Katrina Kaif के Postpartum Look पर उठे सवाल, डिलीवरी के बाद शरीर को रिकवर होने में क्यों लगता है वक्त

बच्चे को जन्म देने के बाद वजन और शारीरिक बदलावों को लेकर ट्रोल हुईं कैटरीना कैफ के समर्थन में फैंस आगे आए हैं। डिलीवरी के बाद महिलाओं में शारीरिक और हार्मोनल बदलाव होना पूरी तरह सामान्य है। इस पोस्टपार्टम अवधि में शरीर को ठीक होने में समय लगता है, जिसके लिए उचित पोषण, आराम और भावनात्मक देखभाल जरूरी है।
कुछ समय पहले सोशल मीडिया पर एक्ट्रेस कैटरीना कैफ अपने लुक्स को लेकर काफी ट्रोल हुईं। आपने भी इंस्टाग्राम पर ऐसे पोस्ट जरुर देखें होंगे कि, जिनमें महिलाओं की खूबसूरती और उनके शरीर को लेकर तरह-तरह की बातें की जाती है। अक्सर एक्ट्रेसेस को उनके शरीर और लुक्स को लेकर काफी जज किया जाता है।
जाने पूरा मामला
एक्ट्रेस कैटरीना कैफ अपने बच्चे को जन्म देने के बाद उनके शरीर में काफी बदलाव देखा गया है। कुछ लोगों ने उनके वजन और बॉडी साइज को लेकर कमेंट किया और कैटरीना के वर्तमान लुक की तुलना मां बनने से पहले के शरीर से की।
कैटरीना कैफ अपने पति विक्की कौशल के साथ मुंबई में अंबानी परिवार के गणेश चतुर्थी समारोह में नजर आई थीं। इस समय कुछ लोगों ने उनके पोस्ट-प्रेग्रेंसी शरीर और वजन को लेकर सोशल मीडिया पर कमेंट्स किए। लेकिन उनके फैंस ने कैटरीना का सपोर्ट किया। उन्होंने कहा कि प्रेग्नेंसी और बच्चे के जन्म के बाद शरीर में बदलाव होना नॉर्मल है और हर महिला के शरीर को ठीक होने में अलग-अलग समय लगता है।
डिलीवरी के बाद शरीर तुरंत पहले जैसा क्यों नहीं होता?
कैटरीना और विक्की कौशल के पहले बच्चे, बेटे विहान कौशल का जन्म 7 नवंबर 2025 को हुआ था। जिसका मतलब है कि एक्ट्रेस अभी बच्चे के जन्म के पहले साल के अंदर ही हैं, लेकिन यहां एक बड़ा सवाल यह है कि आखिर लोगों को क्यों लगता है कि बच्चे को जन्म देने के कुछ ही समय बाद महिला का शरीर बिल्कुल पहले जैसा दिखना चाहिए।
असल में प्रेग्नेंसी के समय शरीर के वजन, चर्बी, पेट की मसल्स, हार्मोन, नींद, एनर्जी और फिजिकल एक्टिविटी में कई तरह के बदलाव आते हैं। रिसर्च से भी यह पता चला है कि बच्चे के जन्म के बाद महिलाओं के वजन में काफी बदलाव होता है। इसलिए कोई तय मेडिकल समय नहीं है, जिसके अंदर हर महिला का वजन बच्चे के जन्म से पहले जैसा होना जरुरी हो।
बच्चे के जन्म बाद शरीर में क्या बदलाव आते हैं
बच्चे को जन्म देने के बाद महिलाओं के शरीर में कई फिजिकल और हार्मोनल बदलाव देखने को मिलते हैं। इस फेज को पोस्टपार्टम पीरियड कहा जाता है। इस अवधि में शरीर धीरे-धीरे प्रेग्नेंसी से पहले की कंडीशन में वापस आने की कोशिश करता है।
- प्रेग्नेंसी के बाद शरीर धीरे-धीरे अपने पहले साइज में वापस आता है।
- इस प्रक्रिया के समय पेट में दर्द या ऐंठन जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
- बच्चों के जन्म देने के बाद कुछ हफ्तों तक वजाइना से ब्लीडिंग या डिस्चार्ज होता रहता है, जिसे लोशिया (Lochia) कहा जाता है।
- मिल्क बनने के कारण ब्रेस्ट में सूजन या भारीपन महसूस होता है।
- वहीं, पेट की मसल्स में काफी खिंचाव महसूस होता है, जिससे पेट कुछ समय तक ढीला या बाहर निकला हुआ दिखाई दे सकता है।
- इस दौरान ब्रेस्ट साइज और शेप में बदलाव आता है।
- हिप्स भी पहले की तुलना में चौड़े हो जाते है।
- स्किन पर खिंचाव के निशान यानी स्ट्रेच मार्क्स नजर आते हैं।
- पेल्विक फ्लोर की मसल्स कमजोर हो सकती है, जिससे कभी-कभी यूरिन लीक होने की समस्या हो सकती है।
- लगातार बालों का झड़ना, जो कि हार्मोनल की बदलाव के कारण होता है।
पोस्टपार्टम के दौरान कौन-कौन सी समस्याएं हो सकती हैं?
पोस्टपार्टम हेमरेज: बच्चे के जन्म के बाद ज्यादा ब्लीडिंग
पोस्टपार्टम प्री-एक्लेम्पसिया: बच्चे के जन्म के बाद हाई ब्लड प्रेशर से जुड़ी समस्याएं
डीप वेन थ्रोम्बोसिस (DVT): शरीर की किसी गहरी नस में ब्लड क्लॉट बनना
पल्मोनरी एम्बोलिज्म: ब्लड क्लॉट को लंग्स तक पहुंचना
मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं: पोस्टपार्टम रेज या पोस्टपार्टम साइकोसिस
सेप्सिस: इंफेक्शन के कारण शरीर में होने वाला खतरनाक रिएक्शन
पोसटपार्टम केयर में आयुर्वेद कैसे मदद करता है?
जब बच्चे का जन्म होता है, तो उसे अक्सर फोर्थ ट्राइमेस्टर (Fourth Trimester) भी कहा जाता है, वैसे यह अवधि मां के लिए महत्वपूर्ण होती है।
- यह समय शरीर को ठीक होने, इमोशनल बदलावोंको समझने और नवजात शिशु के साथ नया रूटीन बनाने का होता है।
- आयुर्वेद भारतीय चिकित्सा पद्धति है, जिसमें बच्चे के जन्म देने के बाद मां के शरीर, मन और भावनाओं क देखभाल पर अधिक ध्यान दिया जाता है।
- आयुर्वेद के अनुसार, डिलीवरी के बाद शरीर की एनर्जी कम हो सकता है और वात दोष बढ़ जाता है। इसलिए भी शरीर को पोषण देना जरुरी है और आराम करना भी काफी जरुरी है।
इमोशनल हेल्थ भी है जरूरी
बच्चे के जन्म के बाद सिर्फ शरीर ही नहीं, बल्कि मेंटल और इमोशनल हेल्थ का ध्यान भी रखा जाता है। योग, मेडिटेशन और प्राणायाम से तनाव और चिंता को कम करने और मन को शांत रखने में मदद मिलती है। वैसे यह समय मां और बच्चे के बीच इमोशनल जुड़ाव बनानने के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दौरा महिलाएं खुद को काफी अकेला न समझें, इस समय काफी इमोशनल महसूस होता है।
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