत रखने का विचार कर रहा है तो उसे पहले इन नियमों को जान लेना चाहिए। तो चलिए जानते हैं नवरात्रि पर उपवास रखते समय किन बातों का रखें ध्यान−

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रखें हमेशा जोड़ा 

यूं तो नवरात्रि के नौ दिन व्रत रखना बेहद शुभ माना जाता है। लेकिन जिन लोगों के लिए पूरे नौ दिन व्रत रखना संभव नहीं होता, उन्हें जोड़ा तो अवश्य रखना चाहिए। ऐसे लोगों को हमेशा पहले व आखिरी दिन व्रत करना चाहिए।

उठें ब्रह्म मुहूर्त में

साल के बाकी दिन आप भले ही कितने भी आलसी बने रहें, लेकिन अगर आप मैया को प्रसन्न करने व उनकी कृपा दृष्टि का पात्र बनने के लिए व्रत रख रहे हैं तो पूरे नौ दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठें और नहाएं। इसके बाद सूर्य देव को जल दें और फिर अपने घर के पूजास्थल या मंदिर में जाकर यथावत पूजन करें।

खानपान में सावधानी

नवरात्रि के दिनों में व्रती व्यक्ति को अपने खानपान को लेकर बेहद सावधानी बरतनी चाहिए। यूं तो बाजार में भी व्रत की थाली व अन्य खाने पीने का सामान मिल जाता है, लेकिन कोशिश करें कि आप घर का बना साफ−सुथरा भोजन ही करें। आप चाहें तो बाजार में मिलने वाले चिप्स आदि का सेवन कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त व्रत के दौरान प्याज, लहसुन आदि का प्रयोग बिल्कुल भी न करें। 

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इसका रखें ध्यान

व्रत के दौरान कुछ चीजों को करना निषेध माना गया है और व्रती व्यक्ति को भी वह कार्य करने से परहेज करना चाहिए। जैसे−

इन नौ दिनों में नाखून या बाल नहीं काटना चाहिए।

किसी का भी दिल न दुखाएं और झूठ न बोलें। 

इधर−उधर की बातों में समय व्यर्थ न करें। जितना हो सके, अपना समय मैया के ध्यान में व उनके भजन आदि में लगाएं। 

नहाने के लिए साबुन का प्रयोग न करें, क्योंकि उसमें केमिकल होते हैं और नहाते समय वह मुंह में जा सकते हैं। बेहतर होगा कि आप केमिकल युक्त साबुन इस्तेमाल करने की बजाय नहाने के पानी में थोड़ा सा सेंधा नमक या नीम या गुलाब जल डालकर नहाएं।

इसी तरह ब्रश करने के लिए केमिकल युक्त टूथपेस्ट का प्रयोग करने की बजाय नौ दिनों तक नीम की दातुन से दांत साफ करें और गर्म पानी से कुल्ला करें। वैसे आप चाहें तो कोयले या सरसों का तेल व नमक से दांत साफ करें। 

मिताली जैन

ज्योतिषाचार्य विकास शास्त्री से बातचीत पर आधारित







कार्तिक पूर्णिमा को जन्मे थे गुरुनानक देवजी, धूमधाम से मनायी जाती है जयंती

  •  शुभा दुबे
  •  नवंबर 30, 2020   09:20
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कार्तिक पूर्णिमा को जन्मे थे गुरुनानक देवजी, धूमधाम से मनायी जाती है जयंती
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सिख संप्रदाय के प्रवर्तक गुरु नानक देवजी का जन्म संवत 1526 की कार्तिक पूर्णिमा को हुआ था। नानक सिख धर्म के आदि प्रवर्तक थे। इन्होंने अपने विचार बोलचाल की भाषा में प्रकट किये। हिन्दू मुसलमानों के आपसी भेदों को मिटाकर प्यार से रहने का उपदेश दिया।

गुरु नानक देव जी की जयन्ती कार्तिक पूर्णिमा को मनाई जाती है। वैसे तो यह उत्सव पूरे भारत में मनाया जाता है, किंतु सिख बाहुल्य क्षेत्रों में लोग इसे बड़ी धूमधाम से मनाते हैं। इस दिन देशभर के गुरुद्वारों में विशेष आयोजन किये जाते हैं और पूरा दिन पवित्र वाणियों के उच्चारण से पूरा माहौल भक्तिमय रहता है। कार्तिक पूर्णिमा से कुछ दिन पहले से ही सभी गुरुद्वारों पर अद्भुत रौशनी की जाती है जोकि देखते ही बनती है। इस दिन गुरुद्वारों के पवित्र सरोवरों में डुबकी लगाने की होड़ सभी श्रद्धालुओं के बीच देखने को मिलती है। गुरुद्वारों के आसपास मेला भी लगता है।

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सिख संप्रदाय के प्रवर्तक गुरु नानक देवजी का जन्म संवत 1526 की कार्तिक पूर्णिमा को हुआ था। नानक सिख धर्म के आदि प्रवर्तक थे। इन्होंने अपने विचार बोलचाल की भाषा में प्रकट किये। हिन्दू मुसलमानों के आपसी भेदों को मिटाकर प्यार से रहने का उपदेश दिया। गुरु नानक का जन्म तलवंडी में हुआ था जो अब ननकाना साहिब के नाम से विख्यात है। तलवंडी पाकिस्तान के लाहौर शहर से लगभग 30 मील दूर दक्षिण पश्चिम में स्थित है। 

गुरु नानक जी का महामंत्र

गुरुजी के विषय में बहुत से किस्से प्रचलित हैं किन्तु एक प्रसिद्ध घटना का विशेष तौर पर उल्लेख किया जाता है जोकि इस प्रकार है- एक बार नानकजी व्यापार के लिए धन लेकर चले, पर उसे साधुओं के भोज में खर्च करके घर लौट आए। इस पर इनके पिता बड़े नाराज हुए। बाद में इनका विवाह सुलक्षणा से हो गया। दो पुत्र भी हुए, पर गृहस्थी में इनका मन नहीं लगा। वह घर त्याग कर देश विदेश घूमने के लिए निकल पड़े। गुरु नानकदेवजी ने देश प्रेम, दया व सेवा का महामंत्र लोगों को दिया। वे सभी धर्मों को आदर की दृष्टि से देखते थे। इनके अनेक शिष्य बन गये। आज के दिन इनकी वाणियों का श्रद्धा से पाठ किया जाता है।

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लंगर प्रथा की शुरुआत

गुरु नानक देवजी ने जात−पात को समाप्त करने और सभी को समान दृष्टि से देखने की दिशा में कदम उठाते हुए 'लंगर' की प्रथा शुरू की थी। लंगर में सब छोटे−बड़े, अमीर−गरीब एक ही पंक्ति में बैठकर भोजन करते हैं। आज भी गुरुद्वारों में उसी लंगर की व्यवस्था चल रही है, जहां हर समय हर किसी को भोजन उपलब्ध होता है। इस में सेवा और भक्ति का भाव मुख्य होता है। नानक देवजी का जन्मदिन गुरु पूर्व के रूप में मनाया जाता है। तीन दिन पहले से ही प्रभात फेरियां निकाली जाती हैं। जगह−जगह भक्त लोग पानी और शरबत आदि की व्यवस्था करते हैं।

गुरु नानक जी के दस उपदेश

गुरु नानक जी ने अपने अनुयायियों को दस उपदेश दिए जो कि सदैव प्रासंगिक बने रहेंगे। उन्होंने कहा कि ईश्वर एक है और सदैव एक ही ईश्वर की उपासना की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि जगत का कर्ता सब जगह मौजूद है और सर्वशक्तिमान ईश्वर की भक्ति करने वालों को किसी का भय नहीं रहता। नानकजी ने उपदेश दिया कि ईमानदारी से मेहनत करके जीवन बिताना चाहिए तथा बुरा कार्य करने के बारे में न तो सोचना चाहिए और न ही किसी को सताना चाहिए। उन्होंने सदा प्रसन्न रहने का उपदेश भी दिया और साथ ही कहा कि मेहनत और ईमानदारी से कमाई करके उसमें से जरूरतमंद को भी कुछ देना चाहिए। गुरु नानक ने अपने दस मुख्य उपदेशों में कहा है कि सभी स्त्री और पुरुष बराबर हैं। उन्होंने कहा है कि भोजन शरीर को जिंदा रखने के लिए जरूरी है पर लोभ−लालच व संग्रहवृत्ति बुरा कर्म है।

-शुभा दुबे







कार्तिक पूर्णिमा पर इस विधि से करिये दान, घर में आयेगी सुख समृद्धि और धन-धान्य

  •  शुभा दुबे
  •  नवंबर 29, 2020   11:16
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कार्तिक पूर्णिमा पर इस विधि से करिये दान, घर में आयेगी सुख समृद्धि और धन-धान्य
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कार्तिक पूर्णिमा के दिन क्षीर सागर दान का अनन्त माहात्म्य है। क्षीर सागर का दान 24 अंगुल के बर्तन में दूध भरकर उसमें स्वर्ण या रजत की मछली छोड़कर किया जाता है। यह उत्सव दीपावली की भांति दीप जलाकर सायंकाल मनाया जाता है।

अब कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा का शास्त्रों में विशेष महत्व बताया गया है। इस वर्ष कार्तिक पूर्णिमा 30 नवंबर सोमवार को पड़ रही है हालांकि पूर्णिमा तिथि 29 नवंबर की दोपहर 12.47 से ही शुरू हो जायेगी। कार्तिक पूर्णिमा को त्रिपुरी पूर्णिमा, गंगा स्नान, देव दीपावली आदि नामों से भी जाना जाता है। इस महापुनीत पर्व पर दीप दान का विशेष महत्व बताया गया है। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन महादेवजी ने त्रिपुरासुर नामक राक्षस का संहार किया था। इसीलिए इस दिन को त्रिपुरी पूर्णिमा भी कहते हैं। इस दिन यदि कृतिका नक्षत्र हो तो यह महाकार्तिकी होती है, भरणी होने से विशेष फल देती है। लेकिन रोहिणी होने पर इसका महत्व बहुत अधिक बढ़ जाता है। मत्स्य पुराण के अनुसार इस दिन संध्या के समय मत्स्यावतार हुआ था। इस दिन गंगा स्नान के बाद दीप दान आदि का फल दस यज्ञों के समान होता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन क्षीर सागर दान का अनन्त माहात्म्य है। क्षीर सागर का दान 24 अंगुल के बर्तन में दूध भरकर उसमें स्वर्ण या रजत की मछली छोड़कर किया जाता है। यह उत्सव दीपावली की भांति दीप जलाकर सायंकाल मनाया जाता है।

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पूजन विधि

पूर्णिमा के दिन प्रातःकाल अपनी शक्ति के अनुसार तीस या एक सपत्नीक ब्राह्मण को भोजन के लिए आमंत्रित करें। इस दिन किया हुआ दान, होम और जप अक्षय फल देने वाला माना गया है। 'अतो देवाः' आदि दो मंत्रों से देवों के देव भगवान श्रीविष्णु तथा अन्य देवताओं की प्रसन्नता के लिए अलग-अलग तिल और खीर की आहुति छोड़ें। फिर यथाशक्ति दक्षिणा दें और उन्हें प्रणाम करें। इसके बाद भगवान श्रीविष्णु, देवगण तथा तुलसी का पुन: पूजन करें। क्षमायाचना करके ब्राह्मणों को प्रसन्न करने के पश्चात उन्हें विदा करें और गौ सहित भगवान श्रीविष्णु की सुवर्णमयी प्रतिमा आचार्य को दान कर दें। तत्पश्चात भक्त पुरुष गुरुजनों के साथ स्वयं भी भोजन करे। संपूर्ण व्रतों, तीर्थों और दानों से जो फल मिलता है, वही इस कार्तिक व्रत का विधिपूर्वक पालन करने से करोड़ गुना होकर मिलता है।

पर्व का महत्व

ब्रह्मा, विष्णु, शिव, अंगिरा और आदित्य ने इसे महापुनीत पर्व की संज्ञा दी है। इसीलिए इसमें किये हुए गंगा स्नान, दीप दान, होम, यज्ञ तथा उपासना आदि का विशेष महत्व है। इस दिन कृतिका पर चंद्रमा और विशाखा पर सूर्य हो तो पद्मक योग होता है, जो पुष्कर में भी दुर्लभ है। इस दिन संध्या काल में त्रिपुरोत्सव करके दीप दान करने से पुनर्जन्मादि कष्ट नहीं होता। इस तिथि में कृतिका में विश्व स्वामी का दर्शन करने से ब्राह्मण सात जन्म तक वेदपाठी और धनवान होता है। इस दिन चंद्रोदय पर शिवा, संभूति, संतति, प्रीति, अनसूया और क्षमा− इन छह कृतिकाओं का अवश्य पूजन करना चाहिए।

पूजन से होने वाले लाभ

कार्तिक पूर्णिमा की रात्रि में नक्त व्रत करके वृषदान करने से शिवपद प्राप्त होता है। गाय, हाथी, घोड़ा, रथ, घी आदि का दान करने से संपत्ति बढ़ती है। इस दिन उपवास करके भगवद् स्मरण एवं चितन से अग्निष्टोम के समान फल होता है तथा सूर्य लोक की प्राप्ति होती है। इस दिन स्वर्ण के मेष दान करने से ग्रह योग के कष्टों का नाश होता है। इस दिन कन्यादान करने से संतान व्रत पूर्ण होता है। कार्तिक पूर्णिमा से आरम्भ करके प्रत्येक पूर्णिमा को रात्रि में व्रत और जागरण करने से सकल मनोरथ सिद्ध होते हैं।

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कार्तिक पूर्णिमा व्रत कथा

एक बार त्रिपुर राक्षस ने एक लाख वर्ष तक प्रयागराज में घोर तप किया। इस तप के प्रभाव से समस्त जड़ चेतन, जीव तथा देवता भयभीत हो गये। देवताओं ने तप भंग करने के लिए अप्सराएं भेजीं, पर उन्हें सफलता न मिल सकी। आखिर ब्रह्माजी स्वयं उसके सामने प्रस्तुत हुए और वर मांगने का आदेश दिया। त्रिपुर ने वर में मांगा, ''न देवताओं के हाथों मरूं, न मनुष्य के हाथों।'' इस वरदान के बल पर त्रिपुर निडर होकर अत्याचार करने लगा। इतना ही नहीं, उसने कैलाश पर भी चढ़ाई कर दी। परिणामतः महादेव तथा त्रिपुर में घमासान युद्ध छिड़ गया। अंत में शिवजी ने ब्रह्मा तथा विष्णु की सहायता से उसका संहार कर दिया। तभी से इस दिन का महत्व बहुत बढ़ गया। 

-शुभा दुबे







मांगलिक कार्य आरम्भ होने का दिन है ‘‘देवोत्थान एकादशी’’

  •  ब्रह्मानंद राजपूत
  •  नवंबर 25, 2020   09:25
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मांगलिक कार्य आरम्भ होने का दिन है ‘‘देवोत्थान एकादशी’’
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देव चार महीने शयन करने के बाद कार्तिक, शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन उठते हैं। इसीलिए इसे देवोत्थान (देव-उठनी) एकादशी कहा जाता है। देवोत्थान एकादशी तुलसी विवाह एवं भीष्म पंचक एकादशी के रूप में भी मनाई जाती है।

देवोत्थान एकादशी कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को कहते हैं। दीपावली के ग्यारह दिन बाद आने वाली एकादशी को ही प्रबोधिनी एकादशी अथवा देवोत्थान एकादशी या देव-उठनी एकादशी कहा जाता है। आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देव चार मास के लिए शयन करते हैं। इस बीच हिन्दू धर्म में कोई भी मांगलिक कार्य शादी, विवाह आदि नहीं होते। देव चार महीने शयन करने के बाद कार्तिक, शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन उठते हैं। इसीलिए इसे देवोत्थान (देव-उठनी) एकादशी कहा जाता है। देवोत्थान एकादशी तुलसी विवाह एवं भीष्म पंचक एकादशी के रूप में भी मनाई जाती है। इस दिन लोग तुलसी और सालिग्राम का विवाह कराते हैं और मांगलिक कार्यों की शुरुआत करते हैं। हिन्दू धर्म में प्रबोधिनी एकादशी अथवा देवोत्थान एकादशी का अपना ही महत्त्व है। इस दिन जो व्यक्ति व्रत करता है उसको दिव्य फल प्राप्त होता है।

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उत्तर भारत में कुंवारी और विवाहित स्त्रियां एक परम्परा के रूप में कार्तिक मास में स्नान करती हैं। ऐसा करने से भगवान् विष्णु उनकी हर मनोकामना पूरी करते हैं। जब कार्तिक मास में देवोत्थान एकादशी आती है, तब कार्तिक स्नान करने वाली स्त्रियाँ शालिग्राम और तुलसी का विवाह रचाती है। पूरे विधि विधान पूर्वक गाजे बाजे के साथ एक सुन्दर मण्डप के नीचे यह कार्य सम्पन्न होता है। विवाह के समय स्त्रियाँ मंगल गीत तथा भजन गाती है। कहा जाता है कि ऐसा करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं और कार्तिक स्नान करने वाली स्त्रियों की हर मनोकामना पूर्ण करते हैं। हिन्दू धर्म के शास्त्रों में कहा गया है कि जिन दंपत्तियों के संतान नहीं होती, वे जीवन में एक बार तुलसी का विवाह करके कन्यादान का पुण्य प्राप्त कर सकते हैं। अर्थात जिन लोगों के कन्या नहीं होती उनकी देहरी सूनी रह जाती है। क्योंकि देहरी पर कन्या का विवाह होना अत्यधिक शुभ होता है। इसलिए लोग तुलसी को बेटी मानकर उसका विवाह सालिगराम के साथ करते हैं और अपनी देहरी का सूनापन दूर करते हैं। 

प्रबोधिनी एकादशी अथवा देवोत्थान एकादशी के दिन भीष्म पंचक व्रत भी शुरू होता है, जो कि देवोत्थान एकादशी से शुरू होकर पांचवें दिन पूर्णिमा तक चलता है। इसलिए इसे इसे भीष्म पंचक कहा जाता है। कार्तिक स्नान करने वाली स्त्रियाँ या पुरूष बिना आहार के रहकर यह व्रत पूरे विधि विधान से करते हैं। इस व्रत के पीछे मान्यता है कि युधिष्ठर के कहने पर भीष्म पितामह ने पाँच दिनो तक (देवोत्थान एकादशी से लेकर पांचवें दिन पूर्णिमा तक) राज धर्म, वर्णधर्म मोक्षधर्म आदि पर उपदेश दिया था। इसकी स्मृति में भगवान श्रीकृष्ण ने भीष्म पितामह के नाम पर भीष्म पंचक व्रत स्थापित किया था। मान्यता है कि जो लोग इस व्रत को करते हैं वो जीवन भर विविध सुख भोगकर अन्त में मोक्ष को प्राप्त करते हैं।

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देवोत्थान एकादशी की कथा

एक समय भगवान विष्णु से लक्ष्मी जी ने कहा- हे प्रभु ! अब आप दिन-रात जागा करते हैं और सोते हैं तो लाखों-करोड़ों वर्ष तक को सो जाते हैं तथा उस समय समस्त चराचर का नाश भी कर डालते हैं। अत: आप नियम से प्रतिवर्ष निद्रा लिया करें। इससे मुझे भी कुछ समय विश्राम करने का समय मिल जाएगा। ‘लक्ष्मी’ जी की बात सुनकर भगवान् विष्णु  मुस्काराए और बोले- ‘देवी’! तुमने ठीक कहा है। मेरे जागने से सब देवों को और खास कर तुमको कष्ट होता है। तुम्हें मेरी सेवा से जरा भी अवकाश नहीं मिलता। इसलिए, तुम्हारे कथनानुसार आज से मैं प्रति वर्ष चार मास वर्षा ऋतु में शयन किया करूंगा। उस समय तुमको और देवगणों को अवकाश होगा। मेरी यह निद्रा अल्पनिद्रा और प्रलयकालीन महानिद्रा कहलाएगी। यह मेरी अल्पनिद्रा मेरे भक्तों को परम मंगलकारी उत्सवप्रद तथा पुण्यवर्धक होगी। इस काल में मेरे जो भी भक्त मेरे शयन की भावना कर मेरी सेवा करेंगे तथा शयन और उत्पादन के उत्सव आनन्दपूर्वक आयोजित करेंगे उनके घर में तुम्हारे सहित निवास करूँगा।

पूजन विधि 

भगवान विष्णु को चार महीने की निद्रा से जगाने के लिए घण्टा, शंख, मृदंग आदि वाद्यों की मांगलिक ध्वनि के बीच ये श्लोक पढकर जगाते हैं-

उत्तिष्ठोत्तिष्ठगोविन्द त्यजनिद्रांजगत्पते। 

त्वयिसुप्तेजगन्नाथ जगत् सुप्तमिदंभवेत॥

उत्तिष्ठोत्तिष्ठवाराह दंष्ट्रोद्धृतवसुन्धरे।

हिरण्याक्षप्राणघातिन्त्रैलोक्येमङ्गलम्कुरु॥

भगवान् विष्णु को जगाने के बाद उनकी षोडशोपचारविधि से पूजा करनी चाहिए। अनेक प्रकार के फलों के साथ भगवान् विष्णु को नैवेद्य (भोग) लगाना चाहिए। अगर संभव हो तो उपवास रखना चाहिए अन्यथा केवल एक समय फलाहार ग्रहण करकर उपवास करना चाहिए। इस एकादशी में रातभर जागकर हरि नाम-संकीर्तन करने से भगवान विष्णु अत्यन्त प्रसन्न होते हैं।

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शास्त्रों के अनुसार भगवान् विष्णु के चार महीने कि नींद से जागने के बाद ही इस एकादशी से सभी शुभ तथा मांगलिक कार्य शुरू किए जाते हैं। और हिन्दू धर्म में विवाहों कि शुरुआत भी इसी दिन शुभ मुहूर्त से होती है जो कि आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तक चलते हैं मान्यता के अनुसार प्रबोधिनी एकादशी के दिन विवाह करने वाला जोड़ा जीवनभर सुखी रहता है।

- ब्रह्मानंद राजपूत

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