Vibe Movie Review | कॉमेडी और जासूसी के चक्कर में उलझी कुणाल खेमू की फिल्म, दूसरे हाफ में धीमी पड़ी रफ्तार

फिल्म का ताना-बाना हार्दिक (कुणाल खेमू) के इर्द-गिर्द बुना गया है, जो बेहद लापरवाह जिंदगी जीता है और किसी भी गंभीर परिस्थिति को मजाकिया बना सकता है। उसके साथ है उसका दोस्त भागीरथ उर्फ बग्स (स्पर्श श्रीवास्तव), जो स्वभाव में उससे बिल्कुल अलग लेकिन हर कदम पर उसका साथ देने वाला साथी है।
कुणाल खेमू जब भी कॉमेडी की दुनिया में कदम रखते हैं, तो दर्शकों की उम्मीदें खुद-ब-खुद बढ़ जाती हैं। बतौर अभिनेता अपनी बेहतरीन कॉमिक टाइमिंग साबित कर चुके खेमू अपनी नई फिल्म 'Vibe' के जरिए कॉमेडी और स्पाई-थ्रिलर (Spy-Thriller) का अनूठा तड़का लेकर आए हैं। फिल्म अपने शुरुआती पलों में एक बेफिक्र, अनोखी और हल्की-फुल्की दुनिया रचने में कामयाब होती है, लेकिन जैसे-जैसे कहानी स्पाई मिशन और अंतरराष्ट्रीय साजिशों की ओर बढ़ती है, इसकी पकड़ ढीली होने लगती है।
क्या है 'Vibe' की कहानी?
फिल्म का ताना-बाना हार्दिक (कुणाल खेमू) के इर्द-गिर्द बुना गया है, जो बेहद लापरवाह जिंदगी जीता है और किसी भी गंभीर परिस्थिति को मजाकिया बना सकता है। उसके साथ है उसका दोस्त भागीरथ उर्फ बग्स (स्पर्श श्रीवास्तव), जो स्वभाव में उससे बिल्कुल अलग लेकिन हर कदम पर उसका साथ देने वाला साथी है।
रोमांटिक एंगल: हार्दिक की जिंदगी में करीना (वंशिका धीर) के आने से कहानी एक हल्की-फुल्की रॉम-कॉम (Rom-Com) का रूप लेती है।
ट्विस्ट व स्पाई मिशन: एक अप्रत्याशित घटना के बाद हार्दिक और बग्स मैडम एच (प्रीति जिंटा) की गुप्त इंटेलिजेंस एजेंसी के संपर्क में आते हैं। इसके बाद दोनों एक ऐसे राष्ट्रीय सुरक्षा मिशन में फंस जाते हैं जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी।
Vibe: पहले हाफ में कॉमेडी बढ़िया है
'Vibe' का पहला हाफ फ़िल्म का सबसे मज़बूत हिस्सा है। फिल्म का अंदाज़ हल्का-फुल्का है और दर्शक आसानी से किरदारों से जुड़ जाते हैं। हार्दिक की हरकतें, बग्स के रिएक्शन और दोनों के बीच की केमिस्ट्री फिल्म को कई बार मज़ेदार बनाती है। फिल्म की कॉमेडी हमेशा दमदार नहीं होती, लेकिन कोशिश साफ दिखती है। छोटे-छोटे रेफरेंस, पुरानी मशहूर फिल्मों और सितारों के नामों का इस्तेमाल और कुछ वन-लाइनर्स माहौल को हल्का बनाए रखते हैं। कभी-कभी फिल्म अपनी कहानी के अजीबपन को मानती हुई लगती है, और यही इसकी खासियत बन जाती है। हार्दिक का किरदार भी शुरुआत में दिलचस्प लगता है। वह कोई पारंपरिक हीरो नहीं है, बल्कि ऐसा व्यक्ति है जो हालात से लड़ने के बजाय उनसे भागने की कोशिश करता है। इसलिए, जब वह जासूसी की दुनिया में कदम रखता है, तो उसके रिएक्शन कॉमेडी पैदा करते हैं।
जब फिल्म का मज़ा कम हो जाता है
फिल्म की असली दिक्कतें इंटरवल के बाद शुरू होती हैं। जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, इसमें नए ट्विस्ट, ज़्यादा खतरा और ज़्यादा एक्शन आता है। यह सब कुछ देर तक तो दिलचस्प लगता है, लेकिन जल्द ही फिल्म में बहुत ज़्यादा चीज़ें भरने की वजह से दिक्कतें आने लगती हैं। यह स्पाई मिशन के साथ आतंकवाद, टेक्नोलॉजी, AI और अंतरराष्ट्रीय साज़िशों को जोड़ने की कोशिश करती है। सोच के हिसाब से, यह एक कॉमेडी स्पाई थ्रिलर को बेहतर बनाने का तरीका हो सकता था, लेकिन यहाँ कई चीज़ें सतही लगती हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि फिल्म यह तय नहीं कर पाती कि वह अपनी कॉमेडी पर भरोसा करे या पूरी तरह से एक्शन फिल्म बन जाए।
दूसरे हाफ में कहानी ज़्यादा गंभीर और बड़े पैमाने की हो जाती है, जबकि दर्शक पहले ही इसके मज़ेदार और अजीब अंदाज़ के आदी हो चुके होते हैं। थाईलैंड वाला हिस्सा भी फिल्म की रफ़्तार पर असर डालता है। हालाँकि कहानी अंतरराष्ट्रीय लोकेशन और एक बड़े मिशन के स्तर पर पहुँच जाती है, लेकिन मनोरंजन का स्तर वैसा नहीं रहता। कई सीन बहुत लंबे लगते हैं।
निर्देशन और लेखन: कुणाल खेमू का फिल्म में अपना विज़न
एक निर्देशक के तौर पर, कुणाल खेमू के पास आइडिया की कोई कमी नहीं है। फिल्म के शुरुआती हिस्से में उनका विज़न साफ दिखता है। वह ऐसे किरदारों और स्थितियों से कॉमेडी निकालने की कोशिश करते हैं जिनमें कुछ अजीबपन हो। शुरुआत से लेकर किरदारों के परिचय तक, फिल्म का तरीका दिखाता है कि खेमू कोई पारंपरिक कॉमेडी बनाने की कोशिश नहीं कर रहे हैं। उनकी कहानी पॉप कल्चर रेफरेंस, व्यंग्य और जानबूझकर लाए गए अजीबपन से भरी है।
हालांकि, उनके निर्देशन की सबसे बड़ी कमी फिल्म पर कंट्रोल न रख पाना है। कहानी में कई तरह के आइडिया एक साथ दिखाए गए हैं और फिल्म का मूड बार-बार बदलता रहता है। एक तरफ तो यह हल्की-फुल्की कॉमेडी लगती है, तो दूसरी तरफ यह ज़बरदस्त एक्शन और स्पाई ड्रामा का रूप लेने लगती है। क्लाइमेक्स के पास आते-आते यह बदलाव और भी साफ़ दिखने लगता है। एक्शन को बड़ा और हीरो को ज़्यादा प्रभावशाली दिखाने की कोशिश में फिल्म अपना शुरुआती सहजपन खो देती है। कुछ सीन बहुत ज़्यादा भव्य और लंबे लगते हैं। अगर डायरेक्टर कहानी के ह्यूमर पर ज़्यादा ध्यान देते और दूसरे हाफ को छोटा रखते, तो फिल्म का असर बेहतर हो सकता था।
वाइब: एक्टर के तौर पर कुणाल खेमू की छाप
एक एक्टर के तौर पर कुणाल खेमू फिल्म का सबसे दमदार हिस्सा हैं। वे हार्दिक के किरदार में वही कॉमिक टाइमिंग लाते हैं जो दर्शकों ने उनके पिछले कामों में देखी है। उनके चेहरे के हाव-भाव, डायलॉग बोलने का अंदाज़ और हालात पर उनके रिएक्शन अक्सर फिल्म को बचा ले जाते हैं। हालांकि, दिक्कत यह है कि उनके कुछ एक्शन और कॉमिक अंदाज़ नए नहीं लगते। दर्शकों को लगातार उनके पिछले किरदारों की झलक मिलती रहती है। फिर भी, फिल्म को उसके अंजाम तक पहुँचाने में खेमू अहम भूमिका निभाते हैं।
वाइब: स्पर्श श्रीवास्तव ने अपनी मौजूदगी का एहसास कराया
बग्स का किरदार निभाने वाले स्पर्श श्रीवास्तव फिल्म का सरप्राइज़ हैं। हालांकि उनका किरदार शुरू में साधारण लगता है, लेकिन वे अपनी बॉडी लैंग्वेज और हल्के-फुल्के रिएक्शन से उसे मज़ेदार बना देते हैं। कभी-कभी किसी सीन में असली कॉमेडी नहीं होती, लेकिन सिर्फ़ स्पर्श के रिएक्शन ही चेहरे पर मुस्कान ले आते हैं। उनकी परफॉर्मेंस कुणाल की तुलना में कम बनावटी लगती है, और दोनों मिलकर फिल्म को ज़रूरी कॉमिक बैलेंस देते हैं।
वाइब: प्रीति ज़िंटा और सपोर्टिंग कास्ट
मैडम एच के तौर पर प्रीति ज़िंटा का किरदार अनोखा है। वे एक सख्त और प्रभावशाली स्पाई बॉस का रोल निभाती हैं और कुछ पलों में फिल्म में जान डाल देती हैं। उनके एक्शन सीन फिल्म के बेहतर हिस्सों में से हैं, लेकिन कभी-कभी वे इसे ज़रूरत से ज़्यादा करती हुई लगती हैं। हालांकि, उनके किरदार में लिखे गए कुछ ह्यूमर और महिला सशक्तिकरण के संकेत गहराई से असर नहीं छोड़ पाते।
थाईलैंड वाला हिस्सा भी कोई खास असर नहीं छोड़ता। वंशिका धीर फिल्म के ग्लैमर और रोमांटिक पहलुओं को संभालती हैं। उनकी स्क्रीन प्रेज़ेंस अच्छी है, लेकिन उनके किरदार का दायरा सीमित है। कभी-कभी उनका लहज़ा भी नैचुरल नहीं लगता। यशपाल सिंह और दिनेश लाल यादव (जिन्हें निरहुआ के नाम से भी जाना जाता है) अपने-अपने किरदारों में ठीक-ठाक हैं। शर्मिला टैगोर की छोटी सी मौजूदगी एक सुखद सरप्राइज़ देती है, लेकिन उनका रोल बहुत छोटा है।
Vibe: फिल्म की कमियां क्या हैं?
Vibe की सबसे बड़ी कमियां इसकी लंबाई और खिंचा हुआ दूसरा हाफ है। फिल्म तब सबसे अच्छी लगती है जब यह कॉमेडी मोड में रहती है। जैसे ही यह एक बड़े स्पाई-एक्शन ड्रामा में बदलने लगती है, कहानी की रफ़्तार और ह्यूमर दोनों कमज़ोर पड़ जाते हैं।
रोमांटिक ट्रैक कुछ जगहों पर कहानी को आगे बढ़ाने के बजाय बोझिल लगता है। गाने फिल्म की रफ़्तार को खास बढ़ाते नहीं हैं। कुछ म्यूज़िकल नंबर कहानी में योगदान देने के बजाय सिर्फ़ माहौल बनाने के लिए जोड़े गए लगते हैं। एक्शन सीन प्रभावशाली हैं, लेकिन वे हमेशा कहानी के हिसाब से सही नहीं लगते। फिल्म का बहुत ज़्यादा मसाला, खासकर आखिरी हिस्से में, इसकी शुरुआती कॉमेडी पर हावी हो जाता है।
फिल्म का प्रोडक्शन डिज़ाइन और लोकेशन अच्छे हैं, और सिनेमैटोग्राफी भी बढ़िया है। हालांकि, शानदार लोकेशन और बड़े पैमाने पर बनी होने के बावजूद, ये कहानी की कमियों को पूरी तरह छिपा नहीं पाते। दूसरे हाफ की एडिटिंग में भी कसावट की कमी है।
Vibe में निश्चित रूप से एक अच्छी कॉमेडी स्पाई फिल्म बनने के गुण हैं। कुणाल खेमू का कॉमिक अंदाज़, स्पर्श श्रीवास्तव की सहज एक्टिंग और प्रीति ज़िंटा के कुछ मज़ेदार पल इसे पूरी तरह निराश करने वाली फिल्म बनने से बचाते हैं। शुरुआत में, फिल्म अपने हल्के-फुल्के मज़ाक से दर्शकों को बांधे रखती है, लेकिन दूसरा हाफ इसकी सबसे बड़ी समस्या बन जाता है।
कहानी बहुत कुछ करने की कोशिश करती है और इस चक्कर में वह चीज़ खो देती है जो इसे खास बना सकती थी: इसका अजीब और बेफिक्र ह्यूमर। अगर आप कुणाल खेमू की कॉमेडी और हल्की-फुल्की टाइम-पास फिल्मों के फैन हैं, तो Vibe आपको कुछ अच्छे पल दे सकती है। हालांकि, अगर आप लगातार मज़बूत कॉमेडी और एक कसी हुई स्पाई थ्रिलर की उम्मीद कर रहे हैं, तो यह फिल्म बहुत ज़्यादा असर नहीं छोड़ती। कुल मिलाकर, 'वाइब' हंसाने की पूरी कोशिश करती है और कुछ पलों में कामयाब भी होती है, लेकिन मज़ेदार माहौल लंबे समय तक बना नहीं रह पाता। अच्छे आइडिया और कास्ट के बावजूद, बिखरी हुई कहानी और बहुत लंबा खिंचा हुआ दूसरा हाफ इसे औसत से बेहतर बनने से रोकते हैं।
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