दोस्त रूस ने तो भारत की लॉटरी लगा दी! क्या है दुनिया का पहला परमाणु आइसब्रेकर?

लेनिन समुद्र में उतरा तो अमेरिका समेत पूरी दुनिया दंग रह गई। अब परमाणु ऊर्जा से चलने वाला दुनिया का यह पहला सतह का जहाज है। इसकी ताकत का अंदाजा आप इस बात से लगाइए कि इसे बार-बार बंदरगाह पर तेल भरने के लिए नहीं रुकना पड़ता है। इतना ही नहीं यह रूस की उस आर्कटिक महत्वाकांक्षा की पहली बड़ी जीत थी जिसने उसे इस क्षेत्र का अघोषित राजा बना दिया। इतना ही नहीं एफएसयूई के विशेषज्ञ व्लादमीर के आंकड़े किसी के भी होश उड़ा सकते हैं। लेनिन ने 30 साल तक लगातार सेवा की।
आज से करीब 65 साल पहले रूस ने सफेद मौत के साम्राज्य को चुनौती दी थी। एक ऐसी चुनौती जिसने दुनिया का भूगोल और इतिहास बदल दिया था। दुनिया के पहले परमाणु ऊर्जा से चलने वाले सिविलियन जहाज लेनिन सिर्फ एक आइस ब्रेकर नहीं था। यह सोवियत संघ का यानी इस समय के रूस और उस समय के सोवियत संघ का वो न्यूक्लियर जिद था जिसने बर्फ की दीवार को हमेशा हमेशा के लिए तोड़ दिया। आज 2026 में इस पुराने जहाज की बात इसलिए हो रही है क्योंकि लेनिन ने जो रास्ता बनाया था आज उसी रास्ते पर भारत और रूस की दोस्ती की सबसे बड़ी इबारत लिखी जा रही है। 1950 के दशक की शीत युद्ध चरम पर था। परमाणु ऊर्जा का मतलब केवल एटम बम समझा जाता था। लेकिन 17 जुलाई 1956 को सेंट पीटर्सबर्ग यानी तब का लेनिन ग्रा एडमिलिट्री शिपयार्ड में कुछ ऐसा हुआ जिसने विज्ञान की दिशा बदल दी। वहां लेनिन की नींव रखी गई। रूस चाहता था कि एक ऐसा जहाज बने जो बिना रुके, बिना ईंधन खत्म हुए महीनों तक आर्कटिक की 2 से 3 मीटर मोटी बर्फ को कागज की तरह फाड़ सके और 3 सितंबर 1959 को यह चमत्कार हकीकत बन गया। जब लेनिन समुद्र में उतरा तो अमेरिका समेत पूरी दुनिया दंग रह गई। अब परमाणु ऊर्जा से चलने वाला दुनिया का यह पहला सतह का जहाज है। इसकी ताकत का अंदाजा आप इस बात से लगाइए कि इसे बार-बार बंदरगाह पर तेल भरने के लिए नहीं रुकना पड़ता है। इतना ही नहीं यह रूस की उस आर्कटिक महत्वाकांक्षा की पहली बड़ी जीत थी जिसने उसे इस क्षेत्र का अघोषित राजा बना दिया। इतना ही नहीं एफएसयूई के विशेषज्ञ व्लादमीर के आंकड़े किसी के भी होश उड़ा सकते हैं। लेनिन ने 30 साल तक लगातार सेवा की।
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30 साल का महापराक्रम
सबसे पहला पॉइंट है 26 आर्किटिक नेविगेशन। इसने नॉर्दन सी रूट को एक व्यापारिक मार्ग में बदल दिया। दूसरा है 3741 जहाज। लेनिन ने अकेले करीब 3/4000 जहाजों को बर्फ के बीच से सुरक्षित रास्ता भी दिया है। 6,54,000 समुद्री मील यह दूरी पृथ्वी के 30 चक्कर लगाने के बराबर है। अब आप खुद सोचिए दोस्तों कि अगर लेनिन ना होता तो आज रूस का वो उत्तरी तट व्यापार के लिए कभी खुल ही ना पाता। लेनिन ने यह साबित कर दिखाया कि परमाणु आइस ब्रेकर ही भविष्य है और आज रूस के पास 40 से ज्यादा आइस ब्रेकर है जिनमें आठ परमाणु शक्ति से भी लैस हैं। यह दुनिया का सबसे बड़ा बेड़ा है और इसकी नींव इसी लेनिन ने रखी थी।
भारत और रूस इस बर्फीले रास्ते पर एक साथ क्यों आ रहे हैं?
अक्टूबर 2024 में नई दिल्ली में एक ऐतिहासिक बैठक होती है। भारत के जहाज रानी मंत्रालय और रूस की परमाणु दिग्गज रूसाटम के बीच एक वर्किंग ग्रुप बनता है। इसका मकसद है नॉर्दर्न सी रूट यानी एनएसआर को भारत के लिए मेन स्ट्रीम बनाना। भारत के लिए यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि इसके तीन बड़े कारण हैं। पहला है समय की बचत। स्वेज नहर के मुकाबले यह रास्ता यूरोप तक पहुंचने में 40% कम लेता है। दूसरा है सुरक्षा। लाल सागर यानी रेड सी में जहाजों पर हमले हो रहे हैं। लेकिन आर्कटिक का रास्ता पूरी तरह सुरक्षित और रूस के नियंत्रण में है। तीसरा मुख्य पॉइंट है ऊर्जा सुरक्षा। भारत रूस से कच्चा तेल और कोयला मंगाता है और यह रास्ता इस सप्लाई को तेज और सस्ता बना देता है। आज भारत न सिर्फ इस रास्ते का इस्तेमाल कर रहा है बल्कि रूस के साथ मिलकर विशाल बुनियादी ढांचे का निर्माण भी कर रहा है और यह दोस्ती का वो स्तर है वो प्रमाण है जहां रूस अपनी सबसे एडवांस तकनीक भारत के साथ साझा कर रहा है और इस वक्त कर रहा है। आज लेनिन रिटायर हो चुका है और मूरमास बंदरगाह पर एक भव्य संग्रहालय के रूप में खड़ा है। यह पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र तो है ही, लेकिन यह रूस की उस तकनीक की विरासत का जीता जागता सबूत भी है।
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आर्कटिक में रूस का साझेदार बना भारत
लेनिन से शुरू हुआ यह सफर आज आर्कटिका और साइबेरिया जैसे नए महाशक्तिशाली जहाजों पर पहुंच चुका है। इतना ही नहीं रूस आज आर्कटिक में जो भी कर रहा है भारत उसमें इसका सबसे बड़ा साझेदार बनकर उभर चुका है। यह साझेदारी आने वाली सदी की ग्लोबल सप्लाई चेन को बदल कर रख देगी और इतिहास भी बदल दी जाएगी। लेकिन दोस्तों वो कहा जाता है ना कि संकट का साथी ही असली मित्र होता है और वैश्विक राजनीति के मंच पर अगर किसी दो देशों की दोस्ती इस मुहावरे पर सटीक बैठती है, फिट बैठती है तो वो है भारत और रूस की पक्की दोस्ती। पिछले सात दशकों में दुनिया का भूगोल बदल गया। महाशक्तियां बदल गई और युद्धों के कारण समीकरण बदल गए। लेकिन नई दिल्ली और मॉस्को के बीच का भरोसा कभी खत्म नहीं हुआ। भारत रूस यानी तब का सोवियत संघ की दोस्ती की शुरुआत भारत की आजादी के तुरंत बाद हो गई थी। नॉर्दर्न सीट यानी एनएसआर के जरिए भारत और रूस एक ऐसा समुद्री रास्ता तैयार कर रहे हैं जो स्वेज नहर के मुकाबले 40% छोटा और सस्ता है। भारत और रूस की यारी दोस्ती कोई मजबूरी नहीं है बल्कि एक ऐतिहासिक जरूरत भी है। रूस को अपनी अर्थव्यवस्था के लिए भारत जैसे विशाल बाजार और भरोसेमंद दोस्त की जरूरत है। तो दूसरी तरफ भारत को अपनी रक्षा, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक संतुलन के लिए रूस के साथ की बहुत ज्यादा आवश्यकता है। अब लेनिन आइस ब्रेकर की तरह ही यह दोस्ती भी वक्त की जमी हुई बर्फ को काटकर भविष्य का रास्ता बनाने का दम रखती है।
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