अपने दुश्मनों को छोड़ता नहीं है 'मोसाद', 20 साल तक घूम-घूमकर आरोपियों का किया था खात्मा

अपने दुश्मनों को छोड़ता नहीं है 'मोसाद', 20 साल तक घूम-घूमकर आरोपियों का किया था खात्मा

हिन्दुस्तान के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक दफा दुश्मनों के लिए कहा था कि हम पहले किसी को छेड़ते नहीं और किसी ने छेड़ा तो हम छोड़ते नहीं हैं। जैसा भारत का रवैया रहा है दुश्मनों के प्रति ठीक वैसे ही मित्र देश इजराइल की खुफिया एजेंसी पर लागू होता है।

राजधानी दिल्ली में स्थित इजरायली दूतावास के बाहर शुक्रवार को एक धमाका हुआ। इस धमाके के बाद से भारतीय और इजरायली खुफिया एजेंसी सक्रिय हो गईं और तमाम सबूत जुटाने लगी। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद भी इस मामले की तहकीकात कर रही है। जिस प्रकार भारत की रॉ, अमेरिकी की सीआईए, इंग्लैंड की एमआईसिक्स हैं उसी प्रकार इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद है और मोसाद अपने दुश्मनों को कभी नहीं छोड़ता है। 

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हिन्दुस्तान के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक दफा दुश्मनों के लिए कहा था कि हम पहले किसी को छेड़ते नहीं और किसी ने छेड़ा तो हम छोड़ते नहीं हैं। जैसा भारत का रवैया रहा है दुश्मनों के प्रति ठीक वैसे ही मित्र देश इजराइल की खुफिया एजेंसी पर लागू होता है। खुफिया एजेंसी मोसाद किसी प्रलय से कम नहीं है वह अपने दुश्मनों को कभी माफ नहीं करता, भले ही उसे कितना अधिक समय क्यों न लगे। हम आपको ऐसा ही एक किस्सा बताने जा रहे हैं। इतिहास के पन्नों में झांके तो इसे रैथ ऑफ गॉड (Wrath Of God) यानी की खुदा का कहर नाम दिया गया।

क्या है खुदा का कहर ?

साल 1972 में म्यूनिख ओलंपिक में दुनियाभर के खिलाड़ी एकत्रित हुए थे। इस दौरान एक ऐसी घटना हुई, जिसमें इजराइल के 11 खिलाड़ियों को होटल में मार दिया गया। अपने खिलाड़ियों की मौत की खबर सुनकर इजराइल सरकार काफी गुस्से में आ गई और बदला लेने की योजना बनाई गई और 11 अपराधियों को टारगेट किया गया।

अपराधियों को ठिकाने लगाने के लिए इजराइल सरकार ने अपनी सबसे खूंखार एजेंसी मोसाद को मिशन सौंपा। फिर क्या था टॉम क्रूज की फिल्म मिशन इम्पॉसिबल की तरह मोसाद ने सभी को मार गिराया। माइकल बार ज़ोहर और निस्सिम मिशल की किताब 'मोसाद' में खुदा के कहर का जिक्र है। मोसाद का यह मिशन करीब 20 साल तक चला था और इसके लिए उन्होंने बहुत से देशों के प्रोटोकॉल तोड़ते हुए अपने सभी 11 खिलाड़ियों की मौत का बदला लिया था। 

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मोसाद ने मौत का बदला भी ऐसे लिया था कि दुश्मनों की रूह तक कांप जाए। बताया जाता है कि मोसाद ने सभी 11 अपराधियों को 11-11 गोलियां मारी थी। यह भी कहा जाता है कि मोसाद ने सभी 11 अपराधियों के परिवार के बुके के साथ एक नोट भेजा था। जिसमें लिखा था- यह याद दिलाने के लिए कि न हम भूलते हैं और न ही माफ करते हैं।

कब हुई थी स्थापना ?

मोसाद की स्थापना 13 दिसंबर 1949 में हुई थी। मोसाद को देश की सुरक्षा मजबूत करने, विदेश के राजनीतिक विभागों के साथ समन्वय और सहयोग बढ़ाने के लिए स्थापित किया गया था। हालांकि, साल 1951 में मोसाद को पुनर्गठित किया गया था और प्रधानमंत्री कार्यालय का एक हिस्सा बनाया गया। मोसाद के स्थापना के पीछे का असल उद्देश्य आतंकवाद को समाप्त करने के लिए हुआ था।