Bhoot Bungla Review | अक्षय कुमार और प्रियदर्शन की पुरानी जोड़ी का जादू पड़ा फीका, न डर सताता है, न हंसी आती है

करीब 14 साल बाद जब यह जोड़ी 'भूत बंगला' के साथ पर्दे पर लौटी, तो उम्मीदें आसमान पर थीं। लेकिन अफ़सोस, यह 'बंगला' उम्मीदों की बुनियाद पर खड़ा नहीं उतर पाया। फिल्म डरावनी होने की कोशिश में शोर मचाती है और कॉमेडी के नाम पर पुराने घिसे-पिटे फॉर्मूले दोहराती है।
भूत बंगला रिव्यू: नई हॉरर-कॉमेडी फ़िल्म 'भूत बंगला' के साथ अक्षय कुमार सिनेमा में वापसी कर रहे हैं। इस फ़िल्म का निर्देशन प्रियदर्शन ने किया है, जिन्होंने एक ऐसी फ़िल्म बनाई है जो दर्शकों के बीच पहले से ही चर्चा का विषय बन चुकी है। इस फ़िल्म में कई जाने-माने कलाकार एक साथ नज़र आ रहे हैं, जिनमें तब्बू, राजपाल यादव, परेश रावल, मिथिला पालकर, वामिका गब्बी और असरानी शामिल हैं। यह फ़िल्म अक्षय कुमार और प्रियदर्शन के बीच लंबे समय से इंतज़ार किए जा रहे मिलन की निशानी है। जब भी भारतीय सिनेमा में प्रियदर्शन और अक्षय कुमार की जोड़ी का नाम आता है, तो 'हेरा फेरी' और 'भूल भुलैया' जैसी कालजयी फिल्मों की यादें ताज़ा हो जाती हैं। करीब 14 साल बाद जब यह जोड़ी 'भूत बंगला' के साथ पर्दे पर लौटी, तो उम्मीदें आसमान पर थीं। लेकिन अफ़सोस, यह 'बंगला' उम्मीदों की बुनियाद पर खड़ा नहीं उतर पाया। फिल्म डरावनी होने की कोशिश में शोर मचाती है और कॉमेडी के नाम पर पुराने घिसे-पिटे फॉर्मूले दोहराती है।
कहानी: लोककथा और लॉजिक का संघर्ष
फिल्म की शुरुआत मंगलपुर नामक एक काल्पनिक गांव की लोककथा से होती है, जहाँ एक राक्षस नई-नवेली दुल्हनों को अगवा कर लेता है। यह प्लॉट 1979 की क्लासिक फिल्म 'जानी दुश्मन' की याद दिलाता है। फिल्म में लॉजिक तब दम तोड़ देता है जब 49 साल के जिस्सू सेनगुप्ता को 58 साल के अक्षय कुमार के पिता के रूप में दिखाया जाता है। कहानी मंगलपुर से लंदन और फिर एक भुतहा महल के इर्द-गिर्द घूमती है, जहाँ मिथिला पालकर को विरासत में एक आलीशान लेकिन शापित बंगला मिलता है।
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अभिनय: सितारों की फौज, पर स्क्रिप्ट कमजोर
अक्षय कुमार अपनी चिर-परिचित ऊर्जा के साथ नजर आते हैं। वे एक्शन और पंचलाइन्स में सहज हैं, लेकिन एक कमजोर और जरूरत से ज्यादा लंबी स्क्रिप्ट को अकेले कंधे पर ढोना उनके लिए भी मुश्किल साबित हुआ। परेश रावल, राजपाल यादव और असरानी जैसे दिग्गज कलाकार फिल्म में हैं, लेकिन उन्हें केवल 'फिजिकल कॉमेडी' (मार खाना या गिरना) तक सीमित कर दिया गया है, जो अब पुरानी और उबाऊ लगती है। तब्बू और वामिका गब्बी जैसी मंझी हुई अभिनेत्रियों को फिल्म में ठीक से इस्तेमाल नहीं किया गया। तब्बू का किरदार प्रभावहीन लगता है, वहीं वामिका का रहस्यमयी रोल अंत तक बेजान ही बना रहता है।
तकनीकी पक्ष: हॉरर कम, शोर ज्यादा
फिल्म का हॉरर तत्व पूरी तरह से 'जंप स्केयर्स' और लाउड बैकग्राउंड म्यूजिक पर निर्भर है। संगीत डराने के बजाय तनाव पैदा करता है, जो कई बार किसी पुराने टीवी सोप ओपेरा जैसा लगने लगता है।
वधुसुर की कथा: देव-असुर वंश और पौराणिक भविष्यवाणियों वाला हिस्सा दिलचस्प हो सकता था, लेकिन इसे दर्शकों को इतना 'समझाया' गया है कि रहस्य का रोमांच ही खत्म हो जाता है।
संगीत: 'राम जी आके भला करेंगे' को छोड़कर कोई भी गाना याद रखने लायक नहीं है। 'अमी जे तोमार' जैसे कल्ट पलों को फिर से रचने की कोशिश पूरी तरह नाकाम रही है।
दूसरा हाफ: बिखराव और उपदेश
फिल्म का दूसरा हिस्सा सबसे ज्यादा निराश करता है। कहानी फ्लैशबैक और लंबे स्पष्टीकरणों के बोझ तले दब जाती है। एक आधुनिक पृष्ठभूमि वाली महिला (मिथिला) का बिना किसी तर्क के पुरानी कुरीतियों को मान लेना खटकता है। साथ ही, फिल्म के बीच में 'पुत्र धर्म' जैसे उपदेश कहानी के प्रवाह को पूरी तरह तोड़ देते हैं।
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निष्कर्ष: क्या आपको यह फिल्म देखनी चाहिए?
'भूत बंगला' एक ऐसी सवारी है जो रोमांचक 'रोलरकोस्टर' होने का वादा करती है, लेकिन हकीकत में यह एक धीमी और चरमराती हुई 'भूतिया घर की सैर' बनकर रह जाती है। प्रियदर्शन की फिल्मों में जो सिचुएशनल कॉमेडी और टाइमिंग हुआ करती थी, उसकी यहाँ भारी कमी खलती है। यदि आप अक्षय कुमार और प्रियदर्शन के कट्टर प्रशंसक हैं, तो आप इसे एक बार देख सकते हैं। लेकिन अगर आप 'भूल भुलैया' जैसी बारीकी और हंसी की तलाश में हैं, तो यह 'बंगला' आपको निराश ही करेगा। काश, इस बंगले में 'भूत' कम और 'दिमाग' थोड़ा ज्यादा होता।
निर्देशक: प्रियदर्शन
लेखक: आकाश कौशिक, अभिलाष नायर, प्रियदर्शन
भूत बांग्ला कलाकार: अक्षय कुमार, परेश रावल, वामिका गब्बी, राजपाल यादव, मिथिला पालकर, असरानी जी, तब्बू
भूत बांग्ला फिल्म रेटिंग: 2/5
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