Denmark की तर्ज पर मानसिक स्वास्थ्य बेहतर करने के लिए प्रकृति के बीच बिताएं कुछ पल

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यूनिवर्सिटी ऑफ रिचमंड के टॉड लुकिंगबिल ने प्रकृति के बीच समय बिताने को मानसिक स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद बताया है। शोध के अनुसार घर या दफ्तर के आसपास मौजूद पार्कों में कुछ मिनट बिताना तनाव कम करने में मदद करता है।

(टॉड लुकिंगबिल, यूनिवर्सिटी ऑफ रिचमंड) रिचमंड (अमेरिका), दो अगस्त (द कन्वरसेशन) आज की कामकाजी जिंदगी का अधिकांश हिस्सा चारदीवारी के भीतर गुजरता है। घंटों का सफर, लगातार बैठकें और कंप्यूटर स्क्रीन के सामने बीतता दिन- इन सबके बीच प्रकृति के लिए समय निकालना किसी विलासिता जैसा लगने लगता है। कई लोगों को लगता है कि प्रकृति का आनंद तभी मिलता है, जब लंबी छुट्टी लेकर पहाड़ों पर ‘ट्रैकिंग’ की जाए या जंगलों में ‘कैंप’ लगाया जाए।

लेकिन अब शोध कुछ और ही कहानी कहते हैं। वे बताते हैं कि प्रकृति का लाभ उठाने के लिए किसी रोमांचक यात्रा पर जाना जरूरी नहीं है। घर या दफ्तर के आसपास मौजूद किसी पार्क या हरियाली के बीच रोज कुछ मिनट बिताना भी तनाव कम करने, मन को शांत रखने और मानसिक स्वास्थ्य बेहतर बनाने के लिए काफी हो सकता है।

साल 2026 की वसंत ऋतु में मुझे डेनमार्क में शहरी परिदृश्य के बारे में पढ़ाने और उनका अध्ययन करने का अवसर मिला। दुनिया के सबसे खुशहाल देशों में गिने जाने वाले डेनमार्क से मुझे पहले से ही सुंदर पार्क, खुले आंगनों और साइकिल चलाने के लिए बने रास्तों की उम्मीद थी। वहां यह सब तो मिला ही, लेकिन जिसने सबसे ज्यादा प्रभावित किया, वह यह था कि लोग इन हरित स्थानों का इस्तेमाल अपनी रोजमर्रा की जिंदगी का स्वाभाविक हिस्सा मानते हैं।

ये पार्क केवल छुट्टी बिताने या खास मौकों के लिए सुरक्षित जगहें नहीं थे। लोग यहां दोपहर का भोजन करते, दोस्तों से मिलते, दफ्तर से लौटते समय पैदल गुजरते या कुछ पल शांति से बैठकर सुकून महसूस करते थे। ऐसा लगता था जैसे खुले वातावरण में समय बिताना उनकी दिनचर्या का स्वाभाविक हिस्सा हो।

डेनमार्क में यह संस्कृति केवल अच्छी योजना बनाकर बनाए गए उद्यानों की वजह से नहीं बनी, बल्कि इसलिए भी कि वहां हरियाली को लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी में इस तरह पिरोया गया है कि प्रकृति उनके दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है। रोज पार्क जाने से मिलने वाले फायदे : प्रकृति के बीच समय बिताने से स्वास्थ्य को होने वाले लाभों के प्रमाण अब इतने मजबूत हो चुके हैं कि दुनिया के कई देशों की सार्वजनिक नीतियों पर भी उनका असर दिखने लगा है। उदाहरण के लिए, अमेरिका में नेशनल पार्क सर्विस की ‘हेल्दी पार्क्स हेल्दी पीपल’ और पार्कआरएक्स’ जैसी पहलें इस सोच को बढ़ावा देती हैं कि पार्क तक आसान पहुंच लोगों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाती है।

हालांकि, अधिकतर अमेरिकी जब ‘पार्क’ शब्द सुनते हैं, तो उनके मन में सबसे पहले येलोस्टोन, योसेमिटी या ग्रैंड कैन्यन जैसे प्रसिद्ध राष्ट्रीय उद्यानों की तस्वीर उभरती है। लेकिन सच यह है कि स्वास्थ्य के लिए सबसे अधिक लाभ उन पार्कों से मिलता है, जहां लोग जीवन में एक बार नहीं, बल्कि बार-बार जा सकें। यानी घर या दफ्तर के पास मौजूद छोटे-छोटे पार्क, हरित क्षेत्र और खुले स्थान कहीं अधिक उपयोगी साबित हो सकते हैं।

मेरे अपने शोध ने भी यही बात साबित की। मैंने अमेरिकी गृहयुद्ध के ऐतिहासिक युद्धस्थलों पर विकसित या संरक्षित पार्कों का अध्ययन किया। ये वे स्थान हैं, जिन्हें गृहयुद्ध के ऐतिहासिक युद्धक्षेत्रों की स्मृति में संरक्षित किया गया है।

चूंकि इनमें से अधिकांश बड़े शहरों के बाहरी इलाकों में स्थित हैं, इसलिए यहां आज भी जंगल, घास के मैदान और पैदल चलने के रास्ते सुरक्षित हैं। करोड़ों अमेरिकी बिना लंबी यात्रा किए आसानी से यहां पहुंच सकते हैं। इसी वजह से ये पार्क केवल पर्यटन स्थल नहीं रह जाते, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन जाते हैं।

कोई दोपहर के भोजन के समय यहां टहलने चला जाता है, तो कोई दफ्तर के बाद कुछ देर सुकून के लिए लौट आता है। यानी यदि हम ‘पार्क’ की अपनी पारंपरिक सोच बदल दें, तो हमें एहसास होगा कि प्रकृति हमारे आसपास पहले से मौजूद है। जरूरत केवल उसे अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाने की है।

जब प्रकृति कामकाज का हिस्सा बन जाए : मैं जिस रिचमंड विश्वविद्यालय में काम करता हूं, वहां एक छोटी-सी नदी के पुनर्जीवन की परियोजना ने यह सोचने का अवसर दिया कि प्रकृति को विश्वविद्यालय के रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा कैसे बनाया जाए। इस परियोजना के तहत एक ‘इको-कोरिडोर’ तैयार किया। इसमें पैदल चलने के रास्ते, लोगों के बैठने और बातचीत करने की जगहें तथा शांत माहौल में कुछ समय बिताने के लिए खुले स्थान विकसित किए गए।

आसपास बहती जलधारा और स्थानीय पौधों ने इस पूरे क्षेत्र को प्राकृतिक स्वरूप दिया। इसका फायदा केवल पर्यावरण को ही नहीं मिला। एक ओर इससे जैव विविधता बढ़ी और पानी की गुणवत्ता में सुधार हुआ, वहीं दूसरी ओर छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों को बैठकों के बीच टहलने, खुले वातावरण में दोपहर का भोजन करने या कुछ मिनट प्रकृति के बीच सुकून से बिताने की जगह भी मिल गई।

इस हरित क्षेत्र की देखभाल भी लोगों की भागीदारी से होती है। स्वयंसेवक पेड़ों के आसपास गीली घास बिछाते हैं, स्थानीय वनस्पतियों को नुकसान पहुंचाने वाले बाहरी पौधों को हटाते हैं और सामुदायिक उद्यान की देखभाल करते हैं। उनके लिए यह केवल सेवा कार्य नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ जुड़ने का एक और अवसर बन जाता है।

इस अनुभव ने हमें एक महत्वपूर्ण बात सिखायी कि प्रकृति और काम एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। यदि शहरों और परिसरों की योजना सोच-समझकर बनायी जाए, तो खुले वातावरण में कुछ मिनट बिताना भी दिनचर्या का उतना ही सामान्य हिस्सा बन सकता है, जितना किसी बैठक में शामिल होना। प्रकृति के साथ जीने का नजरिया : हरित स्थानों का अच्छा डिजाइन महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन पूरी कहानी सिर्फ इतनी नहीं है।

शायद आपने डेनमार्क का प्रसिद्ध शब्द ‘ह्यूगे’ सुना होगा। इसका अर्थ है- आरामदायक, आत्मीय और सुकूनभरा माहौल। लेकिन स्कैंडिनेवियाई देशों में एक और विचार बेहद लोकप्रिय है- ‘फ्रिलुफ्ट्सलिव’।

इसका शाब्दिक अर्थ है ‘खुले वातावरण में जीवन जीना’। यह केवल प्रकृति से प्रेम करने का विचार नहीं है, बल्कि जीवन जीने का एक तरीका है, जो कहता है कि जितना अधिक समय ताजी हवा और प्राकृतिक वातावरण में बिताया जाए, उतना ही बेहतर। शोध भी इस सोच का समर्थन करते हैं।

कोविड-19 महामारी के दौरान बर्लिन में रहने वाले 20 और 30 वर्ष की उम्र के अंतरराष्ट्रीय छात्रों पर किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि जो छात्र नियमित रूप से अपने घर के आसपास के पार्कों में जाते थे, उनके सामाजिक संबंध बेहतर बने रहे और उनका मानसिक तथा भावनात्मक स्वास्थ्य भी अधिक अच्छा था। कोपेनहेगन में तो शिक्षकों और मनोचिकित्सकों ने विशेष रूप से विकसित किए गए जंगलों और ‘थेरेपी गार्डन’ को तनाव दूर करने और आत्मचिंतन के स्थान के रूप में अपनाया है। इन स्थानों पर आने वाले लोगों को सलाह दी जाती है कि वे अपनी रफ्तार धीमी करें, आसपास की आवाजों, खुशबुओं और प्राकृतिक दृश्यों को महसूस करें तथा कुछ समय के लिए काम और तकनीक की निरंतर भागदौड़ से खुद को अलग रखें।

यही साधारण-से दिखने वाले पार्क तनाव और मानसिक थकान से राहत देने वाले स्थान बन जाते हैं। कम सुविधाओं वाले शहरों में भी दफ्तर जाने से पहले 10-15 मिनट की सैर या दिन खत्म होने पर किसी स्थानीय पार्क में कुछ समय बिताना लगभग वही लाभ दे सकता है। इस बात की पुष्टि 2026 में अमेरिका के नॉर्थ कैरोलाइना के रैले शहर में हुए एक अध्ययन से भी हुई।

इसमें पाया गया कि कॉलेज के छात्र केवल 10 मिनट तक पार्क की बेंच पर बैठकर पक्षियों की चहचहाहट सुनने के बाद पहले की तुलना में कम तनावग्रस्त और अधिक तरोताजा महसूस कर रहे थे। प्रकृति को दिनचर्या का हिस्सा बनाने के पांच आसान तरीके : दोपहर का भोजन खुले वातावरण में करें। किसी पार्क की बेंच या पेड़ की छांव में बैठकर खाना खाएं।

इससे मन को नया उत्साह मिलता है। हरियाली वाला रास्ता चुनें। यदि संभव हो तो दफ्तर या घर जाते समय पार्क, नदी किनारे या पेड़ों से घिरी सड़क से होकर गुजरें।

रोज 10 मिनट का ‘नेचर ब्रेक’ लें। मोबाइल फोन अलग रख दें, धीरे-धीरे चलें और आसपास की आवाजों, रंगों और प्राकृतिक दृश्यों को महसूस करें। चलते-चलते बातचीत करें।

बैठक या दोस्तों से मुलाकात कमरे में बैठकर करने के बजाय पार्क या खुले स्थान में टहलते हुए करें। प्रकृति में बार-बार लौटने की वजह खोजें। पक्षी-दर्शन, प्रकृति भ्रमण, वृक्षारोपण या स्वयंसेवी कार्यक्रमों में शामिल हों, ताकि बाहर निकलना आपकी आदत बन जाए।

कोपेनहेगन में बिताए गए समय ने प्रकृति के प्रति मेरी सोच बदल दी। वहां के पार्क निस्संदेह बेहद सुंदर थे, लेकिन सबसे ज्यादा प्रभावित वहां के लोगों की सोच ने किया। उन्होंने मुझे यह एहसास कराया कि प्रकृति से जुड़ने के लिए हर बार सप्ताहांत की लंबी यात्रा की योजना बनाने की जरूरत नहीं होती।

कई बार सुकून और ताजगी हमें अपने घर, दफ्तर या मोहल्ले के आसपास मौजूद उसी हरियाली में मिल सकती है, जिसे हम रोज देखते तो हैं, लेकिन महसूस करने के लिए कभी रुकते नहीं।

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